खास खबर

खास खबर (508)

नई दिल्ली ।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला हो। कोर्ट ने कहा कि यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का मूल तत्व है। दो व्यक्ति जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हैं, उसमें आपत्ति करने का किसी को अधिकार नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज नकवी एवं न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने कुशीनगर के सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार उर्फ आलिया की याचिका पर दिया है। खंडपीठ ने कहा की हम यह समझने में नाकाम हैं कानून जब दो व्यक्तियों, चाहे वे समान लिंग के ही क्यों न हों, को शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है तो किसी को भी व्यक्ति, परिवार या राज्य को उनके रिश्ते पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है। खंडपीठ ने प्रियांशी उर्फ़ समरीन और नूरजहां बेगम उर्फ़ अंजली मिश्रा के केस में इसी हाईकोर्ट की एकल पीठ के निर्णयों से असहमति जताते हुए कहा कि दोनों मामलों में दो वयस्कों को अपनी मर्जी से साथी चुनने और उसके साथ रहने की स्वतंत्रता के अधिकार पर विचार नहीं किया गया है। ये फैसले सही कानून नहीं हैं। याचियों का कहना था कि दोनों बालिग हैं और 19 अक्टूबर 2019 को उन्होंने मुस्लिम रीति रिवाज से निकाह किया है । इसके बाद प्रियंका ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया है और एक साल से दोनों पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं। प्रियंका के पिता ने इस रिश्ते का विरोध करते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई है जिसके खिलाफ उन्होंने याचिका दाखिल की थी। याचिका का विरोध करते हुए सरकारी वकील ने कहा कि सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन करना प्रतिबंधित है और ऐसे विवाह की कानून में मान्यता नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि हम याचियों को हिंदू व मुस्लिम की नजर से नहीं देखते। ये दो बालिग हैं जो अपनी मर्जी और पसंद से एक वर्ष से साथ रह रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि निजी रिश्तो में हस्तक्षेप करना व्यक्ति की निजता के अधिकार में गंभीर अतिक्रमण है, जिसका उसे संविधान के अनुच्छेद 21 में अधिकार प्राप्त है। इसी के साथ कोर्ट एक युवती के पिता की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर खारिज कर दी है। याचिका में कुशीनगर के विष्णुपुरा थाने में 25 अगस्त 2019 को दर्ज आईपीसी की धारा 363, 366, 352, 506 और पोक्सो एक्ट की धारा 7/8 की एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी।

डाइट में ये फूड शामिल करना जरूरी
नई दिल्ली। कोरोना के मरीजों को डाक्टर्स द्वारा शरीर में विटामिन डी की पूर्ति करने की सलाह दी जाती है। ये एक इकलौता विटामिन है, जिसे शरीर में सूरज की रोशनी से उत्पन्न किया जा सकता है और इन फूड्स को शामिल करके भी शरीर में इसकी मात्रा को बढ़ा सकते हैं। विटामिन डी इंसान के शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। वैसे तो विटामिन डी इंसान के शरीर में सूरज के संपर्क में प्रतिक्रिया के रूप में बनता है। इसके अलावा इंसान कुछ खाद्य पदार्थों या सप्लीमेंट के जरिए भी शरीर में विटामिन डी की आवश्यकता को पूरा कर सकता है।
विटामिन डी की बदौलत ही शरीर में हड्डियों और दांत स्वस्थ बने रहते हैं। इसके अलावा विटामिन डी टाइप-1 डायबिटीज जैसी कई बीमारियों और सिचुएशन से भी मदद करता है। विटामिन डी सिर्फ एक विटामिन नहीं है, बल्कि एक हार्मोन है। विटामिन ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जिन्हें शरीर नहीं बना पाता है। इसके लिए एक मनुष्य को डाइट में इनको शामिल करना चाहिए। जबकि बॉडी विटामिन डी को बना सकती है। यहां हम आपको विटामिन डी के लाभों के बारे में बता रहे हैं। इसके अलावा ये जानकारी दे रहे हैं कि अपनी डाइट में किन फूड्स को शामिल करने पर आप शरीर में विटामिन डी की पूर्ति कर सकते हैं। इसके अलावा शरीर में विटामिन डी को किन-किन तरीकों से बढ़ाया जा सकता है। विटामिन डी शरीर में बहुत योगदान करता है। इसके सेवन से स्वस्थ हड्डियों और स्वस्थ दांत प्रदान करता है। इससे इम्यून सिस्टम में बढ़ावा होता है, ब्रेन और नर्वस सिस्टम स्वस्थ रखता है। विटामिन डी शरीर में इंसुलिन के लेवल को विनियमित करता है और डाइबिटीज मैनेजमेंट को सपोर्ट करता है। ये फेफड़े की कार्यक्षमता और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है। सबसे खास बात ये है कि आप विटामिन डी लेवल को कई पोषक तत्वों को सूरज की रोशनी और डाइट में कई विटामिन डी से भरपूर चीजों को शामिल करके बढ़ा सकते हैं। यहां हम आपको उन फूड्स के बारे में बता रहे हैं जो कि शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बढ़ाते हैं।मशरूम के सेवन से शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। पाश्चराइज्ड दूध, अनाज और जूस के सेवन से शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। विटामिन डी के सही से प्रोडक्शन के लिए रोजाना एक्सरसाइज करना चाहिए। जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है उनके लिए इसका सेवन करना बहुत ज्यादा जरूरी होता है।
अगर आपको शरीर में ऐसी कमी महसूस हो रही है तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर या हेल्थ सर्विस प्रोवाइडर से मदद ले सकते है। वैसे ध्यान देने वाली बात ये है कि विटामिन डी एक ऐसा पोषक तत्व है जो कि सूरज की रोशनी में आने से बन सकता है। इसलिए कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों में इसकी कमी को पूरा करने के लिए रोजाना धूप में बैठने और इससे संबंधित फूड्स को शामिल करने की सलाह दी जाती है। फैटी फिश जैसे सैल्मन, मैकेरल और टूना के सेवन से शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। अंडे की जर्दी के सेवन से शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। बीफ लिवर के सेवन से शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।

ब्रह्मोस की शक्ति का अहसास इससे भी हो जाता है कि चीनी सेना कहती रही है कि भारत द्वारा अरूणाचल सीमा पर ब्रह्मोस की तैनाती किए जाने से उसके तिब्बत और यूनान प्रांत पर खतरा मंडराने लगा है। यह देश की सबसे आधुनिक और दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल मानी जाती है।

भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ ने परीक्षण का एक और दौर पार करते हुए भारतीय नौसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है। हाल ही में नौसेना के स्वदेशी विध्वंसक पोत ‘स्टील्थ डिस्ट्रॉयर आईएनएस चेन्नई’ से इस मिसाइल परीक्षण के दौरान अरब सागर में एक लक्ष्य पर निशाना साधा गया और ‘ब्रह्मोस’ ने उसे बेहद सटीकता से भेद दिया। इससे पहले 30 सितम्बर को भी ओडिशा के चांदीपुरा में ब्रह्मोस के सतह से सतह पर मार करने वाले नए प्रारूप का सफल परीक्षण किया गया था। ब्रह्मोस भारत के लिए सामरिक दृष्टिकोण से कितनी महत्वपूर्ण है, यह इसी से स्पष्ट है कि दुनिया का सबसे बेहतरीन ऑटोमेटिक इलैक्ट्रॉनिक गाइडेड मिसाइल इंटरसेप्ट सिस्टम भी 20-30 ब्रह्मोस मिसाइलों को अकेले नहीं रोक सकता। डीआरडीओ के मुताबिक ब्रह्मोस एक ‘प्राइम स्ट्राइक वेपन’ है, जिससे हमारे जंगी जहाजों को लंबी दूरी तक सतह से सतह पर वार करने में मदद मिलेगी।
ब्रह्मोस की शक्ति का अहसास इससे भी हो जाता है कि चीनी सेना कहती रही है कि भारत द्वारा अरूणाचल सीमा पर ब्रह्मोस की तैनाती किए जाने से उसके तिब्बत और यूनान प्रांत पर खतरा मंडराने लगा है। यह देश की सबसे आधुनिक और दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल मानी जाती है, जो पहाड़ों की ओट में छिपे दुश्मन के ठिकानों को भी निशाना बना सकती है। भारत जिस प्रकार पिछले कुछ दिनों से एक के बाद सफल मिसाइल परीक्षण कर रहा है, वह टाइमिंग के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है और इसे भारत-चीन के बीच गहरा रहे सीमा विवाद के समय में चीन को कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय वायुसेना और नौसेना के बेड़े में शामिल चुनिंदा सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल ब्रह्मोस के सफल परीक्षणों के बाद तो भारत की सामरिक ताकत काफी बढ़ गई है। यह अमेरिका की टॉम हॉक मिसाइल के मुकाबले करीब चार गुना तेजी से हमला कर सकती है। टॉम हॉक के मुकाबले इसकी प्रारंभिक गतिज ऊर्जा करीब 32 गुना अधिक है।

दुश्मन के लिए बेहद खतरनाक मानी जाने वाली ब्रह्मोस भारत-रूस के संयुक्त प्रयासों द्वारा विकसित की गई अब तक की सबसे भरोसेमंद आधुनिक प्रक्षेपास्त्र प्रणाली है, जिसने भारत को मिसाइल तकनीक में अग्रणी देश बना दिया है। इसे राफेल तथा सुखोई-30एमकेआई के अलावा नौसेना के मिग-29के में भी तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस को रूस के एनपीओ मैशिनोस्ट्रोनिया (एनपीओएम) के साथ मिलकर भारत के डीआरडीओ ने तैयार किया है। रूस द्वारा इस परियोजना में प्रक्षेपास्त्र तकनीक उपलब्ध कराई जा रही है जबकि उड़ान के दौरान मार्गदर्शन करने की क्षमता डीआरडीओ द्वारा विकसित की गई है। ब्रह्मोस की रेंज पहले 290 किलोमीटर तक थी, जिसे बढ़ाकर 400 किलोमीटर से ज्यादा कर दिया गया है। पलक झपकते ही दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने के लिए ब्रह्मोस को पनडुब्बी, युद्धपोत, लड़ाकू विमान या जमीन से अर्थात् कहीं से भी दागा जा सकता है। यह प्रमुख रूप से पनडुब्बियों, जहाजों और नौकाओं को निशाना बनाने में मददगार साबित होगी। ब्रह्मोस रैमजेट सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ध्वनि की रफ्तार से भी तीन गुना तेजी से अपने लक्ष्य पर वार कर सकती है। इसकी रफ्तार करीब 3457 किलोमीटर प्रति घंटा है और इसकी बड़ी विशेषता यह है कि यह आसानी से दुश्मन के रडार से बच निकलने में सक्षम है। ‘ब्रह्मोस’ नाम दो नदियों, भारत की ब्रह्मपुत्र नदी के ‘ब्रह्म’ और रूस की मोस्क्वा नदी के ‘मोस’ को मिलाकर बना है।

यह मध्यम दूरी तक मार करने वाली रैमजेट इंजन युक्त सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। अभी तक चीन और पाकिस्तान के पास भी ऐसी क्रूज मिसाइलें नहीं हैं, जिन्हें जल, थल और नभ तीनों जगहों से दागा जा सकता है। क्रूज प्रक्षेपास्त्र वे होते हैं, जो कम ऊंचाई पर भी बहुत तेज गति से उड़ान भरते हैं और दुश्मन देशों के रडार की नजरों से बचे रहते हैं। ब्रह्मोस 10 मीटर की ऊंचाई पर भी उड़ान भर सकती है और यह रडार के साथ-साथ किसी भी अन्य मिसाइल पहचान प्रणाली को धोखा देने में सक्षम है, इसीलिए इसे मार गिराना लगभग असंभव है। डीआरडीओ रूस के सहयोग से ब्रह्मोस की मारक दूरी बढ़ाने के साथ इन्हें हाइपरसोनिक गति पर उड़ाने पर भी कार्य कर रहा है। यह दो सैकेंड के भीतर 14 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हवा में ही रास्ता बदल सकती है और फिर भी अपने निर्धारित लक्ष्य को सटीकता से भेद सकती है। यह अपने लक्ष्य के करीब पहुंचने से महज 20 किलोमीटर पहले अपना रास्ता बदल सकने वाली तकनीक से लैस है। ध्वनि के वेग से करीब तीन गुना अधिक 2.8 मैक गति से अपने लक्ष्य पर जबरदस्त प्रहार करने में सक्षम यह दुनिया में अपनी तरह की ऐसी एकमात्र क्रूज मिसाइल है, जिसे सुपरसॉनिक गति से दागा जा सकता है। इसके दागे जाने के बाद दुश्मन को संभलने का मौका ही नहीं मिलता क्योंकि यह पलक झपकते ही दुश्मन के ठिकाने को नष्ट कर सकती है।
रैमजेट इंजन की मदद से इसकी मारक क्षमता को तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यदि किसी मिसाइल की क्षमता 100 किलोमीटर दूरी तक है तो उसे इस इंजन की मदद से बढ़ाकर 320 किलोमीटर तक किया जा सकता है। आम मिसाइलों के विपरीत ब्रह्मोस हवा को खींचकर रैमजेट तकनीक से ऊर्जा प्राप्त करती है और 1200 यूनिट ऊर्जा पैदा कर अपने लक्ष्य को तहस-नहस कर सकती है। ब्रह्मोस की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि इसे पारम्परिक प्रक्षेपक के अलावा वर्टिकल अर्थात् नौसैनिक प्लेटफार्म से लंबवत और झुकी हुई दोनों ही अवस्था में दागा जा सकता है और ये हवा में ही मार्ग बदल कर चलते-फिरते लक्ष्य को भेदने में भी सक्षम है। ब्रह्मोस के दागे जाने के बाद लक्ष्य तक पहुंचते-पहुंचते उसका लक्ष्य अपना मार्ग बदल ले तो यह मिसाइल भी उसी के अनुरूप अपना मार्ग बदल लेती है और उसे आसानी से निशाना बना लेती है। बहरहाल, नई तकनीक से विकसित ब्रह्मोस के नए संस्करणों के सफल परीक्षण के बाद भारतीय सेना के तीनों अंगों की मारक क्षमता और बढ़ गई है और अब ब्रह्मोस की बदौलत भारत जल, थल तथा नभ तीनों ही जगह अपने लक्ष्य को सटीकता के साथ भेदने की क्षमता हासिल करते हुए दुश्मन के ठिकानों को पलक झपकते ही नेस्तनाबूद करने में सक्षम हो गया है।

-योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं)

करवा चौथ भारतीय हिंदू संस्कृति में सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। पति पत्नी के प्रेम और समर्पण का प्रतीक करवा चौथ का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बड़े उत्साह व उमंग से मनाया जाता है।इस बार यह पर्व 4 नवंबर को मनाया जाएगा। विवाहित स्त्रियां करवा चौथ का व्रत अपने पति की दीर्घायु, सुखद दांपत्य जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती है। पति पत्नी के रिश्ते में प्यार आस्था समर्पण एवं विश्वास को और प्रगाढ़ करने वाला यह पर्व उनके दांपत्य जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है।यही वजह है कि सदियों से चली आ रही है इस परंपरा को आज भी बड़े श्रद्धा व विश्वास से निभाया जा रहा है।
करवा चौथ के व्रत में सास द्वारा बहु को दी जानेवाली सरगी का विशेष महत्व होता है। सास तारों की छांव में सूरज उदय होने से पूर्व,अपनी बहू को कपड़े, सुहाग की वस्तुएं जैसे चूड़ी, बिंदिया, सिंदूर,मेहंदी,फ्रूट्स,ड्राई फ्रूट्स, नारियल, मिठाई आदि एक थाली में रखकर देती है। जिससे सरगी कहा जाता हैं।करवा चौथ का व्रत सास की दी हुई सरगी खाने के बाद ही व्रत की शुरुआत होती है।ऐसा मानना है कि सास बहू को सुहाग की चीजें देकर अपना स्नेह और आभार जताती है कि वह उसके पुत्र की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत कर रही है। तथा सांय में व्रत कथा सुनने के बाद बहू करवा पर हाथ फेर कर, बया के रूप में करवा,कपड़े,मिठाई व शगुन सास को भेंट कर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती है। बहु भी अपनी सास को कपड़े, मिठाई व शगुन देकर आभार जताती है कि आपने मेरे पति के रूप में ऐसा सयोग्य पुत्र को जन्म दिया।जिसके फलस्वरूप मुझे सुहागन स्त्री होने का सौभाग्य नसीब हुआ।

अब पति भी रखने लगे व्रत

सदियों से चली आ रही इस परंपरा में,महिलाएं ही अपने पति की दीर्घायु के लिए उपवास रखती है। लेकिन अब बदलते परिवेश में जहां महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर आने लगी है तो अब पुरुष भी अपनी पत्नी का साथ देते हुए व्रत रखने लगे हैं।इससे पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार, समर्पण, आस्था और विश्वास में और अधिक मजबूती आती है।

आधुनिकता के दौर में ऑन लाइन चांद का दीदार

आधुनिकता की दौड़ में ऑनलाइन चांद का दीदार ओर तौर -तरीके अपनाए जाने से करवा चौथ का त्यौहार भी इससे अछूता नहीं है। आज दूर सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले,व सेना में कार्यरत फौजी पति के दीदार ऑन लाइन वीडियो कॉल से करके उनकी पत्नी व्रत खोलती है। व्हाट्सएप फेसबुक वीचैट आदि के माध्यम से वीडियो कॉलिंग कर एक दूसरी कमी को पूरा करते हैं और चांद के साथ अपने चांद का दीदार कर फिर व्रत खोलती है आधुनिकता के आधुनिक तरीके अपनाकर भी परंपरा को निभाने जाने की भारतीय महिलाओं की सोच को सलाम।

फ्रांस में हुए बेगुनाहों के कत्ल को लेकर अपनी राय रखते हुए मशहूर शायर मुनव्वर राना ने विवादित बयान दे डाला है. उन्होंने फ्रांस हमले में बेगुनाहों का कत्ल करने वाले का बचाव किया.

मुनव्वर राना ने तर्क देते हुए कहा कि अगर मजहब मां के जैसा है, अगर कोई आपकी मां का, या मजहब का बुरा कार्टून बनाता है या गाली देता है तो वो गुस्से में ऐसा करने को मजबूर है. साथ ही पीएम मोदी के आतंकवाद फैलाने के बयान पर कहा कि ये राफेल की दरकार है, जो उन्हें ऐसा बयान देना पड़ा है. 

उन्होंने कहा कि मुसलमानों को चिढ़ाने के लिए ऐसा कार्टून बनाया गया. दुनिया में हजारों बरस से ऑनर किलिंग होती है, अखलाक मामले में क्या हुआ, लेकिन तब किसी को तकलीफ नहीं हुई. किसी तो इतना मजबूर न करो कि वो कत्ल करने पर मजबूर हो जाए. 
बता दें कि पीएम मोदी ने फ्रांस में हुए आतंकी हमलों की निंदा की थी. उन्होंने ट्वीट करके कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत हमेशा फ्रांस के साथ खड़ा है. हमारी संवेदनाएं इन हमलों के पीड़ितों के परिवारों और फ्रांस की जनता के साथ हैं. 

वहीं, शनिवार को गुजरात के केवड़िया में एकता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के कार्टून विवाद पर कहा कि कुछ लोग आतंक के समर्थन में खुलकर आ गए हैं. पिछले दिनों पड़ोसी देश से जो खबरें आईं हैं, जिस प्रकार वहां की संसद में सत्य स्वीकारा गया है, उसने इन लोगों के असली चेहरों को देश के सामने ला दिया है.

नई दिल्ली । कोविड-19 के संक्रमण से सुरक्षा के लिए रासायनिक कीटाणुनाशक और साबुन से बार-बार हाथ धोने से हाथ रूखे हो जाते हैं और कई बार उनमें खुजली भी होती है। इस समस्या से बचाने के लिए कई नये उपाय किए जा रहे हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित कई स्टार्ट-अप अब पारंपरिक रासायनिक-आधारित डेकोटेमिनेंट्स के लिए बहुत सारे व्यावहारिक विकल्प लेकर आए हैं जो सतहों और यहां तक कि माइक्रोकैविटी को भी कीटाणु रहित कर सकते हैं। उनके पास उपलब्ध तकनीकों में अस्पतालों में जमा होने वाले बायोमेडिकल कचरे के कीटाणुशोधन और आवर्तक उपयोग सतहों के स्थायी और सुरक्षित रोगाणुनाशन के लिए नोवल नैनोमैटेरियल और रासायनिक प्रक्रिया नवाचारों के इस्तेमाल से जुड़ी तकनीकें भी शामिल हैं। ये तकनीकें कुल 10 कंपनियों ने मुहैया करायी हैं जिन्हें सेंटर फोर ऑगेमेंटिंग वॉर विद कोविड-19 हेल्थ क्राइसिस (सीएडब्ल्यूएसीएच) के तहत कीटाणुशोधन और सैनिटाइजेशन के लिए मदद दी गयी थी। यह राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी उद्यमिता विकास बोर्ड (NSTEDB), विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की एक पहल है जिसका सोसाइटी फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप (एसआईएनई), आईआईटी-मुंबई ने कार्यान्वयन किया है। मुंबई आधारित स्टार्ट-अप इनफ्लोक्स वाटर सिस्टम्स ने कोविड-19 संदूषण से लड़ने की खातिर सतह और उपकरण कीटाणुशोधन के लिए एक प्रणाली का डिजाइन और विकसित करने के उद्देश्य से अपनी तकनीक में बदलाव किया। इस तकनीक को उन्होंने ‘वज्र’ नाम दिया है। यह स्टार्ट-अप जटिल प्रदूषित पानी और अपशिष्ट जल के शोधन की विशेषज्ञता रखता है। ‘वज्र केई’ सीरीज ओजोनपैदा करने वाले एक इलेक्ट्रोस्टैटिक डिस्चार्ज, और यूवीसीलाइट स्पेक्ट्रम के शक्तिशाली रोगाणुनाशन प्रभावों को शामिल करके कई चरणों वाली एक कीटाणुशोधन प्रक्रिया से युक्त कीटाणुशोधन प्रणाली का इस्तेमाल करता है। वज्र कवच-ई (केई) पीपीई पर मौजूद वायरस, बैक्टीरिया और अन्य माइक्रोबियल उपभेदों को निष्क्रिय करने के लिए उन्नत ऑक्सीकरण, इलेक्ट्रोस्टैटिक निर्वहन और यूवीसी प्रकाश स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करता है। यह पीपीई, मेडिकल और नॉनमेडिकल गियर को पुन: इस्तेमाल लायक बनाकर लागत बचाता है।

महिलाओं में आजकल थायरायड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
जागरुकता के अभाव में यह बीमारी कई महिलाएं युवावस्था में ही इस बिमारी से पीड़ित हो रही हैं। थाइरॉइड की वजह से अस्थमा, कोलेस्ट्रॉल की समस्या, डिप्रेशन, डायबिटीज, इंसोमनिया और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा है।
डॉक्टरों के अनुसार कुछ खास चीजों को खाने से थाइरॉइड बढ़ जाता है। ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि थाइरॉइड के दौरान किन चीजें को खाने से परहेज करना चाहिए।
आयोडीन वाला खाना:
थायरॉइड ग्लैंड्स हमारे शरीर से आयोडीन लेकर थायरॉइड हार्मोन पैदा करते हैं, इसलिए हाइपोथायरॉइड है तो आयोडीन की अधिकता वाली खाने-पीने की चीजों से जीवनभर दूरी बनाए रखें। सी फूड और आयोडीन वाले नमक से पूरी तरह दूर रहें।
कैफीन:
कैफीन वैसे तो सीधे थायरॉइड नहीं बढ़ाता, लेकिन यह उन परेशानियों को बढ़ा देता है, जो थायरॉइड की वजह से पैदा होती हैं, जैसे बेचैनी और नींद में खलल।
रेड मीट:
रेड मीट में कोलेस्ट्रॉल और सेचुरेडेट फैट बहुत होता है। इससे वजन तेजी से बढ़ता है। थायरॉइड वालों का वजन तो वैसे ही बहुत तेजी से बढ़ता है। इसलिए इसे न खायें। इसके अलावा रेड मीट खाने से थायरॉइड वालों को शरीर में जलन की शिकायत होने लगती है।
एल्कोहल:
एल्कोहल यानी शराब़, बीयर वगैरा शरीर में एनर्जी के स्तर को प्रभावित करता है। इससे थायरॉइड की समस्या वाले लोगों की नींद में दिक्कत की शिकायत और बढ़ जाती है। इसके अलावा इससे ओस्टियोपोरोसिस का खतरा भी बढ़ जाता है।
वनस्पति घी:
वनस्पति घी को हाइड्रोजन में से गुजार कर बनाया जाता है। यह अच्छे कोलेस्ट्रॉल को खत्म करते हैं और बुरे को बढ़ावा देते हैं। बढ़े थायरॉइड से जो परेशानियां पैदा होती हैं, ये उन्हें और बढ़ा देते हैं. ध्यान रहे इस घी का इस्तेमाल खाने-पीने की दुकानों में जमकर होता है। इसलिए बाहर का फ्राइड खाना न ही खाएं तो बेहतर होगा।

लंदन । वैज्ञानिकों का कहना है कि कोविड-19 के मामले में भारत में किए गए एक परीक्षण में गंभीर बीमारी के बढ़ने से रोकने और मौतों को घटाने में प्लाज्मा थेरेपी का सीमित असर ही देखने को मिला है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजे) में हुए अध्ययन में अप्रैल और जुलाई के बीच भारत के अस्पतालों में भर्ती कोविड-19 के हल्के लक्षण वाले 464 वयस्कों को शामिल किया गया था। प्लाज्मा पद्धति के तहत कोविड-19 से स्वस्थ हो चुके लोगों के प्लाज्मा से संक्रमित मरीजों का उपचार किया जाता है। अध्ययन के तहत 239 वयस्क मरीजों का मानक देखभाल के साथ प्लाज्मा पद्धति से उपचार किया गया, जबकि 229 मरीजों का मानक स्तर के तहत उपचार किया गया। एक महीने बाद सामान्य उपचार वाले 41 मरीजों (18 प्रतिशत मरीजों) की तुलना में प्लाज्मा दिए गए 44 मरीजों (19 प्रतिशत मरीजों) की गंभीर बीमारी बढ़ गई या किसी अन्य कारण से उनकी मौत हो गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक, हालांकि प्लाज्मा थेरेपी से 7 दिन बाद सांस लेने में दिक्कतें या बेचैनी की शिकायतें कम हुईं। अध्ययन करने वाली इस टीम में भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान तमिलनाडु के विशेषज्ञ भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने कहना है, ‘स्वस्थ हो चुके व्यक्ति के प्लाज्मा का कोविड-19 की गंभीरता को घटाने या मृत्यु के संबंध में जुड़ाव नहीं है।’
शोधकर्ताओं ने कहा कि प्लाज्मा दान करने वालों और इसे दिए जाने वाले व्यक्ति में एंटीबॉडी के पूर्व के आकलन से कोविड-19 के प्रबंधन में प्लाज्मा की भूमिका और स्पष्ट हो सकती है। ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्टिन लांड्रे ने कहा कि कोविड-19 के लिए संभावित उपचार के तौर पर प्लाज्मा पद्धति की तरफ रूझान दिख रहा है, लेकिन इस पर अनिश्चितता बनी हुई है कि बीमारी की गंभीर स्थिति से निपटने में क्या यह कारगर है। लांड्रे ने कहा, ‘प्लाज्मा पद्धति से उपचार का परीक्षण पूरा हो चुका है। हालांकि कुछ 100 मरीजों में ही इसके स्पष्ट परिणाम मिले हैं, जो कि बहुत कम संख्या है।’ उन्होंने कहा, ‘व्यापक स्तर पर फायदे नजर आने चाहिए और फिर भी यह सवाल बना रहेगा कि अलग-अलग तरह के मरीजों पर इसका क्या असर होता है।’ अध्ययन में शामिल किए गए मरीजों की न्यूनतम उम्र 18 साल थी और आरटी-पीसीआर के जरिए उनमें संक्रमण की पुष्टि की गई थी। भागीदारों को 24 घंटे में दो बार 200 मिलीलीटर प्लाज्मा चढ़ाया गया और मानक स्तर की देखभाल की गई।ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग में विषाणु विज्ञान के प्रोफेसर इयान जोन्स ने कहा, ‘इस परीक्षण में प्लाज्मा उपचार के कमजोर प्रदर्शन निराशाजनक हैं लेकिन यह बहुत आश्चर्यजनक नहीं हैं।’ उन्होंने कहा, ‘कोविड-19 को मात दे चुके मरीजों से एंटीबॉडीज को संक्रमित मरीजों को प्रदान करने का उपचार मूल रूप से एंटी-वायरल उपचार तरीका है और सभी एंटी-वायरल की तरह गंभीर संक्रमण को रोकने का अवसर बहुत कम होता है।’
पूर्व के अध्ययनों में भले ही प्लाज्मा पद्धति से मरीजों को फायदे की बात कही गई थी, लेकिन परीक्षण रोक दिए गए और कोविड-19 के मरीजों की मृत्यु रोकने में इसका कोई फायदा नहीं मिला। सीमित प्रयोगशाला क्षमता के साथ किए गए नए अध्ययन में कहा गया है कि प्लाज्मा पद्धति मृत्यु दर या बीमारी की गंभीरता को घटाता नहीं है।

 

लंदन । नए अध्ययन में दावा किया गया है, कि किसी व्यक्ति के शरीर में कोरोना संक्रमण से लड़ने वाला एंटीबॉडी तत्व महामारी के लक्षण महसूस होने के बाद, शुरुआती तीन हफ्तों में काफी तेजी से विकसित होता है और बीमारी की चपेट में आने के सात महीने बाद तक भी यह शरीर में मौजूद रहता है। एंटीबॉडी शरीर का वहां तत्व है, जिसका निर्माण हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली वायरस को बेअसर करने के लिए करती है। कोरोना से संक्रमित 300 रोगियों और इससे उबर चुके 198 लोगों पर किए गए अनुसंधान में बात सामने आई है।अनुसंधान में पाया गया कि सार्स-कोव-2 वायरस की चपेट में आने वाले लोगों के शरीर में छह महीने बाद भी एंटीबॉडी तत्व सक्रिय रहा। वैज्ञानिकों ने अस्पतालों में 300 से अधिक कोविड-19 रोगियों और स्वास्थ्य कर्मियों, 2500 यूनिवर्सिटी कर्मचारियों और कोरोना संक्रमण से उबर चुके 198 स्वयंसेवकों के शरीर में एंटीबॉडी स्तर का अध्ययन किया। अनुसंधान में पता चला कि 90 प्रतिशत लोगों के शरीर में कोविड-19 की चपेट में आने के सात महीने बाद भी एंटीबॉडी पाया गया।

 

नई दिल्ली । मोदी सरकार के तहत कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा लाए गए कुछ प्रमुख सुधारों के बारे में जानकारी देते हुए, केंद्रीय पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार के पुरुष कर्मचारी भी अब बच्चों की देखभाल से संबंधित अवकाश के हकदार होंगे। डॉ.सिंह ने कहा कि बच्चों की देखभाल से संबंधित अवकाश (सीसीएल) का प्रावधान और विशेषाधिकार केवल उन पुरुष कर्मचारियों के लिए उपलब्ध होगा जो "एकल पुरुष अभिभावक" हैं। इस श्रेणी में वैसे पुरुष कर्मचारी शामिल हो सकते हैं जो विधुर या तलाकशुदा या अविवाहित हैं और इस कारण एकल अभिभावक के रूप में उन पर बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी है। इस कदम को सरकारी कर्मचारियों के जीवन यापन को आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील सुधार बताते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इस संबंध में आदेश कुछ समय पहले जारी कर दिए गए थे, लेकिन किन्ही वजहों से जनता में इसका पर्याप्त प्रचार नहीं हो पाया।
इस प्रावधान में थोड़ी और ढील दिये जाने की जानकारी देते डॉ.जितेंद्र सिंह ने कहा कि बच्चों की देखभाल से संबंधित अवकाश पर जाने वाला कोई कर्मचारी अब सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति से मुख्यालय छोड़ सकता है। इसके अलावा, उस कर्मचारी द्वारा छुट्टी यात्रा रियायत (एलटीसी) का लाभ उठाया जा सकता है, भले ही वह बच्चों की देखभाल से संबंधित अवकाश पर हो। इस बारे में और अधिक जानकारी देते हुए, उन्होंने बताया कि बच्चों की देखभाल से संबंधित अवकाश की मंजूरी पहले 365 दिनों के लिए 100% सवेतन अवकाश और अगले 365 दिनों के लिए 80% सवेतन अवकाश के साथ दी जा सकती है।

 

Page 1 of 37

फेसबुक