राजनीति

राजनीति (2949)

नई दिल्ली.  भारत और मोरक्को ने एक समझौते पर दस्तखत किए हैं। इस समझौते के तहत दोनों देश आपराधिक मामलों में एक दूसरे की सहायता करने और जरूरत पड़ने पर कानूनी मदद प्रदान करेंगे। गृह मंत्रालय ने इस बात की जानकारी दी।  भारत की ओर से केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू और मोरक्को की ओर से न्याय मंत्री मोहम्मद औजर ने आपराधिक मामलों में आपसी कानूनी सहयोग पर समझौता किया।
गृह मंत्रालय के बयान में कहा गया कि समझौते से मोरक्को के साथ द्विपक्षीय सहयोग मजबूत होगा। अपराधों की रोकथाम, जांच और मुकदमे के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने में मदद मिलने के साथ ही आतंकवादी कृत्यों को वित्तीय मदद का पता लगाने, रोकने और इसे जब्त करने में सहायता भी मिलेगी। बयान में कहा गया है कि दोनों मंत्रियों ने संगठित अपराध और आतंकवाद से पैदा होने वाली चुनातियों का संयुक्त तौर पर मुकाबला करने के प्रति संकल्प जताया ।

लखनऊ. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार राम की नगरी अयोध्या और कृष्ण की नगरी मथुरा को तीर्थ स्थान घोषित कर वहां मांस-मदिरा की बिक्री तथा सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है ।  उप्र सरकार के प्रवक्ता और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने सोमवार को 'भाषा' से विशेष बातचीत में कहा 'साधु संतों और करोड़ों भक्तों की मांग थी कि राम और कृष्ण की नगरी में मांस-मदिरा की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया जाये । उनकी मांग का सम्मान करते हुये प्रदेश सरकार अयोध्या की चौदह कोसी परिक्रमा के आसपास के इलाके और मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के आसपास के इलाके को तीर्थ स्थान घोषित करने की योजना पर काम कर रही है। जब ये दोनों स्थान तीर्थ स्थान घोषित हो जायेंगे तो यहां स्वत: ही मांस-मदिरा की बिक्री पर प्रतिबंध लग जायेगा । बिना तीर्थ स्थान घोषित किये इन दोनों स्थानों पर मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगाना संभव नही है ।' 
 उन्होंने कहा 'अयोध्या और मथुरा में मांस-मदिरा पर प्रतिबंध की मांग को सरकार ने गंभीरता से लिया है और इन दोनों जगहों को तीर्थ स्थान घोषित करने की योजना पर काम किया जा रहा है।’’ ऊर्जा मंत्री ने कहा कि अयोध्या में चौदह कोसी परिक्रमा का इलाका, मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के आसपास के इलाके को तीर्थ स्थान घोषित कर यहां पर मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगाये जाने की योजना है । 

शर्मा के मुताबिक, मथुरा में वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गिरिराज जी :गोर्वधन: की सप्त कोषी परिक्रमा का इलाका पहले से ही तीर्थस्थान घोषित है और वहां मांस-मदिरा की बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबंध है ।
गौरतलब है कि छह नवंबर को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया है। संतों ने मांग की थी कि अयोध्या में मांस-मदिरा की बिक्री भगवान राम का अपमान है और इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। 
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी धूमकेतु की तरह चमकने वाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव को लेकर अंदरखाने में तमाम तरह की बातें चल रही हैं। कभी उनके स्वास्थ्य को लेकर सवाल खड़ा किया जाता है तो कभी उनकी याद्दाश्त पर प्रश्न चिह्न लगाया जाता है। यह स्थिति वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव से कुछ माह पूर्व उस समय से विषम हो गईं थीं जब अखिलेश यादव ने नेता जी को जर्बदस्ती समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाकर स्वयं पार्टी की कमान संभाल ली थी। मुलायम यह बात हजम नहीं कर पाये, लेकिन पुत्र मोह के कारण उनकी नाराजगी कभी खुलकर सामने नहीं आई। यह नाराजगी उस समय भी ज्यादा मुखर नहीं हो सकी, जब अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की रीढ़ समझे जाने वाले चाचा शिवपाल यादव को बाहर का रास्ता दिखाया था। इस बात को भी नहीं भुलाया जा सकता है कि 2017 के विधान सभा चुनाव के समय अखिलेश ने अपने छोटे भाई की बहू अर्पणा यादव को बहुत मुश्किल से काफी दबाव के बाद विधान सभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया था।
 
इससे आगे बढ़कर देखा जाये तो अखिलेश ने अपर्णा को काफी दबाव के बाद टिकट जरूर दिया था, लेकिन उन्हें एक ऐसे विधान सभा क्षेत्र (कैंट विधान सभा क्षेत्र, लखनऊ) से चुनाव लड़ने का मौका दिया गया, जहां उनके सामने भाजपा की दिग्गज नेत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी चुनाव लड़ रही थीं जो तब कैंट से विधायक भी थीं, जबकि मुलायम अपनी छोटी बहू अपर्णा को समाजवादी परिवार का गढ़ समझे जाने वाले मैनपुरी, एटा, इटावा या आसपास के जिलों की किसी सीट से चुनाव लड़ाना चाहते थे। इसके बावजूद अर्पणा ने चुनावी जंग में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन अर्पणा के चुनाव प्रचार के लिये अखिलेश समय ही नहीं निकाल पाये, जिसका खामियाजा अपर्णा को हार के रूप में भुगतना पड़ा था। पारिवारिक कलह के चलते समाजवादी पार्टी को भी बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा था। कांग्रेस का साथ भी उसकी डूबती नैया को बचा नहीं पाया था। मुलायम पहले ही कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन को नकार चुके थे।
 
खैर, सबसे बड़ी बात यही थी कि बहुत कुछ लुटाने के बाद भी अखिलेश के तेवर नहीं बदले। न उन्होंने मुलायम की बातों को गंभीरता से लिया न चाचा शिवपाल के प्रति उनका रवैया नरम हुआ। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि शिवपाल ने अपनी अलग पार्टी नहीं बना ली। शिवपाल के अलग दल बनाते ही मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी के मंच पर नजर आने लगे। अखिलेश सोची−समझी रणनीति के तहत मुलायम के प्रति नरम हुए थे, उन्हें पता था कि अगर उन्होंने पिता मुलायम के प्रति अपना रवैया नहीं बदला तो वह पाला बदलकर शिवपाल के साथ जा सकते हैं। उधर, मुलायम की छोटी बहू अर्पणा यादव भी चाचा शिवपाल के साथ खड़ी दिखाई पड़ने लगी थीं। 
 
समाजवादी परिवार में चल रही उठा−पटक से मुलायम दुखी थे, लेकिन उनकी कोई सुनने को तैयार ही नहीं था। अखिलेश साफ शब्दों में तो शिवपाल गोलमोल भाषा में मुलायम की बात काट रहे थे। चाचा−भतीजे दोनों अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगे थे। वहीं मुलायम न तो पुत्र अखिलेश को छोड़ पा रहे थे और न ही भाई शिवपाल से दूरी बना पा रहे थे। मुलायम पारिवारिक मजबूरियों के बीच धृतराष्ट्र जैसे हो गये थे, जिसमें कोई एक खेमा चुनना उनके लिए आसान नहीं था। वह अखिलेश के साथ रहते हुए भी शिवपाल के साथ नजर आते उनकी पार्टी के मंच तक पर पहुंचने में मुलायम ने गुरेज नहीं किया। इसकी बानगी हाल ही में तब दिखी जब पहले तो समाजवादी पार्टी आफिस में बेटे अखिलेश के साथ सपा कार्यकर्ताओं को समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने की सीख देते दिखे तो कुछ दिनों के बाद मुलायम भाई शिवपाल के साथ मंच साझा करते दिखे। शिवपाल को जब नया सरकारी बंगला मिला तो वहां भी मुलायम खड़े नजर आये। सियासी तौर पर बंटा नजर आ रहा मुलायम सिंह का कुनबा प्रतीक यादव व अपर्णा यादव के गृह प्रवेश पर एक साथ नजर आया। गृह प्रवेश में मुलायम सिंह यादव के साथ ही अखिलेश यादव, डिंपल यादव और शिवपाल सिंह यादव खासतौर पर शामिल हुए। यह अलग बात है कि अखिलेश और शिवपाल अलग−अलग समय पर कार्यक्रम में रहे। उनका आमना−सामना नहीं हुआ।
 
यह सच है कि मुलायम ने अपने सियासी जीवन में परिवार के लोगों की सियासत तो खूब चमकाई थी, उनके बल पर परिवार के कई सदस्य सांसद और विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष व तमाम निगमों के अध्यक्ष आदि बने परंतु मुलायम ने सियासत और परिवार का कभी घालमेल नहीं किया। अपनों के साथ रहना उनकी सहज प्रवृत्ति रही है। यहां तक कि उन्होंने पार्टी छोड़ने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खां और अमर सिंह तक को वापस लेने में संकोच नहीं किया था। कभी जो दर्शन सिंह यादव उनके जानलेवा दुश्मन हुआ करते थे, वह भी बाद में मुलायम के साथ खड़े नजर आने लगे थे। अपने इसी स्वभाव के चलते कुनबे की कलह में भी वह दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य बने रहे हुए हैं। यह बात उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो यह मानकर चलते हैं कि मुलायम सिंह अब सियासत के अखाड़े के पहलवान नहीं रह गये हैं। दरअसल, मुलायम आज भी सियासी दुनिया के 'पहलवान' ही हैं। हां, परिवार के झगड़े ने जरूर उन्हें तोड़ कर रख दिया है।
 
बहरहाल, कुछ ऐसी बातें भी हैं जो यही साबित करती हैं मुलायम के लिए अखिलेश से बढ़कर कोई नहीं है। याद कीजिए 2012 से पहले का वह दौर, जब शिवपाल को ही मुलायम का उत्तराधिकारी माना जा रहा था, लेकिन सियासी दुनिया में 'चरखा दांव' लगाने में मशहूर नेताजी ने 2012 के विधान सभा चुनाव से ठीक पहले शिवपाल को अनदेखा करके अखिलेश की ताजपोशी कर दी थी। कुनबे में कलह के बीज तभी से पड़े थे। 2017 में जब पारिवारिक लड़ाई परवान पर चढ़ी तो मुलायम शिवपाल के साथ नजर तो आये लेकिन, कोई निर्णायक फैसला लेने से बचते रहे। यहां तक कि शिवपाल ने उनके साथ मिलकर सेक्युलर मोर्चा के गठन का फैसला लिया था तो भी मुलायम ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे। फिर भी भाई के लिए उनका मोह लगातार बना रहा। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से दोहराया कि शिवपाल ने मेरे और पार्टी के लिए बहुत कुछ किया है, जबकि अखिलेश का राजनीतिक भविष्य उनकी जिम्मेदारी है। अब जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि 2017 के विधान सभा चुनावों की तरह अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों में भी चाचा शिवपाल के बिना अखिलेश की राह आसन नहीं होगी। अब तो अलग पार्टी बनाकर शिवपाल पूरी तरह से आजाद भी हो गये हैं।
आजकल मुंबई समेत देश के बड़े महानगरों में जहां देखो वहां मी टू अभियान की चर्चा है। मी टू अभियान ने किसी को नहीं छोड़ा... मोदी सरकार के एक मंत्री की जहां कुर्सी चली गई वहीं बॉलीवुड में बरसों से शराफत का चोला पहने कई चेहरे बेनकाब हो गए। महिलाओं के साथ यौन शोषण के खिलाफ चल रहे इस अभियान में नामी-गिरामी पत्रकार भी लपेटे में आ गए। ‘मी टू’ ने देश में ऐसी लहर पैदा कर दी है कि बॉलीवुड से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं सामने आकर यौन शोषण से जुड़े अपने अनुभव लोगों से साझा कर रही है। हर रोज कोई न कोई महिला सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती सुना रही है। किसी का मामला 10 साल पुराना है तो कोई अपने साथ 5 साल पहले हुए वाकये को लोगों के साथ साझा कर रही है। हर रोज अखबार पलटते ही कोई न कोई बड़ा नाम सामने आ जाता है। किसी बड़ी कंपनी में नौकरी या फिर फिल्मों में काम दिलाने के नाम पर महिलाओं का यौन शोषण होता है ये बात किसी से छिपी नहीं है। लेकिन अबतक किसी का चेहरा इसलिए बेनकाब नहीं होता था क्योंकि महिलाएं अपने साथ हुए वाकये को चुपचाप सहन कर जाती थी। लेकिन आज जमाना सोशल मीडिया का है... अब महिलाएं चुप नहीं बैठनेवाली। अमेरिका और पश्चिम के दूसरे देशों में मी टू मुहिम की कामयाबी ने अपने यहां भी उन महिलाओं के अंदर जोश भर दिया है जो कभी न कभी यौन शोषण का शिकार हो चुकी हैं। ये बात अलग है कि अब भी ज्यादतर मामले बॉलीवुड से ही आ रहे हैं। मशहूर फिल्मकार सुभाष घई, साजिद खान से लेकर कई लोगों का चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो गया है। फिल्मों में रोल दिलाने के बहाने महिलाओं को परेशान करनेवाले लोग पूरी तरह डरे हुए हैं। 
 
बॉलीवुड में कुछ लोगों को छोड़कर हर कोई मी टू अभियान का समर्थन कर रहा है...कल तक जो हीरोइन किसी बड़े चेहरे का नाम लेने से डरती थी...आज इस मुहिम के चलते अपने साथ हुई बर्ताव को दुनिया के सामने ला रही है। वैसे अबतक जितने बड़े नामों का चेहरा उजागर हुआ है वो खुद को पाक-साफ बताने में लगे हैं। कोई अपनी छवि खराब करने का आरोप लगा रहा है...तो कोई इसे बदले की भावना से की गई कार्रवाई बता रहा है। किसी की दलील है कि अगर किसी महिला के साथ 10 साल पहले किसी तरह की घटना हुई तो वो अबतक चुप क्यों बैठी रही। कुछ लोगों का मानना है कि  ये सब पब्लिसिटी हासिल करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन मैं इस बात से इत्तिफाक नहीं रखता। 
 
अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की माने तो महिलाओं का सामने आना अच्छी बात है लेकिन उनके लगाए आरोपों की गंभीरता से जांच भी होनी चाहिए क्योंकि हो सकता है कि मामले का कोई दूसरा पहलू भी हो। लेकिन अगर आप समझ रहे होंगे कि मी टू अभियान को महिलाओं का 100 फीसदी समर्थन हासिल है तो आप गलत हैं। मैंने इसे लेकर जब एक-दो महिलाओं से बात की और उनकी राय जानने की कोशिश की तो उनका कहना था...अगर किसी महिला के साथ यौन शोषण हुआ तो वो 10 या 15 साल तक चुप क्यों बैठी रही ? 
 
सवाल चुप बैठने का नहीं है...सवाल महिलाओं की अस्मिता से जुड़ा है...देर से ही सही मी टू मुहिम ने उन महिलाओं को बोलने की ताकत दी है जो अभी तक घुट-घुट कर जी रहीं थी...आज महिलाएं इस स्थिति में पहुंच गई हैं कि वो लोगों के सामने अपनी बात बेबाकी से रख रही हैं।
 
आज पीड़ित महिला सामने आकर दुनिया को बता रही है कि दफ्तर में अपने केबिन में बुलाकर बॉस ने उसे कहां-कहां छुआ...कभी पगार बढ़ाने के नाम पर शोषण हुआ...तो कभी प्रमोशन के नाम पर... फर्क सिर्फ इतना था कि पहले किसी बॉस का चेहरा बेनकाब नहीं होता था। आज हर बड़े दफ्तर में वो अधिकारी डरा हुआ है जिसने कभी किसी महिला सहकर्मी के साथ इस तरह का बर्ताव किया है।  दफ्तरों में महिलाओं के उत्पीड़न रोकने के लिए विशाखा गाइडलाइंस तो लागू हो गया लेकिन उस पर अमल कभी नहीं हुआ। सच्चाई यही है कि जो काम विशाखा गाइडलाइंस नहीं कर सका अब वो मी टू अभियान कर रहा है। 
 
मेरे कई मित्रों ने बताया कि अब वो दफ्तरों में महिलाओं से हाथ मिलाने से भी परहेज करने लगे हैं...उन्हें लगता है कि क्या पता कभी कोई महिला बुरा मान जाए और उसे बाद में परेशान होना पड़े। मी टू अभियान से लोग कितने डरे हुए हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिग बॉस के पूर्व कंटेस्टेंट कमाल राशिद खान ने दुबई और मुंबई में अपने दफ्तर से सभी महिला कर्मचारियों की छुट्टी कर दी है। केआरके की माने तो ऐसा उन्होंने अपनी पत्नी के कहने पर किया है। 
 
मी टू का असर देखिए...अभिनेता दिलीप ताहिल ने अभी हाल ही में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान रेप सीन करने से मना कर दिया। जब डायरेक्टर ने बताया कि सीन फिल्म के लिए जरूरी है तो अभिनेता ने कहा पहले हीरोइन से लिखित में लो कि उसे रेप सीन करने से पहले और बाद में कोई दिक्कत नहीं है। अब इसे मी टू का डर नहीं तो और क्या कहेंगे? मुझे लगता है कि हमें मी टू अभियान का समर्थन करना चाहिए....मेरा मानना है कि अगर आप गलत नहीं हैं तो आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है।

 

 
अब इतना तय हो गया है कि लोकसभा चुनाव के पहले अयोध्या के विवादित स्थल पर राममंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो सकता। अब जनवरी महीने में इस विवाद से जुड़े मुकदमे की सुनवाई की रूपरेखा तय की जाएगी। इस मुकदमे में एक से ज्यादा पक्ष हैं और अनेक किस्म की सत्य और काल्पनिक उलझनें हैं, जिनके कारण इस पर सुनवाई तुरंत समाप्त नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले पर अविलंब सुनवाई शुरू करने की अपील अस्वीकार करने के बाद मंदिर समर्थकों की नींद हराम हो रही हैं और उनमें हताशा का भाव बढ़ता जा रहा है। और जब हताशा बढ़ती है, तो उसका शिकार विवेक हो जाता है, जिसके कारण विवेकहीन बातें शुरू हो जाती हैं।
 
वैसी ही एक विवेकहीन बात यह है कि कानून बनाकर या अध्यादेश लाकर केन्द्र सरकार या राज्य सरकार उस विवादित भूमि का अधिग्रहण कर सकती है और उस अधिगृहित जमीन को राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू संगठनों को सौंपा जा सकता है। इस तरह की मांग जोर पकड़ रही है। भारतीय जनता पार्टी के अनेक नेता इस तरह की मांग कर रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद ने तो औपचारिक रूप से इस तरह की मांग कर दी है कि राममंदिर के निर्माण को शुरू करने के लिए सरकार अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं करे, बल्कि कानून बनाकर उस भूखंड को मंदिर निर्माण के लिए तैयार संगठन को सुपुर्द कर दे।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी सरकार से कानून बनाने की मांग कर चुके हैं। सच तो यह है कि मंदिर निर्माण के लिए तैयार बैठे लोगों को लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो मंदिर बनकर रहेगा। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि मंदिर के पक्षधर मुकदमा हार जाने के बावजूद कानून की सहायता से वह भूखंड पा लेंगे। केन्द्र ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है और सरकार के पास यह अधिकार होता है कि उचित मुआवजा देकर वह कोई भी भूखंड अधिकृत कर ले। अब वहां मस्जिद तो है नहीं, इसलिए उसे अधिगृहित करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होगी।
 
लेकिन इस तरह के विचार रखने वाले यह भूल जाते हैं कि विवादित भूखंड पहले से ही तकनीकी रूप से केन्द्र सरकार द्वारा अधिगृहित संपत्ति है। यह अधिग्रहण नरसिंह राव सरकार ने 1993 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद किया था। विवादित 2 दशमलव 7 एकड़ जमीन के साथ-साथ आसपास के 66 दशमलव 7 एकड़ जमीन नरसिंह राव सरकार ने एक अध्यादेश के द्वारा अधिगृहित कर ली थी। बाद में अध्यादेश का स्थान एक अधिनियम ने ले लिया। उस अधिनियम के तहत विवादित भूमि पर दाखिल सारी याचिकाओं को भी खारिज कर दिया गया था।
 
लेकिन भूमि अधिग्रहण के उस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने बताया कि अधिग्रहण यह भूमि किसी को देने के लिए नहीं किया गया है, बल्कि केन्द्र सरकार अपनी कस्टडी में उसे रखना चाहती है, ताकि उसके कारण सांप्रदायिक तनाव को नियंत्रण में रखा जा सके। केन्द्र की उस दलील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण से संबंधित उस कानून को निरस्त नहीं किया। उसका सिर्फ एक हिस्सा, जिसमें सभी याचिकाओं को समाप्त माना गया था, उसे कोर्ट ने निरस्त कर दिया और आदेश जारी किया कि केन्द्र उस भूमि की कस्टडी अपने पास रखे और याचिकाओं का निस्तारण होने के बाद जिसकी जीत होती है, भूमि उसे सौंप दे। 
 
यानी कानून बनने और उस पर कोर्ट के दिए गए फैसले के अनुसार वह विवादित भूखंड अभी भी अधिगृहित भूखंड है, जो केन्द्र सरकार की कस्टडी में है। उसे केन्द्र को तब तक अपनी कस्टडी में रखना है, जब तक अदालत उस पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना दे। उसके पहले केन्द्र को यथास्थिति बनाए रखनी है। वह किसी को वह भूखंड नहीं दे सकता और जहां तक अधिग्रहण करने के लिए अध्यादेश और अधिनियम बनाने का सवाल है, तो जो जमीन एक बार अधिगृहित हो चुकी है, उसका अधिग्रहण वही सरकार दुबारा कैसे कर सकती है?
 
लिहाजा केन्द्र सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। मंदिर बनाने के लिए उतावले हो रहे लोग मोदी सरकार पर दबाव बनाते हुए कह रहे हैं कि जब तीन तलाक और एससी/एसटी एक्ट पर सरकार अध्यादेश और विधेयक ला सकती है, तो फिर राममंदिर के निर्माण के लिए वैसा क्यो नहीं कर सकती। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि तीन तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत ही उस पर अध्यादेश लाया गया है और एससी/एसटी एक्ट में पुनर्विचार याचिका तो केन्द्र ने ही कर रखी थी और सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई वैधानिक कार्रवाई आगे करने के लिए रोक नहीं लगा रखी है। 
 
विवादित भूखंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का केन्द्र सरकार को आदेश है कि वह वहां यथास्थिति बनाए रखे और वह अपने आपको उस जमीन को कस्टोडियन समझे न कि मालिक। अब जब सरकार उस जमीन की मालिक ही नहीं है, तो फिर वह उसे किसी को कैसे दे सकती है और वह भी तब, जब उस जमीन के एक से ज्यादा दावेदार मौजूद हैं और उनके दावों की जांच सुप्रीम कोर्ट कर रहा है।
 
यही नहीं भारतीय राज्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर है, इसके साथ सरकार क्या संसद भी छेड़छाड़ नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक फैसले में स्पष्ट किया है कि सेक्युलर होने के कारण सरकार अपने आपको किसी धर्म विशेष से जोड़कर फैसला नहीं ले सकती। भारतीय धर्मनिरपेक्षता को कोर्ट ने पारिभाषित करते हुए कहा है कि यह सर्वधर्म समभाव पर आधारित है और सरकार को निर्णय लेते समय सर्वधर्म समभाव की भावना से ही काम करना होगा। इस भावना से विचलित होकर किया गया कोई फैसला या कानून सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया जाएगा। जाहिर है, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे भाजपा सांसदों की कानून बनाकर मंदिर निर्माण का सपना, एक ऐसा दिवास्वप्न है, जो पूरा होता दिखाई नहीं पड़ता। इसका निर्माण तभी होगा, जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसके पक्ष में हो या विपक्ष में फैसला आने के बाद भूखंड का मालिक अपनी मर्जी से उसे मंदिर निर्माण के लिए दे दे।
 
-उपेन्द्र प्रसाद
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली थी और ऐसे में सियासी उतार-चढ़ाव को वे बखूबी समझती थीं। यही वजह रही कि उनके सामने न सिर्फ देश, बल्कि विदेश के नेता भी उन्नीस नजर आने लगते थे।

इंदिरा गांधी एक अजीम शख्यियत थीं। उनके भीतर गजब की राजनीतिक दूरदर्शिता थी। लालबहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा को शुरू में 'गूंगी गुड़‍िया' की उपाधि दी गई थी, लेकिन 1966 से 1977 और 1980 से 1984 के दौरान प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा ने अपने साहसी फैसलों के कारण साबित कर दिया कि वे एक बुलंद शख्यिसत की मालिक हैं।

इंदिरा गांधी ने परिणामों की परवाह किए बिना कई बार ऐसे साहसी फैसले लिए, जिनका पूरे देश को लाभ मिला और उनके कुछ ऐसे भी निर्णय रहे जिनका उन्हें राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ा लेकिन उनके प्रशंसक और विरोधी, सभी यह मानते हैं कि वे कभी फैसले लेने में पीछे नहीं रहती थीं। जनता की नब्ज समझने की उनमें विलक्षण क्षमता थी।

प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा का जन्म इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अपनी वानर सेना बनाई और सेनानियों के साथ काम किया। जब वे लंदन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं तो वहां आजादी समर्थक ‘इंडिया लीग’ की सदस्य बनीं।

भारत लौटने पर उनका विवाह फिरोज गांधी से हुआ। वर्ष 1959 में ही उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। नेहरू के निधन के बाद जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो इंदिरा ने उनके अनुरोध पर चुनाव लड़ा और सूचना तथा प्रसारण मंत्री बनीं।

उनके समकालीन नेताओं के अनुसार बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स समाप्त करना, कांग्रेस सिंडिकेट से विरोध मोल लेना, बांग्लादेश के गठन में मदद देना और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को राजनयिक दांव-पेंच में मात देने जैसे तमाम कदम इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में मौजूद निडरता के परिचायक थे।

साथ ही आपातकाल की घोषणा, लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में डालना, ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे कुछ निर्णयों के कारण उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उड़ीसा में एक जनसभा में गांधी पर भीड़ ने पथराव किया। एक पत्थर उनकी नाक पर लगा और खून बहने लगा।

इस घटना के बावजूद इंदिरा गांधी का हौसला कम नहीं हुआ। वे वापस दिल्ली आईं। नाक का उपचार करवाया और तीन चार दिन बाद वे अपनी चोटिल नाक के साथ फिर चुनाव प्रचार के लिए उड़ीसा पहुंच गईं। उनके इस हौसलों के कारण कांग्रेस को उड़ीसा के चुनाव में काफी लाभ मिला।

एक और वाकया 1973 का है। इंदिराजी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन में भाग लेने इलाहाबाद आईं थीं। उनकी सभा के दौरान विपक्षी नेताओं ने जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। लेकिन उस जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन से इंदिराजी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई।

अपने संबोधन में विरोधियों को शांत करते हुए उन्होंने सबसे पहले कहा कि ‘मैं जानती हूं कि आप यहां इसलिए हैं क्योंकि जनता को कुछ तकलीफें हैं, लेकिन हमारी सरकार इस दिशा में काम कर रही है। इंदिराजी खामियाजे की परवाह किए बगैर फैसले करती थीं।

आपातकाल लगाने का काफी विरोध हुआ और उन्हें नुकसान उठाना पड़ा लेकिन चुनाव में वे फिर चुनकर आईं। ऐसा चमत्कार सिर्फ वे ही कर सकती थीं। इंदिरा की राजनीतिक छवि को आपातकाल की वजह से गहरा धक्का लगा। इसी का नतीजा रहा कि 1977 में देश की जनता ने उन्हें नकार दिया, हालांकि कुछ वर्षों बाद ही फिर से सत्ता में उनकी वापसी हुई।

उनके लिए 1980 का दशक खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वे सिख अलगाववादियों के निशाने पर थीं। 31 अक्टूबर 1984 को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी। गरीबी मुक्त भारत इंदिरा का एक सपना था। जो आज भी साकार नहीं हो पाया है।

अमृतसर में रावण फूंकने से हुई आतिशबाजी से बचने के लिए ट्रेन की चपेट में आने से पचास से अधिक लोगों की अकाल मौत हो गई। इससे पहले कोलकत्ता में पुल ढहने से दर्जन भर लोगों की मौत हो गई। इसी तरह हर साल सड़क हादसों में हजारों लोगों की जान चली जाती है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं में सैंकड़ों लोगों मरते हैं। संक्रामक रोगों से मरने वालों की संख्या भी हर साल हजारों में होती हैं। मंदिरों−मेलों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में भगदड़ से मौतें होते ही रहती हैं।
 
सवाल यह है कि इन मौतों के लिए जिम्मेदार कौन हैं ? क्या इतने लोगों को हर साल काल−कलवित होने से रोका जा सकता है। दरअसल इस तरह के हादसों के लिए सीधे स्थानीय प्रशासन और राज्य तथा केंद्र सरकार जिम्मेदार हैं। प्राकृतिक आपदाओं और लापरवाही से होने वाले इस तरह के हादसों की पुनरावृत्ति को सजगता−जागरूकता से रोका जा सकता है। इसके बावजूद सरकारी मशीनरी के नकारेपन से बड़े हादसे होते रहते हैं। सरकारी मशीनरी में जंग लगी हुई है। सरकारों के लिए ऐसी मौतें महज आंकड़ा भर रह गई हैं। यदि संख्या अधिक होती है तो एक−दो छोटे अफसरों पर कार्रवाई करके सरकारें जिम्मेदारी पूरी कर लेती हैं।
 
सरकारें इस बात का पुख्ता इंतजाम कभी नहीं करती कि ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति नहीं हो। यदि पुरानी घटना−दुर्घटनाओं से सबक लिया जाता तो अमृतसर जैसा हादसा नहीं होता। इससे जाहिर है कि सरकारें और प्रशासन सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाने में माहिर हैं। ऐसे हादसों को रोकने के लिए कभी कोई कार्य योजना नहीं बनाई जाती। यदि बनती भी है तो वो धरातल पर नहीं उतरती। कुछ ही दिनों बाद उसे भुला दिया जाता है। जिस तरह से देश में अप्राकृतिक मौतें हो रही हैं, उसके मद्देनजर इस देश को मौत का देश कहने में कोई अतिरंजना नहीं रह गई है।
 
इनमें मरने वाले आम लोग ही होते हैं। हादसा होने पर राजनीतिक दल ऐसी मौतों के लिए एक−दूसरे को आईना दिखाने में पीछे नहीं रहते। विपक्षी दल सत्तारूढ़ दल को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। सत्तारूढ़ दल के पास तोतारटंत जवाब है होता है कि जब विपक्षी पार्टी जब सत्ता में थी, तब भी ऐसे हादसे होते रहे हैं। राजनीतिक दलों में संवेदना तो दूर सत्ता की जिम्मेदारी का बोध तक नहीं रह गया है। दुर्घटनाओं की तह तक जाने में किसी की रूचि नहीं होती। आरोप−प्रत्यारोपों के दौर में एक−दूसरे को दोषी ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी से भागने की कवायद की जाती है।
 
दुर्घटना में मरने वालों की संख्या अधिक हो तो जिम्मेदारी के नाम पर जांच दल बिठा दिए जाते हैं। ऐसे अलग−अलग प्रकृति के हादसों के बाद केंद्र और राज्य स्तर पर अब तक दर्जनों जांच कमेटियां बना दी गई। इनके सुझावों को लागू करने का काम किसी भी सरकार ने ईमानदारी से नहीं किया। यदि कहीं किया गया भी गया तो महज औपचारिकता निभाने के लिए फाइलों तक सीमित रहा। सड़क और रेल दुर्घटनाओं पर बनी दर्जन भर कमेटियां इसका उदाहरण हैं। जब भी बड़े हादसे हुए कमेटियां बना दी गईं। इसके बाद इनकी रिपोर्टें धूल फांकती रहती हैं।
 
हालात यह हो गए हैं कि हर बार हादसा और हर बार नई जांच कमेटी। सरकारी प्रवृत्तियों के मद्देनजर लगता है कि देश में दुर्घटनाओं में लोगों की मौत अब कोई मुद्दा नहीं रही है। ऐसी मौतों से राजनीतिक दलों का वोट बैंक प्रभावित नहीं होता। इन्हें महज एक दुर्घटना मान कर कुछ ही दिनों में भुला दिया जाता। इसमें भी हालात करेला और नीम चढ़ा जैसे हैं। मृतकों के परिवारों को सरकारी नीति या तात्कालिक रूप से घोषित मुआवजा इत्यादि भी आसानी से नहीं मिलता। ज्यादातर मामलों में मुआवजा राशि ही ऊंट के मुंह में जीरे के समान होती है। अल्पराशि से परिवार का भरण-पोषण आसान नहीं होता। इससे किसी नेता और अफसर का सरोकार नहीं रहता।
 
मुआवजे के ऐसे सैंकड़ों मामले हर साल अदालतों में आते हैं। सालों तक ऐसे मामले चलते हैं। जिनमें भेदभाव या अड़चन डालने के आरोप लगाए जाते हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि ऐसे हादसों को रोकने के लिए दूरगामी और पुख्ता इंतजाम करने के बजाए राजनीतिक दलों के नेता बेफिजूल के मुद्दों पर बहस करके समय जाया करते रहते हैं। कुप्रबंधन और शासकीय अराजकता से होने वाली दुर्घटनाओं को कभी धार्मिक और कभी सामाजिक कारणों से सरकारें अनदेखी करती हैं।
 
दूसरे शब्दों में कहें तो सरकारें ही परोक्ष रूप से ऐसे हादसों की बुनियाद में शामिल हैं। भारी भीड़ और लापरवाही भरे इंतजाम से हादसे होने की संभावना बनी रहती है। इसे टालने के पुख्ता पुलिस−प्रशासनिक दूरदर्शी उपायों की दरकार होती है। इसके बजाए महज खानापूर्ति करके सुरक्षा इंतजामों की पूर्ति की जाती है। लापरवाही और गैरजिम्मेदारी की ऐसी प्रवृत्ति के कारण कुछ दिनों बाद ही देश के दूसरे भू−भाग में ऐसे हादसों की खबरें मिलती हैं। केंद्र हो या राज्य की सरकारें, इस बात की गारंटी नहीं देती कि समान प्रकृति के हादसे अब नहीं होंगे।
 
राज्यों की सरकारें दूसरे राज्यों में होने वाले हादसों से सबक नहीं सीखती। इसके परिणामस्वरूप कुछ अर्से बाद ही समान तरह के हादसे एक राज्य के बाद दूसरे राज्यों में होते हैं। जिस राज्य में हादसा होता है, वहां की सरकार जरूर कुछ फौरी उपाय करती हैं, जबकि दूसरे राज्यों की सरकारें ऐसे हादसों का इंतजार ही करती नजर आती हैं। अमृतसर का ट्रेन हादसा हो या देश के दूसरे हिस्सों में होने वाले ऐसे ही दूसरे हादसे, जब तक सरकारें जिम्मेदारी से भागती रहेंगी, तब तक होते रहेंगे।
 
-योगेन्द्र योगी
देश के पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अगले चंद महीनों के अंदर लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। और बीच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अंदर घमासान छिड़ गया है। देखने पर तो यह घमासान सीबीआई के दो वरिष्ठतम पदों पर बैठे दो अधिकारियों के बीच में है, लेकिन यह घमासान अपने जद में पूरी सीबीआई और उसकी नियंत्रक राजनैतिक प्रतिष्ठान को भी घेरे में लेने की क्षमता रखता है। सीबीआई अब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी प्रधानमंत्री के नियंत्रण में है, इसलिए सवाल देश के सर्वोच्च कार्यालय पर भी खड़े हो सकते हैं।
 
एक अभूतपूर्व घटना के तहत सीबीआई ने अपने दूसरे सबसे बड़े अधिकारी राकेश अस्थाना पर तीन करोड़ रुपये घूस लेकर मांस निर्यातक मोइन कुरेशी के मामले से जुड़े एक व्यापारी साना को क्लीन चिट देने के मामले में मुकदमा किया है। दिलचस्प है कि अस्थाना सीबीआई प्रमुख और अपने बॉस आलोक वर्मा पर उस व्यापारी से दो करोड़ रुपये घूस लेकर उसे बचाने की कोशिश करने का आरोप लगा रहे थे। यह आरोप उन्होंने लिखित रूप से लगाया था और उनके द्वारा लगाए आरोप की जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।
 
और इस बीच सीबीआई प्रमुख ने अपने डिपुटी अस्थाना पर ही उसी व्यापारी को गवाह बनाकर तीन करोड़ की घूस लेने के मामले मे फंसा दिया। इसमें एक और दिलचस्प बात है और वह यह है कि अस्थाना के खिलाफ मुकदमा दायर करने के पहले ऊपर से इजाजत नहीं ली गई, जबकि उस तरह की इजाजत जरूरी थी। जाहिर है, वर्मा हड़बड़ी में हैं और अपने ऊपर लगाए गए आरोप की जांच पूरी होने के पहले ही उन्होंने उसी व्यापारी की गवाही से अपने डिपुटी अस्थाना पर मुकदमा ठोंक दिया है।
 
जब बात मुकदमेबाजी की आती है, तो मामला अदालत के पास पहुंचता है और अदालतें सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं। यह भी देखा जाता है कि वह गवाह कितना विश्वसनीय है। इस मामले में गवाह वह व्यक्ति है, जो खुद जांच के तहत गिरफ्तारी और दोषी साबित होने के खतरे का सामना कर रहा था। वर्मा का कहना है कि साना ने अस्थाना को घूस दी, तो अस्थाना का कहना है कि साना ने वर्मा को घूस दी। अब चूंकि सीबीआई की कमान वर्मा के हाथ में है, तो उन्होंने अपने बॉस होने का फायदा उठाते हुए डिपुटी पर मुकदमा ठोंक दिया और यदि अस्थाना वर्मा के बॉस होते तो यह मुकदमा वर्मा पर ठोंका जाता।
 
अब किसने घूस ली, इसका पता तो बात में चलेगा या चलेगा भी या नहीं, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन जो कुछ सामने आ रहा है, उससे सीबीआई मजाक बनती जा रही है। सीबीआई के पास एक से एक बड़े और संवदेनशील मुकदमे हैं और इस अंदरूनी झगड़े से उसकी कार्यक्षमता निश्चय ही प्रभावित होगी और इससे देश का ही नुकसान होगा, क्योंकि विजय माल्या से लेकर, नीरव मोदी और अन्य अनेक हजारों करोड़ रूपये की लूट के मामले को सीबीआई देख रही है। खुद अस्थाना विजय माल्या और अगुस्ता हेलिकॉप्टर घोटाले के मामले को देख रहे हैं। अब वे उन मामलों को देखने की जगह अब अपना मुकदमा देखेंगे।
 
खुद भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना करते हुए कोई सीबीआई अधिकारी अन्य भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने को नैतिक रूप से कितना सक्षम हैं, यह अलग सवाल है, जिस पर बहस की जा सकती है, लेकिन यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब सीबीआई को मिलजुलकर काम करना चाहिए था। 
 
राकेश अस्थाना की छवि एक ईमानदार अधिकारी की है। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उन पर राजनैतिक दबाव असर नहीं करता और वे अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर वही करते हैं, जिसे वे अपना फर्ज समझते हैं। बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले में लालू यादव को सजा दिलवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वे गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ काम करने का उनका लंबा अनुभव रहा है। सीबीआई में उन्हें नरेन्द्र मोदी की पसंद का आदमी कहा जाता है।
 
चूंकि सीबीआई सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के मातहत काम करती है, इसलिए मोदीजी के लिए यह घमासान एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि वे इसे संभालने में विफल रहे, तो सबसे पहले तो इस संस्था की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाएगी और सारे अधिकारी खेमेबाजी में लग जाएंगे और उससे भी बुरा तब होगा, जब यह मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चला जाएगा। एफआईआर दायर किए जाने के बाद यह मामला अदालत में चला ही गया है और अब अस्थाना अपनी निजी हैसियत से भी उस मुकदमे को निरस्त कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
 
दोनों के बीच संघर्ष पिछले कई महीनों से मीडिया की सुर्खियां बन रहे थे। अस्थाना ने आरोप लगाया था कि वर्मा रेलवे होटल घोटाले के मामले में लालू और उनके परिवार के खिलाफ हो रही जांच को धीमा करने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि यह मामला भी अस्थाना के हाथ में ही है। आरोप है कि वर्मा ने छापा मारने से मना कर दिया था और उसके बावजूद छापे पड़े और सीबीआई की कार्रवाई आगे बढ़ी। वह मामला मीडिया में आने के बाद दोनों के झगड़े और तेज हुए और मोइन कुरेशी मामले में भी अस्थाना ने वर्मा पर अनावश्यक हस्तक्षेप का आरोप लगाया। इस बीच साना को बचाने के लिए एक राजनेता का नाम भी चर्चा में आ गया।
 
सीबीआई के इस अंदरूनी संग्राम को रोकना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्हें अपने स्तर पर हस्तक्षेप कर यह पता लगाना चाहिए कि दोनों अधिकारियों में कौन सही है और कौन गलत। जो गलत है, उसे बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। यदि यह संग्राम नहीं रूका तो ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं और ऐसे ऐसे खुलासे (सही या गलत) हो सकते हैं, जिससे मोदी को राजनैतिक नुकसान हो सकता है।
 
-उपेन्द्र प्रसाद

गढ़ाकोटा। गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल किसान और पिछड़ा वर्ग आंदोलन के तहत गढ़ाकोटा पहुंचे। हार्दिक पटैल ने कहा हम किसी को हराने नहीं आए हम खुद को जिताने आए हैं। युवाओं, किसानों, महिलाओं के मुद्दे पर आए हैं। आज देश में बेरोजगार कौन है? क्या अदाणी का बेटा बेरोजगार है? क्या शिवराज सिंह चौहान का बेटा बेरोजगार है? क्या गोपाल भार्गव का बेटा बेरोजगार है? नहीं, सिर्फ किसान का ही बेटा बेरोजगार है। किसान का ही बेटा मजदूर बन रहा है।
हार्दिक पटेल ने कहा हम चाहते हैं घर- घर में जनजागरण हो, चेतना हो, ताकि जनविरोधी लोगों से लड़ सकें। गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहोगे तब तक अपने विचार और अधिकारों तक नहीं पहुंच पाओगे। हार्दिक ने एक बार फिर मंत्री गोपाल भार्गव को ठन- ठन गोपाल कहा।
हम सत्ता विरोधी: काॅलेज की छात्राओं के साथ हुई घटना पर हार्दिक ने कहा कि पिछड़े समाज की दो छात्राओं के साथ छेड़खानी फिर मारपीट हुई, जिससे उनकी पढ़ाई छूट गई। पिछड़ों की यही लड़ाई लेकर निकले हैं। आजाद हिंदुस्तान में जो लोग जीना चाहते हैं उन्हें मजबूत बनाएं, जागरूक किया जाए। भावांतर में किसानों से लूट हुई है। हार्दिक ने कहा हम कांग्रेस के साथ नहीं हैं, हम तो सत्ता के खिलाफ हैं। अब मप्र में दो ही पार्टियां हैं तो हम क्या करें।
भार्गव और हार्दिक समर्थक आमने- सामने: केंकरा से पथरिया जाते समय हार्दिक का काफिला बस स्टैंड पर रुका। जहां हार्दिक, जीवन , कमलेश साहू ने शहीदों की मूर्तियों पर माल्यार्पण किया। हार्दिक के समर्थक रोड शो नगर में अंदर कराना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने रोक दिया। जिस पर हार्दिक समर्थकों ने नारेबाजी की। इस दौरान वहां मंत्री गोपाल भार्गव के समर्थक भी आ गए जिन्होंने भी नारे लगाए। एक दूसरे के खिलाफ करीब 15 मिनिट नारेबाजी हुई। जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। बाद में हार्दिक का काफिला नगर भ्रमण के बजाए पथरिया की ओर चला गया।
मैं भाजपा विरोधी हूं
पथरिया में हार्दिक ने कहा कि मैं बीजेपी का विरोधी हूं और उसके खिलाफ ही लड़ता हूं। क्योंकि भाजपा में किस तरह लोगों को डराया धमकाया जाता है, गलत नीतियों से गरीब मजदूर वर्ग का शोषण किया जाता है, जिसका सीधा साधा उदाहरण भी आप लोगों के सामने है। प्रदेश के मंत्री की पत्नी शिक्षा माफिया है, जिसका नाम हर कोई अच्छे से जानता है। क्या किसी गरीब का बच्चा उनके स्कूल में पढ़ सकता है। मैं किसी को गलत नहीं ठहराता और न ही में किसी को दोषी मानता हूं, हम सब इसके जिम्मेदार हैं। यह बात सोमवार को हाईस्कूल परिसर में किसान आमसभा में गुजरात के पाटीदार समाज के नेता हार्दिक पटेल ने कहा किसानों काे संबाेधित करते हुए कही।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई है। इसी के साथ इन राज्यों में चुनावी गहमागहमी का दौर तेज हो गया है। चुनाव तारीखों के एलान के बाद इन राज्यों में बड़े नेताओं के दौरे और रैलियों की संख्या बढ़ गई है। हम आपको बता रहे हैं इन राज्यों में चुनाव से जुड़ी हर छोटी-बड़ी खबरों का अपडेट। 

 

-मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी चयन को लेकर अंतिम दौर की बैठकें शुरू। दिल्ली में आज स्क्रीनिंग कमेटी की तीसरे दौर की बैठक होगी। इसमें बाकी बची हुई 159 सीटों पर मंथन होगा।

- छत्तीसगढ़ : कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी एक दिवसीय दौरे पर आज रायपुर आ रहे हैं। राहुल साइंस कॉलेज में जनसभा को संबोधित करेंगे। साथ ही सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से चर्चा भी करेंगे। 

राहुल गांधी दोपहर बाद करीब ढाई बजे नियमित विमान से रायपुर एयरपोर्ट पहुंचेंगे।एसपीजी की रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी के तय कार्यक्रमों में थोड़ा बदलाव किया गया है।

सुरक्षा कारणों की वजह से वह महामाया मंदिर नहीं जा पाएंगे। पहले राहुल गांधी का महामाया मंदिर जाने और वहां दर्शन-पूजन का कार्यक्रम था। 

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