संपादकीय

संपादकीय (44)

पिता की अवधारणा में समाहित है जीवन चक्र जिसके सहारे विश्व का वर्तमान व्यापक रूप नजर आता है। जिससे परिवार की परिकल्पना साकार रूप लेती है। जिसके सुखद छांव में सुव्यवस्थित परिवार की संरचना सुनिश्चित है। जिसके सिर से पिता की साया हट जाती है , उसका जीवन विरान हो जाता है। वह अनाथ हो जाता है। वे लोग ज्यादा भाग्यशाली माने जाते है जिनके सिर पिता की साया लम्बें समय तक विराजमान रहती है। पुत्र में पिता अपनी परिकल्पना को सर्दव ढूंढ़ता है। उसे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसके सहारे की महती आवश्यकता होती है।
भारतीय दर्शन में पिता पुत्र के संबंधों के अनेक अनुकरणीय उदाहरण है। जहां पुत्र पिता के हर दुःख सुख का साथी होता है। वह श्रवण कुमार बनकर लाठी बनता नजर आता है तो कहीं  राम की तरह पिता के आदेश को सादर स्वीकार करते मिलता है। पाश्चयात संस्कृति में पिता पुत्र के इन संबंधों को नहीं देखा जा सकता । पुत्र पाने की मनोकामना हर पिता के मन को होती है पर पिता-पुत्र धर्म निभाने की परम्परा भारतीय संस्कृति में हीं देखी जा सकती । पितृ पक्ष की परम्परा भी भारतीय संस्कृति में हीं देखने को मिलती।
पिता पुत्र के आपसी संबंधों पर आधुनिकता ने भी अपना प्रभाव जमाया है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जहां पुत्र पिता को केवल जन्मदाता मानता है, उसे आश्रय देने की भी जरूरत है, इस जिम्मेवारी से पग स्थिर होते ही भाग खड़ा होता है। उसे बचपन से अपने कंधों का सहारा देकर बड़ा करने वाला पिता एक समय बोझ सा प्रतीत होने लगता है। इस तरह के उभरते परिवेश ने वृद्धाश्रम की अवधारणा को उभार दिया जहां पिता पुत्र से अलग नजर आने लगा है। वृद्धाश्रम जा कर के भी पुत्रमोह से अपने आप को भारतीय पिता अलग नहीं कर पाता, वह इस छिपे दर्द को अपने जैेसे वृद्धाश्रम में आये सहयात्री के साथ बांटता नजर आता है। इस तरह के उभरते परिवेश भारतीय संस्कृति के अनुकूल तो नहीं है पर आधुनिक परिवेश से प्रभावित युवा पीढ़ी की यह धरोहर बनती जा रही है जिसका भावी भविष्य कभी सुखद नहीं हो सकता । इस तरह के उभरते परिवेश से पिता के मन में अंत समय ऐसी वितृष्णा पैदा हो जाती है, जहां पुत्र होने की परिकल्पना खत्म हो जाती है। जिस पुत्र को पाने के लिये जिसने हर तरह के प्रयास किये हो, धर्म स्थानों के चक्कर काटे हों, जंतर - मंतर के बीच नहीं चाहते हुये भी दिये ताबीज को बांधी होे, जिसने जो कहा, उसे पूरा किया हो, वहीं औलाद जब उसे घर से बाहर निकाल वृद्धाश्रम का राह दिखा दे तो ग्लानी होना स्वाभाविक है।
इस तरह के उभरते परिवेश के बीच आज भी अनेक परिवार देखने को मिल जायेंगे जहां भारतीय संस्कृति जिंदी है। जहां पुत्र पिता के हर कदम का सहारा बना अपनी दिनचर्या को बेहतर ढंग से निभा रहा हैं। कार्यालय जाते समय पिता के पांव छूकर आशीर्वाद लेने एवं दिनभर का थका अपने कार्यालय से घर आने पर पिता का हालचाल पूछने एवं, संग में चाय पीने, पिलाने की परम्परा आज भी जहां कायम है वहां कष्ट अपने आप भाग जाता है। पिता की छांव सदा हीं सुखद होती है, इसका आभास उस पारिवारिक परिवेश से किया जा सकता है जहां आज भी पिता की उपस्थिति में संगठित परिवार है। जहां पिता आदर का पात्र है।
 

डाक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म १४ अप्रैल 1891 को महू में सूबेदार रामजी शकपाल एवं भीमाबाई की चौदहवीं संतान के रूप में हुआ था। उनके व्यक्तित्व में स्मरण शक्ति की प्रखरता, बुद्धिमत्ता, ईमानदारी, सच्चाई, नियमितता, दृढ़ता, प्रचंड संग्रामी स्वभाव का मणिकांचन मेल था। उनकी यही अद्वितीय प्रतिभा अनुकरणीय है। वे एक मनीषी, योद्धा, नायक, विद्वान, दार्शनिक, वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं धैर्यवान व्यक्तित्व के धनी थे। वे अनन्य कोटि के नेता थे, जिन्होंने अपना समस्त जीवन समग्र भारत की कल्याण कामना में उत्सर्ग कर दिया।
 खासकर भारत के 80 फीसदी दलित सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त थे, उन्हें अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन संकल्प था। संयोगवश भीमराव सातारा गांव के एक ब्राह्मण शिक्षक को बेहद पसंद आए। वे अत्याचार और लांछन की तेज धूप में टुकड़ा भर बादल की तरह भीम के लिए मां के आंचल की छांव बन गए। बाबा साहब ने कहा- वर्गहीन समाज गढऩे से पहले समाज को जातिविहीन करना होगा। समाजवाद के बिना दलित-मेहनती इंसानों की आर्थिक मुक्ति संभव नहीं।
डॉ. अंबेडकर की रणभेरी गूंज उठी, समाज को श्रेणीविहीन और वर्णविहीन करना होगा क्योंकि श्रेणी ने इंसान को दरिद्र और वर्ण ने इंसान को दलित बना दिया। जिनके पास कुछ भी नहीं है, वे लोग दरिद्र माने गए और जो लोग कुछ भी नहीं हैं वे दलित समझे जाते थे। बाबा साहेब ने संघर्ष का बिगुल बजाकर आह्वान किया, छीने हुए अधिकार भीख में नहीं मिलते, अधिकार वसूल करना होता है। उन्होंने ने कहा है, हिन्दुत्व की गौरव वृद्धि में वशिष्ठ जैसे ब्राह्मण, राम जैसे क्षत्रिय, हर्ष की तरह वैश्य और तुकाराम जैसे शूद्र लोगों ने अपनी साधना का प्रतिफल जोड़ा है। उनका हिन्दुत्व दीवारों में घिरा हुआ नहीं है, बल्कि ग्रहिष्णु, सहिष्णु व चलिष्णु है।  बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने भीमराव अंबेडकर को मेधावी छात्र के नाते छात्रवृत्ति देकर 1913 में विदेश में उच्च शिक्षा के लिए भेज दिया। अमेरिका में कोलंबिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, मानव विज्ञान, दर्शन और अर्थ नीति का गहन अध्ययन बाबा साहेब ने किया। वहां पर भारतीय समाज का अभिशाप और जन्मसूत्र से प्राप्त अस्पृश्यता की कालिख नहीं थी। इसलिए उन्होंने अमेरिका में एक नई दुनिया के दर्शन किए। डॉ. अंबेडकर ने अमेरिका में एक सेमिनार में भारतीय जाति विभाजन पर अपना मशहूर शोध-पत्र पढ़ा, जिसमें उनके व्यक्तित्व की सर्वत्र प्रशंसा हुई।
डॉ. अंबेडकर के अलावा भारतीय संविधान की रचना हेतु कोई अन्य विशेषज्ञ भारत में नहीं था। अत: सर्वसम्मति से डॉ. अंबेडकर को संविधान सभा की प्रारूपण समिति का अध्यक्ष चुना गया। 26 नवंबर 1949 को डॉ. अंबेडकर द्वारा रचित (315 अनुच्छेद का) संविधान पारित किया गया। डॉ. अंबेडकर का लक्ष्य था- सामाजिक असमानता दूर करके दलितों के मानवाधिकार की प्रतिष्ठा करना।  डॉ. अंबेडकर ने गहन-गंभीर आवाज में सावधान किया था, 26 जनवरी 1950 को हम परस्पर विरोधी जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक क्षेत्र में समानता रहेगी किंतु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में असमानता रहेगी। जल्द से जल्द हमें इस परस्पर विरोधता को दूर करना होगी। वर्ना जो असमानता के शिकार होंगे, वे इस राजनीतिक गणतंत्र के ढांचे को उड़ा देंगे। अंबेडकर मधुमेह से पीडि़त थे। 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु दिल्ली में नींद के दौरान उनके घर में हो गई। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों से जो सियासी माहौल अपने चरम पर है और सरकार की अस्थिरता को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं उस पर फिलहाल तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सक्रियता और मोर्चा संभाल लेने के बाद एक प्रकार से विराम लग गया है। फिलहाल यह फौरी राहत के समान है। अभी तो खेल चालू हुआ है और अंतत: इसका पटाक्षेप कौन करेगा यह मार्च मासान्त तक ही पता चल सकेगा। 13 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने का अन्तिम दिन है। इस दिन बहुत कुछ साफ हो जाएगा। यदि मतदान के लिए नौबत आती है तो फिर 26 मार्च को इसके नतीजे सामने आएंगे। बजट सत्र के समापन तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री कमलनाथ पार्टी के सभी विधायकों एवं बाहर से समर्थन दे रहे विधायकों को एकजुट रख पाते हैं तो फिर सरकार की स्थिरता को लेकर भाजपा नेताओं द्वारा समय-समय पर जो सवाल उठाये जाते हैं उन पर भी कुछ अधिक अंतराल के लिए विराम लग जायेगा। कांग्रेस में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, मौजूदा हालातों को देखते हुए यदि कोई कांग्रेस नेता ऐसा माहौल बनाता है तो वह वास्तविकता की अनदेखी से अधिक कुछ नहीं होगा। कांग्रेस में असंतोष की जड़ में संवादहीनता भी है ।
कांग्रेस,बासपा,सपा और निर्दलीय मिलाकर दस विधायकों को गुरुग्राम ले जाया गया और बाद में उनमें से चार को बैंगलुरू ले जाये जाने के साथ ही उनमें से एक कांग्रेस विधायक हरदीप सिंह डंग के द्वारा अपनी उपेक्षा और पीड़ा का इजहार करते हुए विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति और मुख्यमंत्री कमलनाथ को त्यागपत्र भेजने की सोशल मीडिया में चर्चा होते ही कांग्रेस की राजनीति जो पहले से ही सियासी तनाव में थी वह अपने चरम पर पहुंच गयी है। वैसे डंग के इस्तीफे को त्यागपत्र नहीं माना जा सकता भले ही उसमें त्यागपत्र का उल्लेख हो। इस पत्र में इतनी सावधानी अवश्य बरती गयी थी कि उसमें उनकी घ्ाुटन की अभिव्यक्ति थी और ऐसा त्यागपत्र मंजूर नहीं हो सकता। त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को आकर स्वयं विधायक को देना होता है या यह सूचित करना होता है कि यह उन्होंने ही भेजा है। वैसे भी त्यागपत्र वही पत्र माना जाता है जो कि तीन-चार लाइन से अधिक न हो और उसके साथ कोई अन्य बात न कही गयी हो। इसके बावजूद भी अध्यक्ष विधायक को बुलाकर अपनी संतुष्टि करते हैं कि यह पेशकश उन्होंने स्वेच्छा से की है या नहीं। दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया में जिस त्यागपत्र ने सियासी ड्रामें को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया था वह न तो विधिवत त्यागपत्र था और जहां पहुंचाया जाना चाहिए था वहां भी नहीं पहुंचा था। त्यागपत्र में अन्य मुद्दों के अलावा एक मुद्दा प्रदेश नेतृत्व और आलाकमान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें उस बात की ओर संकेत किया गया है जो पीड़ा अन्य कुछ कांग्रेस विधायकों के साथ ही उन नेताओं व कार्यकर्ताओं को भी है जो यह महसूस करते हैं कि भले ही संघर्ष के दिनों में वे पार्टी के साथ खड़े रहे हों लेकिन अवसर उन्हें ही मिलते हैं जो किसी न किसी प्रदेश के स्थापित नेता से जुड़े होते हैं। हरदीप सिंह डंग ने अपने पत्र के अन्त में यह भी कहा है कि उन्हें मंत्रिमंडल में शायद इसलिए स्थान नहीं मिला क्योंकि वे कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी के गुट से नहीं जुड़े हैं और पार्टी के लिए हमेशा संघर्ष करते रहे हैं।
कांग्रेस में संकट के जो कुछ बादल उमड़े-घ्ाुमड़े थे उनको सही संदर्भ में समझने और उसे अभिव्यक्त करने में केवल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने जो कहा वही असली कारण है और उसके कारण ही संवादहीनता की स्थिति है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि कांगे्रस विधायकों के टूटने और भाजपा की ओर झुकाव की एक बड़ी वजह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद भी है। अगर प्रदेश अध्यक्ष अलग से होता तो ऐसे हालात नहीं बनते, वर्तमान में ऐसे व्यक्ति की जरुरत है जो लगातार प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बैठे और कार्यकर्ताओं के असंतोष को खत्म करे। तन्खा ने जो कहा है वही कांग्रेस में पनप रहे असंतोष की असली वजह है। विधायक व कांग्रेस कार्यकर्ता यह महसूस कर रहे हैं कि वे अपनी बात ऊपर तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। मुख्यमंत्री की अपनी व्यस्तताएं होती हैं और सुरक्षा का मजबूत घेरा भी रहता है। ऐसे में उन तक पहुंचना आसान नहीं रहता। अधिकांश विधायकों की भी यह सोच एवं शिकायत है कि संवादहीनता के हालात हैं और वे अपनी बात सत्ता व संगठन नेतृत्व को नहीं पहुंचा पा रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल प्रदेश अध्यक्ष होता तो असंतोष इतना नहीं पनप पाता और विधायक व अन्य कार्यकर्ता और नेता अपनी बात उन तक पहुंचाते तथा उनके माध्यम से समस्या मुख्यमंत्री तक पहुंचती। इससे असंतोष इतना अधिक घनीभ्ाूत नहीं होता जितना कि इस समय सतह पर आ गया है। यह सब भाजपा नेताओं द्वारा प्रायोजित था या फिर कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति का नतीजा था यह बात तो देर-सबेर पता चल ही जाएगी, लेकिन यह सही है कि यदि कांग्रेस के विधायकों में असंतोष था या भाजपा नेता उन्हें अपने मोहपाश में आकर्षित कर रहे थे तो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी कांग्रेस की है। कांग्रेस के विधायकों को सहेज कर रखना और वे विपक्ष की बातों में न आयें यह भी पार्टी के उन लोगों के लिए जरुरी है जो नेतृत्व की कतार में आते हैं। अपना घर चुस्त-दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी पार्टी नेतृत्व की ही है। यदि कांग्रेस के अंदर असंतोष पनप रहा है और विधायक उसको व्यक्त करते रहे हैं तो उस पर समय रहते ध्यान देने की जरुरत थी ताकि ऐसे हालात न बनें जैसे कि आज बन गये हैं।
एक बात साफ है कि सीधे-धीरे ताजा घटनाक्रम राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है। कांग्रेस विधायकों के सामने इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता था कि वे अपनी पीड़ा का इजहार करें। विधायक भी जानते हैं कि उनकी पूछ-परख राज्यसभा चुनाव के समय अधिक होती है। यह घटनाक्रम इशारा भाजपा की ओर कर रहा है क्योंकि वह हर हाल में राज्यसभा की दो सीटें जीतना चाहती है। कांग्रेस को इसके लिए जोड़तोड़ की जरुरत नहीं रहेगी यदि वह अपना घर चुस्त दुरुस्त रख पायेगी, केवल उसे एक या दो मत की आवश्यकता होती जबकि भाजपा को लगभग 9 ऐसे विधायकों का समर्थन जुटाना होता जो कांग्रेस के हों या उसे सहयोग दे रहे हैं। भाजपा की इसमें दो रणनीति हो सकती थीं कि या तो कुछ विधायकों के त्यागपत्र करा दिए जायें या ऐसी व्यवस्था की जाए कि वे मतदान में भाग न लें। कांग्रेस को दो सीटें इसलिए आसानी से मिल जाती क्योंकि उसके पास बाहर से समर्थन दे रहे चार निर्दलियों और तीन बसपा-सपा के विधायकों का समर्थन हासिल है। जहां तक इन दलों के तीन विधायकों का सवाल है उन्होंने कभी भी ऐसा नहीं कहा कि वे सरकार का समर्थन नहीं करेंगे या उसके साथ नहीं हैं। जहां तक प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का सवाल है तो यह निर्णय कांग्रेस हाईकमान को करना है। लम्बे समय तक ऐसे फैसले टालना पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाते रहे हैं इसकी कुछ बानगी अन्य राज्यों में देखने को भी मिली है।  
और यह भी
असंतुष्ट विधायकों की शिकायत चाहे वे कांग्रेस के हों या समर्थन दे रहे विधायक या अन्य दलों व निर्दलीय हों, अधिकांश मंत्री उन्हें आसानी से नहीं मिलते हैं और न ही उनकी कही बातों को तवज्जो देकर उस पर अमल करते हैं। मंत्रियों के बारे में तो हमेशा इस प्रकार की शिकायत कार्यकर्ताओं और विधायकों को रही है चाहे सरकार भाजपा की रही हो या कांग्रेस की। संवादहीनता की स्थिति खत्म हो और मंत्री आसानी से मिल पायें, यदि इसकी समय रहते व्यवस्था नहीं हो पाई तो फिर भविष्य में इस प्रकार की परिस्थितियां पुन: कभी भी सतह पर आ सकती हैं।

-लेखक 'सुबह-सबेरे' के प्रबंध संपादक है।

एक साधु बहुत बूढ़े हो गए थे। उनके जीवन का आखिरी क्षण आ पहुंचा। आखिरी क्षणों में उन्होंने अपने शिष्यों और चेलों को पास बुलाया। जब सब उनके पास आ गए, तब उन्होंने अपना पोपला मुंह पूरा खोल दिया और शिष्यों से बोले- ‘देखो, मेरे मुंह में कितने दांत बच गए हैं?’ शिष्यों ने उनके मुंह की ओर देखा। कुछ टटोलते हुए वे लगभग एक स्वर में बोल उठे- ‘महाराज आपका तो एक भी दांत शेष नहीं बचा। शायद कई वर्षों से आपका एक भी दांत नहीं है’ साधु बोले-‘देखो, मेरी जीभ तो बची हुई है’ सबने उत्तर दिया- ‘हां, आपकी जीभ अवश्य बची हुई है’
इस पर साधू ने कहा- ‘पर यह हुआ कैसे? मेरे जन्म के समय जीभ थी और आज मैं यह चोला छोड़ रहा हूं तो भी यह जीभ बची हुई है। ये दांत पीछे पैदा हुए, ये जीभ से पहले कैसे विदा हो गए? इसका क्या कारण है, कभी सोचा?’ शिष्यों ने उत्तर दिया-‘हमें मालूम नहीं। महाराज, आप ही बतलाइए’ उस समय मृदु आवाज में संत ने समझाया - यही रहस्य बताने के लिए मैंने तुम सबको इस बेला में बुलाया है। इस जीभ में माधुर्य था, मृदुता थी और खुद भी कोमल थी, इसलिए वह आज भी मेरे पास है, परंतु मेरे दांतों में शुरू से ही कठोरता थी, इसलिए वे पीछे आकर भी पहले खत्म हो गए, अपनी कठोरता के कारण ही ये दीर्घजीवी नहीं हो सके। दीर्घजीवी होना चाहते हो तो कठोरता छोड़ो और विनम्रता सेखो।  






17 फरवरी का दिन भारतीय सेना में महिला अधिकारियों के स्थाई कमीशन मामले में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के लिए जाना जाएगा। न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले को बरकरार रखा है जिसके तहत अब सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी नियुक्ति मिल सकेगी। सेना में महिला हक की बराबरी के लिए यह फैसला काफी दूरगामी है। दरअसल स्थायी नियुक्ति का यह मामला तब चर्चा में आया था जब केंद्र सरकार ने एक हलफनामे में कहा था कि सेना में 14 साल की सेवा (शॉट सर्विस कमीशन) पूर्ण कर चुकी महिला अधिकारियों को 20 साल तक सेना में बने रहने की अनुमति दी जाएगी ताकि वह पेंशन के लिए योग्य हो जाएं। इसका मतलब यह था कि 20 साल की सेवा में उन्हें स्थायी नियुक्ति नहीं दी जाएगी। इस फैसले के खिलाफ महिला सेना अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि महिलाओं को स्थायी कमीशन नहीं देने का फैसला उन्हें अत्यंत पीछे ले जाने वाला कदम है।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल महिला अधिकारियों के स्थायी कमीशन को मंजूरी के लिए आदेश दिया है बल्कि इस मामले में केंद्र सरकार के रुख के लिए उसे फटकार भी लगाई। कहा कि सशस्त्र बलों में लिंग आधारित भेदभाव खत्म करने के लिए सरकार की ओर से मानसिकता में बदलाव जरूरी है। सेना में महिला अधिकारियों को कमान पोस्ट देने पर पूरी तरह रोक अतार्किक और समानता के अधिकार के खिलाफ है।
अब नए फैसले के बाद महिला अधिकारी सेना में कमांड पोस्ट पर नियुक्ति के लिए पात्र होंगी। केवल कॉम्बैट रोल पर कोर्ट ने फैसला सेना पर छोड़ा है। कॉम्बेट रोल का मतलब है जंग में सीधे शामिल होने वाली जिम्मेदारियां। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सेना में अब महिला अधिकारी अपनी पसंद के आधार पर कमांड पोस्ट पर जा सकती हैं, जो कि महिला अधिकारों की लड़ाई की बड़ी जीत है। महिला अधिकारों पर समाज में अब काफी बदलाव आया और इस बारे में खुले मन से विचार करने की जरूरत है। इससे पहले कई वर्ष पूर्व एयर इंडिया की एक फ्लाइट में दोनों पायलट महिला होने के चलते जब यात्रियों ने उड़ान का विरोध किया था तो महिला अधिकारों और समानता की बात उठी थी। बाद में एयर इंडिया ने यूरोप की एक लंबी उड़ान में दोनों महिला पायलट के हाथ में फ्लाइट देने के साथ तब महिला अधिकारों पर बड़ा फैसला लिया था। बदलते सामाजिक दौर में अब महिला अधिकारों और समाज में उनकी समानता को लेकर बड़े निर्णय हो रहे हैं। उच्चतम न्यायालय के आज के फैसले ने उन्हीं निर्णयों पर मुहर लगा दी है क्योंकि सेना की जिम्मेदारी किसी भी अन्य जिम्मेदारी से बहुत बड़ी है। यह फैसला महिला सशक्तिकरण की दिशा में सटीक है। अब सरकार को देर नहीं करनी चाहिए। दुनिया में बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया जाता है भारत में अभी तक ऐसा नहीं था। सेना में स्थायी कमीशन दिए जाने को लेकर एक केस दिल्ली हाईकोर्ट में फाइल किया गया था। इस पर दिल्ली हाइकोर्ट ने फैसला दिया था कि महिलाओं को कमीशन दिया जाना चाहिए। उसके बाद केंद्र की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी गई। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी। इससे सेना में काम कर रही महिला अधिकारियों में खुशी है। इसमें कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार युद्ध क्षेत्र को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमान देने के लिए बाध्य है। साथ ही ये भी लिखा कि सामाजिक और मानसिक कारण बताकर महिलाओं को इस अवसर से वंचित करना भेदभावपूर्ण है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया जाता है। भारतीय सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन के मिलने से अब वो बराबरी का हक पा सकेंगी। इससे महिलाओं का न केवल रक्षा के क्षेत्र में डंका बजेगा बल्कि सभी सेवा कर्मियों के लिए अवसर की समानता भी उपलब्ध होगी। दरअसल दुनिया के कई देशों में सेना में कार्यरत महिला अधिकारियों को पहले सिर्फ न्यायाधीश एडवोकेट जनरल और सेना शिक्षा कोर में ही स्थायी कमीशन दिया जाता था, इसके बाद इनकी संख्या में बढ़ोतरी की गई। एक बात ये भी है कि युद्ध क्षेत्र में महिलाओं को तैनाती नहीं दी जाएगी। महिला अधिकारियों को सेना में शार्ट सर्विस कमीशन के द्वारा 14 साल की नौकरी करने के बाद सबसे बड़ी मुश्किल दुबारा से रोजगार मिलने की होती थी। इनको पेंशन भी नहीं मिलती है जिससे इनके सामने रिटायरमेंट के बाद रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त भी कई ऐसी सुविधाएं हैं जो इन महिला अधिकारियों को नहीं मिल पा रही थीं। अब स्थायी कमीशन लागू हो जाने के बाद उन्हें सुविधाएं और पेंशन दोनों मिल सकेगी।
ईएमएस/ 21 फरवरी 2020

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाने की मांग क्या कर डाली, तभी से इस ज्वंलत मसले पर देश के कुछ राजनेताओं ने पक्ष व विपक्ष में श्रेय लेने के लिए अपनी राजनीति चमकाने के लिए बिसात बिछानी शुरू कर दी हैं।

देश में दो बच्चों की नीति लागू करने के संदर्भ में बहुत लंबे समय से विचार चल रहा है। देश के नीति-निर्माता इसके लाभ व हानि को दृष्टिगत रखकर इस पर विचार करने का कार्य कर रहे है, लेकिन हमारे देश के बेहद उथलपुथल भरे अनिश्चितता पूर्ण राजनीतिक हालातों को देखकर अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि देश में दो बच्चों का कानून कब आ पायेगा। लेकिन जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि आरएसएस की आगामी योजना देश में दो बच्चों का क़ानून लागू करवाना है, तब से देश के आम जनमानस व राजनीतिक दलों में एक बार फिर से दो बच्चों के कानून पर तेजी से बहस व जमकर राजनीति भी शुरू हो गयी है। आज हमारी सबसे बड़ी दुविधा यह है कि चंद लोगों व नेताओं की कृपा से हमारे देश में हर मुद्दे पर इतनी ज्यादा राजनीति होने लगी है कि आम आदमी के समझ में ही नहीं आता है कि उसके लिए क्या सही व क्या गलत है। देश में राजनीति की अति के चलते ऐसे हालात हो गये हैं कि जब तक हर बात का आम जनता के बीच में बतंगड़ ना बन जाये तब तक देश के कुछ राजनेताओं को तो चैन की नींद तक भी नहीं आ पाती है।
 
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाने की मांग क्या कर डाली, तभी से इस ज्वंलत मसले पर देश के कुछ राजनेताओं ने पक्ष व विपक्ष में श्रेय लेने के लिए अपनी राजनीति चमकाने के लिए बिसात बिछानी शुरू कर दी हैं। कोई भी यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि यह राजनीति का मसला नहीं बल्कि देश की अधिकांश समस्याओं की जननी बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण करने का एक ठोस समाधान है व अधिकांश समस्याओं का निदान है। आज 133 अरब जनसंख्या वाले हमारे देश में आबादी के इस जबरदस्त विस्फोट पर लगाम लगाना समय की मांग है और यह देश व समाज के हित में अब बहुत जरूरी हो गया है। क्योंकि अब अगर और देर कर दी गयी, तो इस घातक बीमारी का कोई इलाज किसी भी नीतिनिर्माता व विशेषज्ञ के पास नहीं बचेगा। देश में जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार चलती रही तो हम लोग अपनी आने वाली पीढियों को सुविधाओं व संसाधनों से वंचित करके हर चीज की लंबी लाइन में लगने के लिए मजबूर करके एक दिन इस दुनिया से रुखसत हो जायेंगे। इस नीति का विरोध करने वाले राजनीतिक दल व लोग आरोप लगाते हैं कि देश में दो बच्चों की नीति को बाध्यकारी बनाए जाने की संघ प्रमुख और कुछ अन्य लोगों की मांग के पीछे छिपे हुए राजनीतिक कारण हैं। वहीं विरोधी पक्ष भी तरह-तरह के तर्क देकर बताते हैं कि यह कानून देश के मुसलमान और ग़रीब विरोधी है। इस तरह की बात करके आम लोगों को बरगलाने के चक्कर में ये चंद लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि भाई इस कानून से लाभ होगा तो सबको और नुकसान होगा तो सबको होगा, इसमें हिन्दू-मुसलमान या अमीर-गरीब की बात कहां से बीच में आ गयी।  वहीं इस कानून के पक्षधर लोग व राजनीतिक दल देश की जनता को उसके अनगिनत लाभ गिनाते हुए नहीं थकते हैं, लेकिन उनमें से ही चंद लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए धर्म व समुदाय को टारगेट करके उनको एक अच्छे कानून के प्रति भयभीत करने का काम भी करते नज़र आते हैं, जो सरासर गलत है। देश में अन्य मुद्दों की तरह ही दो बच्चों के कानून के पक्षधर व विरोधियों के बीच राजनीति तेजी से शुरू हो गयी है, भविष्य के गर्भ में छिपे इस कानून पर भी दोनों पक्षों के चंद लोग श्रेय लेने की अंधी दौड़ में शामिल हो गये हैं, जो हमारे देश में चंद राजनेताओं की कृपा से लगातार जारी रहेगी।

वैसे हमारे देश में बच्चों के पैदा होने की दर को आकडों के रूप में देखें तो देश में वर्ष 1950 में देश की महिलाओं की औसतन प्रजनन दर छह के आसपास थी, यानी कि देश की एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन छह बच्चों को जन्म देती थी जो बहुत अधिक थी। लेकिन हाल के वर्षों में देखें तो देश में अब औसतन प्रजनन दर 2.2 प्रति महिला हो गई है, इसका मतलब यह है कि देशवासी इस ज्वंलत समस्या के प्रति काफी जागरूक तो हुए हैं। लेकिन विचारणीय यह है कि हमारे देश में प्रजनन दर अब भी 2.1 के एवरेज रिप्लेसमेंट रेट (औसत प्रतिस्थापन दर) तक नहीं पहुंच पायी है। औसत प्रतिस्थापन दर (एवरेज रिप्लेसमेंट रेट) प्रजनन क्षमता का वो स्तर है जिस पर एक आबादी खुद को पूरी तरह से एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में बदल देती है। लेकिन यह भी तय है कि चंद लोगों के विरोध व बरगलाने के बाद भी अब देश में धीरे-धीरे स्थिति रिप्लेसमेंट लेवल पर जल्द ही पहुंचने वाली है। परंतु समस्या यह है कि अभी भी देश के कुछ राज्यों में ऐसा नहीं हो पा रहा है। जो देश की आने वाली पीढियों के शानदार उज्जवल भविष्य के लिए ठीक नहीं है। संतोष की बात यह है कि पश्चिम भारत व दक्षिण भारत में ये हर जगह हो गया है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इसके उलट हिंदी भाषी क्षेत्र उत्तर भारत और पूर्वी भारत के क्षेत्र में महिलाओं की औसतन प्रजनन दर अब भी तीन है और कुछ जगह तो यह चार तक बनी हुई है। जिसमें सबसे अधिक योगदान बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि जैसे राज्यों का है। इसका सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव यह है कि संसाधनों के अभाव में जनसंख्या के बढ़ते दवाब की वजह से इन राज्यों की बहुत सारी जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर है। सोचने वाली बात यह है कि अपने परिवारों का लालनपालन करने के उद्देश्य से रोजगार की तलाश में सबसे अधिक पलायन भी इन राज्यों में ही होता है। क्योंकि यह एक नेचुरल प्रक्रिया है कि जब देश के किसी एक भू-भाग में विकास कम होगा, गरीब अधिक होगी और प्रजनन दर के चलते जनसंख्या अधिक होगी, तो वहां के लोग परिवार पालने के लिए अपने परिवार से दूर होकर प्रवासी बनकर देश के दूसरे राज्यों में रोज़गार खोजने के लिए जायेंगे ही। लेकिन मौजूदा समय में जब देश में रोजीरोटी रोजगार पर मंदी की जबरदस्त मार है, तो उस समय जब प्रवासी लोगों की वजह से किसी राज्य के संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और वहां के मूलनिवासियों को यह लगने लगता है कि तुम इन प्रवासियों की वजह से बेरोजगार हो, तो उस स्थिति में एक बेवजह का समाज में संघर्ष उत्पन्न होता है। यह भी कटु सत्य है कि हमारे देश में अभी भी ऐसी मानसिकता है कि जो लोग दूसरी जगह प्रवासी बनकर काम ढूंढते हैं, उनकी स्थिति कुछ लोगों को छोड़कर अपने घर या गृहराज्य से कभी भी बेहतर नहीं हो पाती है। इस सब स्थिति के लिए हमारी बढ़ती जनसंख्या जिम्मेदार है।

आज हम सभी को सोचना होगा कि परिवार की अच्छी सेहत व बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए हर हाल में बच्चों की संख्या को जाति-धर्म से ऊपर उठाकर नियंत्रित करना होगा। तब ही देश में उपलब्ध संसाधनों, रोजगार के अवसरों, तरक्की के विकल्पों और सरकार की सेवाओं का हम व हमारे बच्चे सही ढंग से लाभ ले सकते हैं या उपयोग कर सकते हैं। क्योंकि आज के व्यवसायिक दौर में परिवार को भावनात्मक लगाव के साथ-साथ आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए की संसाधनों से परिपूर्ण होकर आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना बेहद जरूरी है, जिस लक्ष्य को छोटे परिवार के रहते आसानी से हासिल किया जा सकता है। इसलिए दो बच्चों के कानून के मसले पर अपने दिल व परिवार के हित की सुने व देशहित में उस पर अमल करें।
 
दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

आखिर पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू, सिख आदि भारत की ओर नहीं निहारेंगे तो क्या अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया से उम्मीद लगाएंगे ? कम से कम अब तो नागरिकता कानून के विरोधियों को उसके खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने से बाज आना चाहिए।

पाकिस्तान में गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर हमले की घटना से एक बार फिर दुनिया के सामने वहां के अल्पसंख्यकों की हिफाजत के खोखले दावे का सच सामने आया है। किस तरह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को उपेक्षित, अपमानित और आतंकित जीवन जीने को विवश होना पड़ रहा है, गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर नफरत, द्वेष एवं अमानवीयता का हमला इसका जीता-जागता उदाहरण है। ऐसे हमलों के शिकार लोगों को भारत में पनाह देने के लिये ही नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लाया गया है, लेकिन कतिपय राजनीतिक दलों ने इसे विवादित बना दिया है। प्रश्न है कि आखिर इन मुस्लिम राष्ट्रों के ये अल्पसंख्यक कब तक अन्धकारमय, प्रताड़ित एवं त्रासद जीवन जीने को विवश होते रहेंगे। उनके सामने घना अंधेरा है, वे या तो जबरन धर्मांतरण का शिकार होंगे या फिर अपमानित जीवन जीने को विवश होंगे। उन्हें त्रासदी भरे जीवन से तभी छुटकारा मिल सकता है, जब वे या तो अपना धर्म छोड़ दें या फिर देश। वास्तव में इसी कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। ऐसे प्रताड़ित, उपेक्षित एवं त्रासदी झेल रहे लोगों की सुध लेने के लिये भारत सरकार ने साहसिक कदम उठाया है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
 
पवित्र तीर्थ ननकाना साहिब की घेरेबंदी और पथराव की घटना ने न केवल पाकिस्तान और भारत बल्कि पूरी दुनिया के सिखों का ध्यान खींचा। पथराव के पीछे एक सिख लड़की के कथित अपहरण और जबरन धर्मांतरण के बाद शादी का मामला है, जिसमें एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद संबंधित परिवार ने ननकाना साहिब पर धरना दिया। भीड़ द्वारा पथराव की घटना वहां इसी दौरान हुई। इस प्रकरण ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को एक बार फिर रेखांकित किया है। पाकिस्तान सरकार अन्य देशों, खासकर भारत में अल्पसंख्यकों की असुरक्षा को लेकर जितनी चिंता आजकल दिखा रही है, उसे ध्यान में रखते हुए यह घटना और महत्वपूर्ण हो जाती है। गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर हमले की ताजा घटना ने पाकिस्तान के मंसूबों एवं अमानवीय सोच को ही उजागर किया है। दुनियाभर में घोर निन्दा एवं भर्त्सना के बावजूद पाकिस्तान सुधरने को तैयार नहीं है। भले ही वह कितना ही सफेद झूठ बोल कर इस घटना पर पर्दा डाले, लेकिन दुनिया पाकिस्तान के सच को भली-भांति जानती है। इस गुरुद्वारे के सामने जमा हिंसक भीड़ के व्यवहार और उसकी भड़काऊ नारेबाजी को सारी दुनिया ने देखा-सुना है। यदि ननकाना साहिब में कहीं कुछ नहीं हुआ, तो फिर वहां घोर आपत्तिजनक नारे क्यों लगे और पत्थरबाजी कौन कर गया ? सवाल यह भी है कि इस घटना के अगले दिन वहां के सिखों को नगर कीर्तन निकालने की अनुमति क्यों नहीं दी गई ? गुरुद्वारे पर हुए हमले पर विवाद थमा भी नहीं था कि एक सिख युवक रविंद्र सिंह हो गयी।

ननकाना साहिब की घटना के बाद भारत में उन लोगों की आंखें खुल जाएं तो बेहतर जो अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून का अंध-विरोध करने में लगे हुए हैं। आखिर पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू, सिख आदि भारत की ओर नहीं निहारेंगे तो क्या अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया से उम्मीद लगाएंगे ? कम से कम अब तो नागरिकता कानून के विरोधियों को उसके खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने से बाज आना चाहिए, क्योंकि इस कानून के जरिये पाकिस्तान और साथ ही बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान में प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। क्या हो गया है हमारे देश को ? क्यों भारत को मजबूती देने एवं उसकी एकता-अखण्डता को सुदृढ़ करने के इस कानून के नाम पर हिंसा रूप बदल-बदल कर अपना करतब दिखा रही है। देश को तोड़ने, विखण्डित करने, विनाश, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और निर्दोष लोगों को डराने-धमकाने की इन कुचेष्टाओं एवं षड्यंत्रों को समझने की जरूरत है। ननकाना साहिब पर हमला भी एक षड्यंत्र ही है। इस तरह की अराजकता कोई मुश्किल नहीं, कोई वीरता नहीं। पर निर्दोष जब भी और जहां भी, चाहे देश में या पड़ोस में आहत होते हैं तब पूरा देश घायल होता है। पड़ोस को कड़ा संदेश देना होगा, देश के उपद्रवी हाथों को भी खोजना होगा अन्यथा उपद्रवी हाथों में फिर खुजली आने लगेगी। हमें इस काम में पूरी शक्ति और कौशल लगाना होगा। अराजक एवं उत्पादी तत्वों की मांद तक जाना होगा। पाकिस्तान के मंसूबों को समझना होगा। वह कभी भी पूरे देश की शांति और जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकता है। हमारा उद्योग, व्यापार ठप्प कर सकता है। हमारी खोजी एजेंसियों एवं शासन-व्यवस्था को जागरूक होना होगा।
 
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की मानें तो इस ऐतिहासिक एवं पवित्र गुरुद्वारे में कहीं कुछ नहीं हुआ। वह इस झूठ के पीछे इसलिए नहीं छिप सकता, क्योंकि दुनिया ने इसके सच को अपनी आंखों से देखा है। पाकिस्तान के हालात सुधरने की कहीं कोई उम्मीद इसलिए भी नहीं, क्योंकि एक तो कट्टरपंथी तत्व सेना एवं सरकार से संरक्षित हैं और दूसरे, ईशनिंदा सरीखा दमनकारी कानून अस्तित्व में है। जब तक यह कानून अस्तित्व में रहेगा, पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की जान सांसत में ही बनी रहेगी। पाकिस्तान कितना झूठा, फरेबी एवं षड्यंत्रकारी है, इसका उदाहरण पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने दिया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज के लोगों की स्थिति पर चिंता जताते हुए एक वीडियो ट्वीट किया, जबकि यह वीडियो उत्तर प्रदेश का न होकर बांग्लादेश का था।

नागरिकता कानून का विरोध करने की जरूरत क्यों पड़ रही है ? आखिर जब यह स्पष्ट है कि इस कानून का भारतीय मुसलमानों से कहीं कोई लेना-देना नहीं तब फिर उसके विरोध का क्या औचित्य ? स्पष्ट है पाकिस्तान अपने देश के अन्दरूनी हालात नहीं संभाल पा रहा है, वहां की जनता त्रस्त है, परेशान है, उन स्थितियों से ध्यान हटाने के लिये वह भारत को एवं भारत से जुड़े लोगों को अशांत करता है। विडम्बना तो यह भी है कि हमारे ही देश में राजनीतिक अस्तित्व लगातार खो रहे राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच बनाने के लिये नागरिकता कानून के विरोध जैसे अराष्ट्रीयता के अराजक रास्तों को अख्तियार कर रहे हैं। उत्पात का पर्याय बन गए इस उन्माद भरे हिंसक विरोध से कड़ाई से निपटना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कानून के शासन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का मजाक हो रहा है। अब युद्ध मैदानों में सैनिकों से नहीं, भितरघात करके, निर्दोषों को प्रताड़ित एवं उत्पीड़ित कर लड़ा जाता है। सीने पर वार नहीं, पीठ में छुरा मारकर लड़ा जाता है। इसका मुकाबला हर स्तर पर हम एक होकर और सजग रहकर ही कर सकते हैं।
 
यह भी तय है कि बिना किसी की गद्दारी के ऐसा संभव नहीं होता है। कश्मीर, पश्चिम बंगाल एवं अन्य राज्यों में हम बराबर देख रहे हैं कि प्रलोभन देकर कितनों को गुमराह किया गया और किया जा रहा है। पर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध का जो वातावरण बना है इसका विकराल रूप कई संकेत दे रहा है, उसको समझना है। कई सवाल खड़े हो रहे हैं जिसका उत्तर देना है। इसने नागरिकों के संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया, इसने भारत की एकता पर कुठाराघात किया है। यह बड़ा षड्यंत्र है इसलिए इसका फैलाव भी बड़ा हो सकता है। सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी कुर्सियों को पकड़े बैठे हैं या बैठने के लिए कोशिश कर रहे हैं। उन्हें नहीं मालूम कि इन कुर्सियों के नीचे क्या है। कुर्सी की चाह में देश को दांव पर लगाना कहां तक उचित है? ननकाना साहिब की घटना ने नागरिकता संशोधन कानून की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता को उजागर किया है, अब इस कानून का विरोध करने वालों की आंखें खुलनी ही चाहिए, नहीं खुलती हैं तो यह उनकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिन्ह है।
 
-ललित गर्ग

भला ऐसा कौन-सा इंसान होगा, जिसे त्यौहारों एवं पर्वों का माहौल आनंदित न करता हो, या राजनीति की चालों से कौन अछूता रहता है। ये पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की आपूर्ति करते हैं तो राजनीति राष्ट्र को उन्नति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर करती है।

जीवन में मौसम ही नहीं बदलता माहौल, मकसद, मूल्य और मूड सभी कुछ परिस्थिति और परिवेश के परिप्रेक्ष्य में बदलता है। और ये बदलते दौर जीवन को कई बार विचित्र नए अर्थ दे जाते हैं। नया वर्ष- 2020 ऐसे ही नये अर्थ और दिशाएं देने को सम्मुख खड़ा है। ऐसा लगता है कि जिन्दगी के सारे आदर्श और सारी रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता स्वयं में समेटकर आने वाला वर्ष न केवल त्यौहारों एवं पर्वों बल्कि राजनीति, अर्थनीति एवं समाज-व्यवस्था को नया माहौल देने को उपस्थित है। ऐसे ही माहौल में मनुष्य भीतर से खुलता है वक्त का पारदर्शी टुकड़ा बनकर।
 
भला ऐसा कौन-सा इंसान होगा, जिसे त्यौहारों एवं पर्वों का माहौल आनंदित न करता हो, या राजनीति की चालों से कौन अछूता रहता है। ये पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की आपूर्ति करते हैं तो राजनीति राष्ट्र को उन्नति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर करती है। शुष्क जीवन-व्यवहार के बोझ के नीचे दबा हुआ इंसान इस खुशनुमा मौसम एवं माहौल में थोड़ी-सी मुक्त सांस लेकर आराम महसूस करता है। जीवन की जड़ता उत्साह में बदल जाती है। हमारा देश ऐसे ही उत्सवों एवं त्यौहारों की वैभवता से सम्पन्न है, एक विशेष और आदर्श संस्कृति का वाहक है, फिर भी यह सब हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में अभिव्यक्त क्यों नहीं हो पाता? क्यों राष्ट्रीयता के नाम पर हम इतने बंटे एवं विभाजित है? क्यों बार-बार नारी की अस्मिता को तार-तार कर दिया जाता है, क्यों सामूहिक बलात्कार की घटनाएं तमाम विकास की तस्वीर को धुंधला जाती है, यह जीवन इतना बंधा-बंधा सा क्यों है? ये कैसी दीवारें हैं? इतनी गुलामी, इतने दुख कहां से इस देश के हिस्से में आ गए?

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हजारों-हजारों साल से जिस प्रकृति ने भारतीय मन को आकार दिया था, उसे रचा था, भारतीयता की एक अलग छवि का निर्माण हुआ, यहां के इंसानों की इंसानियत ने दुनिया को आकर्षित किया, संस्कृति एवं संस्कारों, जीवन-मूल्यों की एक नई पहचान बनी।  ऐसा क्या हुआ कि पिछली कुछ सदियों में उसके साथ कुछ गलत हुआ है, और वह गलत दिनोंदिन गहराता गया है जिससे सारा माहौल ही प्रदूषित हो गया है, जीवन के सारे रंग ही फिके पड़ गये हैं, हम अपने ही भीतर की हरियाली से वंचित हो गए लोग हैं। न कहीं आपसी विश्वास रहा, न किसी का परस्पर प्यार। न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में सामूहिकता का स्वर, बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी। यूं लगता है सब कुछ खोकर विभक्त मन अकेला खड़ा है फिर से सब कुछ पाने की आशा में। क्या यह प्रतीक्षा झूठी है? क्या यह अगवानी अर्थशून्य है?  
 
मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है। इसलिये कल पर कुछ मत छोड़िए। कल जो बीत गया और कल जो आने वाला है- दोनों ही हमारी पीठ के समान हैं, जिसे हम देख नहीं सकते। आज हमारी हथेली है, जिसकी रेखाओं को हम देख सकते हैं। हम आज एक नए जीवन के द्वार पर खड़े हैं। अतीत के सारे इतिहास को एक नया रूप दे देने वाले संसाधनों के साथ। इन संसाधनों में सबसे प्रमुख साधन विचार है ऐसा विचार जो विश्लेषणों और कारणों तक पहुंचता है। बीते जमाने में महावीर इसी विचार के पथ पर चल दुख के कारणों तक पहुंचे थे, पर इसके पहले उन्होंने राजगृह से निकल, जाने कितने वनों और बस्तियों की यात्राएं कीं। यह ज्ञान की, संवेदना की, बोध की यात्रा थी। ‘स्टैण्डर्ड ऑफ लाइफ’ के नाम पर भौतिकवाद, सुविधावाद और अपसंस्कारों का जो समावेश भारतीय संस्कृति एवं जीवन-शैली में हुआ या हो रहा है, वह निश्चित ही चिन्तनीय है। इस हिमालयी भूल का प्रतिकार या प्रायश्चित आने वाले साल-2020 में हो जाये तो बहुत शुभ है। अन्यथा आने वाली पीढ़िया अपने पुरुखों को कोसे बिना नहीं रहेगी।
 
देश को अपनी खोयी प्रतिष्ठा पानी है, उन्नत चरित्र बनाना है तथा स्वस्थ समाज की रचना करनी है तो हमें एक ऐसी जीवनशैली को स्वीकार करना होगा जो जीवन में पवित्रता दे। राष्ट्रीय प्रेम व स्वस्थ समाज की रचना की दृष्टि दे। कदाचार के इस अंधेरे कुएँ से निकले बिना देश का विकास और भौतिक उपलब्धियां बेमानी हैं। व्यक्ति, परिवार और राष्ट्रीय स्तर पर हमारे इरादों की शुद्धता महत्व रखती है, हमें खोज सुख की नहीं सत्व की करनी है क्योंकि सुख ने सुविधा दी और सुविधा से शोषण जनमा जबकि सत्व में शांति के लिये संघर्ष है और संघर्ष सचाई तक पहुंचने की तैयारी। हमें स्वयं की पहचान चाहिए और सारे विशेषणों से हटकर इंसान बने रहने का हक चाहिए। इस खोए अर्थ की तलाश करनी ही होगी। उपभोक्ता बनकर नहीं मनुष्य बनकर जीना नए सिरे से सीखना ही होगा। संस्कृति और मूल्यों के नष्ट अध्यायों को न सिर्फ पढ़ना होगा, बल्कि उन्हें नया रूप और नया अर्थ भी देना होगा। एक नई यात्रा शुरू करनी होगी। इसके लिये हमारे पर्वों एवं त्यौहारों, लोकतंत्र, समाज-व्यवस्था की विशेष सार्थकता है। श्रीकृष्ण ने कहा है- जीवन एक उत्सव है। उनके इस कथन पर भारतीयों का पूर्ण विश्वास है। हम जीवन के हर दिन को उत्सव की तरह जीते हैं, ढेरों विसंगतियों और विदूरपताओं से जूझते हुए। संकट में होशमंद रहने और हर मुसीबत के बाद उठ खड़े होने का जज्बा विशुद्ध भारतीय है और ऋतु-राग गुनगुनाते हुए अलग-अलग मौसम में उत्सव मनाने का भी। यही वजह है कि हम गर्व से कहते हैं- फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी... पर इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि बदलती दुनिया के असर से उत्सवधर्मिता एवं राजनीतिक चरित्र का जज्बा काफी प्रभावित हो रहा है। सबसे ज्यादा हमारी राजनीति ही नहीं, पर्व और त्यौहार की संस्कृति ही धुंधली हुई है। खेद की बात है कि हमने पश्चिम की श्रेष्ठ परम्पराओं को आत्मसात नहीं किया, बल्कि उसके साम्राज्यवाद के शिकार बने।
 
बदलाव की संस्कृति में सवालिया नजर केवल भारतीय पर्व और त्यौहार पर ही नहीं, बल्कि राजनीति पर टिकी है, क्योंकि हाल के राजनीतिक परिदृश्यों ने राममंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक कानून, एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की संभावना को पुरजोर तरीके से प्रकट किया है। इन मुद्दों ने वर्तमान नेतृत्व की संभावनाओं पर भी मोहर लगायी गयी है। हमें राजनीति को व्यक्ति नहीं, विचार और विश्वास आधारित बनाना होगा। चेहरा नहीं, चरित्र को प्राथमिकता देनी होगी। आज भी हम पिछड़े हैं, असुरक्षित हैं, अशिक्षित हैं। कभी हमें विश्व स्तर पर भ्रष्टाचारी होने का तगमा पकड़ा दिया जाता है तो कभी साम्प्रदायिकता का। कभी गरीबी का तो कभी अशिक्षा का, इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य होगा? क्या विश्व के हासिए में उभरती भारत की इस तस्वीर को हम कोई नया रंग नहीं दे सकते?

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हमें त्यौहारों एवं पर्वों ही नहीं बल्कि राजनीति की संस्कृति को भी समृद्ध बनाना होगा। हर दिन एक तलाश हो। अपनी और उस अछोर जीवन की, उस विराट प्रकृति की, हमारा अस्तित्व जिसकी एक कड़ी है। किसी भोर का उगता सूरज, कोई बल खाती नदी, दूर तक फैला कोई मैदान, कोई चरागाह, कोई सिंदूरी शाम, दूर गांव से आती कोई ढोलक की थाप, पीछे छूटती दृश्यावलियां... हमारे भीतर रच-बस जाती हैं। यही सब जीवन की संपदाएं हैं, हमारे अंतर में जगमगाती-कौंधती रोशनियां हैं, जिनकी आभा में हम उस सब को पहचान पाते हैं जो जीवन है, जो हमारी पहचान के मानक हैं। हम भारत के लोग इसलिए विशिष्ट नहीं हैं कि हम ‘जगतगुरु’ रहे हैं, या हम महान आध्यात्मिक अतीत रखते हैं। हम विशिष्ट इसलिए हैं कि हमारे पास मानवता के सबसे प्राचीन और गहरे अनुभव हैं। ये अनुभव सिर्फ इतिहास और संस्कृति के अनुभव नहीं हैं, इसमें नदियों का प्रवाह, बदलते मौसमों की खुशबू, विविध त्यौहारों की सांस्कृतिक आभा, प्रकृति का विराट लीला एवं लोकतंत्र की सशक्त शासन-प्रणाली का संसार समाया हुआ है। हमारा हर दिन पर्व और त्यौहार बने, हमारी जीवनशैली दिशासूचक बने। गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, वह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है। कुतुबनुमा बने, जो हर स्थिति में सही दिशा बताता है।
 
- ललित गर्ग

ललित गर्ग
 

 

जीवन जीना एक बात है, विशिष्ट एवं यादगार जीवन जीना महत्वपूर्ण बात है. कुछ व्यक्तियों का जीवन विलक्षण होता है, वे अपने जीवन काल में तथा उसके बाद प्रेरणास्रोत बने रहते हैं. इतिहास अक्सर ऐसे महान् लोगों से ऐसा काम करवा देता है जिसकी उम्मीद नहीं होती. और जब राष्ट्र की आवश्यकता का प्रतीक ऐसे महान् इंसान बनते हैं तो उसका कद सहज ही बड़ा बन जाता है. सरदार वल्लभ भाई पटेल ऐसे ही विराट व्यक्तित्व के धनी थे. वे एक राजनेता ही नहीं, एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं बल्कि इस देश की आत्मा थे. राष्ट्रीय एकता, भारतीयता एवं राजनीति में नैतिकता की वे अद्भुत मिसाल थे. आजादी के बाद विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए पटेल को भारत का बिस्मार्क और लौह पुरूष भी कहा जाता है. उन्हें 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है. भले ही वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन वे इस माटी के लिए किये गये उल्लेखनीय अवदानों के लिए सदियों तक याद किये जायेंगे. 15 दिसम्बर उनका निर्वाण दिवस है.
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाड में हुआ. वे कृषक परिवार से थे. उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल एवं माता का नाम लाडबा देवी है. वे उनकी चैथी संतान हैं. लन्दन जाकर उन्होंने बैरिस्टर की पढाई की और वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे. महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया. सरदार पटेल का स्मृति दिवस हमारे लिये प्रेरणा दिवस है. उनकी शिक्षाएं, जीवन-आदर्श एवं राष्ट्र को प्रदत्त अवदान हमें प्रेरणा देते रहेंगे. उनके विचार एवं सोच हमारे लिये जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने का आधार है. वे कहते थे कि अगर कोई चीज मुफ्त मिलती है तो उसकी कीमत कम हो जाती है जबकि परिश्रम से पाई हुई चीज की कीमत ठीक तरीके से लगाई जाती है. लोगों को मेहनत और कर्म के लिए प्रेरित करते हुए वे कहा करते थे कि यह सच है कि पानी में तैरने वाले ही डूबते हैं, किनारे पर खड़े रहने वाले नहीं लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि किनारे पर ही खड़े रहने वाले लोग तैरना भी नहीं सीखते. 
अहिंसा का समर्थन करते हुए सरदार पटेल का कहना था कि कायरों की अहिंसा का कोई मूल्य नहीं है. जो तलवार चलाना जानते हुए भी तलवार को म्यान में रखता है, उसकी अहिंसा सच्ची अहिंसा होती है. वह कहते थे कि आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिए अपनी आंखों को क्रोध से लाल होने दीजिए और अपने मजबूत हाथों से अन्याय का डटकर सामना कीजिए. पटेल सदैव कहते थे कि गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है. उनका कहना था कि हमारा सिर कभी न झुकने वाला होना चाहिए. हमें केवल भगवान के आगे झुकना चाहिए, दूसरों के आगे नहीं. 
जीवन कैसे जीना चाहिए, इसका भी सरदार पटेल ने सम्पूर्ण दर्शन प्रस्तुत किया. उनका मानना था कि जो कोई भी सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है, वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीवन जीता है. हमें सदैव ईश्वर और सत्य में विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिए. यहां तक कि अगर हम हजारों की दौलत भी गंवा दें और हमारा जीवन बलिदान हो जाए तो भी हमें मुस्कुराते रहना चाहिए. बहुत बोलने से कोई लाभ नहीं होता बल्कि हानि ही होती है. उन्हें देश के छोटे से छोटे स्तर के व्यक्ति की भी कितनी चिंता थी, उसी को व्यक्त करते हुए उन्होंने एकबार कहा था कि उनकी एक ही इच्छा है कि भारत एक अच्छा उत्पादक हो और इस देश में कोई भी व्यक्ति अन्न के लिए आंसू बहाता हुआ भूखा न रहे. 
सरदार पटेल का जीवन और दर्शन भातीयता को सुदृढ़ करने में नियोजित करने में लगा रहा है. एकता में सबसे बड़ा बाधक स्वहित है. आज के समय में स्वहित ही सर्वोपरि हो गया है. आज जब देश आजाद है, आत्मनिर्भर है तो वैचारिक मतभेद उसके विकास में बेड़ियाँ बनी हुई हैं. आजादी के पहले इस स्वार्थी दृष्टिकोण एवं स्वहित की भावना का फायदा अंग्रेज उठाते थे और आज देश के राजनीतिक लोग. देश में एकता के स्वर को सबसे ज्यादा बुलंद सरदार पटेल ने किया था. उनकी सोच, उनका दर्शन, उनकी राष्ट्रीयता के कारण ही आज हम एकसूत्रता में बंध हुए हैं. उनकी सोच आज के युवा जैसी नयी सोच थी. वे सदैव देश को एकता का संदेश देते थे. राष्ट्रीयता को उन्होंने केवल परिभाषित ही नहीं किया बल्कि उसे संगठित करके दिखाया. वे अपनी निजी त्याग, राष्ट्रीयता के प्रति सर्वस्व बलिदान कर देने की भावना एवं कठिन जीवनचर्या को वर्चस्व बनाकर किसी पर नहीं थोपते अपितु व्यक्ति की स्वयं के कमजोरियों को उसे महसूस करवाकर उससे उसको बाहर निकालने का मानवीय स्पर्श करते थे. आपने ‘साल’ का वृक्ष देखा होगा- काफी ऊंचा ‘शील’ का वृक्ष भी देखें- जितना ऊंचा है उससे ज्यादा गहरा है. सरदार पटेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में ऐसी ही ऊंचाई और गहराई थी. जरूरत है इस गहराई को मापने की. उन्हें भारतीय राजनीति का आदर्श बनाकर प्रस्तुत करने की. 
क्रिमिनल लॉयर के रूप में उनकी यश और कीति चारों ओर फैली, खूब नाम कमाया. अपनी वकालत के दौरान उन्होंने कई बार ऐसे केस लड़े जिसे दूसरे निरस और हारा हुए मानते थे. उनकी प्रभावशाली वकालत का ही कमाल था कि उनकी प्रसिद्धि दिनों-दिन बढ़ती चली गई. गम्भीर और शालीन पटेल अपने उच्चस्तरीय तौर-तरीकों लिए भी जाने जाते थे. वे अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी, समर्पण व हिम्मत से साथ पूरा करते थे. उनके इन गुणों का साक्षात्कार तब हुआ जब सन् 1909 में वे कोर्ट में केस लड़ रहे थे, उस समय उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु (11 जनवरी 1909) का तार मिला. पढ़कर उन्होंने इस प्रकार पत्र को अपनी जेब में रख लिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं. दो घंटे तक बहस कर उन्होंने वह केस जीत लिया. बहस पूर्ण हो जाने के बाद न्यायाधीश व अन्य लोगों को जब यह खबर मिली कि सरदार पटेल की पत्नी का निधन हो गया है तब उन्होंने सरदार पटेल से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि “उस समय मैं अपना फर्ज निभा रहा था, जिसका शुल्क मेरे मुवक्किल ने न्याय के लिए मुझे दिया था. मैं उसके साथ अन्याय कैसे कर सकता था.” ऐसी कर्तव्यपरायणता और शेर जैसे कलेजे की मिशाल इतिहास में विरले ही मिलती है. इससे बड़ा चरित्र और क्या हो सकता है? वे अपनी विलक्षण सोच एवं अद्भुत कार्यक्षमता से असंख्य लोागों के प्रेरक बन गए. उनका जीवन एक यात्रा का नाम है- आशा को अर्थ देने की यात्रा, ढलान से ऊंचाई देने की यात्रा, गिरावट से उठने की यात्रा, मजबूरी से मनोबल की यात्रा, सीमा से असीम होने की यात्रा, जीवन के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की यात्रा, परतंत्रता से स्वतंत्रता की यात्रा, बिखराव से जुड़ाव की यात्रा. उनका अभियान सफल हुआ और यह देश एकता के सूत्र में बंधा. उस महापुरुष के मनोबल को प्रणाम.

 (ईश्वर दुबे)11 दिसंबर 2018 को छत्तीसगढ में राजनीतिक फिजाँ को अपने संघर्षों से किसी ने बदला तो वो है प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल। चाउर वाले बाबा का जादू एकाएक समाप्त हो गया और छत्तीसगढ में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। कुछ लोग जो 15 साल से छत्तीसगढ पर राज करते हुए अहंकार के मद में इतने चूर थे कि वे हार को पचा नहीं पा रहे थे। लेकिन राजनीति का अंतिम यथार्थ यही है कि अहंकार का पतन सुनिश्चित है।                         जनता को कैसे अपने पक्ष में करना है प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भलीभांति जानते हैं उनकी कार्यशैली तेजतर्रार नेता की रही है यही कारण है कि प्रदेश की जनता नें सुशासन के लिए अपने लिए तेजतर्रार मुखिया को चुना है जिसके सामने प्रशासन अपना कार्य नीतिगत तरीके से करने को विवश हो जाता है। पूर्व की भाजपा सरकार में प्रशासन के अधिकारी खुलेआम अपनी तानाशाही का परिचय देते थे लेकिन अब फिजां बदल चुकी है और प्रशासन के अधिकारी धीरे धीरे अपनी कर्तव्यपरायणता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इतिहास गवाह है कि कोई भी पार्टी तभी सत्ता में प्रवेश कर सकता है जब उसका नेतृत्व कुशल व्यक्ति कर रहा हो। पूर्व में डॉ. रमन सिंह को हराना मतलब मुश्किल ही नहीं असंभव सा प्रतीत होता था कि चांउर वाले बाबा हैं जनता का फूल सपोर्ट है उसके बाद अधिकारियों की कमीशनखोरी के कारण वे मोबाईल वाले बाबा बन गए। जनता को 35 किलो मिलने वाले चांवल के उपर भी जांच कमेटी बिठा दी गई और प्रति व्यक्ति सात किलो कर दिया गया यही नहीं कई पात्र लोगों के राशन कार्ड सत्यापित भी नहीं हो पाए और निरस्त कर दिए गए। शराब को ठेकेदारों के दायरे से निकालकर भाजपा सरकार स्वयं शराब का विक्रय करने लगी जो भारी भूल ही नहीं भाजपा के नाश का मूल कारण साबित हुई। गली गली दारु वाले बाबा के गाने बजने लगे जो कि मेरे पत्रकार मित्र राजकुमार सोनी नें स्वर प्रदान किया था, अंततोगत्वा दारु वाले बाबा 15 सीट में सिमट कर रह गए। अच्छे अच्छे धाकड़ मंत्री जो कि स्वयं को अपराजेय समझते थे सबकी दुर्गति 11 दिसंबर 2018 को हम सब ने देखा है।                             आज फिर 11 दिसंबर है मतलब नई सरकार के जीत के एक वर्ष पूरे हो चुके हैं। हमने देखा कि घोषणा के अनुरुप कर्जमाफी, 35 किलो चावल, 2500 रुपए धान खरीदी इत्यादि कार्यों के करते हुए सरकार का एक वर्ष कार्यकाल अब कुछ ही दिनों में पूरो होने जा रहा है। कई प्रकार के आरोप भी विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे हैं और यह लाजिमी भी है क्योंकि आरोप लगाकर ही सत्ता पर पुनश्च काबिज हुआ जा सकता है। लेकिन सभी आरोपों की सत्यता और असत्यता की पडताल अपनी जगह है लेकिन प्रदेश में पहली बार जनता को महसूस हुआ है कि प्रदेश में छत्तीसगढियों का शासन है। प्रदेश में मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के बीच जनता में आत्मीयता का सूत्रपात हुआ है जो कि भाजपा सरकार में लगभग समाप्त हो चुका था। कई मंत्रियों की दबंगई के किस्से पूर्व से प्रचलित हैं जिसे बताने की आवश्यकता नहीं है। सामाजिक, सास्कृतिक रुप से छत्तीसगढ की एक पहचान देश भर में बनी है जो कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रयासों के कारण संभव हो पाया है। प्रदेश के तीज त्यौहारों में छुट्टियाँ या हरेली को सरकारी तौर पर मनाए जाने से प्रदेश की जनता अपनी संस्कृति और परिवेश के प्रचार प्रसार से स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। और जिस सरकार ने जनता के मन को जीत लिया उसके लिए विपक्ष के सारे आरोप भी जनता को थोथे ही लगते हैं क्योंकि वह मन से उस व्यक्ति या सरकार से जुड़ चुका होता है। प्रदेश में विकास कार्य करना हर सरकार का दायित्व है जनता पहले विकल्प के अभाव में डॉ. रमन सिंह को जिताती रही परंतु अब मजबूत नेता के रुप में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रुप में भाजपा को कड़ी टक्कर है और एैसा नेता है कि अभी कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि भाजपा नहीं भाजपा के दर्जनों नेता जनता के लिए अब गिर चुके हैं क्योंकि उनके भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो चुका है। राजनीति में दूसरे की छबि खराब करने के चक्कर में कभी कभी व्यक्ति स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेता है। उदाहरण के लिए 2018 में ठीक चुनाव के पहले भूपेश बघेल को सीडी कांड में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। राजनीति रणनीतिकारों का मानना है है कि यहीं पर बीजेपी ने अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली। जय छत्तीसगढ

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