संपादकीय

संपादकीय (38)

आखिर पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू, सिख आदि भारत की ओर नहीं निहारेंगे तो क्या अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया से उम्मीद लगाएंगे ? कम से कम अब तो नागरिकता कानून के विरोधियों को उसके खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने से बाज आना चाहिए।

पाकिस्तान में गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर हमले की घटना से एक बार फिर दुनिया के सामने वहां के अल्पसंख्यकों की हिफाजत के खोखले दावे का सच सामने आया है। किस तरह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को उपेक्षित, अपमानित और आतंकित जीवन जीने को विवश होना पड़ रहा है, गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर नफरत, द्वेष एवं अमानवीयता का हमला इसका जीता-जागता उदाहरण है। ऐसे हमलों के शिकार लोगों को भारत में पनाह देने के लिये ही नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लाया गया है, लेकिन कतिपय राजनीतिक दलों ने इसे विवादित बना दिया है। प्रश्न है कि आखिर इन मुस्लिम राष्ट्रों के ये अल्पसंख्यक कब तक अन्धकारमय, प्रताड़ित एवं त्रासद जीवन जीने को विवश होते रहेंगे। उनके सामने घना अंधेरा है, वे या तो जबरन धर्मांतरण का शिकार होंगे या फिर अपमानित जीवन जीने को विवश होंगे। उन्हें त्रासदी भरे जीवन से तभी छुटकारा मिल सकता है, जब वे या तो अपना धर्म छोड़ दें या फिर देश। वास्तव में इसी कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। ऐसे प्रताड़ित, उपेक्षित एवं त्रासदी झेल रहे लोगों की सुध लेने के लिये भारत सरकार ने साहसिक कदम उठाया है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
 
पवित्र तीर्थ ननकाना साहिब की घेरेबंदी और पथराव की घटना ने न केवल पाकिस्तान और भारत बल्कि पूरी दुनिया के सिखों का ध्यान खींचा। पथराव के पीछे एक सिख लड़की के कथित अपहरण और जबरन धर्मांतरण के बाद शादी का मामला है, जिसमें एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद संबंधित परिवार ने ननकाना साहिब पर धरना दिया। भीड़ द्वारा पथराव की घटना वहां इसी दौरान हुई। इस प्रकरण ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को एक बार फिर रेखांकित किया है। पाकिस्तान सरकार अन्य देशों, खासकर भारत में अल्पसंख्यकों की असुरक्षा को लेकर जितनी चिंता आजकल दिखा रही है, उसे ध्यान में रखते हुए यह घटना और महत्वपूर्ण हो जाती है। गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर हमले की ताजा घटना ने पाकिस्तान के मंसूबों एवं अमानवीय सोच को ही उजागर किया है। दुनियाभर में घोर निन्दा एवं भर्त्सना के बावजूद पाकिस्तान सुधरने को तैयार नहीं है। भले ही वह कितना ही सफेद झूठ बोल कर इस घटना पर पर्दा डाले, लेकिन दुनिया पाकिस्तान के सच को भली-भांति जानती है। इस गुरुद्वारे के सामने जमा हिंसक भीड़ के व्यवहार और उसकी भड़काऊ नारेबाजी को सारी दुनिया ने देखा-सुना है। यदि ननकाना साहिब में कहीं कुछ नहीं हुआ, तो फिर वहां घोर आपत्तिजनक नारे क्यों लगे और पत्थरबाजी कौन कर गया ? सवाल यह भी है कि इस घटना के अगले दिन वहां के सिखों को नगर कीर्तन निकालने की अनुमति क्यों नहीं दी गई ? गुरुद्वारे पर हुए हमले पर विवाद थमा भी नहीं था कि एक सिख युवक रविंद्र सिंह हो गयी।

ननकाना साहिब की घटना के बाद भारत में उन लोगों की आंखें खुल जाएं तो बेहतर जो अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून का अंध-विरोध करने में लगे हुए हैं। आखिर पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू, सिख आदि भारत की ओर नहीं निहारेंगे तो क्या अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया से उम्मीद लगाएंगे ? कम से कम अब तो नागरिकता कानून के विरोधियों को उसके खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने से बाज आना चाहिए, क्योंकि इस कानून के जरिये पाकिस्तान और साथ ही बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान में प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। क्या हो गया है हमारे देश को ? क्यों भारत को मजबूती देने एवं उसकी एकता-अखण्डता को सुदृढ़ करने के इस कानून के नाम पर हिंसा रूप बदल-बदल कर अपना करतब दिखा रही है। देश को तोड़ने, विखण्डित करने, विनाश, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और निर्दोष लोगों को डराने-धमकाने की इन कुचेष्टाओं एवं षड्यंत्रों को समझने की जरूरत है। ननकाना साहिब पर हमला भी एक षड्यंत्र ही है। इस तरह की अराजकता कोई मुश्किल नहीं, कोई वीरता नहीं। पर निर्दोष जब भी और जहां भी, चाहे देश में या पड़ोस में आहत होते हैं तब पूरा देश घायल होता है। पड़ोस को कड़ा संदेश देना होगा, देश के उपद्रवी हाथों को भी खोजना होगा अन्यथा उपद्रवी हाथों में फिर खुजली आने लगेगी। हमें इस काम में पूरी शक्ति और कौशल लगाना होगा। अराजक एवं उत्पादी तत्वों की मांद तक जाना होगा। पाकिस्तान के मंसूबों को समझना होगा। वह कभी भी पूरे देश की शांति और जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकता है। हमारा उद्योग, व्यापार ठप्प कर सकता है। हमारी खोजी एजेंसियों एवं शासन-व्यवस्था को जागरूक होना होगा।
 
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की मानें तो इस ऐतिहासिक एवं पवित्र गुरुद्वारे में कहीं कुछ नहीं हुआ। वह इस झूठ के पीछे इसलिए नहीं छिप सकता, क्योंकि दुनिया ने इसके सच को अपनी आंखों से देखा है। पाकिस्तान के हालात सुधरने की कहीं कोई उम्मीद इसलिए भी नहीं, क्योंकि एक तो कट्टरपंथी तत्व सेना एवं सरकार से संरक्षित हैं और दूसरे, ईशनिंदा सरीखा दमनकारी कानून अस्तित्व में है। जब तक यह कानून अस्तित्व में रहेगा, पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की जान सांसत में ही बनी रहेगी। पाकिस्तान कितना झूठा, फरेबी एवं षड्यंत्रकारी है, इसका उदाहरण पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने दिया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज के लोगों की स्थिति पर चिंता जताते हुए एक वीडियो ट्वीट किया, जबकि यह वीडियो उत्तर प्रदेश का न होकर बांग्लादेश का था।

नागरिकता कानून का विरोध करने की जरूरत क्यों पड़ रही है ? आखिर जब यह स्पष्ट है कि इस कानून का भारतीय मुसलमानों से कहीं कोई लेना-देना नहीं तब फिर उसके विरोध का क्या औचित्य ? स्पष्ट है पाकिस्तान अपने देश के अन्दरूनी हालात नहीं संभाल पा रहा है, वहां की जनता त्रस्त है, परेशान है, उन स्थितियों से ध्यान हटाने के लिये वह भारत को एवं भारत से जुड़े लोगों को अशांत करता है। विडम्बना तो यह भी है कि हमारे ही देश में राजनीतिक अस्तित्व लगातार खो रहे राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच बनाने के लिये नागरिकता कानून के विरोध जैसे अराष्ट्रीयता के अराजक रास्तों को अख्तियार कर रहे हैं। उत्पात का पर्याय बन गए इस उन्माद भरे हिंसक विरोध से कड़ाई से निपटना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कानून के शासन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का मजाक हो रहा है। अब युद्ध मैदानों में सैनिकों से नहीं, भितरघात करके, निर्दोषों को प्रताड़ित एवं उत्पीड़ित कर लड़ा जाता है। सीने पर वार नहीं, पीठ में छुरा मारकर लड़ा जाता है। इसका मुकाबला हर स्तर पर हम एक होकर और सजग रहकर ही कर सकते हैं।
 
यह भी तय है कि बिना किसी की गद्दारी के ऐसा संभव नहीं होता है। कश्मीर, पश्चिम बंगाल एवं अन्य राज्यों में हम बराबर देख रहे हैं कि प्रलोभन देकर कितनों को गुमराह किया गया और किया जा रहा है। पर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध का जो वातावरण बना है इसका विकराल रूप कई संकेत दे रहा है, उसको समझना है। कई सवाल खड़े हो रहे हैं जिसका उत्तर देना है। इसने नागरिकों के संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया, इसने भारत की एकता पर कुठाराघात किया है। यह बड़ा षड्यंत्र है इसलिए इसका फैलाव भी बड़ा हो सकता है। सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी कुर्सियों को पकड़े बैठे हैं या बैठने के लिए कोशिश कर रहे हैं। उन्हें नहीं मालूम कि इन कुर्सियों के नीचे क्या है। कुर्सी की चाह में देश को दांव पर लगाना कहां तक उचित है? ननकाना साहिब की घटना ने नागरिकता संशोधन कानून की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता को उजागर किया है, अब इस कानून का विरोध करने वालों की आंखें खुलनी ही चाहिए, नहीं खुलती हैं तो यह उनकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिन्ह है।
 
-ललित गर्ग

भला ऐसा कौन-सा इंसान होगा, जिसे त्यौहारों एवं पर्वों का माहौल आनंदित न करता हो, या राजनीति की चालों से कौन अछूता रहता है। ये पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की आपूर्ति करते हैं तो राजनीति राष्ट्र को उन्नति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर करती है।

जीवन में मौसम ही नहीं बदलता माहौल, मकसद, मूल्य और मूड सभी कुछ परिस्थिति और परिवेश के परिप्रेक्ष्य में बदलता है। और ये बदलते दौर जीवन को कई बार विचित्र नए अर्थ दे जाते हैं। नया वर्ष- 2020 ऐसे ही नये अर्थ और दिशाएं देने को सम्मुख खड़ा है। ऐसा लगता है कि जिन्दगी के सारे आदर्श और सारी रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता स्वयं में समेटकर आने वाला वर्ष न केवल त्यौहारों एवं पर्वों बल्कि राजनीति, अर्थनीति एवं समाज-व्यवस्था को नया माहौल देने को उपस्थित है। ऐसे ही माहौल में मनुष्य भीतर से खुलता है वक्त का पारदर्शी टुकड़ा बनकर।
 
भला ऐसा कौन-सा इंसान होगा, जिसे त्यौहारों एवं पर्वों का माहौल आनंदित न करता हो, या राजनीति की चालों से कौन अछूता रहता है। ये पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की आपूर्ति करते हैं तो राजनीति राष्ट्र को उन्नति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर करती है। शुष्क जीवन-व्यवहार के बोझ के नीचे दबा हुआ इंसान इस खुशनुमा मौसम एवं माहौल में थोड़ी-सी मुक्त सांस लेकर आराम महसूस करता है। जीवन की जड़ता उत्साह में बदल जाती है। हमारा देश ऐसे ही उत्सवों एवं त्यौहारों की वैभवता से सम्पन्न है, एक विशेष और आदर्श संस्कृति का वाहक है, फिर भी यह सब हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में अभिव्यक्त क्यों नहीं हो पाता? क्यों राष्ट्रीयता के नाम पर हम इतने बंटे एवं विभाजित है? क्यों बार-बार नारी की अस्मिता को तार-तार कर दिया जाता है, क्यों सामूहिक बलात्कार की घटनाएं तमाम विकास की तस्वीर को धुंधला जाती है, यह जीवन इतना बंधा-बंधा सा क्यों है? ये कैसी दीवारें हैं? इतनी गुलामी, इतने दुख कहां से इस देश के हिस्से में आ गए?

इसे भी पढ़ें: साल 2019 की तो हो गई विदाई पर चुनौतियां भरा रहेगा नया साल
हजारों-हजारों साल से जिस प्रकृति ने भारतीय मन को आकार दिया था, उसे रचा था, भारतीयता की एक अलग छवि का निर्माण हुआ, यहां के इंसानों की इंसानियत ने दुनिया को आकर्षित किया, संस्कृति एवं संस्कारों, जीवन-मूल्यों की एक नई पहचान बनी।  ऐसा क्या हुआ कि पिछली कुछ सदियों में उसके साथ कुछ गलत हुआ है, और वह गलत दिनोंदिन गहराता गया है जिससे सारा माहौल ही प्रदूषित हो गया है, जीवन के सारे रंग ही फिके पड़ गये हैं, हम अपने ही भीतर की हरियाली से वंचित हो गए लोग हैं। न कहीं आपसी विश्वास रहा, न किसी का परस्पर प्यार। न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में सामूहिकता का स्वर, बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी। यूं लगता है सब कुछ खोकर विभक्त मन अकेला खड़ा है फिर से सब कुछ पाने की आशा में। क्या यह प्रतीक्षा झूठी है? क्या यह अगवानी अर्थशून्य है?  
 
मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है। इसलिये कल पर कुछ मत छोड़िए। कल जो बीत गया और कल जो आने वाला है- दोनों ही हमारी पीठ के समान हैं, जिसे हम देख नहीं सकते। आज हमारी हथेली है, जिसकी रेखाओं को हम देख सकते हैं। हम आज एक नए जीवन के द्वार पर खड़े हैं। अतीत के सारे इतिहास को एक नया रूप दे देने वाले संसाधनों के साथ। इन संसाधनों में सबसे प्रमुख साधन विचार है ऐसा विचार जो विश्लेषणों और कारणों तक पहुंचता है। बीते जमाने में महावीर इसी विचार के पथ पर चल दुख के कारणों तक पहुंचे थे, पर इसके पहले उन्होंने राजगृह से निकल, जाने कितने वनों और बस्तियों की यात्राएं कीं। यह ज्ञान की, संवेदना की, बोध की यात्रा थी। ‘स्टैण्डर्ड ऑफ लाइफ’ के नाम पर भौतिकवाद, सुविधावाद और अपसंस्कारों का जो समावेश भारतीय संस्कृति एवं जीवन-शैली में हुआ या हो रहा है, वह निश्चित ही चिन्तनीय है। इस हिमालयी भूल का प्रतिकार या प्रायश्चित आने वाले साल-2020 में हो जाये तो बहुत शुभ है। अन्यथा आने वाली पीढ़िया अपने पुरुखों को कोसे बिना नहीं रहेगी।
 
देश को अपनी खोयी प्रतिष्ठा पानी है, उन्नत चरित्र बनाना है तथा स्वस्थ समाज की रचना करनी है तो हमें एक ऐसी जीवनशैली को स्वीकार करना होगा जो जीवन में पवित्रता दे। राष्ट्रीय प्रेम व स्वस्थ समाज की रचना की दृष्टि दे। कदाचार के इस अंधेरे कुएँ से निकले बिना देश का विकास और भौतिक उपलब्धियां बेमानी हैं। व्यक्ति, परिवार और राष्ट्रीय स्तर पर हमारे इरादों की शुद्धता महत्व रखती है, हमें खोज सुख की नहीं सत्व की करनी है क्योंकि सुख ने सुविधा दी और सुविधा से शोषण जनमा जबकि सत्व में शांति के लिये संघर्ष है और संघर्ष सचाई तक पहुंचने की तैयारी। हमें स्वयं की पहचान चाहिए और सारे विशेषणों से हटकर इंसान बने रहने का हक चाहिए। इस खोए अर्थ की तलाश करनी ही होगी। उपभोक्ता बनकर नहीं मनुष्य बनकर जीना नए सिरे से सीखना ही होगा। संस्कृति और मूल्यों के नष्ट अध्यायों को न सिर्फ पढ़ना होगा, बल्कि उन्हें नया रूप और नया अर्थ भी देना होगा। एक नई यात्रा शुरू करनी होगी। इसके लिये हमारे पर्वों एवं त्यौहारों, लोकतंत्र, समाज-व्यवस्था की विशेष सार्थकता है। श्रीकृष्ण ने कहा है- जीवन एक उत्सव है। उनके इस कथन पर भारतीयों का पूर्ण विश्वास है। हम जीवन के हर दिन को उत्सव की तरह जीते हैं, ढेरों विसंगतियों और विदूरपताओं से जूझते हुए। संकट में होशमंद रहने और हर मुसीबत के बाद उठ खड़े होने का जज्बा विशुद्ध भारतीय है और ऋतु-राग गुनगुनाते हुए अलग-अलग मौसम में उत्सव मनाने का भी। यही वजह है कि हम गर्व से कहते हैं- फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी... पर इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि बदलती दुनिया के असर से उत्सवधर्मिता एवं राजनीतिक चरित्र का जज्बा काफी प्रभावित हो रहा है। सबसे ज्यादा हमारी राजनीति ही नहीं, पर्व और त्यौहार की संस्कृति ही धुंधली हुई है। खेद की बात है कि हमने पश्चिम की श्रेष्ठ परम्पराओं को आत्मसात नहीं किया, बल्कि उसके साम्राज्यवाद के शिकार बने।
 
बदलाव की संस्कृति में सवालिया नजर केवल भारतीय पर्व और त्यौहार पर ही नहीं, बल्कि राजनीति पर टिकी है, क्योंकि हाल के राजनीतिक परिदृश्यों ने राममंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक कानून, एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की संभावना को पुरजोर तरीके से प्रकट किया है। इन मुद्दों ने वर्तमान नेतृत्व की संभावनाओं पर भी मोहर लगायी गयी है। हमें राजनीति को व्यक्ति नहीं, विचार और विश्वास आधारित बनाना होगा। चेहरा नहीं, चरित्र को प्राथमिकता देनी होगी। आज भी हम पिछड़े हैं, असुरक्षित हैं, अशिक्षित हैं। कभी हमें विश्व स्तर पर भ्रष्टाचारी होने का तगमा पकड़ा दिया जाता है तो कभी साम्प्रदायिकता का। कभी गरीबी का तो कभी अशिक्षा का, इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य होगा? क्या विश्व के हासिए में उभरती भारत की इस तस्वीर को हम कोई नया रंग नहीं दे सकते?

इसे भी पढ़ें: साल 2020: नव उमंग, नव तरंग, जीवन का नव प्रसंग
हमें त्यौहारों एवं पर्वों ही नहीं बल्कि राजनीति की संस्कृति को भी समृद्ध बनाना होगा। हर दिन एक तलाश हो। अपनी और उस अछोर जीवन की, उस विराट प्रकृति की, हमारा अस्तित्व जिसकी एक कड़ी है। किसी भोर का उगता सूरज, कोई बल खाती नदी, दूर तक फैला कोई मैदान, कोई चरागाह, कोई सिंदूरी शाम, दूर गांव से आती कोई ढोलक की थाप, पीछे छूटती दृश्यावलियां... हमारे भीतर रच-बस जाती हैं। यही सब जीवन की संपदाएं हैं, हमारे अंतर में जगमगाती-कौंधती रोशनियां हैं, जिनकी आभा में हम उस सब को पहचान पाते हैं जो जीवन है, जो हमारी पहचान के मानक हैं। हम भारत के लोग इसलिए विशिष्ट नहीं हैं कि हम ‘जगतगुरु’ रहे हैं, या हम महान आध्यात्मिक अतीत रखते हैं। हम विशिष्ट इसलिए हैं कि हमारे पास मानवता के सबसे प्राचीन और गहरे अनुभव हैं। ये अनुभव सिर्फ इतिहास और संस्कृति के अनुभव नहीं हैं, इसमें नदियों का प्रवाह, बदलते मौसमों की खुशबू, विविध त्यौहारों की सांस्कृतिक आभा, प्रकृति का विराट लीला एवं लोकतंत्र की सशक्त शासन-प्रणाली का संसार समाया हुआ है। हमारा हर दिन पर्व और त्यौहार बने, हमारी जीवनशैली दिशासूचक बने। गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, वह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है। कुतुबनुमा बने, जो हर स्थिति में सही दिशा बताता है।
 
- ललित गर्ग

ललित गर्ग
 

 

जीवन जीना एक बात है, विशिष्ट एवं यादगार जीवन जीना महत्वपूर्ण बात है. कुछ व्यक्तियों का जीवन विलक्षण होता है, वे अपने जीवन काल में तथा उसके बाद प्रेरणास्रोत बने रहते हैं. इतिहास अक्सर ऐसे महान् लोगों से ऐसा काम करवा देता है जिसकी उम्मीद नहीं होती. और जब राष्ट्र की आवश्यकता का प्रतीक ऐसे महान् इंसान बनते हैं तो उसका कद सहज ही बड़ा बन जाता है. सरदार वल्लभ भाई पटेल ऐसे ही विराट व्यक्तित्व के धनी थे. वे एक राजनेता ही नहीं, एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं बल्कि इस देश की आत्मा थे. राष्ट्रीय एकता, भारतीयता एवं राजनीति में नैतिकता की वे अद्भुत मिसाल थे. आजादी के बाद विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए पटेल को भारत का बिस्मार्क और लौह पुरूष भी कहा जाता है. उन्हें 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है. भले ही वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन वे इस माटी के लिए किये गये उल्लेखनीय अवदानों के लिए सदियों तक याद किये जायेंगे. 15 दिसम्बर उनका निर्वाण दिवस है.
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाड में हुआ. वे कृषक परिवार से थे. उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल एवं माता का नाम लाडबा देवी है. वे उनकी चैथी संतान हैं. लन्दन जाकर उन्होंने बैरिस्टर की पढाई की और वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे. महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया. सरदार पटेल का स्मृति दिवस हमारे लिये प्रेरणा दिवस है. उनकी शिक्षाएं, जीवन-आदर्श एवं राष्ट्र को प्रदत्त अवदान हमें प्रेरणा देते रहेंगे. उनके विचार एवं सोच हमारे लिये जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने का आधार है. वे कहते थे कि अगर कोई चीज मुफ्त मिलती है तो उसकी कीमत कम हो जाती है जबकि परिश्रम से पाई हुई चीज की कीमत ठीक तरीके से लगाई जाती है. लोगों को मेहनत और कर्म के लिए प्रेरित करते हुए वे कहा करते थे कि यह सच है कि पानी में तैरने वाले ही डूबते हैं, किनारे पर खड़े रहने वाले नहीं लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि किनारे पर ही खड़े रहने वाले लोग तैरना भी नहीं सीखते. 
अहिंसा का समर्थन करते हुए सरदार पटेल का कहना था कि कायरों की अहिंसा का कोई मूल्य नहीं है. जो तलवार चलाना जानते हुए भी तलवार को म्यान में रखता है, उसकी अहिंसा सच्ची अहिंसा होती है. वह कहते थे कि आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिए अपनी आंखों को क्रोध से लाल होने दीजिए और अपने मजबूत हाथों से अन्याय का डटकर सामना कीजिए. पटेल सदैव कहते थे कि गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है. उनका कहना था कि हमारा सिर कभी न झुकने वाला होना चाहिए. हमें केवल भगवान के आगे झुकना चाहिए, दूसरों के आगे नहीं. 
जीवन कैसे जीना चाहिए, इसका भी सरदार पटेल ने सम्पूर्ण दर्शन प्रस्तुत किया. उनका मानना था कि जो कोई भी सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है, वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीवन जीता है. हमें सदैव ईश्वर और सत्य में विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिए. यहां तक कि अगर हम हजारों की दौलत भी गंवा दें और हमारा जीवन बलिदान हो जाए तो भी हमें मुस्कुराते रहना चाहिए. बहुत बोलने से कोई लाभ नहीं होता बल्कि हानि ही होती है. उन्हें देश के छोटे से छोटे स्तर के व्यक्ति की भी कितनी चिंता थी, उसी को व्यक्त करते हुए उन्होंने एकबार कहा था कि उनकी एक ही इच्छा है कि भारत एक अच्छा उत्पादक हो और इस देश में कोई भी व्यक्ति अन्न के लिए आंसू बहाता हुआ भूखा न रहे. 
सरदार पटेल का जीवन और दर्शन भातीयता को सुदृढ़ करने में नियोजित करने में लगा रहा है. एकता में सबसे बड़ा बाधक स्वहित है. आज के समय में स्वहित ही सर्वोपरि हो गया है. आज जब देश आजाद है, आत्मनिर्भर है तो वैचारिक मतभेद उसके विकास में बेड़ियाँ बनी हुई हैं. आजादी के पहले इस स्वार्थी दृष्टिकोण एवं स्वहित की भावना का फायदा अंग्रेज उठाते थे और आज देश के राजनीतिक लोग. देश में एकता के स्वर को सबसे ज्यादा बुलंद सरदार पटेल ने किया था. उनकी सोच, उनका दर्शन, उनकी राष्ट्रीयता के कारण ही आज हम एकसूत्रता में बंध हुए हैं. उनकी सोच आज के युवा जैसी नयी सोच थी. वे सदैव देश को एकता का संदेश देते थे. राष्ट्रीयता को उन्होंने केवल परिभाषित ही नहीं किया बल्कि उसे संगठित करके दिखाया. वे अपनी निजी त्याग, राष्ट्रीयता के प्रति सर्वस्व बलिदान कर देने की भावना एवं कठिन जीवनचर्या को वर्चस्व बनाकर किसी पर नहीं थोपते अपितु व्यक्ति की स्वयं के कमजोरियों को उसे महसूस करवाकर उससे उसको बाहर निकालने का मानवीय स्पर्श करते थे. आपने ‘साल’ का वृक्ष देखा होगा- काफी ऊंचा ‘शील’ का वृक्ष भी देखें- जितना ऊंचा है उससे ज्यादा गहरा है. सरदार पटेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में ऐसी ही ऊंचाई और गहराई थी. जरूरत है इस गहराई को मापने की. उन्हें भारतीय राजनीति का आदर्श बनाकर प्रस्तुत करने की. 
क्रिमिनल लॉयर के रूप में उनकी यश और कीति चारों ओर फैली, खूब नाम कमाया. अपनी वकालत के दौरान उन्होंने कई बार ऐसे केस लड़े जिसे दूसरे निरस और हारा हुए मानते थे. उनकी प्रभावशाली वकालत का ही कमाल था कि उनकी प्रसिद्धि दिनों-दिन बढ़ती चली गई. गम्भीर और शालीन पटेल अपने उच्चस्तरीय तौर-तरीकों लिए भी जाने जाते थे. वे अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी, समर्पण व हिम्मत से साथ पूरा करते थे. उनके इन गुणों का साक्षात्कार तब हुआ जब सन् 1909 में वे कोर्ट में केस लड़ रहे थे, उस समय उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु (11 जनवरी 1909) का तार मिला. पढ़कर उन्होंने इस प्रकार पत्र को अपनी जेब में रख लिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं. दो घंटे तक बहस कर उन्होंने वह केस जीत लिया. बहस पूर्ण हो जाने के बाद न्यायाधीश व अन्य लोगों को जब यह खबर मिली कि सरदार पटेल की पत्नी का निधन हो गया है तब उन्होंने सरदार पटेल से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि “उस समय मैं अपना फर्ज निभा रहा था, जिसका शुल्क मेरे मुवक्किल ने न्याय के लिए मुझे दिया था. मैं उसके साथ अन्याय कैसे कर सकता था.” ऐसी कर्तव्यपरायणता और शेर जैसे कलेजे की मिशाल इतिहास में विरले ही मिलती है. इससे बड़ा चरित्र और क्या हो सकता है? वे अपनी विलक्षण सोच एवं अद्भुत कार्यक्षमता से असंख्य लोागों के प्रेरक बन गए. उनका जीवन एक यात्रा का नाम है- आशा को अर्थ देने की यात्रा, ढलान से ऊंचाई देने की यात्रा, गिरावट से उठने की यात्रा, मजबूरी से मनोबल की यात्रा, सीमा से असीम होने की यात्रा, जीवन के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की यात्रा, परतंत्रता से स्वतंत्रता की यात्रा, बिखराव से जुड़ाव की यात्रा. उनका अभियान सफल हुआ और यह देश एकता के सूत्र में बंधा. उस महापुरुष के मनोबल को प्रणाम.

 (ईश्वर दुबे)11 दिसंबर 2018 को छत्तीसगढ में राजनीतिक फिजाँ को अपने संघर्षों से किसी ने बदला तो वो है प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल। चाउर वाले बाबा का जादू एकाएक समाप्त हो गया और छत्तीसगढ में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। कुछ लोग जो 15 साल से छत्तीसगढ पर राज करते हुए अहंकार के मद में इतने चूर थे कि वे हार को पचा नहीं पा रहे थे। लेकिन राजनीति का अंतिम यथार्थ यही है कि अहंकार का पतन सुनिश्चित है।                         जनता को कैसे अपने पक्ष में करना है प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भलीभांति जानते हैं उनकी कार्यशैली तेजतर्रार नेता की रही है यही कारण है कि प्रदेश की जनता नें सुशासन के लिए अपने लिए तेजतर्रार मुखिया को चुना है जिसके सामने प्रशासन अपना कार्य नीतिगत तरीके से करने को विवश हो जाता है। पूर्व की भाजपा सरकार में प्रशासन के अधिकारी खुलेआम अपनी तानाशाही का परिचय देते थे लेकिन अब फिजां बदल चुकी है और प्रशासन के अधिकारी धीरे धीरे अपनी कर्तव्यपरायणता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इतिहास गवाह है कि कोई भी पार्टी तभी सत्ता में प्रवेश कर सकता है जब उसका नेतृत्व कुशल व्यक्ति कर रहा हो। पूर्व में डॉ. रमन सिंह को हराना मतलब मुश्किल ही नहीं असंभव सा प्रतीत होता था कि चांउर वाले बाबा हैं जनता का फूल सपोर्ट है उसके बाद अधिकारियों की कमीशनखोरी के कारण वे मोबाईल वाले बाबा बन गए। जनता को 35 किलो मिलने वाले चांवल के उपर भी जांच कमेटी बिठा दी गई और प्रति व्यक्ति सात किलो कर दिया गया यही नहीं कई पात्र लोगों के राशन कार्ड सत्यापित भी नहीं हो पाए और निरस्त कर दिए गए। शराब को ठेकेदारों के दायरे से निकालकर भाजपा सरकार स्वयं शराब का विक्रय करने लगी जो भारी भूल ही नहीं भाजपा के नाश का मूल कारण साबित हुई। गली गली दारु वाले बाबा के गाने बजने लगे जो कि मेरे पत्रकार मित्र राजकुमार सोनी नें स्वर प्रदान किया था, अंततोगत्वा दारु वाले बाबा 15 सीट में सिमट कर रह गए। अच्छे अच्छे धाकड़ मंत्री जो कि स्वयं को अपराजेय समझते थे सबकी दुर्गति 11 दिसंबर 2018 को हम सब ने देखा है।                             आज फिर 11 दिसंबर है मतलब नई सरकार के जीत के एक वर्ष पूरे हो चुके हैं। हमने देखा कि घोषणा के अनुरुप कर्जमाफी, 35 किलो चावल, 2500 रुपए धान खरीदी इत्यादि कार्यों के करते हुए सरकार का एक वर्ष कार्यकाल अब कुछ ही दिनों में पूरो होने जा रहा है। कई प्रकार के आरोप भी विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे हैं और यह लाजिमी भी है क्योंकि आरोप लगाकर ही सत्ता पर पुनश्च काबिज हुआ जा सकता है। लेकिन सभी आरोपों की सत्यता और असत्यता की पडताल अपनी जगह है लेकिन प्रदेश में पहली बार जनता को महसूस हुआ है कि प्रदेश में छत्तीसगढियों का शासन है। प्रदेश में मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के बीच जनता में आत्मीयता का सूत्रपात हुआ है जो कि भाजपा सरकार में लगभग समाप्त हो चुका था। कई मंत्रियों की दबंगई के किस्से पूर्व से प्रचलित हैं जिसे बताने की आवश्यकता नहीं है। सामाजिक, सास्कृतिक रुप से छत्तीसगढ की एक पहचान देश भर में बनी है जो कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रयासों के कारण संभव हो पाया है। प्रदेश के तीज त्यौहारों में छुट्टियाँ या हरेली को सरकारी तौर पर मनाए जाने से प्रदेश की जनता अपनी संस्कृति और परिवेश के प्रचार प्रसार से स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। और जिस सरकार ने जनता के मन को जीत लिया उसके लिए विपक्ष के सारे आरोप भी जनता को थोथे ही लगते हैं क्योंकि वह मन से उस व्यक्ति या सरकार से जुड़ चुका होता है। प्रदेश में विकास कार्य करना हर सरकार का दायित्व है जनता पहले विकल्प के अभाव में डॉ. रमन सिंह को जिताती रही परंतु अब मजबूत नेता के रुप में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रुप में भाजपा को कड़ी टक्कर है और एैसा नेता है कि अभी कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि भाजपा नहीं भाजपा के दर्जनों नेता जनता के लिए अब गिर चुके हैं क्योंकि उनके भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो चुका है। राजनीति में दूसरे की छबि खराब करने के चक्कर में कभी कभी व्यक्ति स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेता है। उदाहरण के लिए 2018 में ठीक चुनाव के पहले भूपेश बघेल को सीडी कांड में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। राजनीति रणनीतिकारों का मानना है है कि यहीं पर बीजेपी ने अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली। जय छत्तीसगढ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ इन दिनों राष्ट्रवाद के साथ ही मठ-मंदिरों के उन्नयन और धार्मिक पर्यटन विकसित करने के साथ ही उदार हिंदुत्व की राह पर कांग्रेस और उसकी सरकार को ले जा रहे हैं। इसका मकसद बहुसंख्यक मतदाताओं के मानस में कांग्रेस के लिए और अधिक जगह बनाना है। ए.के. एंटोनी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार की समीक्षा के बाद सिफारिश की थी कि कांग्रेस को उदार हिंदुत्व की अपनी पुरानी विचारधारा पर आगे बढ़ना होगा ताकि बहुसंख्यक मतदाता भी उससे अपना जुड़ाव महसूस कर सकें। जनसंपर्क और अध्यात्म विभाग के मंत्री पी.सी. शर्मा इन दिनों कमलनाथ सरकार के मठ मंदिरों के उन्नयन और धार्मिक पर्यटन को विकसित करने के प्रयासों को अमलीजामा पहनाने पूरी प्रतिबद्धता से आगे बढ़ रहे हैं। अब कमलनाथ सरकार द्वारा तेजी से राम वन गमन पथ एक धार्मिक पर्यटन के रुप में विकसित किया जायेगा। मध्यप्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जयवर्द्धन सिंह ने भी ऐलान किया है कि स्थानीय निकाय संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्र में रामलीला मंचन के लिए मंच तैयार करेंगी ताकि इसके मंचन में किसी प्रकार की असुविधा न हो। एक हजार गौशालाओं के निर्माण का फैसला कमलनाथ सरकार काफी पहले ही कर चुकी है। अब कांग्रेस की योजना 16 दिसम्बर को राजधानी भोपाल में विजय पर्व शौर्य स्मारक में मनाने की है। 16 दिसम्बर 1971 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना ने सरेन्डर किया था, उसी की याद ताजा कराने इस दिन विजय पर्व मनाने की योजना है।
कमलनाथ का मकसद इसके माध्यम से भारतीय जनता पार्टी की घेराबंदी उसके ही एजेंडे पर करने की है और इसके लिए सरकार अपने इस अभियान में तेजी से आगे बढ़ रही है। एंटोनी कमेटी की सिफारिशों के बाद तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने अपने कार्यकाल में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में गणेश प्रतिमा एवं दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की शुरुआत की थी जो अभी भी जारी है। 2018 के विधानसभा चुनाव के पूर्व तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अनेक मंदिरों में पूजा अर्चना कर चुनाव अभियान का शुभारंभ किया था। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा की यात्रा पूरे विधि विधान से की थी। इन सबका चुनावों में कांग्रेस को फायदा हुआ और 15 साल बाद कांग्रेस की सत्ता का सूर्योदय हुआ। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार हिंदुत्व के साथ ही राष्ट्रवाद के मुद्दे को भी उभारने जा रही है और इसके लिए ही शौर्य स्मारक में विजय पर्व मनाने की योजना बनाई है। कांग्रेस पार्टी की इस आयोजन के सम्बन्ध में औपचारिक घोषणा अभी होना शेष है लेकिन इस पर विचार-विमर्श लगभग पूरा हो गया है। 16 दिसम्बर 1971 का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में उस समय अंकित हो गया था जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और पूर्वी पाकिस्तान में आजाद बांग्लादेश का निर्माण हुआ। एक नये राष्ट्र के उदय का पूरा श्रेय श्रीमती इंदिरा गांधी को है और यह ऐसी लड़ाई थी जिसमें पाकिस्तान को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। उस दैरान पूरे देश में इंदिरा गांधी की जय-जयकार हुई थी और विश्‍व पटल पर वे एक सख्त नेता के रुप में उभरी थीं। यहां तक कि तत्कालीन विपक्ष के नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को संसद में दुर्गा कहा था। आज की पीढ़ी को इन सब बातों की विस्तार से जानकारी देने के लिए यह आयोजन किया जा रहा है।
1985 में लोकसभा में कमलनाथ ने कहा था कि भारत की आध्यात्मिक विरासत की रक्षा करना विशेष रुप से सरकार का कार्य है, वास्तविक आध्यात्मिक संस्थाओं और इस क्षेत्र में कार्य कर रहे व्यक्तियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पी.सी.शर्मा का कहना है कि प्रदेश में अध्यात्म विभाग का गठन हमारी सरकार ने किया है। मंदिरों में पूजा अर्चना करने वाले पुजारियों की बेहतरी के लिए नीतियों को नये सिरे से निर्धारित किया और पुजारियों का मानदेय तीन गुना कर दिया गया। सरकार द्वारा मॉ नर्मदा, मॉ क्षिप्रा, मॉ मंदाकिनी एवं मॉ ताप्ती जैसी जीवनदायिनी पवित्र नदियों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए नदी न्यास का गठन किया गया है। मंदिर व मठों की व्यवस्थाओं के सुचारु संचालन के लिए मठ-मंदिर सलाहकार समिति का भी गठन किया गया है। विभिन्न मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए राशि प्रदान की गयी है। तीर्थ दर्शन के लिए तीन विशेष ट्रेनें चलाई गयी हैं। शर्मा का कहना है कि प्रदेश की पावन भूमि का आलोकित स्वरुप भगवान श्रीराम के चरण कमल प्रदेश में पड़ते ही साकार हो गया था। कमलनाथ सरकार प्रतिबद्ध है कि प्रदेश के वे पवित्र तीर्थस्थल जैसे सतना, पन्ना, कटनी, उमरिया, शहडोल, अनूपपुर आदि जिले जहां भगवान श्रीराम ने अपने वनवास का समय व्यतीत किया था प्रदेश कांग्रेस सरकार उन स्थलों को वही आलोकित स्वरुप देने के लिए संकल्पित है। चित्रकूट-कामदगिरी, गुप्तगोदावरी, स्फटिक-शिला, अनुसूइया-आश्रम, हनुमान-धारा, दशरथ-गाठ इत्यादि स्थलों को धार्मिक पर्यटन के लिए विकसित किया जाएगा। साथ ही भोपाल में समूचे राम वन गमन पथ की प्रतिकृति भी निर्मित की जाएगी। शहरी मतदाताओं को खुश करने सभी नगरपालिक निगमों, नगरपालिकाओं व निगम परिषदों में रामलीला मंच बनाने का ऐलान करते हुए नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जयवर्द्धन सिंह ने कहा है कि अतिक्रमण के चलते अब रामलीला कराने के लिए भी समिति व आयोजकों के पास जमीन नहीं बची है, इन हालातों में राज्य सरकार नगरीय क्षेत्रों में स्थायी व्यवस्था करते हुए रामलीला मंच का निर्माण करेगी। सरकार को जमीन तलाशने खास मेहनत नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि दुर्गा उत्सव समितियों के पंडालों का उपयोग भी रामलीला मंचन के लिए किया जा सकता है।
महाकाल की नगरी उज्जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर के बाद अब ओंकारेश्‍वर को विकसित करने के लिए 156 करोड़ की कार्ययोजना को मंजूरी प्रदान करते हुए कमलनाथ ने निर्देश दिए हैं कि ओंकारेश्‍वर मंदिर के लिए शीघ्र ही एक विधेयक तैयार किया जाए। ओंकारेश्‍वर कार्ययोजना की समीक्षा के दौरान कमलनाथ ने कहा कि देश में केवल मध्यप्रदेश को यह गौरव हासिल है कि 12 ज्योर्तिलिंगों में से यहां प्रतिष्ठापित हैं। हमारा लक्ष्य है कि ये पवित्र स्थान विश्‍व पर्यटन केन्द्र के रुप में विकसित हों। ओंकारेश्‍वर विकास योजना एक समयबद्ध ढंग से पूरा करने के भी निर्देश दिए गए, निर्देश के साथ ही कहा कि हर विकास कार्य पूरा करने की तारीख तय हो। उन्होंने कहा कि अगले शीतकालीन सत्र में यह विधेयक पेश करने की हमारी मंशा है। उज्जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर विकास के लिए 350 करोड़ रूपए के विकास की योजना कमलनाथ पहले ही स्वीकृति दे चुके हैं। ओंकारेश्‍वर विकास की योजना मुख्यमंत्री के निर्देश पर तैयार की गयी है। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसीराम सिलावट ने इस योजना को अंतिम रुप दिया। मंत्रालय में यह योजना मुख्यमंत्री के सामने प्रस्तुत की गयी। इसमें विकास का एक विस्तृत विवरण तैयार किया गया है। इसमें ओंकारेश्‍वर के प्रवेश द्वार को भव्य बनाना, मंदिर का संरक्षण, प्रसाद काउंटर, मंदिर के चारों ओर विकास तथा सौंदर्यीकरण, शापिंग काम्पलेक्स, झूलापुल और विषरंजन कुंड के पास रिटेनिंग वॉल, बहुमंजिला पार्किग, पहुंच मार्ग, परिक्रमा पथ का सौंदर्यीकरण, शेड निर्माण, लैं स्केपिंग, धार्मिक पौराणिक गाथा पुस्तकों की लायब्रेरी, ओंकार आइसलैंड का विकास, गौमुख घाट पुन-निर्माण, भक्त निवास और भोजनशाला, ओल्ड पैलेस, विष्णु मंदिर, ब्रम्हा मंदिर, चन्द्रेश्‍वर मंदिर का जीर्णोद्धार, ई-साइकिल तथा ई-रिक्शा सुविधा, बोटिंग, आवागमन, बस स्टैंड, पर्यटक सुविधा केन्द्र सहित अन्य विकास कार्य शामिल हैं।
और यह भी
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार महात्मा गांधी की रामराज्य की संकल्पना पर काम कर रही है। मध्यप्रदेश में आधुनिक गौशालाओं के निर्माण की बात हो, गौसंरक्षण और उपचार की बात हो या फिर प्रभु श्रीराम के राम वन गमन पथ की बात हो, इन सब पर कमलनाथ सरकार ठोस कार्य कर रही है। मठों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों को पर्यटन केन्द्र के रुप में विकसित किया जा रहा है। राम वन गमन पथ और गौवंश के संरक्षण का जहां तक सवाल है इन मुद्दों पर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने खाली बयानबाजी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है लेकिन कांग्रेस की कमलनाथ सरकार प्रदेश में इन विषयों पर पूरी गंभीरता से काम कर रही है। इसी श्रंखला में प्रदेश के सभी नगरीय निकायों में स्थायी रामलीला मंच का निर्माण होगा और वहां पर बाकायदा रामलीला का मंचन हो यह सुनिश्‍चित किया जायेगा। रामलीला सनातन परम्परा का वास्तविक संदेश समाज को देती है और इसके मंचन से सामाजिक व सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रहेगी जो अंततोगत्वा समाज सुधार में सहायक होगी।

- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।

Source ¦¦ अरुण पटेल जी
गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”
  2012 दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामला भारत की राजधानी दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को हुई बलात्कार एवम हत्या की घटना रोंगटे खड़े कर दिए थे यह सत्य है कि संचार माध्यम के त्वरित हस्तक्षेप के कारण प्रकाश में आयी वरना यह भी एक सामान्य सा अपराध बनकर फाइलों में दबी होती.

सोशल मीडिया ट्वीटर फेसबुक आदि पर काफी कुछ लिखा गया. इस घटना के विरोध में पूरे नई दिल्ली,  कलकत्ता  और बंगलौर  सहित देश के छोटे-छोटे कस्बों तक में एक निर्णायक लड़ाई सड़कों पर नजर आ रही थी .   बावजूद इसके किसी भी प्रकार का परिवर्तन नजर नहीं आता इसके पीछे के कारण को हम आप सब जानते हैं .
बरसों से देख रहा हूं कि नवंबर से दिसंबर बेहद स्थितियों को सामने रख देते हैं . ठीक 7 साल पहली हुई इस घटना के बाद परिस्थितियों में कोई खास परिवर्तन नजर नहीं आ रहा है . हम अगले महीने की 26 तारीख को नए साल में भारतीय गणतंत्र की वर्षगांठ मनाएंगे पता नहीं क्या स्थिति होगी तब मुझे नहीं लगता कि हम तब जबकि महान गणतंत्र होने का दावा कर रहे होंगे तब हां तब ही किसी कोने में कोई निर्भया अथवा प्रियंका रेड्डी का परिवार सुबक रहा होगा तब तक टनों से मोम पिलाया जा चुका होगा . अधिकांश जनता आम दिनों की तरह जिंदगी बसर करने लगे होंगे... हां उनके हृदय में डर अवश्य बैठ चुका होगा . ना तो समाज में और ना ही व्यवस्था में कोई खास परिवर्तन नजर आएगा परंतु परिवर्तन आ सकता है अगर समाज में लोग यह सोचें कि :- हम रेपिस्ट को केवल फांसी के फंदे पर देखना चाहते हैं अगर वह अपना खून है तो भी ..! शायद बदलाव शुरू हो जाएगा, परंतु सब जानते हैं ऐसा संभव नहीं है .
व्यवस्था भी कानूनी व्यवस्थाओं का परिपालन करते-करते बरसों बिता देगी परंतु फांसी के फंदे तक रेपिस्ट नहीं पहुंच पाएंगे आप जानते हैं कि अब तक आजादी के बाद कुल 57 केस में फांसी की सजा हो पाई है . इसका अर्थ है कि कहीं ना कहीं रेपिस्ट न्याय व्यवस्था में लंबे लंबे प्रोसीजर्स के चलते लाभ उठा ही लेते हैं और जिंदा बनी रहते हैं कि वह लोग हैं जिन्हें जीने का हक नहीं है . एक साहित्यकार होने के बावजूद केवल रेप के मामलों में शीघ्र और अंततः फांसी की सजा की मांग क्यों कर रहा हूं..?
जी हां आपके ऐसे सवाल उठ सकते हैं लेकिन पूछना नहीं यह जघन्य अपराध है और इसका अंत फांसी के फंदे से ही होगा यह जितना जल्दी हो उतना समाज को और उन दरिंदों को संदेश देने के लिए काफी है जो रेप को एक सामान्य सा अपराध मानते हैं .
सुधि पाठको , साहित्यकार हूं कभी हूं संवेदनशील हूं इसका यह अर्थ नहीं है कि न्याय के पासंग पर यौन हिंसा को साधारण अपराधों की श्रेणी में रख कर तोलूं . यहां ऐसे अपराधों के लिए केवल मृत्युदंड की अपेक्षा है .
निर्भया कांड के बाद व्यवस्था ने व्यवस्थित व्यवस्था ना करते हुए ... इन अपराधों को स्पेस दिया है यह कहने में मुझे किसी भी तरह का संकोच नहीं हो रहा . हबीबगंज प्लेटफॉर्म पर हुए कांड के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने कुछ नए बदलाव लाने की कोशिश भी की है 50 महिला केंद्रों की स्थापना प्रत्येक जिले में कर दी गई है न्याय के मामले में मध्यप्रदेश की अदालतों में तेजी से काम हुआ है इसकी सराहना तो की जानी चाहिए लेकिन क्या यह पर्याप्त है मुझे लगता है कदापि नहीं आप भी यही सोच रहे होंगे कुछ सुझाव व्यवस्था के लिए परंतु उसके पहले कुछ सुझाव समाज के लिए बहुत जरूरी है अगर आप अभिभावक हैं तो अपनी पुरुष संतान को खुलकर नसीहत देने की पहल आज ही कर दीजिए कि महिलाओं के प्रति बेटियों के प्रति नकारात्मक और हिंसक भाव रखने वाले बच्चों यानी पुरुष संतानों के लिए घर के दरवाजे कभी नहीं खुल सकेंगे .
समाज ऐसा कदम नहीं उठाएगा जीने का सुधरने का एक मौका और चाहेगा परंतु इन्हीं मौकों के कारण महिलाओं का शोषण करने को स्पेस मिलता है जो सर्वदा गैर जरूरी है क्या अभिभावक ऐसा करना चाहेंगे मुझे नहीं लगता जो पुत्र मोह में फंसे हैं ऐसा धृतराष्ट्री समाज कदापि अपनी पुरुष संतान के खिलाफ कोई कठोर कदम उठाएगा . यह वही समाज है जहां लड़कों के लिए व्रत किए जाते हैं यह वही समाज है जहां कुछ वर्षों पूर्व तक बेटियों के जन्म से उसे उपेक्षित भाव से देखा जाता है इतना ही नहीं बेटी की मां के प्रति नेगेटिविटी का व्यवहार शुरू हो जाना सामान्य बात है .
यह वही समाज है जहां पुत्रवती भव् होने का आशीर्वाद दिया जाता है . समाज से किसी को भी बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है . अगर आप मेरी बात को समझ पा रहे हैं तो गौर कीजिए बेटियों के प्रति स्वयं नजरिया पॉजिटिव करिए तो निश्चित तौर पर आप देवी पूजा करने के हकदार है वरना आप देवी पूजा करके केवल ढोंग करते हुए नजर आते हैं .
बातें कुछ कठिन और कड़वी है पर उद्देश्य साफ है की औरत को लाचार मजबूर बना देने की आदत व्यवस्था यानी सरकार में नहीं समाज में है . अतः समाज को स्वयं में बदलाव लाने की जरूरत है बलात्कारी पुत्र के होने से बेहतर है बेटी के माता-पिता बन जाओ विश्वास करो डीएनए ट्रांसफर होता है आपका वंश चलता है आपकी वंशावली से आप की पुत्री का नाम मत काटो और आशान्वित रहो की बेटी सच में बेटों के बराबर है .
धार्मिक संगठनों सामाजिक एवं जातिगत संगठनों थे उम्मीद की जा सकती है कि वे बेटियों की सुरक्षा के लिए सच्चे दिल से कोशिश है करें . अगर समाज सेवा का इतना ही बड़ा जज्बा भी कर आप समाजसेवी के ओहदे को अपने नाम के साथ जोड़ते हैं जो आपकी ड्यूटी बनती है आपका फर्ज होता है कि आप लैंगिक विषमताओं को समाप्त करें फोटो खिंचवाने का फितूर दिमाग से निकाल दें .
आध्यात्मिक एवं धार्मिक गुरुओं से अपेक्षा की जाती है कि वे ईश्वर के इस संदेश को लोक व्यापी करें जिसमें साफ तौर पर यह कहा गया है कि- हर एक शरीर में आत्मा होती है और ईश्वर की परिकल्पना नारी के बिना अधूरा ही होता है इसका प्रमाण सनातन में तो अर्धनारीश्वर का स्वरूप के तौर पर लिखा हुआ है .
नदी को लेकर सामाजिक व्यवस्था में बेहद विसंगतियां है . कुछ नहीं अभी अपनी मादा संतानों को सुकोमल बने रहने का पाठ पढ़ाती हैं . जबकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत की हर सड़क चाहे वह हैदराबाद की हो जबलपुर की हो भोपाल की हो जयपुर की हो नई दिल्ली की हो महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच ना हो कर हिंसक नजर आने लगी हैं . समाज अगर अपना नजरिया नहीं बनता तो ऐसी घटनाएं कई बार सुर्खियों में बनी रहेगी और आपका विश्व गुरु कहलाने का मामला केवल मूर्खों का उद्घोष ही साबित होगा .
अब समाज यह तय करें क्यों से करना क्या है सामाजिक कानून कठोर होने चाहिए सामाजिक व्यवस्था इस मुद्दे को लेकर बेहद अनुशासन से बांध देने वाली होनी चाहिए अगर बच्चे के यानी नर संतान के आचरणों में जरा भी आप गलती देखते हैं या गंदगी देखते हैं तो तुरंत आपको उसके ऊपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हुए उसे काउंसलिंग प्रोसेस पर बड़ा करना ही होगा अच्छे मां-बाप की यही पहचान होगी .
धार्मिक जन जिसमें टीकाकारों कथावाचकों, साधकों योगियों को भी अब सक्रिय होने की जरूरत है . यहां हम उन ढोंगीयों का आव्हान नहीं कर रहे हैं बल्कि उनसे हमारी अपेक्षाएं हैं जो वाकई में समाज के लिए सार्थक कार्य कर रहे हैं .
व्यवस्था पर भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि व्यवस्था केवल घोषणा वीर ना रहे बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश करें कुछ बिंदु मेरे मस्तिष्क में बहुत दिनों से गूंज रहे हैं उन पर काम किया जा सकता है....
1 1000 की जनसंख्या कम से कम 50 किशोरयाँ लड़कियां तथा कम से कम 50 महिलाएं आत्मरक्षा प्रशिक्षण प्राप्त हो
2 हर विद्यालय में अनिवार्य रूप से सेल्फ डिफेंस का प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए
3 हर सिविल कोर्ट मुख्यालय में 24 * 7 अवधि के लिए विशेष न्यायिक इकाइयों की स्थापना की जावे
4 हर थाना क्षेत्र में एक एक वन स्टॉप सेंटर की स्थापना हो जहां एफ आई आर चिकित्सा सुरक्षा की व्यवस्था हो
5 प्रत्येक जिला मुख्यालय में फोरेंसिक जांच की व्यवस्था की जा सकती है . यकीन मानिए चंद्रयान मिशन मिशन पर हुई खर्च का आधा भाग इस व्यवस्था को लागू कर सकता .
6 रेप या यौन हिंसा रोकने के लिए सबसे अधिक फुलप्रूफ व्यवस्था की जानी चाहिए . घटना के उपरांत 3 दिन के बाद हैदराबाद में प्राथमिकी दर्ज की गई यह स्थिति दुखद है . जब हम तकनीकी रूप से बहुत सक्षम हो गए हैं ऐसी स्थिति में इस बात को तय करने की बिल्कुल जरूरत नहीं कि क्षेत्राधिकार किसका है अतः ऐसी टीमों का गठन करना जरूरी है जो मोबाइल हो और कहीं भी प्राथमिकी दर्ज करने का कार्य कर सकें फिर अन्वेषण के लिए भले जिस पुलिस अधिकारी का क्षेत्राधिकार हो उसे सौंप देना पड़े मामला सौंपा जा सकता है .
7 :- अन्वेषण परिस्थिति जन्य साक्षी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए
8 :- अन्वेषण हेतु केवल 7 दिनों का अवसर देना उचित प्रतीत होता है अगर साक्ष्यों की अत्यधिक जरूरत है तो अन्वेषण के लिए एसपी एडिशनल एसपी स्तर के अधिकारी से अनुमति लेकर ही अधिकतम अगले 7 दिन की अवधि सुनिश्चित की जा सकती है . अर्थात कुल मिलाकर 14 या 15 दिनों में अन्वेषण का कार्य प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों से कराया जाना उचित होगा .
9:- भले ही स्थापना व्यय कितना भी हो प्राथमिक अदालतें गठित कर ही देनी चाहिए जो डिस्ट्रिक्ट जज की सीधी मॉनिटरिंग में कार्य करें इनके लिए विशेष न्यायाधीशों की तैनाती बेहद आवश्यक है .
10:- सार्वजनिक यातायात साधनों में निजी सेवा प्रदाताओं से इस बात की गारंटी लेना चाहिए कि वह जिस वाहन चालक कंडक्टर को भेज रहे हैं अपराधिक प्रवृत्ति के तो नहीं है
11 :- हर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था के प्रबंधन के लिए बंधन कारी होना चाहिए कि महिला सुरक्षा के लिए उसके परिवहन वाहन में क्या प्रबंध किए गए हैं निरापद प्रबंध के नियम भी बनाए जाने अनिवार्य है .
12 :- ट्रांसपोर्टेशन व्यवसाय जैसे ट्रक मालवाहक अन्य कार्गो वाहन के चालू किया उसके कंडक्टर की आपराधिक पृष्ठभूमि का परीक्षण करने के उपरांत ही उन्हें लाइसेंस जारी किया जावे
13 :- महिलाओं को लड़कियों को जीपीएस की सुरक्षा तथा आईटी विशेषज्ञ से ऐसी तकनीकी का विकास की अपेक्षा है जिससे खतरे या आसन्न खतरों की सूचना कंट्रोल रूम तथा महिला या बालिका द्वारा एक क्लिक पर भेजी जा सके ऐसी डिवाइस बनाना किसी भी आईटी विशेषज्ञ के लिए कठिन नहीं होगा .
14 :- पॉक्सो तथा अन्य यौन हिंसा की रोकथाम के लिए बनाई गई नियम अधिनियम प्रावधान आदेश निर्देश को एक यूनिफॉर्म पाठ्यक्रम के रूप में बालक बालिकाओं को पढ़ाना अनिवार्य है
15 :- अन्वेषण के उपरांत मामला दाखिल करने के लिए पुलिस को केवल अधिकतम 20 दिनों की अवधि देनी अनिवार्य है साथ ही निचली अदालत में मामले के निपटान के लिए केवल 20 दिनों का समय दिया जाना उचित होगा.
16 :- कोई भी मामला 20 दिन से अधिक समय लेता है तो हाईकोर्ट को मामले को अपनी मॉनिटरिंग में लेते हुए विलंब की परिस्थिति का मूल्यांकन करने का अधिकार होना चाहिए .
17 :- उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में अपील के लिए क्रमशः 25 दिनों की अवधि नियत की जानी चाहिए जिसमें अपील करने के लिए मात्र हाईकोर्ट की स्थिति में 10 दिवस तथा सुप्रीम कोर्ट की स्थिति में 15 दिवस कुल 25 दिवस ( निचली अदालत के फैसले के उपरांत) देना उचित होगा . यहां विशेष अदालत द्वारा दिए गए फैसले के विरुद्ध 10 दिनों के अंदर अपील की जा सकती है तदोपरांत अगर निर्णय से असंतुष्ट हैं तो 15 दिनों में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है .
अगर व्यवस्था और समाज चाहे तो उपरोक्त अनुसार कार्य करके एक विश्वसनीय व्यवस्था कायम कर सकते हैं .

गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”
 

 

2012 दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामला भारत की राजधानी दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को हुई बलात्कार एवम हत्या की घटना रोंगटे खड़े कर दिए थे यह सत्य है कि संचार माध्यम के त्वरित हस्तक्षेप के कारण प्रकाश में आयी वरना यह भी एक सामान्य सा अपराध बनकर फाइलों में दबी होती.
सोशल मीडिया ट्वीटर फेसबुक आदि पर काफी कुछ लिखा गया. इस घटना के विरोध में पूरे नई दिल्ली,  कलकत्ता  और बंगलौर  सहित देश के छोटे-छोटे कस्बों तक में एक निर्णायक लड़ाई सड़कों पर नजर आ रही थी .   बावजूद इसके किसी भी प्रकार का परिवर्तन नजर नहीं आता इसके पीछे के कारण को हम आप सब जानते हैं .
बरसों से देख रहा हूं कि नवंबर से दिसंबर बेहद स्थितियों को सामने रख देते हैं . ठीक 7 साल पहली हुई इस घटना के बाद परिस्थितियों में कोई खास परिवर्तन नजर नहीं आ रहा है . हम अगले महीने की 26 तारीख को नए साल में भारतीय गणतंत्र की वर्षगांठ मनाएंगे पता नहीं क्या स्थिति होगी तब मुझे नहीं लगता कि हम तब जबकि महान गणतंत्र होने का दावा कर रहे होंगे तब हां तब ही किसी कोने में कोई निर्भया अथवा प्रियंका रेड्डी का परिवार सुबक रहा होगा तब तक टनों से मोम पिलाया जा चुका होगा . अधिकांश जनता आम दिनों की तरह जिंदगी बसर करने लगे होंगे... हां उनके हृदय में डर अवश्य बैठ चुका होगा . ना तो समाज में और ना ही व्यवस्था में कोई खास परिवर्तन नजर आएगा परंतु परिवर्तन आ सकता है अगर समाज में लोग यह सोचें कि :- हम रेपिस्ट को केवल फांसी के फंदे पर देखना चाहते हैं अगर वह अपना खून है तो भी ..! शायद बदलाव शुरू हो जाएगा, परंतु सब जानते हैं ऐसा संभव नहीं है .
व्यवस्था भी कानूनी व्यवस्थाओं का परिपालन करते-करते बरसों बिता देगी परंतु फांसी के फंदे तक रेपिस्ट नहीं पहुंच पाएंगे आप जानते हैं कि अब तक आजादी के बाद कुल 57 केस में फांसी की सजा हो पाई है . इसका अर्थ है कि कहीं ना कहीं रेपिस्ट न्याय व्यवस्था में लंबे लंबे प्रोसीजर्स के चलते लाभ उठा ही लेते हैं और जिंदा बनी रहते हैं कि वह लोग हैं जिन्हें जीने का हक नहीं है . एक साहित्यकार होने के बावजूद केवल रेप के मामलों में शीघ्र और अंततः फांसी की सजा की मांग क्यों कर रहा हूं..?
जी हां आपके ऐसे सवाल उठ सकते हैं लेकिन पूछना नहीं यह जघन्य अपराध है और इसका अंत फांसी के फंदे से ही होगा यह जितना जल्दी हो उतना समाज को और उन दरिंदों को संदेश देने के लिए काफी है जो रेप को एक सामान्य सा अपराध मानते हैं .
सुधि पाठको , साहित्यकार हूं कभी हूं संवेदनशील हूं इसका यह अर्थ नहीं है कि न्याय के पासंग पर यौन हिंसा को साधारण अपराधों की श्रेणी में रख कर तोलूं . यहां ऐसे अपराधों के लिए केवल मृत्युदंड की अपेक्षा है .
निर्भया कांड के बाद व्यवस्था ने व्यवस्थित व्यवस्था ना करते हुए ... इन अपराधों को स्पेस दिया है यह कहने में मुझे किसी भी तरह का संकोच नहीं हो रहा . हबीबगंज प्लेटफॉर्म पर हुए कांड के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने कुछ नए बदलाव लाने की कोशिश भी की है 50 महिला केंद्रों की स्थापना प्रत्येक जिले में कर दी गई है न्याय के मामले में मध्यप्रदेश की अदालतों में तेजी से काम हुआ है इसकी सराहना तो की जानी चाहिए लेकिन क्या यह पर्याप्त है मुझे लगता है कदापि नहीं आप भी यही सोच रहे होंगे कुछ सुझाव व्यवस्था के लिए परंतु उसके पहले कुछ सुझाव समाज के लिए बहुत जरूरी है अगर आप अभिभावक हैं तो अपनी पुरुष संतान को खुलकर नसीहत देने की पहल आज ही कर दीजिए कि महिलाओं के प्रति बेटियों के प्रति नकारात्मक और हिंसक भाव रखने वाले बच्चों यानी पुरुष संतानों के लिए घर के दरवाजे कभी नहीं खुल सकेंगे .
समाज ऐसा कदम नहीं उठाएगा जीने का सुधरने का एक मौका और चाहेगा परंतु इन्हीं मौकों के कारण महिलाओं का शोषण करने को स्पेस मिलता है जो सर्वदा गैर जरूरी है क्या अभिभावक ऐसा करना चाहेंगे मुझे नहीं लगता जो पुत्र मोह में फंसे हैं ऐसा धृतराष्ट्री समाज कदापि अपनी पुरुष संतान के खिलाफ कोई कठोर कदम उठाएगा . यह वही समाज है जहां लड़कों के लिए व्रत किए जाते हैं यह वही समाज है जहां कुछ वर्षों पूर्व तक बेटियों के जन्म से उसे उपेक्षित भाव से देखा जाता है इतना ही नहीं बेटी की मां के प्रति नेगेटिविटी का व्यवहार शुरू हो जाना सामान्य बात है .
यह वही समाज है जहां पुत्रवती भव् होने का आशीर्वाद दिया जाता है . समाज से किसी को भी बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है . अगर आप मेरी बात को समझ पा रहे हैं तो गौर कीजिए बेटियों के प्रति स्वयं नजरिया पॉजिटिव करिए तो निश्चित तौर पर आप देवी पूजा करने के हकदार है वरना आप देवी पूजा करके केवल ढोंग करते हुए नजर आते हैं .
बातें कुछ कठिन और कड़वी है पर उद्देश्य साफ है की औरत को लाचार मजबूर बना देने की आदत व्यवस्था यानी सरकार में नहीं समाज में है . अतः समाज को स्वयं में बदलाव लाने की जरूरत है बलात्कारी पुत्र के होने से बेहतर है बेटी के माता-पिता बन जाओ विश्वास करो डीएनए ट्रांसफर होता है आपका वंश चलता है आपकी वंशावली से आप की पुत्री का नाम मत काटो और आशान्वित रहो की बेटी सच में बेटों के बराबर है .
धार्मिक संगठनों सामाजिक एवं जातिगत संगठनों थे उम्मीद की जा सकती है कि वे बेटियों की सुरक्षा के लिए सच्चे दिल से कोशिश है करें . अगर समाज सेवा का इतना ही बड़ा जज्बा भी कर आप समाजसेवी के ओहदे को अपने नाम के साथ जोड़ते हैं जो आपकी ड्यूटी बनती है आपका फर्ज होता है कि आप लैंगिक विषमताओं को समाप्त करें फोटो खिंचवाने का फितूर दिमाग से निकाल दें .
आध्यात्मिक एवं धार्मिक गुरुओं से अपेक्षा की जाती है कि वे ईश्वर के इस संदेश को लोक व्यापी करें जिसमें साफ तौर पर यह कहा गया है कि- हर एक शरीर में आत्मा होती है और ईश्वर की परिकल्पना नारी के बिना अधूरा ही होता है इसका प्रमाण सनातन में तो अर्धनारीश्वर का स्वरूप के तौर पर लिखा हुआ है .
नदी को लेकर सामाजिक व्यवस्था में बेहद विसंगतियां है . कुछ नहीं अभी अपनी मादा संतानों को सुकोमल बने रहने का पाठ पढ़ाती हैं . जबकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत की हर सड़क चाहे वह हैदराबाद की हो जबलपुर की हो भोपाल की हो जयपुर की हो नई दिल्ली की हो महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच ना हो कर हिंसक नजर आने लगी हैं . समाज अगर अपना नजरिया नहीं बनता तो ऐसी घटनाएं कई बार सुर्खियों में बनी रहेगी और आपका विश्व गुरु कहलाने का मामला केवल मूर्खों का उद्घोष ही साबित होगा .
अब समाज यह तय करें क्यों से करना क्या है सामाजिक कानून कठोर होने चाहिए सामाजिक व्यवस्था इस मुद्दे को लेकर बेहद अनुशासन से बांध देने वाली होनी चाहिए अगर बच्चे के यानी नर संतान के आचरणों में जरा भी आप गलती देखते हैं या गंदगी देखते हैं तो तुरंत आपको उसके ऊपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हुए उसे काउंसलिंग प्रोसेस पर बड़ा करना ही होगा अच्छे मां-बाप की यही पहचान होगी .
धार्मिक जन जिसमें टीकाकारों कथावाचकों, साधकों योगियों को भी अब सक्रिय होने की जरूरत है . यहां हम उन ढोंगीयों का आव्हान नहीं कर रहे हैं बल्कि उनसे हमारी अपेक्षाएं हैं जो वाकई में समाज के लिए सार्थक कार्य कर रहे हैं .
व्यवस्था पर भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि व्यवस्था केवल घोषणा वीर ना रहे बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश करें कुछ बिंदु मेरे मस्तिष्क में बहुत दिनों से गूंज रहे हैं उन पर काम किया जा सकता है....
1 1000 की जनसंख्या कम से कम 50 किशोरयाँ लड़कियां तथा कम से कम 50 महिलाएं आत्मरक्षा प्रशिक्षण प्राप्त हो
2 हर विद्यालय में अनिवार्य रूप से सेल्फ डिफेंस का प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए
3 हर सिविल कोर्ट मुख्यालय में 24 * 7 अवधि के लिए विशेष न्यायिक इकाइयों की स्थापना की जावे
4 हर थाना क्षेत्र में एक एक वन स्टॉप सेंटर की स्थापना हो जहां एफ आई आर चिकित्सा सुरक्षा की व्यवस्था हो
5 प्रत्येक जिला मुख्यालय में फोरेंसिक जांच की व्यवस्था की जा सकती है . यकीन मानिए चंद्रयान मिशन मिशन पर हुई खर्च का आधा भाग इस व्यवस्था को लागू कर सकता .
6 रेप या यौन हिंसा रोकने के लिए सबसे अधिक फुलप्रूफ व्यवस्था की जानी चाहिए . घटना के उपरांत 3 दिन के बाद हैदराबाद में प्राथमिकी दर्ज की गई यह स्थिति दुखद है . जब हम तकनीकी रूप से बहुत सक्षम हो गए हैं ऐसी स्थिति में इस बात को तय करने की बिल्कुल जरूरत नहीं कि क्षेत्राधिकार किसका है अतः ऐसी टीमों का गठन करना जरूरी है जो मोबाइल हो और कहीं भी प्राथमिकी दर्ज करने का कार्य कर सकें फिर अन्वेषण के लिए भले जिस पुलिस अधिकारी का क्षेत्राधिकार हो उसे सौंप देना पड़े मामला सौंपा जा सकता है .
7 :- अन्वेषण परिस्थिति जन्य साक्षी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए
8 :- अन्वेषण हेतु केवल 7 दिनों का अवसर देना उचित प्रतीत होता है अगर साक्ष्यों की अत्यधिक जरूरत है तो अन्वेषण के लिए एसपी एडिशनल एसपी स्तर के अधिकारी से अनुमति लेकर ही अधिकतम अगले 7 दिन की अवधि सुनिश्चित की जा सकती है . अर्थात कुल मिलाकर 14 या 15 दिनों में अन्वेषण का कार्य प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों से कराया जाना उचित होगा .
9:- भले ही स्थापना व्यय कितना भी हो प्राथमिक अदालतें गठित कर ही देनी चाहिए जो डिस्ट्रिक्ट जज की सीधी मॉनिटरिंग में कार्य करें इनके लिए विशेष न्यायाधीशों की तैनाती बेहद आवश्यक है .
10:- सार्वजनिक यातायात साधनों में निजी सेवा प्रदाताओं से इस बात की गारंटी लेना चाहिए कि वह जिस वाहन चालक कंडक्टर को भेज रहे हैं अपराधिक प्रवृत्ति के तो नहीं है
11 :- हर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था के प्रबंधन के लिए बंधन कारी होना चाहिए कि महिला सुरक्षा के लिए उसके परिवहन वाहन में क्या प्रबंध किए गए हैं निरापद प्रबंध के नियम भी बनाए जाने अनिवार्य है .
12 :- ट्रांसपोर्टेशन व्यवसाय जैसे ट्रक मालवाहक अन्य कार्गो वाहन के चालू किया उसके कंडक्टर की आपराधिक पृष्ठभूमि का परीक्षण करने के उपरांत ही उन्हें लाइसेंस जारी किया जावे
13 :- महिलाओं को लड़कियों को जीपीएस की सुरक्षा तथा आईटी विशेषज्ञ से ऐसी तकनीकी का विकास की अपेक्षा है जिससे खतरे या आसन्न खतरों की सूचना कंट्रोल रूम तथा महिला या बालिका द्वारा एक क्लिक पर भेजी जा सके ऐसी डिवाइस बनाना किसी भी आईटी विशेषज्ञ के लिए कठिन नहीं होगा .
14 :- पॉक्सो तथा अन्य यौन हिंसा की रोकथाम के लिए बनाई गई नियम अधिनियम प्रावधान आदेश निर्देश को एक यूनिफॉर्म पाठ्यक्रम के रूप में बालक बालिकाओं को पढ़ाना अनिवार्य है
15 :- अन्वेषण के उपरांत मामला दाखिल करने के लिए पुलिस को केवल अधिकतम 20 दिनों की अवधि देनी अनिवार्य है साथ ही निचली अदालत में मामले के निपटान के लिए केवल 20 दिनों का समय दिया जाना उचित होगा.
16 :- कोई भी मामला 20 दिन से अधिक समय लेता है तो हाईकोर्ट को मामले को अपनी मॉनिटरिंग में लेते हुए विलंब की परिस्थिति का मूल्यांकन करने का अधिकार होना चाहिए .
17 :- उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में अपील के लिए क्रमशः 25 दिनों की अवधि नियत की जानी चाहिए जिसमें अपील करने के लिए मात्र हाईकोर्ट की स्थिति में 10 दिवस तथा सुप्रीम कोर्ट की स्थिति में 15 दिवस कुल 25 दिवस ( निचली अदालत के फैसले के उपरांत) देना उचित होगा . यहां विशेष अदालत द्वारा दिए गए फैसले के विरुद्ध 10 दिनों के अंदर अपील की जा सकती है तदोपरांत अगर निर्णय से असंतुष्ट हैं तो 15 दिनों में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है .
अगर व्यवस्था और समाज चाहे तो उपरोक्त अनुसार कार्य करके एक विश्वसनीय व्यवस्था कायम कर सकते हैं .

महात्मा गांधी को लेकर पीएम नरेन्द्र मोदी का क्या दृष्टिकोण है? यह सवाल एक बार फिर इसलिए उठ रहा है कि बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक बार पुनः नाथूराम गोडसे को देशभक्त करार दिया है.
खबर है कि भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने बुधवार को लोकसभा में एक डिबेट के दौरान नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा.
इसके बाद तो न केवल बड़ा सियासी हंगामा हुआ, बल्कि पीएम मोदी ही विरोधियों के निशाने पर आ गए?
प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया- आज देश की संसद में खड़े होकर भाजपा की एक सांसद ने गोडसे को देशभक्त बोल ही दिया. अब प्रधानमंत्रीजी (जिन्होंने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती धूमधाम से मनाई) से अनुरोध है कि दिल से बता दें कि गोडसे के बारे में उनके क्या विचार हैं? महात्मा गांधी अमर हैं!
यही नहीं, रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा- देश गांधी जयंती का 150वां साल मना रहा है, और भाजपा सांसद, प्रज्ञा ठाकुर गांधीजी के हत्यारे गोडसे को ‘शहीद’ बता महिमामंडन कर रही हैं. गोडसे की सोच के भाजपाइयों ने जो गांधीवादी मुखौटा लगाया था, आज संसद में उतर गया. मोदीजी, देश अब आपको व भाजपा को कभी ‘मन से माफ नही करेगा’!
खबर है कि बुधवार को लोकसभा में एक डिबेट के दौरान प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने ये बयान दिया. लोकसभा में एसपीजी संशोधन बिल पर डीएमके सांसद ए राजा अपनी राय रख रहे थे. इस दौरान ए राजा ने गोडसे के एक बयान का जिक्र किया जिसमें गोडसे ने कहा कि था कि उसने महात्मा गांधी को क्यों मारा था?
ए राजा जब बोल ही रहे थे, उसी दौरान प्रज्ञा ठाकुर ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि- आप एक देशभक्त का उदाहरण नहीं दे सकते हैं!
उनके इतना कहते ही लोकसभा में हंगामा मच गया. वैसे, प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयान को लोकसभा के रिकॉर्ड से हटा दिया गया है, लेकिन प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ पार्टी कार्रवाई हो सकती है?
ऐसा पहली बार नहीं है कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त करार दिया हो. लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान भी उन्होंने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया था.
तब भी पीएम मोदी सवालों के घेरे में थे, इसके कारण उन्होंने कहा था- भले ही इस मामले में उन्होंने (साध्वी प्रज्ञा) माफी मांग ली हो, लेकिन मैं अपने मन से उन्हें कभी भी माफ नहीं कर पाऊंगा!
बहरहाल, साध्वी प्रज्ञा ने एक बार फिर पीएम मोदी के लिए सियासी परेशानी खड़ी कर दी है, देखना होगा कि अब पीएम मोदी क्या जवाब देते हैं?
कुमार विश्वास ने शब्दबाण चलाए और ट्वीट किया- मैं इन्हें फिर से माफ नहीं कर पाऊंगा!

संजय राय
 

 महाराष्ट्र में सत्ता के समीकरण जमाने और बिगाड़ने में शरद पवार का कोई सानी नहीं है. इस खेल में उन्होंने बड़े -बड़े दिग्गजों को किनारे लगाया है और इसी का परिचय इस बार भी दिया.  विधानसभा चुनावों में अपने भाषणों में पवार कहते थे अभी मैं बूढा नहीं हुआ हूँ ,कुछ लोगों को अब भी सत्ता से बाहर घर बिठाने का मादा रखता हूँ.  उस समय उनके विरोधी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेता भले ही उनकी बातों को हलके में ले रहे थे लेकिन प्रदेश में चुनाव परिणाम के बाद बीस दिन तक चला सत्ता बनाने के इस संग्राम को देखें तो हर सूत्र शरद पवार से जुड़ा ही नजर आया. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनके सहयोगी भले ही चुनाव प्रचार में यह कहते रहे की शरद पवार की राजनीति अब ख़त्म हो गयी ,उनका समय ख़त्म हो गया लेकिन पवार के वार ने उन्हें सबसे बड़ा दल होने के बाद भी सत्ता की कुर्सी पर नहीं बैठने दिया. महाराष्ट्र में विभिन्न पार्श्वभूमि और विचारधाराओं की पार्टियों को एक साथ लेकर सरकार बनाने का अनुभव पवार का अच्छा ख़ासा है और इसकी शुरुवात उन्होंने 1978 में की और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले प्रदेश के सबसे युवा नेता बने ,उनका यह रेकॉर्ड आज भी कायम है. शरद पवार पर अपने ही राजनीतिक गुरु वसंत दादा पाटिल की सरकार गिराने और उनके साथ विश्वासघात करने का आरोप लगता रहा है. यह कहानी 80 के दशक की है और महारष्ट्र की राजनीति का जो चित्र आज दिख रहा है दोनों में काफी कुछ समानता है. 1975 में तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने के बाद उनका कांग्रेस में भी विरोध बढ़ने लगा था और परिणाम कांग्रेस में टूट हुआ. यशवंतराव चव्हाण और ब्रम्हानंद रेड्डी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ बगावत कर रेड्डी कांग्रेस की स्थापना की. वसंतदादा पाटिल और शरद पवार ने यशवंतराव चव्हाण का साथ दिया और रेड्डी कांग्रेस में शामिल हो गए.  महाराष्ट्र में कांग्रेस की कमान नासिकराव तिरपुडें को मिल गयी जो इंदिरा गांधी के समर्थक थे. 1978 का विधानसभा चुनाव हुआ और महाराष्ट्र में जनता पार्टी ,इंदिरा कांग्रेस और रेड्डी कांग्रेस ने अलग -अलग चुनाव लड़ा. जनता पार्टी को 99,इंदिरा काँग्रेस को  62, और  रेड्डी काँग्रेस को  69 सीटों पर विजय मिली. शेतकरी कामगार पक्ष को  13, माकपा को  9 और 36 सीटों पर निर्दलीय जीतकर आये. यानी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला  था . महाराष्ट्र में  जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए रणनीति बनने लगी थी.  इस सिलसिले में रेड्डी काँग्रेस के वसंतदादा पाटिल ने  दिल्ली जाकर  यशवंतराव चव्हाण, ब्रह्मानंद रेड्डी, चंद्रशेखर से चर्चाएं की और उनके साथ इंदिरा गांधी से चर्चा की.  चर्चा का मुख्य बिंदु यही था महाराष्ट्र की सत्ता से जनता पार्टी को दूर रखना.  इंदिराजी ने उस पर अपनी सहमति दे दी और प्रदेश का सबसे बड़ा दल जनता पार्टी ज्यादा सीटें जीतकर भी सत्ता से बाहर हो गया. वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने और शरद पवार उद्योग मंत्री.  लेकिन नासिकराव तिरपुडें को लगातार सत्ता में रहते हुए भी वसंतदादा पाटिल की आलोचना करते थे. तिरपुंडे उप मुख्यमंत्री थे लिहाजा वे बार बार यह करके अपना वर्चस्व दिखाना चाहते थे. ऐसी परिस्थितियों में करीब चार माह बाद ही "1978 के जुलाई महीने में विधानसभा का मानसून अधिवेशन शुरू हुआ शरद पवार ने अपना दांव चल दिया. वे 40 विधायक लेकर सरकार से बाहर हो गए. उनके साथ सुशील कुमार शिंदे, सुंदरराव सोळंके और दत्ता मेघे जैसे मंत्रियों ने भी इस्तीफ़ा देकर सरकार छोड़ दी.  वसंतदादा पाटिल की सरकार गिर गयी और पवार जनता पार्टी को साथ लेकर पहली बार मुख्यमंत्री बने.  उन्होंने जो गठबंधन बनाया था वह पुलोद ( पुरोगामी लोकशाही दल ) यानी प्रगतिशील डेमोक्रेटिक दल का नाम दिया.  महाराष्ट्र में यह पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी और वह भी शरद पवार के नेतृत्व में. वसंतदादा का साथ छोड़ने के बाद पवार ने समाजवादी कांग्रेस नामक पार्टी की स्थापना की थी.  बताया जाता है कि पवार ने इस खेल में यशवंतराव चव्हाण को भी भरोसे में लिया था और उनकी के पार्टी के मुख्यमंत्री की सरकार गिरा दी थी. शरद पवार की यह सरकार पौने दो साल तक ही चली.  केंद्र में जनता पार्टी की सरकार गिराकर इंदिरा गांधी जब पूर्ण बहुमत के साथ फिर से सत्तासीन हुई तो उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को भंग कर दिया था.  इसके लिए उन्होंने ना सिर्फ जनता पार्टी में तोड़ फोड़ की अपितु शरद पवार के विधायकों को भी तोड़ दिया.  इस बार विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने एनसीपी के दर्जनों विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था तो पवार ने सार्वजनिक  बात का उदाहरण दिया था.  उन्होंने कहा था कि एक बार उनके 60 विधायक थे और 54 ने उनका साथ छोड़ दिया था लेकिन अगले चुनाव में वे फिर से 60 विधायकों को चुनवाने में सफल हुए थे.  पवार ने इस कहा था इस बार भी वे वही इतिहास दोहराएंगे.  उन्होंने कहा था कि कई लोगों को घर बिठाना है.  पवार ने उम्र के इस पड़ाव में कुछ वैसा ही इस  चुनाव में कर दिखाया है.  पिछले 20 दिनों  से महाराष्ट्र में जो सत्ता संघर्ष चल रहा है उसका यह परिणाम लाने में शरद पवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही. जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस और शिवसेना को करीब लाकर एक नया समीकरण बनाया है यह उसी घटना को याद दिलाता है जब जनता पार्टी को रोकने के लिए इंदिरा कांग्रेस और रेड्डी कांग्रेस का मेल हुआ था.

बधाई दीजिए कि बीती 23 जुलाई, 2016 को 89 साल की हो गई अपनी आकाशवाणी. उम्र के लिहाज से इसे आप बूढा कह सकते हैं. किंतु अपने मन की बात कहने के लिए हमारे प्रधानमंत्री जी द्वारा आकाशवाणी को चुनने से साफ है कि आकाशवाणी बीते वक्त का कोई चूका हुआ माध्यम नहीं है. हकीकत यह है कि रेडियो एक अरसे से जनसंवाद का लाजवाब माध्यम रहा है. सत्य-अहिंसा का अपने संदेश को भारतवासियों तक पहुंचाने के लिए 1930 में महात्मा गांधी ने भी रेडियो को ही चुना था. 15 अगस्त, 1947 को सबसे पहले रेडियो पर पंडित जवाहर लाल नेहरु की खनकती आवाज सुनकर ही भारतवासियों ने जाना था कि अब देश आजाद है. मौका चाहे, 20 नवंबर, 1964 चीन हमले के वक्त नेहरु द्वारा राष्ट्र के संबोधन का रहा हो अथवा इंदिरा जी द्वारा बढती आबादी, अनाज की कमी पर जन-अपील का, हमारे नेता रेडियो के जरिए जनता से जुङते रहे हैं. इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के हमले का माकूल जबाव देने और इमरजेंसी के ऐलान के लिए भी रेडियो के जरिये ही किया था.

माना जाता है कि रेडियो को जनसंवाद माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने वाली शासकीय शख्सियत के रूप में अमेरिका में न्यूयार्क के तत्कालीन गर्वनर रूजवेल्ट ( वर्ष-1929) पहले थे.  उन्होने रेडियो को जनंसवाद के माध्यम के रूप में तवज्जो दी. युवावस्था में रेडियो के लिए काम कर चुके रोनाल्ड रीगन जब 1982 में अमेरिका के राष्ट्रपति हुए, तो उन्होने हर शनिवार रेडियो से जरिए जनसंवाद शुरु किया. हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945), मानवता के इतिहास में एक काला धब्बा है; किंतु इसमें कोई शक नहीं कि इस युद्ध में बम-बंदूकों का इस्तेमाल तो हुआ ही, एक लङाई रेडियो के जरिए भी लङी गई. इसके बाद ही दुनिया की सरकारों ने रेडियो की असल ताकत को पहचाना.

इससे यह आशा भी बलवती होती है कि यदि रेडियो पर जम आई धूल को झाङ-पोछकर नये रुतबे के साथ पेश किया जायेे, तो यह फिर से जनसंवाद का एक बेहतरीन और व्यापक औजार बन सकता है. ''यह आकाशवाणी की लोकप्रसारक सेवा है'' - गत् कुछ वर्षों से आकाशवाणी ने यह कहने का मौका पुनः हासिल करने की कवायद शुरु कर दी है. वह स्टुडियो के पुराने औपचारिक अंदाज और दीवारों से बाहर निकल कुछ अनौपचारिक और नूतन होने के मूड में सामने आने लगी है. हांलाकि पुरानी खेप को खपाने की बजाय, नई पौध के हाथों कमान देने के मूड बना, तो रास्ते और भी बनेंगे और आकाशवाणी और भी जवां होगी.

आज सैकङों टी वी चैनल हैं. निजी एफ एम चैनल हैं. सामुदायिक रेडियो हैं. लाखों अखबार हैं. करोङो मोबाइल हैं. सामाजिक संवाद के लिए सोशल मीडिया है. जो सुनना चाहो, जानना चाहो, देखना चाहो; इंटरनेट पर पूरी दुनिया है. रेडियो से इतर यदि हम आकाशवाणी की बात करें, तो तकनीकी क्रांति और सरकारी माध्यमों पर सरकारी दबाव के चित्र को सामने रखकर आज आप पूछ सकते है कि ऐसे में कोई आकाशवाणी को क्यों सुने ? मेरा मानना है, यही वह एक प्रश्न है जो कि आकाशवाणी के सामने एक बङी चुनौती भी रखता है और उसके लिए संभावनायें भी पेश करता है.

चुनौती यह है कि यह कैसे हो कि दुनिया आकाशवाणी को सुनना चाहें. संभावना यह है कि अपने खर्चों के लिए आकाशवाणी किसी विज्ञापन या प्रायोजक की ओर ताकने को मजबूर नहीं है. सरकार उसके खर्चे की व्यवस्था करती है. अतः आकाशवाणी लोकप्रसारक की अपनी उस भूमिका के साथ न्याय कर सकती है, जो बाजार के दबाव में जनसंचार के दूसरे माध्यम नहीं कर पा रहे. तकनीकी और भाषाई तौर पर आज जितनी विविधता और पहुंच आकाशवाणी की है, उतनी सिर्फ भारत नहीं, पूरे एशिया के किसी जनसंचार माध्यम की नहीं है. दुनिया में कोई और रेडियो अथवा टी वी चैनल समूह नहीं है, जिसके पास कर्नाटक अथवा हिंदोस्तानी शास्त्रीय संगीत व वाद्य वृंद प्रस्तुतियों को समर्पित कोई चैनल हो. कभी रेडियो घर में रखने के लिए लाईसेंस व सालाना रखना पङता था, आज रेडियो मुफ्त और बिना बिजली चलने वाला माध्यम है. इसे घर में सुनें या खेत की जुताई करते हुए बैल के गले में टांगकर. रेडियो किसी अनपढ को खेती के गुर सिखा सकता है. रेडियो किसी अंधे को पढा सकता है. एक साथ इतनी सारी संभावनायें किसी और जनसंचार माध्यम में नहीं होना, आकाशवाणी के लिए संभावनाओं के कई द्वार खोलता है.

गौर कीजिए कि भारत में रेडियो प्रसारण, अंग्रेजी हुकुमत की देन थी. उन्होने ही एक निजी कंपनी को अधिकृत कर भारत में 23 जुलाई, 1927 को पहला (मंुबई) और 26 अगस्त, 1927 को दूसरा (कलकत्ता) रेडियो स्टेशन शुरु कराया. सरकारी होने के बाद 8 जून, 1936 से इन्हे एक नया और नायाब नाम मिला: 'आॅल इंडिया रेडियो'.

जब भारत आजाद हुआ, तो आकाशवाणी के पास कुल छह केन्द्र, 18 ट्रांसमीटर और देश के ढाई प्रतिशत भूगोल और 11 प्रतिशत लोगों में इसकी पहुंच थी; आज आकाशवाणी के पास 413 प्रसारण केन्द्र हैं. देश के 92 प्रतिशत भूगोल और 99.19 प्रतिशत आबादी तक इसकी पहुंच है. लेह-तवांग जैसे सुदूर क्षेत्र, कठिन सीमायें और हमारे जाबांज सैनिक भी इस जद में शामिल हैं, जिन्हे आकाशवाणी के अलावा और कोई जनसंचार माध्यम बाकि दुनिया से नहीं जोङता. 23 भाषाओं और 146 बोलियों में इसके कार्यक्रम प्रसारित होते हैं. सात भारतीय और 16 विदेशी भाषाओं के साथ आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा दुनिया के 54 देशों में अपनी पहुंच रखती है. मनोरजंन और समाचारों के लिए मोबाइल सेट और डी2एच पर लोगों की बढती रुचि को ध्यान में रखते हुए आकाशवाणी ने अपने कुल मौजूदा 584 ट्रांसमीटर में सबसे ज्यादा संख्या, 391 एफ एम ट्रंासमीटर की ही रखी है. आकाशवाणी के प्रसारण व कार्यक्रम निर्माण की तकनीक पूरी तरह डिजीटल है. आकाशवाणी के पास राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक स्टुडियो सुविधा उपलब्ध है. डी2एच पर इसके 21 चैनल उपलब्ध है. आकाशवाणी के सभी प्रमुख कार्यक्रमों को अब आप कभी भी इंटरनेट पर सुन सकते हैं.

तकनीकी उत्थान के इस चित्र को सामने रखें, तो निस्संदेह हम कह सकते हैं कि चुनौतियों से निबटने के लिए रेडियो ने तैयारी की है. किंतु यदि आकाशावाणी के श्रोता अनुसंधान एकांश, निगरानी इकाई की कार्यप्रणाली, उसके लिए उपयोग की जा रही तकनीक और राष्ट्रीय प्रसारण सेवा की उपेक्षा के चित्रों पर निगाह डालें, तो कह सकते हैं कि अभी तैयारी और चाहिए. यदि विदेश प्रसारण सेवा के कार्यक्रम प्रसारण के अपने लक्ष्य क्षेत्र की बजाय भटककर दूसरे क्षेत्र में सुनाई दें, तो भी कहा जा सकता है कि कमियों से उबरने की जरूरत यहां भी है. विशेष श्रोता और स्थान विशेष के लिए एफ एम ट्रांसमीटरों का इस्तेमाल करके बङे-बङे राजमार्गांे के बीच जन-जुङाव की पगंडडियों का एक विशाल संजाल खङा किया जा सकता है. इस लिहाज से कह सकते हैं कि नई उपलब्ध तकनीक का जितना अधिकतम सदुपयोग संभव है, वह किया जाना अभी बाकी है.

लोकप्रसारक की भूमिका की दृष्टि से यदि हम निजी मीडिया के रुख पर गौर करें, तो आकाशवाणी-दूरदर्शन सरीखे माध्यमों की जरूरत और ज्यादा महसूस होती है. जरा सोचिए, लोकसेवक की अपनी भूमिका में संवाद के लिए सरकार के पास सुदूर इलाकों में पहुंच वाले जनसंचार माध्यम के नाम पर आकाशवाणी और दूरदर्शन के सिवा और क्या है ? क्या कोई और अथवा निजी तंत्र है, जो सरकार की योजनाओं, मुहिमों को ऐसे इलाकों में पहुंचा रहा है ? क्या कोई निजी टी. वी. या रेडियो चैनल है, जिसमें आपको गांव के गरीब की सीधी आवाज सुनाई देती हो ? कुछ सरकारी वेबसाइट, पोर्टल व सरकारी पत्रिकायें हैं. उनकी पहुंच सीमित तो है ही, गरीब की आवाज की उपस्थिति उनमें भी नहीं है. केन्द्र से लेकर राज्य व जिला स्तरीय सूचना व जनसंपर्क केन्द भी महज् औपचारिक बनकर रह गये हैं.

इस दृष्टि से देखें तो यह कह सकते हैं कि आकाशवाणी-दूरदर्शन को सरकारी छाया से मुक्त होने से ज्यादा जरूरत, सरकार की नीतियों, कानूनों और लोक योजनाओं की जानकारी और कार्यप्रणाली को पूरी मुस्तैदी व ईमानदारी के साथ लोगों तक पहुंचाने की है. जरूरत है कि आकाशवाणी-दूरदर्शन सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और उसमें आ रही दिक्कतों को उजागर करे. एक लोक प्रसारक के रूप में सरकार व लोगों के बीच में डाकिये तथा लोक निगरानी तंत्र की भूमिका निभाये.

2004 से लेकर 2011 तक के जनगणना दस्तावेजों के मुताबिक, भारत के एक-चौथाई अघ्यापक विद्यालय ही नहीं आते. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाॅक्टर की उपस्थिति के आंकङे बेहद निराशाजनक हैं. गरीबी रेखा से नीचे होते हुए भी बीपीएल कार्डधारक बन पाने का सपना कई को अभी भी इस जन्म में पूरा होता नहीं दिखता. उचित दर दुकानों से हक का राशन लेना गंावों में अभी एक जंग लङने जैसा है. आकाशवाणी की असल भूमिका, लोक जरूरत के ऐसे मसलों को सामने लाने की है; 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' के अपने सूत्र वाक्य का सिरा पकङकर उसे अंजाम तक पंहुचाने की है.

किंतु यह तभी संभव है, जब आकाशवाणी-दूरदर्शन के संवाददाता प्रेस विज्ञप्ति व बयान आधारित समाचारों की दुनिया से बाहर निकलें. कार्यक्रम निष्पादक, पगडंडियों के पैदल रास्ते पर चलकर गरीब गांवों, कस्बों और झोपङ पट्टियों की उस उपेक्षित दुनिया में जाने की खुद पहल करें, जिन्हे आज भी इंतजार है कि कोई आयेगा और एक न एक दिन उनकी आवाज सरकार द्वारा सुनी जायेगी. रेडियो सुनकर और उसके प्रसारक को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराकर दायित्व निर्वाह की इस प्रक्रिया को हम दोतरफा बना सकते हैं. आइये, बनायें.

Page 1 of 3

फेसबुक