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बात बेबाक "चुनावी चकल्लस"

चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार )
9425522015
 
राजनीति एक ऐसी चीज है जहां हर कोई खुद को दूसरों से बेहतर बताकर हित साधना चाहता है । इस हित में और कुछ नहीं ‘सत्ता का हित’ होता है । चुनावी समर में रोज नए नए समीकरण बन बिगड़ रहे है, कोई साथ छोड़ रहा तो कोई दामन थाम रहा है । ऐसा किसी एक पार्टी में नहीं वरन भाजपा , कांग्रेस व जोगी कांग्रेस सभी पार्टियों में हो रहा है ,कार्यकर्ताओ व पदाधिकारियो का आना -जाना ,रूठना- मनना लगा है । कबीरधाम जिले की पंडरिया विधानसभा में भाजपा में वर्तामान विधायक को बाहरी प्रत्यासी बताने के नाम पर चिल्ल -पों और खलबली मची हुई है तो कांग्रेस में पैराशूट लैंडिंग से बेमेतरा से प्रत्यासी आयातित करने पर स्थानीय कांग्रेसी अपने भविष्य को ले कर चिंतित । जिले की राजनीति में प्रभावशाली महल को टिकट नहीं मिलने से कांग्रेस के एक धड़े में असंतोष फैला है , जो रानी के निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में सामने आ रहा है । बदले घटना क्रम में राज परिवार के महराज एवं पूर्व विधायक योगेश्वर राज सिंह ने भले ही टी एस सिंह देव के अनुरोध पर पंडरिया सीट से अपना नामांकन वापस ले कांग्रेस के प्रति समर्पण भाव दिखाने का प्रयास किया है, पर रानी कृति देवी के बगावती तेवर ने राजनैतिक दलों की चूलें हिला कर रख दी है । वे अब कवर्धा सीट से चुनावी समर में उतर चुकी है । अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर अब तक कवर्धा राज परिवार का दबदबा क्षेत्र के साथ साथ प्रदेश की राजनीती में हमेशा बरक़रार रहा । राजा धर्मराज सिंह की गौरवशाली परम्परा का निर्वहन करते राज परिवार आदिवासी परिवार से है और कवर्धा आदिवासी बाहुल्य जिला होने के कारण इनका प्रभाव भी आदिवासी समाज पर है । रामराज्य परिषद के बैनर तले प्रथम निर्वाचन में भागीदारी निभाने के बाद राज परिवार ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया तब से लेकर अब तक कांग्रेस पार्टी के लिए समर्पित रही । राज परिवार ने विगत चुनाव में कांग्रेस का दामन छोड़ने और महल की राजनीती का अंत करने से नाराज  महल समर्थकों ने मो. अकबर को हाशिये पे लाकर खड़ा कर दिया जिसका परिणाम विगत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के रूप में सामने आया था ।  5 साल कांग्रेस से महल की दूरी के बाद टिकट की आस में राजा का पुनः कांग्रेस प्रवेश और पुनः कांग्रेस की दगाबाजी से नाराज महल के राजा भले ही शांत हो गए हो पर रानी की नाराजगी आज भी बरकरार है ।यहाँ बताना लाज़मी होगा कि योगिराज के पिता स्व. महाराज विश्व राज सिंह ,माता रानी शशि प्रभा सिंह एवं स्वयं योगिराज सिंह विधायक रह चुके है । क्षेत्र में राज परिवार की गरिमा और महल से जुड़े कर्मठ कार्यकर्ताओ की लम्बी फेहरिस्त है जो कई पीढ़ियों से महल के लिए निष्ठावान सदस्य के रूप में कार्य करते रहे है परंतु बदले परिवेश और समय के चलते युवा पीढ़ी का झुकाव अन्य राजनैतिक दलों की ओर होता जा रहा है । हांलाकि पुरानी पीढ़ी और कर्मठ कार्यकर्ता आज भी महल के साथ खड़े नजर आते है ।बहरहाल रानी के मैदान में उतरने से इसका प्रभाव तो आने वाले समय में दिखेगा कि "बंद मुट्ठी लाख की खुली मुट्ठी खाक की है या खुली मुट्ठी भी लाख की है ", खैर चुनावी नतीजे जो हों लेकिन इतना तय है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि थी, है और रहेगी | इसे राजनीतिक पार्टी और प्रत्याशी समझकर चलें इसी में जन-कल्याण और तंत्र कल्याण भी है ।
 
और अंत मे 
 
लकीरें खींच रक्खी है चंद सियासत दानों ने थाली में , 
वरना फ़र्क़ ही क्या है तेरी ईद और मेरी दिवाली में ।
 
जय हो 
 

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