चांपा. उपहार लेना देना हमारी समाजिक पारिवारिक परंपरा का एक हिस्सा है .उपहार देते लेते समय देने वाले और लेने वाले के बीच भावनात्मक संबंधों का पता सहज ही लगाया जा सकता है कुछ ऐसा ही उदाहरण अक्षर साहित्य परिषद चांपा द्वारा बसंत पंचमी के पावन अवसर पर आयोजित समारोह मे देखने सुनने को मिला .
वरिष्ठ साहित्यकार महेश राठौर मलय ने जब लोगों को बताया कि आज बसंत पंचमी पर मेरे पुत्र आशीष (मीतु)ने मुझे सफेद संगमरमर से बने माता सरस्वती की मुर्ति भेंट की है ये मुर्ति जयपुर से लाई गई है. बसंत पंचमी पर पुत्र द्वारा दिए गए इस उपहार से मैं अभिभूत हूं.
महेश राठौर जी की इस बात को सुनकर उपस्थित साहित्यकारों ने उन्हें बधाई देते हुए उनके पुत्र आशीष की भावनाओं की प्रशंसा करने लगे .
बसंत पंचमी का पर्व लेखन के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए एक विशेष अनुष्ठान का पर्व होता है और ऐसे अवसर पर अपने साहित्यकार पिता को पुत्र द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा भेंट करना अपने ह्रदय के मनोभावों को विशेष रुप से प्रगट करना है.
नगर के साहित्यकारों ने महेश राठौर को इस उपहार प्राप्ति पर बधाई देते हुए मां सरस्वती की कृपा बने रहने की शुभकामनाएं दी है.
इस सुघटना से हमें "हामिद का चिमटा" नामक कहानी याद आ गई जो हमें स्कूल मे पढ़ाई जाती थी .इस कहानी मे हामिद और उसकी दादी के मनोभाव की प्रेरक बातें शामिल थी हामिद जब अपने दोस्तों के साथ मेला जाता है तब वह अपनी दादी के लिए चिमटा खरीद कर लाता है चिमटा खरीदने के पीछे हामिद का यह मनोभाव होता है कि रोटी सेंकते समय दादी का हाथ न जले.खैर..
कोई भी उपहार छोटा या बड़ा नहीं होता उपहार तो मन के कोमल भावनाओं को प्रगट करने का एक साधन मात्र होता है