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उ.प्र. सरकार ने संगम नगरी के युगों-युगों से प्रचलित पुराने नाम ‘प्रयागराज’ को बहाल कर दिया है। आजादी के बाद से सभी देशभक्त यह मांग कर रहे थे। लोगों को लगता था कि नेहरू का संबंध यहां से खास है। पर वे ठहरे परम सेक्यूलर। उन्होंने इस पर कान नहीं दिया। 

 
इसके बाद उ.प्र. में भा.ज.पा सरकारों के समय इस मांग ने जोर पकड़ा। पर कभी प्रदेश में गठबंधन सरकार होती थी, तो कभी केन्द्र में। अब दोनों जगह भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार है। अतः योगी ने निर्णय ले लिया। पर इससे सेक्यूलरों के पेट में दर्द होने लगा है। उन्हें लगता है कि यदि अभी वे चुप रहे, तो न जाने प्रदेश और देश में कितने नाम बदल दिये जाएं ? अतः इस पर कोई सर्वसम्मत नीति बननी चाहिए। 
 
असल में नाम परिवर्तन के पीछे राजनीतिक और सामाजिक कारण हैं। जब विदेशी व विधर्मी हमलावर आये, तो उन्होंने कई स्थानों के नाम बदल दिये। इसका पहला उद्देश्य तो हिन्दुओं का अपमान था। अतः प्रयाग और अयोध्या को इलाहबाद और फैजाबाद किया गया। कोशिश तो उन्होंने हरिद्वार, मथुरा, काशी और दिल्ली को बदलने की भी की; पर वह चाल विफल हो गयी। 

 
दूसरा उद्देश्य खुद को या अपने किसी पूर्वज को महिमामंडित करना था। जिस नाम के साथ ‘बाद’ लगा हो, उसकी यही कहानी है। अकबराबाद, औरंगाबाद, हैदराबाद, सिकंदराबाद, गाजियाबाद, तुगलकाबाद, रोशनाबाद, अहमदाबाद..जैसे हजारों नाम हैं। जैसे फैजाबाद अर्थात् फैज द्वारा आबाद; पर सच ये है कि ये स्थान उन्होंने आबाद नहीं बरबाद किये हैं। इसलिए ‘फैजाबाद’ को ‘फैज बरबाद’ कहना चाहिए। 
 
कुछ अति बुद्धिवादी कहते हैं कि मुस्लिम शासकों ने सैंकड़ों साल राज किया है। अतः उन्होंने नये गांव और नगर बसाये ही होंगे। उनके नाम पर प्रचलित महल, मकबरे और मस्जिदों के लिए भी यही कहा जाता है; पर वे यह नहीं बताते कि यदि सब स्मारक उन्होंने बनाये हैं, तो हिन्दू शासक क्या जंगल में रहते थे ? यदि नहीं, तो उनके महल और मंदिर कहां हैं ?

 
सच ये है कि इस्लामी हमलावर सदा हिन्दू राजाओं से या फिर आपस में ही लड़ते-मरते रहे। उन्हें नये निर्माण की फुरसत ही नहीं थी ? उनके साथ लड़ाकू लोग आये थे, वास्तुकार और कारीगर नहीं। अतः उन्होंने तलवार के बल पर पुराने नगर और गांवों के नाम बदल दिये। महल और मंदिरों में थोड़ा फेरबदल कर, उन पर आयतें आदि खुदवा कर उन्हें इस्लामी भवन बना दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार पी.एन. ओक ने इस पर विस्तार से लिखा है।
 
जब अंग्रेज आये, तो कई शब्द वे ठीक से बोल नहीं पाते थे। अतः शासक होने के कारण उनके उच्चारण के अनुरूप मैड्रास, कैलकटा, बंबई, डेली.. आदि नाम चल पड़े। अब इन्हें चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली कहते हैं। कानपुर (Cawnpore), लखनऊ (Lucknow), बनारस (Benares) आदि की वर्तनी (स्पैलिंग) भी अंग्रेजों ने बिगाड़ दी। कांग्रेस राज में नामों की धारा एक परिवार की बपौती बन गयी। अतः हर ओर गांधी, नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और सोनिया नगरों की बहार आ गयी। 

 
यहां यह पूछा जा सकता है कि आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा बदले नाम ठीक करने में ही शासन ने रुचि क्यों ली ? असल में भारत में ईसाई वोटों की संख्या बहुत कम है। उनसे सत्ता के फेरबदल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; पर मुस्लिम वोटों के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए राजनीतिक दल मुस्लिम शासकों द्वारा बदले गये नामों को नहीं छेड़ते। 
 
उ.प्र. में मायावती ने ऊधमसिंह नगर, ज्योतिबाफुले नगर, गौतमबुद्ध नगर आदि कई नये जिले बनाये; पर लोग इन्हें यू.एस. नगर, जे.पी. नगर और जी.बी. नगर ही कहते हैं। हाथरस बनाम महामाया नगर और लखनऊ के किंग जार्ज बनाम छत्रपति शाहू जी महाराज मेडिकल कॉलिज के बीच तो कई बार कुश्ती हुई। अब भा.ज.पा. सरकार ने उ.प्र. में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन’ किया है। क्योंकि 11 फरवरी, 1968 को दीनदयाल जी का शव वहां पर ही मिला था। पर खतरा ये है कि यह समय के प्रवाह में कहीं डी.डी. जंक्शन न हो जाए।
 
कई नामों के पीछे इतिहास और भाषायी गौरव जुड़ा होता हैं; पर जुबान का भी एक स्वभाव है। वह कठिन की बजाय सरल शब्द अपनाती है। इसलिए भोजपाल, जाबालिपुरम् और गुरुग्राम क्रमशः भोपाल, जबलपुर और गुड़गांव हो गये। मंगलौर (मंगलुरू), बंगलौर (बंगलुरू), मैसूर (मैसुरू), बेलगांव (बेलगावि), त्रिवेन्द्रम (तिरुवनंतपुरम्), तंजौर (तंजावूर), कालीकट (कोझीकोड), गोहाटी (गुवाहाटी), इंदौर (इंदूर), कोचीन (कोच्चि), पूना (पुणे), बड़ोदा (बड़ोदरा), पणजी (पंजिम), उड़ीसा (ओडिसा), पांडिचेरी (पुड्डुचेरी) आदि की भी यही कहानी है। अब शासन भले ही इन्हें बदल दे; पर लोग पुराने और सरल नाम ही सहजता से बोलते हैं। 
 
अतः विदेशी हमलावरों द्वारा बिगाड़े नाम हटाकर ऐतिहासिक नाम फिर प्रचलित करने चाहिए। इससे अपने इतिहास का पुनर्स्मरण भी होगा; पर सहज बोलचाल के कारण प्रचलित हो गये नाम बदलने की जिद ठीक नहीं है। 
 
-विजय कुमार

 

रायपुर. राजधानी रायपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र में विगत ३० जुलाई को गरियाबंद जिले में स्थित उदंती सीतानदी टाईगर रिजर्व के सम्बन्ध में च्च् उदंती सीतानदी टाईगर रिजर्व में १५ सालो से नहीं है कोई बाघ, उड़ीसा के बाघों को अपना बाघ होने का ढिंढोरा पिट कर वन विभाग ने उड़ा डाले १३ करोड़ च्च् शीर्षक से समाचार का प्रकाशन किया गया था  जिस पर उदंती सीतानदी टाईगर रिजर्व के उप निदेशक विवेकानंद रेड्डी ने सर्वोच्य छत्तीसगढ़ समाचार पत्र के सम्पादक व जिला संवाददाता को नोटिस भेजा है तथा उनके खिलाफ पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराया गया है  प्रकाशित समाचार में लिखा गया था की उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व का गठन २००९ में हुआ है परन्तु  इससे पहले उसका नाम उदंती अभ्यारण्य हुआ करता था  उदंती अभ्यारण्य वन भैसों के लिए बनाया गया था जहा वन भैसों का संरक्षण संवर्धन किया जाता है यहाँ १५ से २० साल पहले ही टाईगर का नामोनिशान मिट चुका है अर्थात १५ से २० साल से यहाँ कोइ भी टाईगर नहीं है  परन्तु टाईगर नहीं होने के बाद भी उदंती अभ्यारण्य को बता नहीं क्यों जबदस्ती टाईगर रिजर्व घोषित कर के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व नाम करण कर दिया गया है  जबकि वास्तविकता यह है की उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में पिछले १५ सालो से कोइ टाईगर है ही नहीं  और गत वर्ष कुल्हाड़ीघाट के जंगलो में कैमरों में जो बाघ की तस्वीरे आई थी वो उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के बाघ नहीं थे वे बाघ उड़ीसा के सोनाबेडा अभ्यारण्य के बाघ थे जो भोजन और प्रजनन की तलास में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में एकाध चक्कार लगा लेते थे जैसे की उड़ीसा के हाथी अभी इस क्षेत्र में आ जा रहे है बिलकुल वैसा ही उड़ीसा के बाघ भी कभी कभार इधर आ जाते है  और इसी दौरान उड़ीसा के बाघ की तस्वीर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में लगाए गए कैमरों में आ गयी  समाचार में लिखा है की उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर विवेकानंद रेड्डी ने भी कहा है की बाघों का कोइ निश्चित स्थान नहीं है कभी तो वे उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में रहते है तो कभी उड़ीसा के जंगलो में चले जाते है 7 स्पष्ट हो रहा है की वन विभाग के द्वारा बहुत कुछ छिपाया जा रहा है  परन्तु इस साल की गणना ने उनकी पोल खोल दिया है 7 इस साल के गणना में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में लगाए गए २०० कैमरों में से एक में भी यहां बाघ की मौजूदगी के सबूत नहीं मिले हैं  जबकि बाघ के नाम पर विभाग अब तक १४ करोड़ रुपया खर्च कर चुकी है और यह राशि कहा खर्च किया गया कोइ रिकार्ड ही नहीं है
समाचार में आगे लिखा है की  यहां पिछले साल देखे गए बाघ के जोड़े का शिकार किया जा चुका है है  पुलिस ने बाघ की खाल बेचने की फिराक में घूम रहे दो लोगों को १४ फरवरी को गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेज दिया था  आरोपियों ने सोनाबेड़ा जंगल में बाघ का शिकार करने की बात कुबूल की थी 7 २०० में से एक भी कैमरा ट्रेप में बाघ की मौजूदगी का एक भी सबूत वन विभाग के हाथ नहीं लगा है  उदंती और सीतानदी वाइल्डलाइफ सेंचुरी को मिलाकर टाइगर रिजर्व बनाए जाने से पहले सीतानदी वाइल्डलाइफ सेंचुरी में २००५ तक करीब पांच बाघ हुआ करते थे  लेकिन आज हालत ये है कि यहां के जंगल से बाघों का सफाया हो चुका है  इसलिए अब उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व को समाप्त कर देना चाहिये 7 बाघों की गणना के काम से जुड़े एनटीसीए के लोगों का कहना है कि उदंती- सीतानदी टाइगर रिजर्व में इस वर्ष एक भी बाघ कैमरे में ट्रैप नहीं हुआ है और न ही अन्य माध्यमों से इसकी मौजूदगी के पुख्ता सबूत मिले हैं। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष तक देखे गए बाघ के जोड़े का शिकार हो चुका है और आरोपियों को गरियाबंद पुलिस जेल भेज चुकी है। राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण (एनटीसीए) के दिशा-निर्देश पर देशभर में बाघों की गणना इस साल की है परन्तु उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में कोइ भी बाघ के मोजुदगी के प्रमाण नहीं मिले है जबकि उदंती और सीतानदी अभयारण्य को मिलाकर टाइगर रिजर्व बनाए जाने से पहले सीतानदी अभयारण्य में २००५ तक ४ से ५ बाघ मौजूद होने का दावा अधिकारी करते रहे है  । इसकी पुष्टि वन विभाग की वन्य प्राणी गणना में भी करता रहा  है। बाद में एक-एक कर सारे बाघों का शिकार हो गया। इसके बाद २-३ साल पहले ही ओडिशा के सीमावर्ती जंगल से बाघ के एक जोड़े ने यहां आना जाना करने की बात अधिकारियों ने कही थी  पर यह जोड़ा भी शिकारियों की भेंट चढ़ गया। कुल्हाड़ीघाट रेंज में पिछली गणना में जो बाघ के चिन्ह मिले थे वो उडीसा के बाघों के थे मिले थे जिनका शिकार हो गया है । गरियाबंद पुलिस ने शेर की खाल बेचने की फिराक में घूम रहे ग्राम कुकरार निवासी मेघनाथ नेताम और जरंडी निवासी कंवल सिंह नेताम को बीते १४ फरवरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। आरोपियों ने पुलिस पूछताछ में खाल के लिए उड़ीसा के सोनाबेड़ा जंगल में शेर का शिकार करने की बात कुबूल की थी। उपरोक्त समाचार के प्रकाशन के बाद उदंती सीतानदी टाईगर रिजर्व के उप निदेशक विवेकानंद रेड्डी ने सर्वोच्य छत्तीसगढ़ समाचार पत्र के सम्पादक व जिला संवाददाता को नोटिस भेजा है तथा उनके खिलाफ पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराया गया है जिसकी जांच एस डी ओ पी मैनपुर के कार्यालय में की जा रही है.

लखनऊ। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने पर खुशी जाहिर करते हुये फैजाबाद का नाम बदलने की मांग की है। विहिप की ओर से कहा गया है कि लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुये फैजाबाद जिले का नाम बदलकर 'श्री अयोध्या' किया जाए। विहिप प्रवक्ता शरद शर्मा ने शुक्रवार को कहा कि ‘‘योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करके संतों की मांग का सम्मान किया है। यह कदम स्वागत योग्य है, जैसे सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया है, उसी तरह फैजाबाद का नाम भी बदलकर 'श्री अयोध्या' कर देना चाहिए।' उन्होंने कहा कि 'आज देश में अनेक सड़कें, भवन, जनपद, गुलामी का बोध कराते आ रहे हैं। देश को अंग्रेज दासता से मुक्ति जरूर प्राप्त हुई है परन्तु उनके प्रतीक आज भी हर हिन्दुस्तानी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाते हैं। वर्तमान सरकारें भावनाओं को समझें और भविष्य की पीढ़ी को इन गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति दिलायें।' शर्मा ने कहा कि योगी सरकार दीपावली पर दीपोत्सव महोत्सव के दौरान साधु संतों के समक्ष नाम बदलने की घोषणा कर सकते हैं। गौरतलब है कि इस सप्ताह मंगलवार को उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने ऐतिहासिक शहर इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का प्रस्ताव किया था जिसको कैबिनेट से पास कर दिया था।

 

दशहरा की धूम के बीच सरकारी अफसर से मैंने पूछा था कि कुल्लू के दशहरे में अंर्तराष्ट्रीय क्या है। उन्होंने मुझे अंग्रेज़ी में समझाया था कि हर साल हम दूसरे देशों के सांस्कृतिक दलों को बुलाते हैं जो यहां अपने लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। लगा, यह शायद इसलिए कि इस आयोजन में ज्यादा विदेशी पर्यटक आएं। हमारी अपनी लोक संस्कृति व धरती में कम आकर्षण नहीं है। यहां तो सैंकड़ों बरस से दूसरे देशों से व्यापारी आते रहे व सांस्कृतिक कला सम्बंध भी उगते रहे। बात तो कहने, समझने की व सही प्रस्तुति की है। लगभग तीन सौ साठ बरस से मनाए जा रहे इस एतिहासिक, पारम्परिक उत्सव में अभी आन बान व शान सलामत है। दशहरे की परम्पराएं आज भी जीवंत हैं। हिमालय के बेटे हिमाचल की पहाड़ियों की गोद में बसे हर गांव का अपना देवता है। आज भी जब जब लोकउत्सव होते हैं तब तब आम जनता का अपने ईष्ट से मिलना होता है। कुल्लू की नयनाभिराम घाटी में आयोजित होने वाले कई लोकोत्सवों का सरताज है कुल्लू दशहरा। संसार व पूरे देश में दशहरा सम्पन्न हो जाने के बाद आरम्भ होता है यह लोकदेव समागम।

 

रिलिजन. धर्म ग्रंथों के अनुसार, आश्विन मास की दशमी तिथि को विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का अंत किया था। बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में ये पर्व पूरे देश में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 18 अक्टूबर, गुरुवार तो कुछ स्थानों पर 19 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। ऐसा पंचांग भेद के कारण होगा। दशमी तिथि पर दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। साथ ही इस दिन भगवान श्रीराम की पूजा तथा शस्त्र पूजन करने की भी परंपरा है।
 इस विधि से करें भगवान श्रीराम की पूजा
 दशहरे की सुबह स्नान आदि करने के बाद घर के उत्तर भाग में एक सुंदर मंडप बनाएं। उसके बीच में एक वेदी बनाएं। उसके ऊपर भगवान श्रीराम व माता सीता की प्रतिमा स्थापित करें। श्रीराम व माता सीता की पंचोपचार (गंध, चावल, फूल, धूप, दीप) से पूजन करें। इसके बाद इस मंत्र बोलें-
    मंगलार्थ महीपाल नीराजनमिदं हरे।
    संगृहाण जगन्नाथ रामचंद्र नमोस्तु ते।।
    ऊँ परिकरसहिताय श्रीसीतारामचंद्राय कर्पूरारार्तिक्यं समर्पयामि।
    इसके बाद किसी पात्र (बर्तन) में कपूर तथा घी की बत्ती (एक या पांच अथवा ग्यारह) जलाकर भगवान श्रीसीताराम की आरती करें-
    आरती कीजै श्रीरघुबर की, सत चित आनंद शिव सुंदर की।।
    दशरथ-तनय कौसिला-नंदन, सुर-मुनि-रक्षक दैत्य निकंदन,
    अनुगत-भक्त भक्त-उर-चंदन, मर्यादा-पुरुषोत्तम वरकी।।
    निर्गुन सगुन, अरूप, रूपनिधि, सकल लोक-वंदित विभिन्न विधि,
    हरण शोक-भय, दायक सब सिधि, मायारहित दिव्य नर-वरकी।।
    जानकिपति सुराधिपति जगपति, अखिल लोक पालक त्रिलोक-गति,
    विश्ववंद्य अनवद्य अमित-मति, एकमात्र गति सचारचर की।।
    शरणागत-वत्सलव्रतधारी, भक्त कल्पतरु-वर असुरारी,
    नाम लेत जग पवनकारी, वानर-सखा दीन-दुख-हरकी।।

    आरती के बाद हाथ में फूल लेकर यह मंत्र बोलें-
    नमो देवाधिदेवाय रघुनाथाय शार्गिणे।
    चिन्मयानन्तरूपाय सीताया: पतये नम:।।
    ऊँ परिकरसहिताय श्रीसीतारामचंद्राय पुष्पांजलि समर्पयामि।

     इसके बाद फूल भगवान को चढ़ा दें और यह श्लोक बोलते हुए प्रदक्षिणा करें-

    यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च।
    तानि तानि प्रणशयन्ति प्रदक्षिण पदे पदे।।

    इसके बाद भगवान श्रीराम को प्रणाम करें और कल्याण की प्रार्थना करें। इस प्रकार भगवान श्रीराम का पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
 विजयादशमी पर इस विधि से करें शस्त्र पूजन...
दशहरे पर विजया नाम की देवी की पूजा की जाती है। यह पर्व शस्त्र द्वारा देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले एवं कानून की रक्षा करने वाले अथवा शस्त्र का किसी अन्य कार्य में उपयोग करने वालें लोगों लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दिन यह सभी अपने शस्त्रों की पूजा करते है, क्योंकि यह शस्त्र ही प्राणों की रक्षा करते हैं तथा भरण पोषण का कारण भी हैं। इन्ही अस्त्रों में विजया देवी का वास मान कर इनकी पूजा की जाती है।  सबसे पहले शस्त्रों के ऊपर ऊपर जल छिड़क कर पवित्र किया जाता है फिर महाकाली स्तोत्र का पाठ कर शस्त्रों पर कुंकुम, हल्दी का तिलक लगाकर हार पुष्पों से श्रृंगार कर धूप-दीप कर मीठा भोग लगाया जाता है।इसके बाद दल का नेता कुछ देर के लिए शस्त्रों का प्रयोग करता है। इस प्रकार से पूजन कर शाम को रावण के पुतले का दहन कर विजया दशमी का पर्व मनाया जाता है।
 19 अक्टूबर के पूजन के मुहूर्त
    दोपहर - 1:13 से 1:40
    दोपहर- 2 से 3:15 तक
    शाम- 4:50 से 5:45 तक


गैजेट. चुनावों में फेसबुक के जरिए फैलने वाली फेक न्यूज पर लगाम कसने के लिए कंपनी ने 'वॉर रूम' बनाया है। फेसबुक का ये वॉर रूम कंपनी के कैलिफोर्निया हेडक्वार्टर मेनलो पार्क में स्थित है, जहां 2 दर्जन से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। फेसबुक ने गुरुवार को अपने वॉर रूम की एक झलक पेश की, जिसमें यहां के काम करने का तरीका बताया गया है।
फेसबुक के वॉर रूम को अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव (6 नवंबर 2018) और ब्राजील में होने वाले आम चुनाव (7 अक्टूबर) को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यहां पर चुनावों के दौरान फैलने वाली फेक न्यूज और अफवाहों को रोकने का काम किया जाएगा। इसके साथ ही चुनावों के दौरान होने वाली विदेशी दखलअंदाजी पर नजर रखना भी वॉर रूम के कर्मचारियों का काम है। फेसबुक के साइबर सिक्योरिटी के हेड नैथानियल ग्लिचर ने बताया कि 'चुनावों के दौरान होने बहस में किसी तरह की हेरफेर का पता लगाना ही हमारा काम है।'  फेसबुक के सिविक इंगेजमेंट के हेड समिध चक्रवर्ती ने बताया कि 'चुनावों के दौरान अक्सर ऐसी झूठी खबरें फैलती हैं कि यहां विरोध की वजह से वोटिंग रोक दी गई। हमारा काम इस तरह की झूठी खबरों को फैलने से रोकना है। हम इस तरह की कोई भी पोस्ट, जो चुनावों को प्रभावित करती हों, उन्हें वायरल होने के एक घंटे के भीतर ही हटा देंगे।'
फेसबुक के मुताबिक, ये वॉर रूम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी पर काम करता है, जो फेसबुक पर आने वाले पोस्ट की सच्चाई और यूजर्स के व्यवहार को पहचाने में मदद करती है। उन्होंने बताया कि हमारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी पहले के मुकाबले ज्यादा तेजी से फेक अकाउंट को ब्लॉक या डिसेबल करने में सक्षम है।
  समिध चक्रवर्ती ने बताया कि 'इस वॉर रूम में कंपनी के दो दर्जन से ज्यादा एक्सपर्ट काम करते हैं, जो थ्रेट इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, रिसर्च और लीगल टीम को पहचानने का काम करेगी।'  उन्होंने बताया कि 'जब सभी लोग एक साथ एक ही जगह पर होते हैं, तो हमारी टीम किसी भी खतरे को पहचानकर ज्यादा जल्दी उसका समाधान कर सकती है।' फेसबुक के मुताबिक, यहां रियल टाइम में चुनावी मुद्दों की निगरानी की जाती है, ताकि स्पैम कंटेंट को फैलने से रोका जा सके। समिध चक्रवर्ती ने बताया कि 'हमारी टीम ने एक मैसेज की पहचान की, जिसमें कहा था कि ब्राजील में हो रहे विरोध की वजह से चुनाव की तारीख को 7 अक्टूबर से बढ़ाकर 8 अक्टूबर कर दिया गया है, लेकिन ये मैसेज गलत था जिसके बाद हमने इस मैसेज को 1 घंटे के अंदर हटा दिया।'   उन्होंने बताया कि जैसे ही किसी पोस्ट या कंटेंट पर संदेह होता है, टीम उसकी पुष्टि के लिए न्यूज रिपोर्टर्स, फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट और एक्सपर्ट से करती है। फेक निकलने पर उस कंटेंट को फेसबुक से हटा दिया जाता है।
फेसबुक वॉर रूम में काम कर रहे कर्मचारियों को सिर्फ जरूरी होने पर ही अपनी सीट से उठने की इजाजत है। फेसबुक ने बताया कि वॉर रूम के कर्मचारी सिर्फ वाशरूम जाने के लिए और अपनी डेस्क पर खाना लाने के लिए ही उठ सकते हैं।  हालांकि कंपनी ने सुरक्षा कारणों की वजह से ज्यादा जानकारी तो नहीं दी, लेकिन यहां हर कर्मचारी के पास एक लैपटॉप और दो डेस्कटॉप है, जिसमें ऑनलाइन एक्टिविटी पर ध्यान रखा जाता है। इसके अलावा इस रूम में बड़ी-बड़ी स्क्रीन भी लगी हैं, जिनपर फोक्स, सीएनएन जैसे न्यूज चैनल 24X7 चलते रहते हैं।

भोपाल. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के फीडबैक, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सर्वे और संगठन की रिपोर्ट को सामने रखकर भाजपा ने प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया तेज कर दी है। अभी तक ग्वालियर संभाग से शुरू कर 160 सीटों पर चर्चा हो गई है। जल्द ही 2-3 नामों का पैनल बनाया जाएगा। साथ ही तय किया गया है कि 2013 के विधानसभा चुनावों में 20 से लेकर 50 हजार वोटों से हारे भाजपा प्रत्याशियों के नामों पर अभी कोई विचार नहीं होगा। 10 हजार से अधिक वोटों से हारे प्रत्याशी यदि जातिगत समीकरणों और सर्वे के आधार पर अभी भी वोटरों के बीच वजूद रखते हैं तो उन पर एक बार चर्चा की जाएगी।
एंटी इंकम्बेंसी झेल रहे 3-4 या इससे अधिक बार चुनाव जीतने वालों के भी टिकट बदले जा सकते हैं। गुरुवार को मुख्यमंत्री निवास पर अखिल भारतीय सह क्षेत्र प्रचारक प्रमुख अरुण जैन और क्षेत्र प्रचारक दीपक विस्पुते की मौजूदगी में शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे, प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह और संगठन महामंत्री सुहास भगत की सीटवार चर्चा हुई, जिसमें 160 सीटों पर संभावित प्रत्याशियों को लेकर चर्चा हो गई है। संघ की ओर से दिए गए फीडबैक के अाधार पर भी नामों को सूची में शामिल किया जाएगा। भाजपा की कोशिश है कि 20 तारीख से पहले सभी सीटों पर पैनल बना लिया जाए। मुख्यमंत्री शिवराज और प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह शुक्रवार को दिल्ली जाएंगे। वहां वे वरिष्ठ नेताओं से भी टिकटों पर चर्चा करेंगे।
आरएसएस ने मांगीं भोपाल की तीन सीटें : बैठक में बैरसिया, उत्तर और हुजूर सीट पर सहमति तकरीबन बन गई है। संघ की ओर से साफ कर दिया गया है कि उत्तर सीट पर इस बार हिंदुत्व का चेहरा होगा। पिछले विधानसभा चुनाव में भी बैरसिया में विष्णु खत्री और हुजूर में रामेश्वर शर्मा को संघ समर्थित मानते हुए टिकट मिला था। मध्य सीट से मौजूदा विधायक सुरेंद्रनाथ सिंह को लेकर संघ ने मुख्यमंत्री को अलग तरह का फीडबैक दिया है, जो पिछले नगर निगम चुनावों से जुड़ा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि मध्य सीट का चेहरा अंतिम दौर में तय होगा।
इन हारे मंत्रियों के नामों पर भी विचार: जतारा सीट से 233 वोटों से हारे हरिशंकर खटीक को भाजपा दोबारा लड़ाने पर विचार कर रही है। करण सिंह वर्मा भी 744 वोटों से हारे थे। इछावर से इनके नाम पर फिलहाल सहमति बनी है। सिरोंज में लक्ष्मीकांत शर्मा को लेकर पार्टी असमंजस में है। राजनगर सीट पर 8607 वोटों से हारे डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया के नाम पर चर्चा हुई, लेकिन संघ सहमत नहीं है। अजय विश्नोई जबलपुर पश्चिम सीट से दावेदारी कर रहे हैं, लेकिन पूर्व मंत्री हरेंद्र जीत सिंह बब्बू के मामले में सिर्फ संगठन सहमत है।
20 हजार से ज्यादा वोटों से हारने वालों पर नहीं हुआ विचार
इनके नाम पर नहीं होगा विचार : (20 हजार से अधिक वोटों से हारे) राव देशराज सिंह, नरेश दिवाकर, मोहन शर्मा, रतन सिंह सिलारपुर, देवेंद्र जैन, सुदामा सिंह सिंग्राम, सुरेश राजे, विश्वामित्र पाठक, राव राजकुमार सिंह यादव, रमेश भटेरे, भगत सिंह नेताम।
हारे, लेकिन नामों पर हुई चर्चा
पवई या पन्ना से बृजेंद्र प्रताप सिंह (2013 में मंत्री थे), जबलपुर पश्चिम या पाटन से अजय विश्नोई (2013 में मंत्री थे), अटेर से अरविंद सिंह भदौरिया, चित्रकूट से सुरेंद्र सिंह गहरवार, सुवासरा से राधेश्याम पाटीदार, ग्वालियर पूर्व से अनूप मिश्रा (2013 में मंत्री थे), लहार से रसाल सिंह, खरगापुर से राहुल सिंह लोधी, चितरंगी से जगन्नाथ सिंह (2013 में मंत्री थे), बमोरी से कन्हैयालाल अग्रवाल (2013 में मंत्री थे)  (नोट : ये दावेदार पिछले चुनावों में 5 से 20 हजार तक वोटों से हारे हैं। ऐसे भाजपा में 32 लोग हैं, जिनमें से सिर्फ दस पर बात हुई)
पहली सूची 28 अक्टूबर के बाद
बैठक में यह भी तय हुआ कि 230 सीटों पर की गई रायशुमारी का पहले संगठन स्तर पर अध्ययन किया जाएगा। सर्वे व संघ के फीडबैक से उसका मिलान होता है तो ठीक, अन्यथा इसमें संशोधन किया जाएगा। गुरुवार को रायशुमारी का काम हो गया है। भाजपा 28 अक्टूबर के बाद प्रत्याशी की पहली सूची जारी कर सकती है।

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डबल बेंच ने जिला न्यायालय कटनी के आदेश को निरस्त करते हुए कटनी में 20 साल पहले 9 साल की मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के आरोपी को 7 साल की सजा सुनाई है।
कटनी की जिला अदालत ने करीब 19 साल पहले आरोपित को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने अपील की थी। कोर्ट ने आरोपी को 7 साल के सश्रम कारावास तथा पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। कटनी निवासी 9 साल की बच्ची 1998 में पानी भरने गई थी, तभी आरोपी राजेश सिंह उसे 10 रुपए का लालच देकर एक सूने मकान में ले गया और दुष्कर्म करने का प्रयास किया।
इसी बीच बच्ची को आवाज देते हुए उसका पिता उस ओर आने लगा। आरोपित बच्ची का गला दबाते हुए जान से मारने की धमकी देकर भाग गया। कटनी थाना पुलिस ने आरोपित राजेश के खिलाफ धारा 376 के तहत मामला दर्ज किया था।
1999 में जिला कोर्ट ने आरोपी कर दिया था दोषमुक्त : कोर्ट ने नवम्बर 1999 में आरोपी को दोषमुक्त करार दिया था। जिसके खिलाफ सरकार ने यह अपील दायर की थी। राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता नम्रता केशरवानी ने कोर्ट को बताया कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार बच्ची के नाजुक अंग में सूजन आ गई थी। ऐसा कृत्य भी दुष्कर्म की श्रेणी में आता है। अंतिम सुनवाई के बाद बेंच ने पाया कि जिला अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट का उचित निरीक्षण नहीं किया। इसी आदेश को निरस्त कर कोर्ट ने आरोपित को दोषी ठहराया।

रायपुर. चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों और उनके दलों को अपने आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी मतदाताओं को देनी होगी। उन्हें अखबारों और न्यूज चैनलों में बकायदा विज्ञापन देना होगा। इसके लिए आयोग ने नामांकन दाखिले के दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले हलफनामे के प्रारूप-26 में संशोधन किया है।
मतदान के 48 घंटे पूर्व तक प्रसारित कराई जाएगी घोषणा
ऐसे उम्मीदवार जिनके विरूद्ध आपराधिक मामले पंजीबद्ध हैं या पूर्व में रहे हैं, उन्हें अपने विरूद्ध दर्ज प्रकरणों की जानकारी अपनी संबद्धता के राजनीतिक दल को देनी होगी। साथ ही उन्हें संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष घोषित करना होगा कि उन्होंने अपने आपराधिक प्रकरणों की सूचना अपने दल को दे दी है।
उम्मीदवारों को अपने विरूद्ध दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी अपने क्षेत्र के बहुप्रसारित समाचार पत्र में तीन अलग-अलग तिथियों में प्रकाशित कराना होगा। नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि से लेकर मतदान के दो दिन पूर्व तक इस तरह की घोषणा का प्रकाशन अनिवार्य है। उम्मीदवार को टेलीविजन चैनल पर भी तीन अलग-अलग तिथियों में आपराधिक मामलों की घोषणा प्रसारित करवानी होगी। टी.वी. चैनल पर यह घोषणा मतदान समाप्ति के 48 घंटे पूर्व तक प्रसारित करवायी जा सकती है। मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों को अपने उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा वेबसाइट पर प्रदर्शित करना होगा।  साथ ही आयोग द्वारा निर्धारित प्रारूप (सी-2) में क्षेत्र में वृहद रूप से प्रसारित समाचार पत्र में तीन अलग-अलग तिथियों में इसे प्रकाशित कराना होगा। नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि से लेकर मतदान के दो दिन पूर्व तक इस तरह की घोषणा का प्रकाशन अनिवार्य है।
टीवी पर करनी होगी आपराधिक मामलों की घोषणा
राजनीतिक दलों को टेलीविजन चैनल पर भी तीन अलग-अलग तिथियों में आपराधिक मामलों की घोषणा प्रसारित करवानी होगी। दलों को टी.व्ही. चैनल पर इस घोषणा का प्रसारण मतदान समाप्ति के 48 घंटे पहले सुनिश्चित कराना होगा। रिटर्निंग अधिकारी प्रत्याशियों को समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों में वृहद प्रचार के लिए आपराधिक मामलों की घोषणा के प्रकाशन-प्रसारण के संबंध में आयोग द्वारा निर्धारित प्रारूप (सी-3) में स्मरण पत्र जारी करेंगे। उम्मीदवार निर्वाचन व्यय लेखों के साथ ही घोषणा प्रकाशन के प्रमाण के तौर पर समाचार पत्रों की प्रतियां भी जिला निर्वाचन अधिकारी के पास जमा करेंगे।

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