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विधायक बनते ही अक्सर नेताओं के पास गाड़ी बंगला, सुख-सुविधाएं मिलने लगती हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में एक विधायक ऐसी भी हैं जो देश में सबसे कम कमाई करने वाले विधायकों की सूची में आती हैं। केराबाई मनहर को पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार उतारा था और उन्होंने कांग्रेस की दिग्गज नेता पद्मा मनहर को 15 हजार से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी थी।

 

केराबाई सारंगढ़ विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। उनका परिवार बेहद सामान्य है, विधायक के रूप में मिलने वाली तनख्वाह ही उनकी आय का साधन है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार, केराबाई की वार्षिक तनख्वाह पांच लाख 40 हजार रुपये हैं। केराबाई की वार्षिक आय राष्ट्रीय स्तर के औसत आय से भी कम है।

केराबाई के पिता शिक्षक थे, उनकी गांव में थोड़ी सी खेती है, जिससे आय नाममात्र की होती है, इसके अलावा कुछ मवेशी हैं। सारंगढ़ के ग्राम टेंगनापाली में परिवार के सदस्य रहते हैं। इस विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने केराबाई मनहर पर ही विश्वास जताया है वहीं दूसरी ओर पिछली शिकस्त को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने उनके खिलाफ उत्तरी जांगड़े को उतारा है।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में 62 नक्सलियों ने 51 हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया है। सभी नक्सलियों ने बस्तर के आईजी विवेकानंद सिन्हा और नारायणपुर के एसपी जीतेंद्र शुक्ला के सामने आत्मसमर्पण किया।

जानकारी के मुताबिक आत्मसमर्पण के बाद नक्सलियों ने कहा कि हमने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय खो दिया है, अब मुख्यधारा से जुड़कर काम करना चाहते हैं। बता दें राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों का नक्सलियों ने बहिष्कार किया है। विरोध करते हुए उन्होंने पर्चे फाड़े और बैनर लगाए।

वहीं ये भी कहा जा रहा है कि जिन दो ग्रामीणों को नक्सलियों ने बीजापुर के गंगालुर से अगवा किया था उनमें से एक की हत्या कर दी है। जबकि दूसरे ग्रामीण को मारपीट कर छोड़ दिया है। फिलहाल नक्सलियों ने ग्रामीणों के साथ ये सब किया है या नहीं, इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है।

विरोध कर भाजपा को हटाने की बात कही
नक्सलियों ने विधानसभा चुनावों का विरोध करते हुए बीजापुर के भोपालपटनम ब्लॉक में पोस्टर लगाए। पोस्टरों में उन्होंने भाजपा को हटाने की बात कही है। इसके साथ ही नक्सलियों ने राजनीतिक प्रत्याशियों के पोस्टर पर क्रॉस का निशान भी लगाया है और कहा है कि जो भी वोट मांगने आए उसे मार भगाओ।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के नामांकन के दौरान दिए गए शपथ पत्र के मुताबिक उनकी संपत्ति में करीब सवा चार करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। शिवराज द्वारा नाम निर्देशन पत्र में दिए गए आय-व्यय के ब्यौरा के अनुसार उनके पास 10 करोड़ 45 लाख 82 हजार 140 रुपए हैं। 

 

नामांकन पत्र में दी गई जानकारी के मुताबिक उनकी पत्नी साधना सिंह की संपत्ति शिवराज से दोगुनी है। साल 2013 में दिए गए चुनावी शपथपत्र के मुताबिक शिवराज के पास छह करोड़ 27 लाख 54 हजार 114 रुपए की संपत्ति थी। जिसमें इस बार सवा चार करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है। 

शिवराज की संपत्ति का ब्यौरा 

नगद राशि

शिवराज सिंह चौहान : 45 हजार

साधना सिंह : 40 हजार


बैंक एकाउंट का ब्यौरा

शिवराज सिंह चौहान

एसबीआई बैंक विदिशा- आठ लाख 36 हजार 819

एसबीआई बैंक भोपाल- पांच लाख 79 हजार 423

जिला सहकारी बैंक भोपाल- छ: लाख 10 हजार 532

साधना सिंह

एसबीआई विदिशा- नौ लाख 47 हजार 374

पीएनबी भोपाल- एक लाख 72 हजार 392


आवासीय

शिवराज सिंह चौहान : विदिशा में मकान है।

साधना सिंह : अरोरा कॉलोनी में फ्लैट है।


जमीन का ब्यौरा

शिवराज सिंह चौहान : 77 लाख रुपए

उनके पास जैत में 20 एकड़, बैस में साढ़े तीन लाख और डोलखेड़ी में ढाई एकड़ भूमि है।

साधना सिंह : तीन करोड़ 32 लाख रुपए

साधना सिंह के नाम से विदिशा में 32 एकड़ जमीन है।


वाहन

शिवराज सिंह चौहान के पास वाहन नहीं है।

साधना सिंह के नाम से डेढ़ लाख की एक एंबेसडर है।

 
अन्य

शिवराज सिंह चौहान

एक रिवाल्वर- 5500 रुपए
घरेलू सामान- दो लाख 50 हजार
 

कुल संपत्ति का ब्यौरा

शिवराज सिंह चौहान : तीन करोड़ 15 लाख 70 हजार 274 रुपए।

साधना सिंह : सात करोड़ 30 लाख 11 हजार 866 रुपए।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा के अंदर मचा संग्राम खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम बाबूलाल गौर हर हाल में चुनाव लड़ने पर अड़े नजर आ रहे हैं। भाजपा ने अभी तक उनकी दावेदारी का एलान नहीं किया है, लेकिन आज उन्होंने नामांकन फॉर्म खरीद लिया। 

 बाबूलाल गौर और उनकी बहू कृष्णा गौर ने आज भोपाल में नामांकन फॉर्म खरीदा। बाबूलाल गौर गोविंदपुरा सीट से कृष्णा को टिकट दिलाना चाहते हैं। पिछले दिनों भाजपा ने 176 उम्मीदवारों के नामों का एलान किया था लेकिन उसमें गोविंदपुरा सीट का नाम नहीं था। इस सीट को होल्ड पर रखा गया है। 


दरअसर, भाजपा के लिए पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। वह अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद चुनाव लड़ना चाहते हैं। वह अपनी बहू कृष्णा गौर को गोविंदपुरा सीट पर लड़ाना चाहते हैं। गोविंदपुरा विधानसभा सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है। यहां से 88 साल के बाबूलाल गौर दशकों तक चुने जाते रहे हैं। 

इस सीट पर कई दावेदार हैं। हालांकि भाजपा ने अभी इसके लिए किसी का नाम फाइनल नहीं किया है। गौर ने अपना पहला चुनाव निर्दलीय के तौर पर लड़ा था और वह इसी सीट से 10 बार विधायक बन चुके हैं। कुछ दिन पहले ही उन्होंने कहा था, अगर हमें टिकट नहीं मिला तो मैं और कृष्णा जी अलग-अलग सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। 

 
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी धूमकेतु की तरह चमकने वाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव को लेकर अंदरखाने में तमाम तरह की बातें चल रही हैं। कभी उनके स्वास्थ्य को लेकर सवाल खड़ा किया जाता है तो कभी उनकी याद्दाश्त पर प्रश्न चिह्न लगाया जाता है। यह स्थिति वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव से कुछ माह पूर्व उस समय से विषम हो गईं थीं जब अखिलेश यादव ने नेता जी को जर्बदस्ती समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाकर स्वयं पार्टी की कमान संभाल ली थी। मुलायम यह बात हजम नहीं कर पाये, लेकिन पुत्र मोह के कारण उनकी नाराजगी कभी खुलकर सामने नहीं आई। यह नाराजगी उस समय भी ज्यादा मुखर नहीं हो सकी, जब अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की रीढ़ समझे जाने वाले चाचा शिवपाल यादव को बाहर का रास्ता दिखाया था। इस बात को भी नहीं भुलाया जा सकता है कि 2017 के विधान सभा चुनाव के समय अखिलेश ने अपने छोटे भाई की बहू अर्पणा यादव को बहुत मुश्किल से काफी दबाव के बाद विधान सभा चुनाव लड़ने का टिकट दिया था।
 
इससे आगे बढ़कर देखा जाये तो अखिलेश ने अपर्णा को काफी दबाव के बाद टिकट जरूर दिया था, लेकिन उन्हें एक ऐसे विधान सभा क्षेत्र (कैंट विधान सभा क्षेत्र, लखनऊ) से चुनाव लड़ने का मौका दिया गया, जहां उनके सामने भाजपा की दिग्गज नेत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी चुनाव लड़ रही थीं जो तब कैंट से विधायक भी थीं, जबकि मुलायम अपनी छोटी बहू अपर्णा को समाजवादी परिवार का गढ़ समझे जाने वाले मैनपुरी, एटा, इटावा या आसपास के जिलों की किसी सीट से चुनाव लड़ाना चाहते थे। इसके बावजूद अर्पणा ने चुनावी जंग में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन अर्पणा के चुनाव प्रचार के लिये अखिलेश समय ही नहीं निकाल पाये, जिसका खामियाजा अपर्णा को हार के रूप में भुगतना पड़ा था। पारिवारिक कलह के चलते समाजवादी पार्टी को भी बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा था। कांग्रेस का साथ भी उसकी डूबती नैया को बचा नहीं पाया था। मुलायम पहले ही कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन को नकार चुके थे।
 
खैर, सबसे बड़ी बात यही थी कि बहुत कुछ लुटाने के बाद भी अखिलेश के तेवर नहीं बदले। न उन्होंने मुलायम की बातों को गंभीरता से लिया न चाचा शिवपाल के प्रति उनका रवैया नरम हुआ। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि शिवपाल ने अपनी अलग पार्टी नहीं बना ली। शिवपाल के अलग दल बनाते ही मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी के मंच पर नजर आने लगे। अखिलेश सोची−समझी रणनीति के तहत मुलायम के प्रति नरम हुए थे, उन्हें पता था कि अगर उन्होंने पिता मुलायम के प्रति अपना रवैया नहीं बदला तो वह पाला बदलकर शिवपाल के साथ जा सकते हैं। उधर, मुलायम की छोटी बहू अर्पणा यादव भी चाचा शिवपाल के साथ खड़ी दिखाई पड़ने लगी थीं। 
 
समाजवादी परिवार में चल रही उठा−पटक से मुलायम दुखी थे, लेकिन उनकी कोई सुनने को तैयार ही नहीं था। अखिलेश साफ शब्दों में तो शिवपाल गोलमोल भाषा में मुलायम की बात काट रहे थे। चाचा−भतीजे दोनों अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगे थे। वहीं मुलायम न तो पुत्र अखिलेश को छोड़ पा रहे थे और न ही भाई शिवपाल से दूरी बना पा रहे थे। मुलायम पारिवारिक मजबूरियों के बीच धृतराष्ट्र जैसे हो गये थे, जिसमें कोई एक खेमा चुनना उनके लिए आसान नहीं था। वह अखिलेश के साथ रहते हुए भी शिवपाल के साथ नजर आते उनकी पार्टी के मंच तक पर पहुंचने में मुलायम ने गुरेज नहीं किया। इसकी बानगी हाल ही में तब दिखी जब पहले तो समाजवादी पार्टी आफिस में बेटे अखिलेश के साथ सपा कार्यकर्ताओं को समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने की सीख देते दिखे तो कुछ दिनों के बाद मुलायम भाई शिवपाल के साथ मंच साझा करते दिखे। शिवपाल को जब नया सरकारी बंगला मिला तो वहां भी मुलायम खड़े नजर आये। सियासी तौर पर बंटा नजर आ रहा मुलायम सिंह का कुनबा प्रतीक यादव व अपर्णा यादव के गृह प्रवेश पर एक साथ नजर आया। गृह प्रवेश में मुलायम सिंह यादव के साथ ही अखिलेश यादव, डिंपल यादव और शिवपाल सिंह यादव खासतौर पर शामिल हुए। यह अलग बात है कि अखिलेश और शिवपाल अलग−अलग समय पर कार्यक्रम में रहे। उनका आमना−सामना नहीं हुआ।
 
यह सच है कि मुलायम ने अपने सियासी जीवन में परिवार के लोगों की सियासत तो खूब चमकाई थी, उनके बल पर परिवार के कई सदस्य सांसद और विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष व तमाम निगमों के अध्यक्ष आदि बने परंतु मुलायम ने सियासत और परिवार का कभी घालमेल नहीं किया। अपनों के साथ रहना उनकी सहज प्रवृत्ति रही है। यहां तक कि उन्होंने पार्टी छोड़ने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खां और अमर सिंह तक को वापस लेने में संकोच नहीं किया था। कभी जो दर्शन सिंह यादव उनके जानलेवा दुश्मन हुआ करते थे, वह भी बाद में मुलायम के साथ खड़े नजर आने लगे थे। अपने इसी स्वभाव के चलते कुनबे की कलह में भी वह दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य बने रहे हुए हैं। यह बात उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो यह मानकर चलते हैं कि मुलायम सिंह अब सियासत के अखाड़े के पहलवान नहीं रह गये हैं। दरअसल, मुलायम आज भी सियासी दुनिया के 'पहलवान' ही हैं। हां, परिवार के झगड़े ने जरूर उन्हें तोड़ कर रख दिया है।
 
बहरहाल, कुछ ऐसी बातें भी हैं जो यही साबित करती हैं मुलायम के लिए अखिलेश से बढ़कर कोई नहीं है। याद कीजिए 2012 से पहले का वह दौर, जब शिवपाल को ही मुलायम का उत्तराधिकारी माना जा रहा था, लेकिन सियासी दुनिया में 'चरखा दांव' लगाने में मशहूर नेताजी ने 2012 के विधान सभा चुनाव से ठीक पहले शिवपाल को अनदेखा करके अखिलेश की ताजपोशी कर दी थी। कुनबे में कलह के बीज तभी से पड़े थे। 2017 में जब पारिवारिक लड़ाई परवान पर चढ़ी तो मुलायम शिवपाल के साथ नजर तो आये लेकिन, कोई निर्णायक फैसला लेने से बचते रहे। यहां तक कि शिवपाल ने उनके साथ मिलकर सेक्युलर मोर्चा के गठन का फैसला लिया था तो भी मुलायम ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे। फिर भी भाई के लिए उनका मोह लगातार बना रहा। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से दोहराया कि शिवपाल ने मेरे और पार्टी के लिए बहुत कुछ किया है, जबकि अखिलेश का राजनीतिक भविष्य उनकी जिम्मेदारी है। अब जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि 2017 के विधान सभा चुनावों की तरह अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों में भी चाचा शिवपाल के बिना अखिलेश की राह आसन नहीं होगी। अब तो अलग पार्टी बनाकर शिवपाल पूरी तरह से आजाद भी हो गये हैं।
रायपुर। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है कि आने वाले वर्षों में देश ब्रिटिश अर्थव्यवस्था से भी बड़ी ताकतवर अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। ईरानी ने आज यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि आर्थिक विकास और आर्थिक क्रांति का सबसे बड़ा पैमाना कोई हो तो आज वैश्विक स्तर पर यह माना जाता है कि हिंदुस्तान आर्थिक रूप से और सशक्त हुआ है। आज यह भी माना जाता है कि आने वाले समय में हम लोग ब्रिटिश अर्थव्यवस्था से भी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं। यह तभी संभव हुआ है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जन कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से हम आर्थिक सशक्तीकरण और राष्ट्र नवनिर्माण की ओर बढ़ पाए हैं।
 
मंत्री ने कहा कि यह मान्यता केवल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम जैसे संस्थानों ने भी माना है कि केंद्र सरकार के माध्यम से जो योजनाएं लाई जा रही हैं, उनके चलते आर्थिक रूप से हिंदुस्तान सशक्त हो रहा है। ईरानी ने कहा कि वर्ष 2014 में जिन आर्थिक परिस्थितियों में कांग्रेस नीत यूपीए ने देश को छोड़ा था, उस दौरान कर्ज था। कई घोटाले थे। आज उससे उबरकर एक नए भारत की कल्पना के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता के आशीर्वाद से आगे बढ़ रहे हैं।
 
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर के नक्सलियों को लेकर दिए गए बयान से संबंधित सवाल के जवाब में ईरानी ने कहा कि अगर राज बब्बर जी को लगता है कि वह जो बेगुनाहों का खून बहाते हैं, जो हमारे सुरक्षाबलों को मौत के घाट उतारने का दुस्साहस करते हैं, उनमें उन्हें क्रांति दिखती है तब मुझे लगता है कांग्रेस के लिए यह शर्म की बात है। मैं चिंतित हूं कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इसका खंडन नहीं किया है। उनकी चुप्पी में ऐसे बयानों को सह मिलती है। कम से कम अपनी राजनीतिक मतभेद छोड़कर संविधान और कानून के संरक्षण के लिए राष्ट्रहित में कांग्रेस पार्टी को अपने नेता के इस बयान का खंडन करना चाहिए था।
 
गौरतलब है कि राज बब्बर ने शनिवार को रायपुर में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा था कि गोलियां और बंदूकें नक्सलवाद का हल नहीं कर सकती हैं। धमकाकर, डराकर इस समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता है। ऐसे लोगों को नहीं रोका जा सकता है जिन्होंने क्रांति की शुरूआत कर दी है। हालांकि बब्बर ने इस मुद्दे पर अपनी सफाई भी दी थी। 
 
छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा चुनाव में दो चरणों में मतदान होगा। पहले चरण में नक्सल प्रभवित बस्तर क्षेत्र के सात जिलों और राजनांदगांव जिले की 18 सीटों लिए इस महीने की 12 तारीख को तथा शेष 72 सीटों के लिए 20 तारीख को मतदान होगा।
लिलॉंगवे। उप-राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने सोमवार को मालावी के राष्ट्रपति आर्थर पीटर मुथरिका से विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। इस मौके पर भारत और मालावी ने प्रत्यर्पण, परमाणु ऊर्जा में सहयोग और राजनयिकों एवं अधिकारियों के लिए वीजा में छूट संबंधी तीन समझौतों पर दस्तखत किए। इसके अलावा, भारत ने मालावी में 18 जल परियोजनाओं के लिए 21 करोड़ डॉलर से अधिक (215.16 मिलियन) का कर्ज देने की घोषणा की। विदेश मंत्रालय में सचिव टी एस तिरुमूर्ति ने बताया कि दोनों नेताओं की वार्ता के दौरान भारत ने मालावी के रक्षा बलों के लिए विशेषीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रमों की पेशकश की।
 
उन्होंने कहा कि ग्लोबल सेंटर फॉर न्यूक्लियर एनर्जी पार्टनरशिप और मालावी के प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा एवं खनन मंत्रालय के बीच शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए परमाणु ऊर्जा में सहयोग संबंधी एक समझौते पर दस्तखत हुए। दोनों पक्षों ने प्रत्यर्पण संधि के लिए भी एक समझौते पर दस्तखत किए। इसके अलावा, राजनयिकों एवं आधिकारिक पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा छूट संबंधी भी एक समझौता हुआ। इस बीच, नायडू ने यहां ‘जयपुर फुट’ के एक शिविर का उद्घाटन किया और कई लाभार्थियों को भारत में बने ‘प्रोस्थेटिक लिंब’ (कृत्रिम पैर) बांटे। ‘इंडिया फॉर ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम के तहत इस शिविर का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम महात्मा गांधी की ओर से की गई मानवता की सेवा का सम्मान करता है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने गोमती नगर विस्तार स्थित इकाना अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का नामकरण ‘‘भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी अन्तरराष्ट्रीय इकाना क्रिकेट स्टेडियम’’ कर दिया है। आज मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने इस स्टेडियम का लोकार्पण किया। 

स्टेडियम का नाम बदलने की जानकारी प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजन नितिन रमेश गोकर्ण ने सोमवार की शाम एक बयान में दी थी। उन्होंने बताया था कि लखनऊ विकास प्राधिकरण, इकाना स्पोर्ट्स सिटी प्रा लि एवं जी सी कन्स्ट्रक्शन एवं डेवलपमेन्ट इण्डस्ट्रीज प्रा लि के मध्य हुये करार में दी गयी व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में यह निर्णय लिया गया है। आज शाम इस स्टेडियम में पहली बार भारत और वेस्टइंडीज के बीच टी-20 मुकाबला होगा। इस स्टेडियम में पहली बार कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच हो रहा है। 

 

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