ईश्वर दुबे
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Bhilai
मुंबई. वो दिन जब सरहद पार से आए आतंकियों ने मुंबई को दहला दिया था। इस हमले ने मायानगरी को ऐसे जख्म दिए, जो शायद कभी भरने वाले नहीं हैं। हमले में 164 बेकसूर लोग आतंकियों की गोली का शिकार बने, जबकि सैकड़ों घायल हुए थे। देश पर हुए इस सबसे बड़े आतंकी हमले में शामिल 10 दहशतगर्दों में से एकमात्र जिंदा बचे आतंकी अजमल कसाब को 2012 में भारत ने फांसी दे दी। देविका रोटावन (तब 9 साल 11 महीने की थी) इस हमले की सबसे कम उम्र की गवाह बनी, जिसकी पहचान पर कसाब को फांसी हुई थी। मगर अफसोस कि कुछ लोग देविका को 'कसाब की बेटी' कहकर बुलाने लगे। देविका अब 18 साल की हो चुकी है। वो IPS अफसर बनकर आतंकियों से बदला लेना चाहती है। आइए जानते हैं देविका की जुबानी इस आतंकी हमले और 10 साल बाद उसकी जिंदगी में आए बदलाव की कहानी।
देविका कहती है, उस हमले के बाद से जिंदगी मानो ठहर सी गई। हमें रहने के लिए मकान नहीं मिल रहा था। लोगों को आतंकी हमला होने का डर सताता था। जहां भी रहते, वहां मुझे 'कसाब की बेटी' कहकर पुकारा जाता था। अगर आप किसी से पूछेंगे कि मुंबई हमले वाली लड़की कहां रहती है, तो वो आपको मुझे कसाब की बेटी कहकर ही मेरे पास लेकर आएंगे।
मैं और मेरे घरवाले उस रात को कभी भुला नहीं पाएंगे। मैं अपने पापा और भाई के साथ सीएसटी स्टेशन पहुंची थी। प्लेटफॉर्म नंबर 12 पर हम अपनी ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे थे। इस बीच भाई टॉयलेट के लिए गया, तभी एकदम से फायरिंग शुरू हो गई।
मेरे पैर में गोली लग गई। तेज दर्द के कारण मैं कुछ ही देर बाद बेहोश हो गई। होश आया, तो कामा अस्पताल में खुद को पाया। मैं पापा को देखते ही रोने लगी। अस्पताल में महीनेभर तक मेरा इलाज चला। फिर मुझे जेजे अस्पताल में शिफ्ट किया गया। जहां कई सर्जरी हुई।
मेरे पापा के पास पाकिस्तान से फोन आते थे। हमें रुपए देकर बयान बदलने के लिए धमकाया जाता था। हम नहीं माने तो पूरे परिवार को जान से मारने तक धमकी दी गई। इसके बावजूद मैंने बैसाखी पर कोर्ट में कसाब के खिलाफ गवाही दी।
रिश्तेदारों ने दूरी बना ली
हालांकि, कोर्ट में गवाही देने के बाद देविका के रिश्तेदारों ने उसके भाई और पापा से दूरी बना ली। देविका ने बताया, वो हमें घर पर बुलाने से भी कतराने लगे। कहते थे आतंकियों के खिलाफ गवाही दी है, वो हमें भी जान से मार देंगे। देविका बताती है, तब हमें काफी बुरा लगता था। हमेशा यही सोचती थी कि हमने आखिर ऐसी कौन-सी गलती की है जिसकी हमें सजा मिल रही है। रिश्तेदारों के यहां अगर कोई फंक्शन भी हो रहा होता, तो हमें घर के बाहर ही रुकना पड़ता था। रिपोर्ट के मुताबिक, हमले के 4 साल बाद तक देविका को किसी भी स्कूल में एडमिशन नहीं मिला। अब 11वीं में पढ़ने वाली देविका का एकमात्र लक्ष्य IPS अफसर बनकर आतंकियों को सबक सिखाना है।
टीबी से ग्रसित हो गई देविका
देविका और उसके घरवालों की मदद को लेकर पहले सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने तमाम दावे किए, लेकिन किसी ने कोई सहायता नहीं की। साल दर साल देविका के परिवार के हालात बिगड़ते गए। उसे टीबी हो गया और वह गंभीर हालत में संघर्ष करती रही। देविका के इलाज के दौरान उसका भाई जयेश भी संक्रमित हो गया और उसका भी ऑपरेशन हुआ।
ठप्प हो गया पिता का कारोबार
देविका के पिता नटवरलाल रोटावन का दक्षिण मुंबई के कलबादेवी इलाके में ड्रायफ्रूट का बिजनेस था। अच्छा-खासा बिजनेस चल रहा था, लेकिन लोगों ने आतंकियों के डर से पहले उनके साथ कारोबार करना कम किया फिर पूरी तरह से बंद कर दिया। इस कारण ड्रायफ्रूट का बिजनेस भी ठप्प हो गया।हालांकि, हमले के बाद फेमस हुई देविका को कई पुरस्कार समारोहों में बुलाया जाने लगा। इस दौरान कई शीर्ष पुलिस अफसरों से मुलाकात के बाद उसे भारतीय पुलिस सेवा में जाने की ठान ली। लेकिन पिता नटवरलाल कहते हैं, अवार्ड से पेट नहीं भरता है। मुझे इस बात की चिंता है कि मेरी बेटी से कौन ब्याह करेगा। लोग डरते हैं कि कहीं आतंकी उनके पीछे न पड़ जाएं। इसलिए हमलोगों से सबने दूरी बना ली है।