ईश्वर दुबे
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हॉरर फिल्में और हिंदी सिनेमा का नाता काफी लंबे अरसे से चला आ रहा है। 'सौ साल बाद, वीराना और दो गज जमीन के नीचे' जैसी डरावनी फिल्मों ने सिने प्रेमियों का सामना दहशत से कराया था। लेकिन जैसे-जैसे दौर बदला खौफनाक कहानियों को सिल्वर स्क्रीन पर पेश करने का तरीका भी बदला। लेकिन हॉरर लीग में जो बदलाव निर्देशक राही अनिल बर्वे की फिल्म तुम्बाड (Tumbbad) लेकर आई, उसे कभी नहीं भुलाया सकता।
6 साल पहले सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली तुम्बाड (Tumbbad Re-Release) फिर से लौट आई है। जी हां 13 सितंबर से इस मूवी को बड़े पर्दे पर री-रिलीज किया गया है। ऐसे में हम आपको वो 5 कारण बताने जा रहे हैं, जो इसे मस्ट वॉच मूवी बनाते हैं।
पीरियड ड्रामा हॉरर फिल्म
सिनेमा जगत में बहुत कम बार ऐसा देखा जाता है कि कोई फिल्ममेकर्स पीरियड ड्रामा हॉरर फिल्म को बनाने का साहस दिखाए। जहां आज के समय में हॉरर कॉमेडी और सेपुरनेचुलर हॉरर थ्रिलर का ट्रेंड काफी बढ़ गया है। उसमें पीरियड ड्रामा हॉरर लीग का अपना अलग ही महत्व है। आजादी से पहले के प्लॉट पर तुम्बाड की कहानी को दर्शाया गया है। जिस तरह से निर्देशक ने स्टोरी की नब्ज को पकड़ा है और स्क्रीनप्ले पेश किया है, उस आधार पर एक समय पर आपको ये मूवी 1947 के दौर में ही ले जाएगी।
दमदार कहानी का करिश्मा
फिल्म में दिखाया गया है कि विनायक राव (सोहम शाह) नाम का एक शख्स अपने बेटे पांडुरंग (मोहम्मद समद) को देवी मां के सालों पुराने दबे हुए खजाने के बारे में जानकारी देता। जिसे जानकर उसके मन के अंदर उत्सुकता जाग जाती है। धरती के गहरे गर्भ गृह में खूब सारा सोना दफन है, जिसकी रक्षा के हस्तर नाम का शैतान करता है, जो एक समय में देव माना जाता था। हस्तर का देवी मां से क्या संबंध है और कैसे वह एक देव से शैतान बन गया है। इसके अलावा फिल्म में सदाशिव (रुद्रा सोनी) का किरदार भी अहम दिखाया गया है। ऐसे में वो खजाना किसे मिलता है या फिर हस्तर किसी का खात्मा करता है, कौन लालची बन जाता है। ये सब जानने के लिए आपको एक बार तुम्बाड को देखना पड़ेगा।