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उपचुनाव: क्या शिवराज के 14 गण बचा पाएंगे शिव 'राज' -अरुण पटेल Featured

विधानसभा के 28 उपचुनाव प्रचार का शोर-शराबा और मर्यादा व सामान्य शिष्टाचार को तार-तार करते आरोप-प्रत्यारोप से अटे पड़े व्यंग्यबाणों के तीर छोड़ने का सिलसिला थम गया है, क्योंकि अब प्रचार अभियान बंद हो चुका है। मतदान के लिए एक दिन शेष है। इन उपचुनावों में शिवराज सिंह चौहान सरकार के 14 मंत्रियों के भाग्य का भी फैसला 3 नवंबर को ईवीएम में बंद हो जाएगा। चुनावों में मंत्रियों की हार का भी सिलसिला रहा है और
देखने वाली बात यही होगी कि कितने मंत्री अपना पद बचा पाते हैं क्योंकि अधिकांश स्थानों पर इन्हें कड़ी टक्कर मिल रही है। पिछले दो विधानसभा चुनाव का रुझान रिकॉर्ड देखा जाए तो शिवराज सरकार के 23 मंत्रियों को जनता ने घर बैठा दिया था। 2013 के विधानसभा चुनाव में 10 और 2018 के चुनाव में 13 मंत्री विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाए। 3 नवंबर 2020 को होने वाले चुनाव में 14 मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। 11मंत्रियों की साख के साथ ही भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा भी दांव पर है क्योंकि इन मंत्रियों को सिंधिया समर्थक माना जाता है। मंत्रियों की परफारमेंस से ही यह तय होगा कि शिवराज के 14 गण उनका राज बचाने में अपना कितना योगदान देते हैं।जिन सिंधिया समर्थक मंत्रियों की साख दांव पर लगी है उनमें तुलसी सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत, प्रभु राम चौधरी, इमरती देवी, प्रद्युम्न सिंह तोमर, महेंद्र सिंह सिसोदिया, गिर्राज दंडोतिया, ओपीएस भदौरिया, सुरेश धाकड़, बृजेंद्र सिंह यादव, राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव तथा तीन मंत्री जिनकी गिनती सिंधिया समर्थकों में नहीं होती उनमें ऐदल सिंह कंसाना, बिसाहूलाल सिंह और हरदीप सिंह डंग शामिल हैं। चुनाव नतीजों से ही पता चल सकेगा कि 14 मंत्रियों में से कितने अपनी साख और सिंधिया की प्रतिष्ठा बचा पाते हैं।
कांग्रेस से भाजपा में गए 25 पूर्व विधायकों के सामने फिर से विधायक बनने के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती खुद को मिले सवा चार लाख वोटों के अंतर को पाटना है जो उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में भाजपा उम्मीदवारों से अधिक मिले थे। इस मामले में सबसे कम चुनौती उन पूर्व विधायकों के सामने हैं जो 2000 से कम मतों से जीते थे इनमें मंत्री हरदीप सिंह डंग की जीत सबसे छोटी थी और वह 350 मतों से जीते थे। उसके बाद मांधाता के नारायण पटेल 1236 और नेपानगर की सुमित्रा देवी 1256 मतों से जीती थी। सबसे बड़ी जीत दर्ज कराने वालों में डबरा से बतौर कांग्रेस उम्मीदवार इमरती देवी 57466 तथा बदनावर से राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव 41506 वोटों से जीते थे। इसी प्रकार अन्य पूर्व विधायक भी जो भारी मतों से जीते थे उनके सामने मतों के अंतर को पाटना और उसके बाद उस पर बढ़त लेना होगा तब ही उनके फिर विधायक बनने के अरमान पूरे हो सकेंगे।
बसपा वैसे तो 28 विधानसभा क्षेत्रों में ही चुनाव लड़ रही है लेकिन उसका ज्यादा फोकस ग्वालियर-चंबल संभाग की 16 सीटों पर है और वह निरंतर अपने घटते हुए जनाधार को बचाने और बढ़ाने की मशक्कत कर रही है। भले ही वह फोकस इन पर कर रही हो लेकिन 4 से लेकर 6 सीटों पर कड़ी टक्कर दे रही और इस अंचल में वह कुछ सीटों पर जीत हार के समीकरण गड़बड़ा सकती है । यही कारण है कि उसने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी। 1से लेकर 3 सीट तक में वह जीत के कगार पर है और अंतिम ओवर में कैसा प्रदर्शन करती है इस पर निर्भर करेगा वह कितनी सीट जीतती है। बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को विधान परिषद में हराने के लिए भाजपा को वोट देने की बात करने से कांग्रेस अधिक उत्साहित है और उसे भरोसा है कि जिन दलित मतदाताओं ने 2018 में कांग्रेस का साथ दिया था वह कांग्रेस के साथ हैं बल्कि अन्य दलित मतदाता जो बसपा के साथ थे इस बयान के बाद कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने का मानस बना रहे हैं। अब यह तो 10 नवंबर को ही पता चलेगा कि मायावती ने जो कहा है उसका यहां के नतीजों पर क्या असर पड़ता है। 1993 से लेकर 2018 तक ग्वालियर और चंबल संभाग में कभी ना कभी 10 क्षेत्र ऐसे हैं जहां बसपा ने जीत दर्ज कराई है और उसका फोकस इन्हीं सीटों पर ज्यादा है। उसकी चिंता का असली कारण 2018 के चुनाव में झटका लगना था। उससे उबर कर वह कम से कम 2008 के चुनाव में जो स्थिति थी उस तक पहुंचने की है। मुरैना जिले से बसपा ने अधिक उम्मीदें लगा रखी हैं। भाजपा और कांग्रेस को एक साथ घेरने के लिए बसपा अपनी नुक्कड़ सभाओं में 2 अप्रैल 2018 के दिन एट्रोसिटी एक्ट को लेकर भड़की हिंसा और दलितों पर दर्ज हुए मुकदमों को उठाते हुए आरोप लगा रही है कि कांग्रेस ने इन्हे वापस लेने का वायदा किया था लेकिन यह वायदा पूरा नहीं किया। बसपा नेताओं का कहना है कि 2018 में भाजपा सरकार के दौरान 2 अप्रैल के दिन हुए दंगों के समय अनुसूचित जाति और जनजाति के हजारों लोगों पर झूठे प्रकरण दर्ज किए गए थे। इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है जो छात्रावासों में रह रहे थे और बिना किसी जांच के आरोपी बना दिया गया। कई ऐसे छात्रों के नाम भी शामिल कर लिए गए जो घर गए हुए थे। कांग्रेस सरकार ने एक पर मुकदमा वापस नहीं लिया और अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। बसपा ने बड़ी सभाओं के स्थान पर नुक्कड़ सभा के माध्यम से दोनों मुख्य पार्टियों को घेरने की भरपूर कोशिश की है। देखने वाली बातें यही रहेंगी कि वह अपने इस लक्ष्य में कितनी सफल होती है। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी भी दिमनी में जयंत सिंह तोमर को खड़ा कर अपनी ताकत और उपस्थिति का एहसास करा रही है। इस क्षेत्र में ठाकुर मतदाता बहुतायत में हैं और कांग्रेस उम्मीदवार रविंद्र सिंह तोमर हैं। पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक और समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर का दावा है कि उनका उम्मीदवार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और इस बार पार्टी विधानसभा में अपना खाता खोलने में सफल रहेगी। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा का दावा है कि मतदाताओं ने दल बदलने वालों को सबक सिखाने का मन बना लिया है इसलिए कांग्रेस ही सभी सीटों पर जीतेगी और उसी प्रकार भाजपा नेता पंकज चतुर्वेदी का भी दावा है कि भाजपा सारी सीटें जीतने जा रही है। किस का दावा कितना वजनदार है यह मतदाताओं के जनादेश से ही पता चलेगा।

और अंत में............

चुनाव प्रचार अभियान समाप्ति के कुछ घंटे पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ग्वालियर में कहा कि उन्होंने कभी भी भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया है और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी नालायक नहीं कहा है। कमलनाथ ने कहा है कि उपचुनाव के प्रचार का समापन मैं वहीं पर करने जा रहा हूं, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी। मैंने पहले ही तय किया था कि हम हमारे प्रचार के अंतिम दिन का समापन ग्वालियर में ही करेंगे। आप सभी को पता है कि यह कहानी कौन से महल से, कौन से मकान से शुरू हुई थी? आप सबको इस कहानी को यहीं खत्म कर देश भर को संदेश देना है।

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