कानून में नक्सलवाद और आतंकवाद का जिक्र तक नहीं विपक्ष का वॉकआउट, फिर भी बहुमत से विधेयक पारित : उद्धव ठाकरे

 

क्या यह जनसुरक्षा कानून है या भाजपा सुरक्षा कवच? विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा में पारित हुए जनसुरक्षा विधेयक पर राज्य की राजनीति गरमा गई है। शिवसेना (उद्धव गुट) ने इसे एक "राजनीतिक हथियार" बताते हुए तीखा विरोध किया है और आरोप लगाया है कि यह विधेयक "भाजपा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है, न कि आम जनता के लिए।"

"पहले से हैं प्रभावी कानून, तो नया क्यों?"

शिवसेना विधायक एड. अनिल परब ने विधान परिषद में सवाल उठाया कि जब पहले से ही UAPA, MPDA जैसे चार कानून अस्तित्व में हैं, तो फिर इस नए कानून की जरूरत क्या है? उन्होंने कहा, "इस कानून का उद्देश्य आतंकवादियों से ज़्यादा राजनीतिक संगठनों पर दबाव बनाना हो सकता है।"

परब ने विधेयक में संशोधन कर इसे दोबारा सदन में लाने की मांग की। जबकि गृह राज्यमंत्री योगेश कदम ने विधान परिषद में विधेयक पेश किया और विपक्ष के वॉकआउट के बाद इसे बहुमत से पारित भी करवा लिया।

विवादित बयान से हंगामा, सदन 10 मिनट के लिए स्थगित

विधान परिषद में भाजपा विधायक प्रसाद लाड ने कहा कि "हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे ने कम्युनिस्ट विचारधारा को मारकर शिवसेना बनाई थी।" इस बयान पर विपक्ष के नेता अंबादास दानवे ने आपत्ति जताते हुए पूछा, "क्या यह कानून किसी विचारधारा के खिलाफ है?" इसी विरोध के चलते विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया और सदन की कार्यवाही 10 मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ी।

उद्धव ठाकरे का हमला: यह कानून भाजपा के लिए सुरक्षा कवच

विधान भवन परिसर में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए विधेयक की भाषा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "इस कानून में 'देशविरोधी', 'आतंकवादी', 'नक्सलवादी' जैसे शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। केवल 'कट्टर वामपंथी' संस्थाओं को निशाना बनाया गया है।" उन्होंने सवाल उठाया कि "क्या सरकार सिर्फ एक विचारधारा के विरोध में कानून ला रही है?"

उद्धव ने कहा, "यह कानून 'मीसा' और 'टाडा' जैसे दमनकारी कानूनों की तरह दुरुपयोग की आशंका से घिरा है।" उन्होंने यह भी कहा कि जब देश के गृहमंत्री स्वयं कहते हैं कि नक्सलवाद खत्म हो रहा है, तो फिर इस कानून की आवश्यकता क्या है?

भाजपा का जवाब: अन्य राज्यों में भी लागू है कानून

भाजपा का तर्क है कि यह कानून केवल महाराष्ट्र में नहीं, बल्कि तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और आंध्र प्रदेश जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी लागू है। इसके बावजूद विपक्ष इसे राजनीतिक हथियार कहकर जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा है।

निष्कर्ष: सवाल विधेयक पर नहीं, मंशा पर उठ रहे हैं

विधेयक को लेकर विवाद की जड़ इसकी परिभाषाएं और प्रयोग की आशंकाएं हैं। विपक्ष का कहना है कि यह कानून विचारधारा-विशेष के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है, जबकि सरकार इसे देशविरोधी गतिविधियों के विरुद्ध एक आवश्यक कदम बता रही है।

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