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महात्मा गांधी की तरह ही बड़ी सहजता के साथ लोगों के दिल में सीधे उतर जाते हैं मोदी Featured

मोदी अपनी राजनीति से जिस तरह देश को चौंकाते हैं, वह गांधी के अनुरूप नहीं है। गांधी चौंकाते नहीं थे, बल्कि वे धीरे से अपने कदमों के जरिए समय शैया पर पड़े इतिहास का करवट बदल देते थे। मोदी भी वैसा ही करते हैं, लेकिन अपने अंदाज से।

 

गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से हमेशा के लिए भारत लौटे थे तो उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले से पूछा था कि उन्हें क्या करना चाहिए। तब गोखले ने उन्हें पूरे देश को समझने की सलाह दी थी और गांधी की शुरू हुई थी पूरे देश की रेल यात्रा और वह भी तीसरे दर्जे की...तब रेल गाड़ियों में तीसरा दर्जा भी होता था। तीसरे दर्जे को आज के राजनेता शशि थरूर के शब्दों में कहें तो ‘केटल क्लास’ कहा जा सकता है। बहरहाल गांधी जी ने इस यात्रा के जरिए पूरे देश को समझा और इसके बाद उन्होंने कांग्रेस की राजनीति में प्रवेश लिया तो सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, पूरे देश का स्वाधीनता आंदोलन बदल गया। कांग्रेस अभिजात्य समूह की पार्टी की बजाय पूरे देश की आकांक्षाओं के साथ ही स्वाधीनता प्राप्ति का साधन बन गयी। 

सवाल यह है कि इस विषय की यहां चर्चा क्यों..इस चर्चा की वजह है गांधी के गुजरात की ही दूसरी हस्ती का राजनीतिक कौशल...जी हां, ठीक समझा इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर है। मोदी अपनी राजनीति से जिस तरह देश को चौंकाते हैं, वह गांधी के अनुरूप नहीं है। गांधी चौंकाते नहीं थे, बल्कि वे धीरे से अपने कदमों के जरिए समय शैया पर पड़े इतिहास का करवट बदल देते थे। मोदी भी वैसा ही करते हैं, लेकिन अपने अंदाज से। 13 दिसंबर के बारे में सबको इतना ही पता था कि इस दिन प्रधानमंत्री नई धज के साथ तैयार हुए ‘तीन लोकन ते न्यारी’ काशी के प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर का दुनिया के श्रद्धालुओं के समक्ष लोकार्पण करेंगे। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि अपने अंदाज में वे गंगा में त्यागी संन्यासियों के गेरूए वस्त्र में जल पात्र और सूर्य के प्रिय लाल पुष्प को लेकर उतर जाएंगे। कुछ कूढ़मगज आलोचकों की तरह आप भी मोदी की इस उत्सवकेंद्रित शैली की आलोचना कर सकते हैं। शिवसेना के सांसद संजय राऊत जैसे लोग काशी-विश्वनाथ कारीडोर की सज्जा बदलने में अहर्निश जुटे रहे मजदूरों पर मोदी के पुष्प बरसाने और उनके साथ बैठकर सादा भोजन करने को आडंबर बताते हुए आलोचना करते रहें, लेकिन हकीकत यह है कि मोदी के इन कदमों ने देश ही नहीं, दुनिया के सामने लंबी लकीर खींच दी है।

 

गांधी अपनी सहजता के साथ आम लोगों के दिलों तक सीधे उतर जाते थे। उनकी कृशकाया और उस पर लिपटी फकत धोती, पैरों में साधारण चप्पल और डंडा तब के भारतीय आम आदमी की हैसियत के मुताबिक थी। मोदी आज के दौर में गांधी की तरह हो भी नहीं सकते। वे देश के प्रधानमंत्री हैं और बदले विश्व में प्रधानमंत्री पर तमाम तरह के खतरे हैं। इसलिए सुरक्षा का बड़ा तामझाम है। इस तामझाम की चाहे लाख आलोचना हो, लेकिन जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के लिए यह तामझाम अनिवार्य बुराई जैसा ही है। लेकिन इस तामझाम के बीच से देश की कार्यपालिका का सर्वोच्च व्यक्ति मजदूरों के बीच उतर जाता है, उनके ही साथ सादा दाल-रोटी खाता है। यह देश के दिल में सीधे घुसता है। इसलिए कि देश में समानता की बात करने वाला अभिजात्य वर्ग सिर्फ बातें ही करता है, जब उसे आम आदमी से बराबरी करने का मौका हाथ लगता है तो वह गंदगी से हाथ झाड़ते हुए अपने अभिजात्यपन में लौट जाता है हाथों पर सैनिटाइजर को मलते हुए। अभिजात्य के इस आडंबर के अभ्यासी निम्न मध्यवर्गीय प्रधान भारतीय समाज के बीच जब कोई सर्वशक्तिमान व्यक्ति सीधे उतरता है और उनके साथ खाना खाता है, उनके पांव पंखारता है तो ये बातें सीधे मर्म को भेदती हैं। मर्म का भेदना ही मोदी की राजनीति की सफलता का मूल मंत्र है।

 

याद कीजिए, 26 फरवरी 2019 की तारीख.. जगह थी वाराणसी से करीब एक सौ बीस किलोमीटर दूर प्रयागराज..ठीक वाराणसी की ही तरह मोदी उस दिन भी जल में सूर्य का अभिवादन कर रहे थे। बस अंतर यह था कि वाराणसी में सिर्फ पश्चिम मुखी गंगा थी तो प्रयागराज में तीन पवित्र नदियों का संगम...अंतर यह भी था कि उस दिन मोदी के हाथ में कोई पुष्प भी नहीं था..तब वाराणसी की तरह उन्होंने गेरूआ वस्त्र नहीं, बल्कि काले वस्त्र पहने थे। उस दिन प्रयाग कुंभ की सफाई व्यवस्था में लगे महत्तर समाज के लोगों के मोदी ने पांव पंखारे थे। याद कीजिए, उस दिन की मोदी की गंभीर मुद्रा को...इन पंक्तियों के लेखक ने तब यह दृश्य देखकर कुछ परिचितों और परिवारीजनों से कह दिया था कि जल्द ही कुछ खास घटित होने वाला है..संगम के जल में सूर्य को अर्घ्य देते मोदी का मुखमंडल संकेत दे रहा था, लेकिन आध्यात्मिकता की सुदीर्घ परंपरावाले देश के लोगों ने नहीं समझा।

विपक्ष को तो खैर आलोचना करनी ही थी और सदा की तरह वह आलोचनरत था ही। लेकिन उसी रात पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय वायुसेना ने एयर स्ट्राइक करके दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति को बदल दिया था। मोदी ने तब भी चौंकाया था, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने वाराणसी में चौंकाया है। गांधी ने रेल गाड़ी के तीसरे दर्जे की अहर्निश यात्रा के बाद देश के मिजाज को समझा था। मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक के तौर पर शुरू किए अपने राजनीतिक जीवन के साथ ही लंबे संघर्ष में देश को समझा और यह समझ ही है कि वे काशी विश्वनाथ के पास की बजबजाती गलियों को चमकदार बना देते हैं। बाबा विश्वनाथ का मंदिर चमका देते हैं। राजनीति की पारंपरिक धारा को धत्ता बताते हुए वे अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास कर देते हैं। अपनी जिद्दी छवि को तोड़ते हुए ठीक गुरु नानक जयंती के दिन 19 नवंबर को उन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर देते हैं, जिन्हें वे अब भी खराब नहीं मानते। मोदी के इन कदमों के देखिए, हर बार उन्होंने देश को चौंकाया है।

 

वाराणसी में देर रात स्टेशन पर निकल जाना और उसके जरिए सीधे आम लोगों से संवाद करना हो, कभी मेट्रो में उतर कर बच्चे को दुलारना हो, कभी सेल्फी के लिए नौजवानों को प्रोत्साहित करना हो, मोदी की ये सभी शैलियां चौंकाऊ है। अभी हाल की एक यात्रा के दौरान तो पारंपरिक ढंग से उनके घर से हवाई अड्डे तक की सड़क पर रोक नहीं लगाई गई और प्रधानमंत्री का काफिला आम ट्रैफिक के बीच सरपट गुजरता रहा। दुनिया को पता तक नहीं चला कि अभिजात्य में जीने वाले देश का प्रधानमंत्री उनकी ही तरह उनके बीच से गुजर रहा है।

 

दरअसल मोदी ने जो अपनी शैली विकसित की है, उसकी मीमांसा करने की बजाय उनकी आलोचना पथ के राही इस चौंकाऊपन को समझने की कोशिश भी नहीं करते, सिर्फ मीन-मेख निकालते रहते हैं। दिलचस्प यह है कि जो इहलौकिक आस्थाओं का मजाक उड़ाते हैं, जो आस्थाओं की वैज्ञानिकता के आधार पर खारिज करते हैं, उन्हें भी मोदी का गंगा में नहाना आस्था का मजाक लगने लगता है। दरअसल आलोचक हर बार नकारात्मकता के साथ मोदी विरोधी नैरेटिव का वितान रचते रहते हैं। सोशल मीडिया का विशाल मंच इसमें सहयोगी की भूमिका निभाता है। विरोधीगण सोचते हैं कि सोशल मीडिया के जरिए अपने आलोचन रथ के जरिए देश को मोदी के खिलाफ भड़का देंगे। लेकिन हो उलटा रहा है। 2014 के बाद हुए चुनावों में भाजपा सिर्फ दस प्रतिशत चुनाव ही हारी है। यह बात खुद भाजपा विरोधी प्रशांत किशोर भी स्वीकार कर चुके हैं। और आलोचनातंत्र के सहारे मोदी को पटखनी देने की कोशिश में जुटा मोदी विरोधी पत्रकारीय खेमा और राजनीति लगातार मुंह की खा रही है।

 

सच मानिए तो अपने कदमों से मोदी राजनेता की मर्यादा से आगे निकलते हुए स्टेट्मैन की तरफ बढ़ चले हैं। कांग्रेस शासित एक राज्य के एक राज्यमंत्री जब ऑफ द रिकॉर्ड कहते हैं कि अब कांग्रेस नेतृत्व को भी मान लेना चाहिए कि मोदी ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी है, जिसे कांग्रेस के लिए छोटी करना आसान नहीं है, तब उनका मकसद दरअसल भारतीय राजनीति और मानस की सच्चाई को ही स्वीकार करना होता है। लेकिन हकीकत में कम से कम विपक्षी मोर्चे पर ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है।

 

तो क्या मान लिया जाये कि अपने कदमों से प्रधानमंत्री मोदी ने फिलहाल भारतीय राजनीति को विकल्पहीनता की ओर धकेल दिया है, जनता का मिल रहा प्यार और विपक्षी राजनीति की स्तरहीन आलोचना तो कम से कम इसी सोच को ही साबित कर रही है।

 

-उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं)

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