ईश्वर दुबे
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अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने मुख्यमंत्री बनाया लेकिन वह तो प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखते हैं इसलिए दिल्ली की जनता से मिली जिम्मेदारियों को निभाने के प्रति उनका पूरा ध्यान ही नहीं है। केजरीवाल से अगर आपको मिलना है तो दिल्ली की बजाय गुजरात या हिमाचल प्रदेश जाकर मिलना होगा क्योंकि आजकल वह इन्हीं राज्यों में ज्यादा पाये जाते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि केजरीवाल ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपने पास एक भी विभाग नहीं रखा है। उन्होंने अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया को 18 विभागों की जिम्मेदारी सौंपी हुई है। केजरीवाल ने यह सब इसलिए किया है ताकि उनका ध्यान आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करने में लगा रहे और दिल्ली की सफलता का ढिंढोरा पीट-पीट कर वह अपने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को मजबूत कर सकें। आप एक बात पर ध्यान दीजिये। केजरीवाल दिल्ली की शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सफलता का जो ढिंढोरा पीट रहे हैं यदि उसे सही मान भी लिया जाये तो शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया हैं और स्वास्थ्य मंत्री हाल तक सत्येंद्र जैन रहे हैं। केजरीवाल ने खुद किस विभाग का कायापलट किया है इसके बारे में भी उन्हें जनता को बताना चाहिए। साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य यदि दिल्ली सरकार की बड़ी उपलब्धियां हैं तो राज्य सरकार को यह भी बताना चाहिए कि उसके कार्यकाल में कितने स्कूल खोले गये और कितने नये अस्पताल बनाये गये। दिल्ली में शराब की दुकानों को बढ़ाने में रुचि दिखाने वाली केजरीवाल सरकार को यह भी बताना चाहिए कि उसने कितने नये शिक्षकों की भर्ती कर शिक्षा व्यवस्था को सुधारा है?
बहरहाल, भाजपा की ओर से हाल ही में ऐलान कर दिया गया है कि 2024 में भी उनकी तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ही होंगे। नरेंद्र मोदी के मुकाबले में कौन होगा यह कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दल अभी तक तय नहीं कर पाये हैं लेकिन आम आदमी पार्टी के दो बड़े नेताओं ने साफ कर दिया है कि 2024 का लोकसभा चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल होगा। पहले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने ऐलान किया कि 2024 का चुनाव भाजपा बनाम आम आदमी पार्टी होगा तो उसके दूसरे दिन दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दावा कर दिया कि 2024 का लोकसभा चुनाव मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बनाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल को डराने के लिए सभी हथकंडे आजमा रहे हैं इसलिए सीबीआई के छापे पड़वाये जा रहे हैं। जहां तक केजरीवाल और मोदी की भिड़ंत की बात है तो केजरीवाल 2014 में भी प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देख रहे थे और इसीलिए उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद छोड़कर वाराणसी संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ा था। परिणाम क्या रहा यह सभी जानते हैं। यही नहीं, 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट डालने के लिए दिल्ली के लोगों से अपील करते हुए केजरीवाल ने कहा था कि इस छोटे चुनाव में हमें वोट दे दीजिये बड़े चुनाव में आप मोदी जी को वोट दे देना। वैसे कई बार लगता है कि 2014 और 2019 में राहुल गांधी से मुकाबला कर चुके मोदी भी इस बार चाहते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनावों में केजरीवाल से मुकाबला किया जाये। इसलिए वह कांग्रेस के परिवारवाद के साथ ही आम आदमी पार्टी की ओर से बढ़ावा दिये जा रहे रेवड़ी कल्चर के खिलाफ लगातार बोल रहे हैं।
दूसरी ओर, जहां केजरीवाल खुद को प्रधानमंत्री की रेस में मान रहे हैं तो दूसरे नेता भी अपने नाम को आगे करवाने में लग गये हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभरने की चर्चा के बीच, उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने कहा है कि अगर अन्य दल चाहें तो नीतीश कुमार एक विकल्प हो सकते हैं। जद (यू) अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार का मुख्य ध्यान 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा से मुकाबला करने के लिए विपक्षी दलों को एकजुट करने पर है। यानि नीतीश अब पटना की बजाय दिल्ली पर पूरा ध्यान लगाना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि अगले सप्ताह बिहार विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के बाद विभिन्न दलों के नेताओं से मिलने के लिए नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजधानी का दौरा करेंगे और उसके बाद ऐसे दौरे करते रहेंगे। यानि जिस तरह से प्रधानमंत्री पद की रेस में शामिल ममता बनर्जी लगातार दिल्ली का दौरा कर आगे की संभावनाएं टटोल रहीं हैं उसी तरह अब नीतीश कुमार भी दिल्ली आ आकर अपने लिए संभावनाएं टटोलेंगे। लेकिन इन नेताओं को हम 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे एन. चंद्रबाबू नायडू का हश्र याद दिलाना चाहेंगे। उस समय चंद्रबाबू नायडू को लग रहा था कि वह देशभर में विपक्ष को जोड़ने का माद्दा रखते हैं इसलिए अपने राज्य के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की चिंता नहीं करते हुए वह कभी दिल्ली, कभी मुंबई, कभी कोलकाता, कभी लखनऊ तो कभी अन्य किसी स्थान के चक्कर लगाते रहे और विपक्षी नेताओं के साथ फोटो खिंचवाते रहे। इस व्यस्तता के बीच कब जनता ने चंद्रबाबू की जमीन पूरी तरह खिसका दी इसका पता उन्हें चुनाव परिणाम आने के बाद लगा।
बहरहाल, प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की बढ़ती संख्या की बात है तो ऐसे बहुत से नेता हैं जो इस रेस में शामिल हैं। कुछ ने अपने नाम सार्वजनिक कर दिये हैं तो कुछ मौके की तलाश में हैं। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस रेस में शामिल सभी विपक्षी नेताओं में एकता की कमी है। पीएम पद की रेस में शामिल नेताओं के नाम पर गौर करें तो एक के नाम पर दूसरा राजी नहीं होगा तो दूसरे के नाम पर तीसरा राजी नहीं होगा। साथ ही यह नेता देश के लिए विजन पेश करने की बजाय सिर्फ इस बात के गुणा-भाग में लगे हैं कि किस राज्य में भाजपा की कितनी सीट कम हो सकती है और फिर कैसे किसको मिलाकर अपना नंबर लग सकता है। ऐसे में देश को तय करना होगा कि वापस खिचड़ी सरकारों के दौर में जाना है या फिर 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ काम कर रहे लोगों के साथ खड़ा रहना है।
-नीरज कुमार दुबे