ईश्वर दुबे
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Bhilai
लंदन। नासा के लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटेर (एलआरओ) स्पेसक्राफ्ट के मिनियेचर रेडियो फ्रीक्वेंसी इंस्ट्रूमेंट ने पाया है कि चांद पर लोहे और टाइटेनियम का भंडार है। अर्थ ऐंड प्लैनटरी साइंस लेटर्स में छपी इस खोज से जुड़े जॉन हॉपकिन्स अप्लाइड फिजिक्स लैबरेटरी से मिनि-आरएफ के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर वेस पैटरसन का कहना है कि रेडार इंस्ट्रूमेंट ने हमारे सबसे करीबी पड़ोसी की उतपत्ति और कॉम्पलेक्सिटी की नई जानकारी देकर हमें हैरान कर दिया है।
दरअसल, अभी तक माना जाता रहा है कि मंगल ग्रह के आकार के प्रोटोप्लैनेट या प्राग्गह और एकदम नई पृथ्वी के बीच टक्कर से चांद की उतपत्ति हुई थी। इसलिए चांद का ज्यादातर केमिकल कंपोजिशन पृथ्वी से मिलता जुलता है। इसकी गहराई में जाकर देखें तो पाएंगे कि चांद का अंदरूनी हिस्सा एक समान नहीं है। चांद की सतह के उजाले हिस्से जिन्हें लूनर हाईलैंड्स कहा जाता है, वहां चट्टानों में पृथ्वी की तरह कुछ मात्रा में मेटल मिलते हैं। यदि यह माना जाए कि टक्कर के वक्त पृथ्वी की परतें अच्छी तरह से कोर, मैंटल और क्रस्ट में विकसित हो चुकी थीं तो यह समझा जा सकता है कि चांद के अंदर ज्यादा मेटल नहीं रहा होगा। हालांकि, जब चांद के अंधेरे वाले हिस्से मरिया को देखा जाता है तो पता चलता है कि वहां कई जगहों पर पृथ्वी से भी ज्यादा मेटल है। इस अंतर की वजह से वैज्ञानिक हमेशा से उलझन में रहे हैं और इस बात पर शोध जारी रहा कि आखिर दूसरे पराग्ग्रह का चांद पर कितना असर रहा होगा।
मिनि-आरएफ ने खोजा एक पैटर्न:
मिनि-आरएफ को अब एक पैटर्न मिला है, जिससे इस सवाल का जवाब मिल सकता है। इसकी मदद से रिसर्चर्स को चांद के उत्तरी गोलार्ध के क्रेटर्स की मिट्टी में एक इलेक्ट्रकिल प्रॉपर्टी मिली है। इस इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टी को डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टेंट कहते हैं। किसी मटीरियल और स्पेस के वैक्यूम में इलेक्ट्रिक फील्ड ट्रांसमिट करने की रेलेटिव अबिलिटी यानी सापेक्ष क्षमता को डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टेंट कहते हैं। इसकी मदद से गड्ढों में छिपी बर्फ को खोजा जा रहा था। हालांकि, टीम को पता चला कि गड्ढे के आकार के साथ-साथ यह क्षमता भी बढ़ती जा रही थी। यानी जितने बड़े क्रेटर, उतना ज्यादा डाइइलेक्ट्रिक कॉन्स्टेंट।