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मोदी सरकार के कार्यकाल के साढ़े चार साल लगभग पूरे हो चुके हैं। वैसे तो किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए हिसाब देने का वक्त 5वें साल में होता है। लेकिन, सच यही है कि, चौथे साल के रिकॉर्ड से ही करीब साल भर बाद होने वाले चुनावों में जनता फैसला लेगी, और, यह भी सही है कि, पांचवें साल में सरकार अगले 5 साल के लिए चुनाव की नजर से माहौल बनाना शुरू कर देती है। भाजपा अपनी सरकार को जबरदस्त कामयाब बताते हुए कई उपलब्धियां गिना रही है। ऐसा करते वक्त उसका सबसे ज्यादा जोर आर्थिक मोर्चे पर दिख रहा है। इसके लिए वह कई आंकड़े भी पेश कर रही है। लेकिन मुद्रा योजना के तहत बांटे गए लोन को छोड़कर रोजगार के मामले में खुद मोदी सरकार ही ज्यादा दावे नहीं कर रही है।
 
यह भी कहा जा सकता है कि अपनी तमाम उपलब्धियों के बीच बड़ी सफाई से मोदी सरकार रोजगार सृजन के ‘कमजोर आंकड़ों’ को ढक रही है। एक अनुमान के अनुसार देश के करीब 34 करोड़ युवा बेहतर रोजगार की तलाश में हैं। जिस देश में रेलवे की 90 हजार नौकरियों के लिए दो करोड़ 37 लाख अभ्यर्थियों के प्रार्थना पत्र आते हों उस देश के आर्थिक विकास के दावों की असलियत को समझने में किसी सामान्य नागरिक को भी ज्यादा दिमाग लड़ाना नहीं पड़ेगा। अर्थशास्त्रियों का भी दावा है कि रोजगार के मामले में मोदी सरकार को कामयाब नहीं कहा जा सकता। 
 
खासकर तब जब आगरा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए 22 नवंबर, 2013 को नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि यदि भाजपा की सरकार बनी तो हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा। उन्होंने मनमोहन सरकार पर ‘जॉबलेस ग्रोथ’ का आरोप जड़ा था। 2014 में यूपीए सरकार की हार के पीछे अहम कारणों में बढ़ती बेरोजगारी शुमार थी। लेकिन सच्चाई ठीक इसके उलट नजर आ रही है। बीते चार साल के दौरान मोदी सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी के आंकड़ों में सुधार का इंतजार जारी रहा। सरकार प्रॉविडेंट फंड के आंकड़े के जरिये साबित करना चाहती थी कि सितंबर 2017 और फरवरी 2018 के बीच ही 31 लाख नई नौकरियां पैदा की गई हैं, लेकिन सरकार के इस दलील लोगों को सहमत नहीं कर पाई। 
 
जब त्रिपुरा के मुख्यमन्त्री यह कहते हैं कि किसी स्नातक युवक को गाय पालकर उसका दूध बेचकर कुछ कमाना चाहिए, न कि नौकरी की तलाश करने में समय गंवाना चाहिए, तो वह अनजाने में ही इस सत्य को उजागर कर देता है कि सरकार तो खुद नौकरियां कम कर रही है। पूरे देश में सभी राज्यों में कम से कम पचास लाख से अधिक नौकरियों को जाम कर दिया गया है। इनमें महाराष्ट्र का नम्बर सबसे ऊपर है। यदि सभी राज्यों का ब्यौरा दिया जाए तो मध्य प्रदेश ऐसा दूसरा राज्य है जिसमें पिछले 15 साल में सरकारी नौकरी के नाम पर पूरी युवा पीढ़ी को जमकर दिग्भ्रमित किया गया है। उत्तर प्रदेश में तो रोडवेज से लेकर बिजली के दफ्तरों में भर्ती इस तरह बन्द है जैसे किसी बर्फ की दुकान पर गर्मी पड़ने से वह पानी हो जाती है। 
 
इस स्थिति की तरफ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बहुत ही संजीदगी के साथ अपने अन्तिम कार्यकाल वर्ष में बेंगलुरु विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह को सम्बोधित करते हुए चेताया था। उन्होंने कहा था कि यदि हमने जनसांख्यिकी लाभ (डैमोग्रेफिक डिवीडेंड) को समय रहते सही दिशा में नहीं लगाया तो यह बहुत बड़ी देनदारी या बोझ (लाइबिलिटी) बन जाएगा। प्रणब दा का आशय यही था कि 65 प्रतिशत युवा जनसंख्या वाले देश की इस पीढ़ी को रोजगार के व्यापक साधन सुलभ कराने की कोशिशें पूरी मुस्तैदी के साथ शुरू की जानी चाहिएं मगर हम तो पकौड़े बेच कर रोजगार पाने के गुर बांट रहे हैं और अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और ऐसे आंकड़े पेश करने से बाज नहीं आ रहे हैं जो किसी जासूसी उपन्यास का हिस्सा नजर आते हों। बेरोजगारी के इस विस्फोट को रोकने का कोई जादुई तरीका निश्चित रूप से नहीं हो सकता है।
 
एक तरफ मोदी सरकार देश में रोजगार बढ़ने का दावा कर रही है और दूसरी तरफ देश में बेरोजगारी की दर बढ़ती जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली निजी एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश में पिछले एक साल में बेरोजगारी दर 70 प्रतिशत बढ़ चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2018 में देश की बेरोजगारी दर 5.67 प्रतिशत हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार 2014 में देश में बेरोजगारी की दर 3.41 फीसदी थी जो अगले तीन सालों में बढ़ते हुए 3.49, 3.51 और 3.52 फीसदी हो गई। वैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी अच्छी अर्थव्यवस्था में चार फीसदी से ज्यादा बेरोजगारी ठीक नहीं होती है।
 
श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भी अप्रैल 2018 आते-आते भारत दुनिया में सर्वाधिक बेरोजगारों वाला देश बन चुका है। हाल ही में आए आरबीआई के कंज्यूमर कांफिडेंस सर्वे के मुताबिक, 31.5 प्रतिशत लोगों को लगता है कि रोजगार के मौके बेहतर हुए हैं जबकि 24.4 प्रतिशत को लगता है कि इस मोर्चे पर कोई सुधार नहीं हुआ है और 44.1 प्रतिशत लोगों का मानना है कि रोजगार के मौके खत्म हुए हैं। हालांकि भारत में रोजगार पर किसी विश्वस्त और विस्तृत सर्वेक्षण के अभाव में इसकी सही स्थिति का आकलन कर पाना हमेशा से एक मुश्किल काम रहा है। लेकिन कुछ महीने पहले आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीते चार सालों में केवल 36 लाख सालाना की दर से ही रोजगार पैदा हो पाए हैं। वहीं लेबर ब्यूरो के अनुसार अर्थव्यवस्था में आठ फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले संगठित क्षेत्र में 2014 से 2016 के बीच तीन लाख से भी कम की औसत से रोजगार पैदा हुए हैं। हालांकि संगठित क्षेत्र के आकार और प्रधानमंत्री के वादे को देखते हुए इससे हर साल करीब 16 लाख रोजगार पैदा करने की जरूरत थी।
 
सरकार अकेले ही सारे रोजगार पैदा नहीं कर सकती। इसलिए सरकार उद्यमिता की भावना सुनिश्चित करने के लिए भी काम कर रहे हैं। स्टैंड अप, स्टार्ट अप इंडिया और मुद्रा योजनाओं को इसी दिशा में उठाए गए कदम के रूप में देखा जा सकता है। स्टार्ट अप इंडिया के अच्छे नतीजे देखने को मिल रहे हैं। आज हमारे देश में आइडिया और इनोवेशन की कोई कमी नहीं है। मौजूद समय में भारत दुनिया के टॉप पांच देशों की सूची में दूसरे नंबर पर है जहां करीब 9,500 से लेकर 10,500 स्टार्टअप कंपनियां मौजूद हैं और इस नए कैंपेन की घोषणा से सरकार आने वाले वर्षों र्में 30,000 स्टार्टअप्स बनाने का लक्ष्य तय कर रही है। उदाहरण के तौर पर ‘ओला कैब’ जो चार साल पुरानी स्टार्टअप कंपनी है पर यह आज छोटे-बड़े शहरों में कैब की सुविधा प्रदान कर रही है और इसने अब तक करीब दो लाख ड्राइवरों को रोजगार दिया है। विशेषज्ञों की राय है कि स्टैंड अप इंडिया जैसी पहल को अभी महज एक साल ही हुआ है इसलिये इसका आकलन फिलहाल जल्दबाजी होगा लेकिन इससे स्टार्टअप इकोसिस्टम को प्रोत्साहन जरूर मिला है।
 
यह तस्वीर का एक रूख है। रोजगार के मसले पर विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर मुद्रा में है। विपक्ष का आरोप है कि मेक इन इंडिया से लेकर डिजिटल इंडिया सिर्फ योजनाओं का नाम भर रहा, जमीन पर कुछ देखने को नहीं मिला। लेकिन मेक इन इंडिया का बेहतर परिणाम समझने के लिए इस आंकड़ों को जरूर जानना चाहिए। जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई थी तो, भारत में दो मोबाइल बनाने की कम्पनी थीं, आज देश में 120 मोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग इकाईयां लगी हुई हैं। अभी हाल ही में दुनिया की बड़ी मोबाइल निर्माता कंपनी सैमसंग ने उत्तर प्रदेश में विश्व की सबसे बड़ी उत्पादन इकाई की स्थापना की घोषणा की है। वहीं यूपी ने इंवेस्टर्स समिट का सफल आयोजन कर नयी आशा का संचार किया है।
 
रोजगार के मोर्चे पर चौतरफा वार झेल रही मोदी सरकार अब स्वरोजगार पाए लोगों का आंकड़ा भी रोजगार पाए लोगों की सूची में शामिल करने पर विचार कर रही है। ऐसा करने के पीछे सरकार की होशियारी देखिए कि इससे अगर ऐसा होता है तो पिछले चार साल में नौकरी पाने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक इजाफा हो सकता है। इसके लिए केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए ऋण लेकर स्वरोजगार करने वालों का आंकड़ा जोड़ने पर विचार किया जा रहा है। असल में श्रम ब्यूरो जो रोजगार पर आंकड़े जारी करता है, श्रम मंत्रालय के अधीन काम करता है। माना जा रहा है कि अगले साल यानी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार श्रम ब्यूरो के आंकड़ों को लोगों के सामने रखकर अपनी पीठ थपथपाएगी।
 
जानकारों के मुताबिक बेरोजगारी दूर करने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले सरकारी नौकरियों पर पड़े तालों को खोला जाए। आर्थिक मोर्चे पर तमाम अहम फैसलों व उपलब्धियों के बावजूद रोजगार के आंकड़े इस बात की चुगली करते हैं कि बीते चार सालों में कुल मिलाकर भी दो करोड़ रोजगार सृजित नहीं हो सके हैं। यही वजह है कि आलोचकों का मानना है कि केंद्र सरकार यदि दोबारा सत्ता में आना चाहती है तो उसे रोजगार बढ़ाने के लिए जल्द ही कुछ ठोस उपाय करने होंगे और ऐसा न हुआ तो नाराज युवा केंद्र की सत्ता में उसकी वापसी पर ग्रहण लगा सकते हैं।
 
-आशीष वशिष्ठ

नयी दिल्ली। भाजपा के पूर्व नेता और विचारक के एन गोविंदाचार्य ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि 1993 के कानून में सरकार अध्यादेश के द्वारा संशोधन करके राम जन्मभूमि परिसर की पूरी जमीन का अधिग्रहण करे जिससे अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण हो सके। पत्र में गोविंदाचार्य ने कहा है कि "राम जन्मभूमि की 2.77 एकड़ जमीन समेत पूरे परिसर की 67 एकड़ भूमि का स्वामित्व 1993 से केंद्र सरकार के पास है। केंद्र ने इसके लिए कानून बनाया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 के फैसले में मान्यता भी दे दी थी। भूमि के मिल्कियत विवाद में सरकार को भूमि अधिग्रहण का पूरा अधिकार है।"

गोविंदाचार्य ने कहा है कि "तत्कालीन नरसिंहा राव सरकार द्वारा बनाए गए उपरोक्त कानून में भूमि के इस्तेमाल पर लगाई गई पाबंदियों को भी उच्चतम न्यायालय ने सही ठहराया था। इसी वजह से मंदिर निर्माण में संवैधानिक अड़चन आ रही है।" उन्होंने मांग की है कि 1993 के कानून में सरकार अध्यादेश के द्वारा संशोधन करके राम जन्मभूमि परिसर की पूरी जमीन का अधिग्रहण करे जिससे रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण हो सके। भाजपा के पूर्व नेता ने सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति के रिकॉर्ड समय में निर्माण के लिए देशवासियों की ओर से प्रधानमंत्री का आभार जताते हुए कहा कि "इसी तेजी के साथ अयोध्या में श्री राम मंदिर जन्म भूमि पर मंदिर का निर्माण भी हो जाए तो जनता द्वारा आपके लिए दिया गया ऐतिहासिक जनादेश सार्थक होगा।" 
 
गोविंदाचार्य ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 2011 में लगाई गई रोक और इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू नहीं होने का उल्लेख करते हुए सरकार से इस मामले में औपचारिक पक्षकार बनकर पूरा पक्ष प्रस्तुत करने की मांग की है। गोविंदाचार्य ने कहा है कि सिविल प्रोसिजर कोड कानून के तहत जमीन की मिल्कियत के मुकदमे में भू स्वामी का पक्षकार होना जरूरी है तो फिर इस मुकदमे में केंद्र सरकार पार्टी बनकर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त क्यों नहीं करती।गोविंदाचार्य ने कहा है कि राम की ऐतिहासिकता को अदालतों ने माना है और वर्तमान मामला सिर्फ भूमि की मिल्कियत का है। गर्भगृह के समीप स्थानों की पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में रामलला के प्राचीन मंदिर के अनेक अवशेष और प्रमाण मिले हैं। 

कोलकाता। कांग्रेस सांसद शशि थरुर ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए उन्हें ‘‘एक सफेद घोड़े पर हाथ में तलवार लेकर बैठा हीरो’’ करार दिया।गत रविवार को थरूर ने बेंगलुरु साहित्य महोत्सव में दावा किया था कि एक आरएसएस नेता ने मोदी की तुलना ‘शिवलिंग पर बैठे बिच्छू’ से की थी। थरूर के इस बयान पर विवाद हो गया था।मोदी पर की गई थरूर की कथित ‘बिच्छू’ वाली टिप्पणी को लेकर उनके खिलाफ शनिवार को दिल्ली की एक अदालत में आपराधिक मानहानि का मामला दायर किया गया।थरुर ने एक बार फिर मोदी पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘‘एक सफेद घोड़े पर हाथ में तलवार लेकर बैठा हीरो’’ करार दिया जो कहता है कि ‘‘मैं सारे जवाब जानता हूं।’’ 

कांग्रेस सांसद ने एक औद्योगिक संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहा, ‘‘मोदी एक व्यक्ति की सरकार हैं और हर कोई उनके इशारे पर नाच रहा है।’’ उन्होंने कहा कि भारत में अभी इतिहास का ‘‘सबसे केंद्रीकृत प्रधानमंत्री कार्यालय’’ है।थरूर ने कहा, ‘‘हर फैसला पीएमओ करता है। हर फाइल मंजूरी के लिए पीएमओ भेजी जाती है।’’ अगले लोकसभा चुनावों के मुद्दे पर थरूर ने कहा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के बीच चुनाव से पहले और चुनाव के बाद गठबंधन होंगे, लेकिन ‘‘हो सकता है’’ कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद का ‘‘चेहरा नहीं हों।’’ कांग्रेस नेता ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव अहम है, जिसमें भाजपा को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलने वाला।
 
उन्होंने कहा कि कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर फैसला सामूहिक रूप से होगा और ‘‘हो सकता है कि वह (राहुल गांधी) नहीं हों।’’ थरूर ने कहा, ‘‘भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में बहुत वरिष्ठ नेता हैं। हमारे पास प्रणब मुखर्जी जैसे लोग थे। पी.चिदंबरम एवं अन्य हैं, जिनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है।’’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए राहुल गांधी नेता के तौर पर सर्वमान्य हैं और इस पर कोई सवाल नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘यदि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच निष्पक्ष चुनाव हो तो राहुल गांधी स्पष्ट तौर पर जीतेंगे।’’ मोदी सरकार की आलोचना जारी रखते हुए थरूर ने कहा कि एक अत्यंत-केंद्रीकृत और अक्षम सरकार देश चला रही है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ भी सकारात्मक नहीं है।
 
उन्होंने नोटबंदी, रुपए के कमजोर होने, सांप्रदायिकता, गोरक्षकों की हिंसा, भीड़ हत्या जैसी घटनाओं के लिए भी मोदी सरकार की आलोचना की। थरूर ने एक अन्य कार्यक्रम में कहा कि मूर्तियां स्थापित करना और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाना केंद्र की मोदी सरकार की ‘‘नाकामियों’’ से लोगों का ध्यान हटाने की चाल है।उन्होंने कहा, ‘‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे ध्यान भटकाने वाले हैं। मैं भारत के लोगों से अपील करूंगा कि वे ध्यान भटकाने वाले मुद्दों से दूर रहें और भारतीयों की जिंदगी और वास्तविकताओं पर ध्यान दें। वास्तविकता यह है कि भारतीय आम आदमी पिछले साढ़े चार साल से परेशान है।’’ 

जयपुर। लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (राजग) के घटक के रुप में लड़ना चाहती है और उसने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में 15 सीटों पर दावेदारी की है। प्रदेश लोजपा अध्यक्ष सूरज कुमार बुराहड़िया ने गुरूवार को संवाददाताओं से कहा कि उनकी पार्टी राजग के घटक के रुप में भाजपा के साथ गठबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती है। लोजपा पदाधिकारी हाल ही में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन सैनी से मिले थे और 15 सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी उतारने की मांग की थी।

उन्होंने बताया कि 15 सीटों की पार्टी की मांग पर भाजपा से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है लेकिन सैनी ने केन्द्रीय नेतृत्व का हवाला देते हुए उन्हें आश्वस्त किया है। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के लिये पार्टी अलवर ग्रामीण, उदयपुरवाटी, झुंझुनूं, वैर, मालपुरा, निवाई, टोंक हिंडौन सहित प्रदेश की 15 सीटों पर फोकस कर रही है। इस संबंध में उन्होंने लोजपा प्रमुख एवं केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत करने का आग्रह किया है और संभवतया दीपावली से पहले कोई निर्णय हो जायेगा।

बुराहडिया ने कहा कि यदि भाजपा के साथ सहमति नहीं बनती है तो लोजपा राजस्थान में सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से अपने प्रत्याशी उतारेगी। आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी ने पूरी तरह कमर कस ली है। उन्होंने बताया कि लोक जनशक्ति के सुप्रीमों व केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को संसद में पुनः अध्यादेश के माध्यम से लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उसके सार्थक परिणाम चुनाव में देखने को मिलेंगे। दलित सेना के प्रदेशाध्यक्ष महेन्द्र कुमार ओझा ने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के लोग हमेशा से ही चुनावों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे है।

इंदौर। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के "धार्मिक अवतार" को लेकर लोकसभा में भाजपा के मुख्य सचेतक अनुराग ठाकुर ने शनिवार को निशाना साधा। चुनावी दौरे पर यहां आये ठाकुर ने संवाददाताओं से कहा, "राहुल धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति होने का ढोंग कर रहे हैं। कांग्रेस को पिछले 70 साल में कभी जनेऊ याद नहीं आया। लेकिन अब कांग्रेस अध्यक्ष मतदाताओं को ठगने के लिये अपना जनेऊ दिखा रहे हैं।" 
 
उन्होंने कहा, "कांग्रेस पहले हिंदू आतंकवाद और भगवा आतंकवाद की बात करती थी। लेकिन अब राहुल लगातार मंदिरों के चक्कर काट रहे हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि जो हिंदू हित की बात करेगा, वह भारत पर राज करेगा। लेकिन कांग्रेस हिन्दू हितों को लेकर दिखावा कर रही है।" 
 
गौरतलब है कि प्रदेश के चुनावी दौरों में राहुल धार्मिक वेश-भूषा में अलग-अलग मंदिरों में दर्शन-पूजन कर रहे हैं। पिछली बार वह 29 अक्टूबर को उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव की पूजा करते नजर आये थे। ठाकुर ने एक सवाल पर कहा, "विजय माल्या, मेहुल चोकसी और नीरव मोदी के बारे में राहुल सीना ठोक कर कहते हैं कि ये लोग भारतीय बैंकों से हजारों करोड़ रुपये के कर्ज लेकर देश से भाग गये। लेकिन ये उद्योगपति पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के राज में कांग्रेस के करीबी थे। तब इन्हें यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल के आशीर्वाद से ही ये कर्ज दिये गये थे।" 
 
हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से लोकसभा सांसद ने तंज कसते हुए कहा, "राहुल इतने चकराये रहते हैं कि उन्हें एक भी आंकड़ा ठीक से याद नहीं रहता।" ठाकुर ने दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच चुनावी टिकट वितरण को लेकर मतभेद की खबरों की ओर इशारा करते हुए मध्यप्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल के भीतर भारी गुटबाजी का आरोप भी लगाया। 
उन्होंने कहा, "सूबे में कांग्रेस राजा-महाराजा की लड़ाई में अब तक उलझी है। वह मुख्यमंत्री पद का चुनावी चेहरा तक तय नहीं कर सकी है। कांग्रेस के बड़े नेता पार्टी के अंदर ही अंदर एक-दूसरे पर बम फोड़ रहे हैं।" सूबे की 230 सीटों पर 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां भाजपा लगातार चौथी बार सत्ता में आने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।

 

भोपाल। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने शनिवार को आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के शासन काल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के ग्राफ में 700 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। तिवारी ने पत्रकार वार्ता में कहा कि शिवराज सिंह चौहान सरकार के 2004 से 2016 तक के काल में मध्यप्रदेश में महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के मामलों में 755 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2004 में महिला अपहरण के 584 मामले दर्ज हुए थे जबकि वर्ष 2016 में इनकी संख्या बढ़कर 4994 हो गई है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे तिवारी ने आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश में महिलाओं और नाबालिग लड़कियों से बलात्कार के मामले 259 प्रतिशत बढ़ गये हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 में नाबालिग बालिकाओं से बलात्कार के 710 मामले दर्ज हुए थे, वहीं वर्ष 2016 में यह बढ़कर 2479 हो गये। तिवारी ने दावा किया कि कुल मिलाकर भाजपा शासन काल में मध्यप्रदेश में अपराध बढ़े हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा कि एक रिपोर्ट के अनुसार कामकाजी महिलाओं के लिये मध्यप्रदेश देश का सबसे असुरक्षित राज्य है। राज्य में बढ़ते अपराध इसकी प्रगति में बाधक हैं। तिवारी ने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के 13 साल के शासन काल में 30,000 लोगों की हत्या हुई, 46,000 बलात्कार के मामले दर्ज हुए तथा प्रदेश में 2.25 लाख गंभीर अपराध हुए। जबकि दूसरी ओर राज्य में दोषियों को सजा दिलाने की दर काफी कम है। गत वर्ष के अंत में प्रदेश में 79 प्रतिशत मामले लंबित थे।

तिवारी ने आरोप लगाया कि भाजपा शासित मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में स्पर्धा चल रही है कि कहां अपराध अधिक होते हैं। अपराधों के मामले में देश में पहले दो स्थान इन्ही भाजपा शासित राज्यों के नाम पर दर्ज हैं। प्रदेश भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने आरोप लगाया कि बाहरी नेताओं द्वारा मध्य प्रदेश की छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह शासन काल में मध्यप्रदेश दलितों और आदिवासी महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के मामले में अव्वल था तथा प्रदेश में नक्सल और डकैत समस्या अपने चरम पर थी। भाजपा का शासन आने के बाद प्रदेश में संगठित अपराधों का अंत हुआ तथा प्रदेश में नक्सल और डकैत समस्या समाप्त कर दी गई है।

देहरादून। योग गुरु रामदेव ने अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने की शनिवार को कड़ी वकालत की और कहा कि यदि उच्चतम न्यायालय मामले में जल्द फैसला नहीं देता तो संसद में कानून लाया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने गत 29 अक्टूबर को अयोध्या भूमि विवाद मामले में तत्काल सुनवाई किए जाने से इनकार कर दिया था। इसने कहा था कि एक ‘‘उचित पीठ’’ जनवरी में फैसला करेगी कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामले में कब सुनवाई की जाए।

इसके बाद विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण की मांग तेज होने लगी है।रामदेव ने पतंजलि योग पीठ में दो दिवसीय सम्मेलन से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘‘यदि मामले में शीर्ष अदालत जल्द फैसला नहीं देती है तो लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च संस्थान है और कानून लाने में कुछ भी गलत नहीं है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनेगा तो और क्या बनेगा।

नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्टाइल का खादी 'कुर्ता-जैकेट' युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। खादी ग्रामोद्योग की खादी की सात दुकानों से रोजाना 1,400 कुर्ता-जैकेट बिक रहे हैं। खादी इंडिया ने प्रधानमंत्री के जन्मदिवस पर 17 सितंबर को कनॉट प्लेस स्थित अपने स्टोर में 'मोदी जैकेट' और 'मोदी कुर्ता' की एक श्रृंखला पेश की थी।

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के चेयरमैन वी के सक्सेना ने पीटीआई-भाषा से कहा कि हमारी 'मोदी कुर्ता-जैकेट' श्रृंखला को धीरे-धीरे देश भर के और भी दुकानों में पेश करने की योजना है। कनॉट प्लेस स्थित दुकान की अक्टूबर 2018 में कुल बिक्री रिकॉर्ड 14.76 करोड़ रुपये रही। यह पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 34.71 प्रतिशत अधिक है। 
 
सक्सेना ने कहा, "खादी इंडिया के दिल्ली, कोलकाता, जयपुर, जोधपुर, भोपाल, मुंबई और एर्नाकुलम में हर केंद्र पर 'मोदी कुर्ता-जैकेट' के रोजाना दो सौ पीस बिक रहे हैं।" उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खादी को अपनाने के आह्वान के चलते स्वदेशी कपड़ों को लेकर जागरूकता बढ़ी है। इससे लोगों खासकर युवाओं में इसकी लोकप्रियता बढ़ी है।
हमारा देश प्रतिमाओं के दीवानों की धरती है। हाल ही में देश की एकता को पुनः समाहित करने के लिए लगभग तेईस सौ करोड़ रुपए खर्च कर विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया गया। एक और विशाल प्रतिमा मुंबई के समंदर में निकट भविष्य में प्रस्तुत होने वाली है। प्रतिमा, प्रतिमान शब्द का ही एक रूप है। प्रतिमान का अर्थ परछाई, प्रतिमा, प्रतिमूर्ति, चित्र भी है। ‘वह वस्तु या रचना जिसे आदर्श या मानक मानकर उसके अनुरूप और वस्तुएँ बनाई जाएं’। हमारा देश व समाज प्रतिमा पूजक भी है और व्यक्ति पूजक भी। प्रतिमा का मुक़ाबला आदमी नहीं कर सकता हां वह नए मानक गढ़ सकता है। हमारे यहां वह प्रतिमा से बड़ा, महत्वपूर्ण, महान, महंगा नहीं हो सकता।
 
प्रतिमाओं को बनाने में तकनीक का बारीकी से ध्यान रखा जाता है। वह तेज़ चलने वाली हवाएँ झेल सकती है, भूकंप का सामना कर सकती है, बाढ़ में खड़ी रह सकती है। इनके सामने आम आदमी की क्या औकात। उसे तो स्वतन्त्रता के सात दशक बाद भी जीवन की आधारभूत सुविधाएं जुटाने के लिए जूझना पड़ता है। खैर यहाँ बात इन्सानों की नहीं हो रही।
 
हमारे यहां ज़्यादातर प्रतिमाएं राजनीतिक व धार्मिक आधार पर लगाई जाती हैं। यह दिलचस्प है कि दुनिया में सबसे अधिक मूर्तियां महात्मा बुद्ध और बाबा अंबेडकर की हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमाएं दुनिया के 71 से अधिक देशों में हैं। राजनीतिक दलों द्वारा अपनी अवसरवादी व स्वार्थी सोच के आधार पर पार्क बनाने और उसमें मूर्तियां स्थापित करने का अपना इतिहास है। इनमें देश के पैसे का खूब सदुपयोग होता है। मूर्तियां तोड़ने व कालिख पोतने के कितने ही किस्से हैं जिनमें नए किस्से जुड़ते जाते हैं। यह किस्से न्यायालयों के आँगन में बरसों पढ़े जाते हैं। वैसे देखने में आया है कि आम तौर पर प्रतिमाएं श्रद्धा, भक्ति, ईमानदारी के साथ साथ उत्कृष्ट सामग्री से बनाई जाती हैं और बनते बनते ढह जाने वाले पुलों जैसी नहीं होतीं।
 
यह भी सत्य है कि लगभग सभी प्रतिमाओं की देख रेख का अच्छा रिकार्ड नहीं है। गांधीजी की मूर्ति लगभग साल भर पूरी तरह से उपेक्षित रहती है। उनका जन्मदिन आने से पहले ही प्रशासन या गांधी प्रेमियों में उनके बुत को साफ कर रंग रोगन करने या उनका चश्मा ठीक करवाने का विचार जन्म लेता है। कितनी ही प्रतिमाएँ तो स्थापित होने के बाद वस्तुतः विस्थापित कर दी जाती हैं। देश के कोने-कोने में नई प्रतिमाएं स्थापित होती रहती हैं इस बहाने रोजगार ज़रूर मिलता रहता है।
 
बीबीसी ने लिखा है कि इतनी बड़ी प्रतिमा पर धन खर्च करने की बजाय सरकार को यह पैसा राज्य के किसानों के कल्याण के लिए लगाना चाहिए था। गरीब परिवार यहाँ भूखे पेट जिंदगी गुज़ार रहे हैं। बीबीसी इस बात को नहीं समझती कि हमारे यहाँ महापुरुषों को याद करना, उनकी विश्व स्तरीय प्रतिमाएं बनाना, उनकी याद में ख़र्चीले आयोजन करना राष्ट्रभक्ति का एक अहम हिस्सा है। क्या राष्ट्रभक्ति और राजनीति एक ही वस्तु होती है। किसी भी देश में अपनी मातृभूमि के लिए अथक काम करने वालों की कमी नहीं होती, सैंकड़ों लोग राष्ट्र व समाज के लिए निस्वार्थ बिना किसी लालच, द्वेष या मान्यता के निरंतर जुटे रहते हैं। क्या प्रतिमा स्थापित होने से ही देश के स्वाभिमान व गौरव के बारे में दुनिया को पता चलता है। क्या सभी की वस्तुस्थिति से दूसरे सब परिचित नहीं है। कोई देश अपनी लाख शेख़ी बखार ले दूसरे देश भी तो समझने की बुद्धि रखते हैं।

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में तमाम राजनीतिक दल जीत के लिए दिन रात एक कर रहे हैं। ऐसे में बसपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दावा किया है कि राज्य में इस बार उनकी पार्टी अपने 34 साल के इतिहास का सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए कम से कम 32 सीटें जीतेगी और सत्ता की चाबी बसपा के पास रहेगी। मध्यप्रदेश बसपा अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने ‘भाषा’ के साथ बातचीत में राज्य में 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत न मिलने की भविष्यवाणी के साथ ही अपनी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा, ‘‘हम कम से कम 32 सीटों पर जीत दर्ज करेंगे और सत्ता की चाबी बसपा के पास रहेगी। कुल मिलाकर 75 सीटों पर हमारी स्थिति पहले से बहुत अच्छी है।’’ 

उन्होंने कहा, ‘‘वर्ष 2003 में बसपा ने राज्य विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीती थीं, 2008 में सात और 2013 में चार सीटें जीती थीं। इस बार प्रदेश में 15 साल से सत्ता पर काबित भाजपा के खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर एवं दलित एकता के चलते हम अच्छी जीत की स्थिति में हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘लोकतंत्र में एक सीट लेने वाला निर्दलीय भी कभी-कभी मुख्यमंत्री बन जाता है। मैं तो कम से कम 32 सीटों पर बसपा की जीत की उम्मीद के साथ आपको यह बता रहा हूं। हम चाहते हैं कि मध्यप्रदेश की सत्ता की धुरी बहनजी :बसपा सुप्रीमो मायावती: के आजू-बाजू रहे, लेकिन यह तय है कि खंडित जनादेश आने पर हम भाजपा को समर्थन नहीं करेंगे।’’ 
 
उन्होंने बताया, ‘‘पिछले चुनाव में प्रदेश के पांच जिलों मुरैना, रीवा, सतना, दतिया एवं ग्वालियर में बसपा का दबदबा था। इस बार भी इन जिलों की कुछ सीटों से हम जीतेंगे। इसके अलावा छतरपुर, पन्ना, शिवपुरी, श्योपुर, दमोह, कटनी, बालाघाट एवं सिंगरौली जिलों में भी पार्टी का खाता खुलने की पूरी उम्मीद है।’’ वर्ष 2008 के राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत 8.97 प्रतिशत रहा था, जो 2013 में करीब ढाई प्रतिशत गिरकर 6.29 प्रतिशत रह गया। अहिरवार ने इस बार पार्टी को 10 प्रतिशत से अधिक वोट मिलने का दावा किया। 
 
इसकी वजह स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया, ‘‘फिलहाल माहौल अलग है। दलित वर्ग अपने अधिकारों के प्रति पहले से ज्यादा जागरूक है और अपनी स्थिति बेहतर बनाने के लिए वह बसपा पर भरोसा करेंगे। राज्य में पिछले वर्ष के किसान आंदोलन के खिलाफ भाजपा सरकार ने जो कदम उठाए थे, उसकी वजह से किसान भी इस सरकार के खिलाफ हैं।’’ 
 
प्रदेश में जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर का दावा करते हुए अहिरवार ने कहा कि पिछले 13 साल से राज्य के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान और भाजपा सरकार की हालत खराब है। चौहान दो सीटों से चुनाव लड़ने वाले हैं। चौहान जिस बुधनी विधानसभा सीट से जीतते हैं, वहां वह मतदाताओं की नाराजगी के चलते चुनाव सभा तक नहीं कर पा रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि हम पहली बार मध्य प्रदेश में चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ना ही पार्टी का इतिहास रहा है।

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