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श्रीनगर में शुक्रवार को प्रशासन ने सभी हायर सेकेंडरी स्कूल सहित कॉलेज बंद रखने के आदेश दिए हैं। कश्मीर विश्वविद्यालय में भी शिक्षण कार्य ठप रहेगा। बुधवार और गुरुवार को सुरक्षाबलों ने आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाकर कुल आठ आतंकी मार गिराए। जिसमें फतेहकदल में लश्कर के टॉप कमांडर मेहराजुद्दीन बांगरू समेत तीन आतंकियों को बुधवार को, वहीं गुरुवार सुबह पुलवामा में सुरक्षा बलों ने तहरीक ए मुजाहिदीन संगठन के आतंकवादी अहमद भट्ट को मार गिराया।

 

उधर देर रात उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले के बोनियार जंगल क्षेत्र में सेना ने घुसपैठ की कोशिश को नाकाम किया। सेना के अनुसार इस दौरान हुई मुठभेड़ के दौरान चार आतंकियों को ढेर कर दिया गया है, लेकिन फिलहाल किसी का शव बरामद नहीं किया जा सका है।   

ऐसे में जुमे की नमाज के बाद हिंसा भड़कने की आशंका में प्रशासन ने एहतियातन स्कूल-कॉलेज को बंद रखने का फैसला किया है।

आतंकी के मारे जाने पर कश्मीर विवि में प्रदर्शन
दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा में बी फार्मेसी के छात्र से आतंकी बने शौकत के मारे जाने के विरोध में कश्मीर विश्वविद्यालय के छात्रों ने वीरवार को प्रदर्शन किया। उन्होंने सर सैय्यद गेट तक मार्च निकाला और जनाजा पढ़ा। बी फार्मेसी विभाग के बाहर श्रद्धांजलि भी दी। ज्ञात हो कि दो अक्तूबर को ही शौकत तहरीक-उल-मुजाहिदीन में शामिल हुआ था।

छत्तीसगढ़ में वसूली के नाम से कुख्यात बदमाश को दून पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। बदमाश दो दिन पहले ही यहां दून में छुपने आया था। आरोप है कि वह लोगों को पहले मोटे ब्याज पर कर्जा देता था और फिर डरा धमकाकर वसूली करता था। आरोपी को ट्रांजिट रिमांड पर छत्तीसगढ़ पुलिस अपने साथ ले गई है। 

 दून पुलिस के मुताबिक सोमवार को छत्तीसगढ़ की विलासपुर पुलिस ने वसूली के दून में मौजूद होने की सूचना दी थी। इस पर छत्तीसगढ़ के कुछ पुलिसकर्मी भी देहरादून पहुंचे, जिन्होंने दून पुलिस के साथ उसकी तलाश की। पता चला कि बदमाश कोतवाली क्षेत्र के एक होटल में ठहरा हुआ है। पुलिस ने होटल से वसूली को गिरफ्तार कर लिया।

वसूली का पूरा नाम बबला उर्फ अमित सिंह ठाकुर निवासी पारिजात एक्सटेंशन नेहरू नगर बिलासपुर है। पूछताछ में उसने बताया कि वह लोगों को मोटे ब्याज पर कर्ज देता है और बाद में डरा धमकाकर कर्ज वसूलता है। कर्ज वसूलने के लिए वह कई लोगों से मारपीट और जानलेवा हमले भी करा चुका है। उसके खिलाफ छत्तीसगढ़ कर्जा अधिनियम, जमीन की धोखाधड़ी समेत कई धाराओं में करीब सात मुकदमे दर्ज हैं।

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिला में नक्सलियों ने बैनर और पोस्टर के जरिये चुनाव बहिष्कार करने का एलान किया है। इससे पहले भी नक्सल प्रभावित जिला बस्तर में भी माओवादियों ने ग्रामीणों को चुनाव बहिष्कार की घोषणा की थी। यहीं नहीं मतदान में शामिल होने वाले ग्रामीणों को जान से मारने की धमकी तक दी थी।

 

कांकेर जिला के पखांजुर क्षेत्र के बरदा मार्ग पर नक्सलियों ने बैनर लगाया है और पर्चे फेंके हैं। इनमें विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करने को कहा गया है। नक्सलियों ने फेंके पर्चों में लिखा है कि भाजपा को मार भगाओ और जनताना सरकार को मजबूत बनाओं और इसका विस्तार करो। 

वैसे जब जब चुनाव नजदीक आता है नक्सली इस तरह से पर्चे फेंकते रहते हैं। कुछ दिनों पहले बस्तर जिला में ग्रामीणों ने बताया था कि नक्सलियों ने फरमान जारी किया है कि अगर किसी आदिवासी मतदाता के हाथ में चुनावी स्याही लगी मिलेगी तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। 

बता दें कि छत्तीसगढ़ में पहले चरण में 12 नवंबर को चुनाव होंगे। वहीं दूसरे चरण में 20 नवंबर को मतदान कराए जाएंगे। जिसमें बस्तर की 12 सीटों पर पहले चरण में 12 नवंबर को मतदान होना है। 

छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित बस्तर के लोग विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना चाहते हैं। लेकिन नक्सलियों की धमकी के बाद चुनाव में लगाई जाने वाली स्याही नहीं लगवाना चाहते। वोटर जागरूकता अभियान के दौरान बस्तर के लोगों ने बीजापुर और सुकमा कलेक्टर को इस बारे में बताया था। 

अब कांकेर जिला में नक्सलियों की चुनाव बहिष्कार घोषणा के बाद निर्वाचन आयोग के लिए प्रथम चरण का चुनाव में सतर्कता बरतनी पड़ेगी। 

वोटिंग के बाद नक्सलियों का खौफ 

नक्सली मतदान के बाद गांव-गांव में घूमकर ग्रामीणों के हाथ देखते हैं। अगर किसी की अंगुली पर स्याही के निशान पाए गए तो उसे परेशान किया जाता है। चुनाव में मतदान करने पर हत्या तक करने के मामले सामने आए हैं। इसलिए ग्रामीण मतदान में हिस्सा नहीं लेते। 

बीते चुनावों में बस्तर के अंदरूनी जिले सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर में 100 से अधिक ऐसे बूथ सामने आए थे, जहां एक फीसदी से कम मतदान हुआ। 

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष अजीत जोगी इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे। वह स्टार प्रचारक के रूप में सक्रिय रहेंगे। इस चुनाव में जोगी की पार्टी, बसपा और सीपीआई के बीच गठबंधन हुआ है। अजीत जोगी सभी 90 सीटों पर चुनाव प्रचार करेंगे। उनकी व्यस्तता के मद्देनजर फैसला लिया गया है कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे ताकि प्रचार के काम में पूरा ध्यान लगा सकें।

हयात ने बताया कि इस विषय पर पिछले कुछ दिनों से महागठबंधन के कार्यकर्ता, महागठबंधन के पदाधिकारियों के बीच इस बात को उठा रहे थे कि मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी को पहले चरण में बस्तर की सीटों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है और इसी कारणवश इस संबंध में तत्काल फैसला लेने की आवश्यकता है।
90 सीटों पर सघन प्रचार करेंगे जोगी
उन्होंने बताया कि इस विषय पर गठबंधन के सभी वरिष्ठ नेताओं एवं पदाधिकारियों के बीच आज चर्चा हुई और यह निर्णय किया गया कि महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी अजीत जोगी को कहीं से भी चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा बल्कि 90 सीटों में सघन प्रचार कराया जाएगा।
महागठबंधन के इस निर्णय का कारण बताते हुए महागठबंधन के नेताओं ने कहा कि अगर जेसीसीजे अकेले 90 सीटों पर चुनाव लड़ती तो अजीत जोगी ख़ुद चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र थे। लेकिन महागठबंधन होने के वजह से उनके दौरों, सभा और प्रचार कार्यक्रमों की संख्या दुगनी हो गयी है और इसलिए अब उनका समय सभी 90 विधानसभाओं में प्रमुखता से बंटना चाहिए।
हयात ने बताया कि अगर जोगी किसी एक सीट से लड़ेंगे तो उनका अधिक समय उस अकेली सीट में प्रचार करने में व्यतीत होगा जिससे महागठबंधन को बस्तर और अन्य स्थानों पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी कारणवश, महागठबंधन के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने यह निर्णय किया है कि मुख़्यमंत्री पद के प्रत्याशी अजीत जोगी को किसी भी सीट से चुनाव न लड़ाया जाए।

जोगी ने कहा, महागठबंधन के निर्णय के अनुसार ही चलूंगा 

महागठबंधन के इस फैसले पर अजीत जोगी ने कहा कि महागठबंधन के निर्णय के अनुसार ही वह चलेंगे। महागठबंधन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों और उनकी सभी 90 सीटों पर सघन आवश्यकता के अनुरूप यह निर्णय लिया गया है। यह निर्णय छत्तीसगढ़ में महागठबंधन की सरकार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

छत्तीगसगढ़ में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। राज्य में दो चरणों में 12 नवंबर और 20 नवंबर को मतदान होगा। पहले चरण में नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र और राजनांदगांव जिले की 18 सीटों पर और दूसरे चरण में 20 नवंबर को 72 सीटों पर मतदान होगा।

राज्य में चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने महागठबंधन बनाया है। राज्य में 90 विधानसभा सीटों में बसपा 33 सीटों पर, जनता कांग्रेस 55 सीटों पर तथा भाकपा दो सीटों पर चुनाव लड़ेगी। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की मौजूदा सीट राजनांदगांव से चुनाव लड़ने का फैसला किया था। अब उनके चुनाव नहीं लड़ने के फैसले को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

12 नवंबर को मतदान

कांग्रेस की ओर से 12 उम्मीदवारों के नाम के एलान के साथ ही राज्य में चुनावी हलचल और तेज हो गई है। पांच राज्यों में सबसे पहले छत्तीसगढ़ में मतदान होना है। यहां 12 और 20 नवंबर को मतदान होगा। बता दें कि पांच राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मिजोरम में चुनाव होने जा रहे हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार 15 साल से सत्ता में है। वहीं राजस्थान में भाजपा ने 2013 में सरकार बनाई थी। 

इन पांचों राज्यों में सबसे पहले मतदान छत्तीसगढ़ में होगा। यहां दो दौर में मतदान होगा। पहले फेज में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 12 नवंबर को जबकि दूसरे फेज में 20 नवंबर को चुनाव होगा। छत्तीसगढ़ की सत्ता पर भाजपा 15 साल से काबिज है। डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री पद की कमान संभाले हुए हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती और पूर्व कांग्रेस नेता अजीत जोगी के बीच गठबंधन के एलान के बाद मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।

रायपुर/दिल्ली. शुक्रवार को  मुख्यमंत्री डाॅ.रमन सिंह ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की है। हालांकि इस मुलाकात का ब्यौरा सामने नहीं आया है, लेकिन बताया जा रहा है कि प्रत्याशियों के नाम को लेकर रायशुमारी की गई है। इस मुलाकात के दौरान राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह और राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पांडेय भी मौजूद थीं। 

50 सीटों पर हो सकता है नामों का ऐलान

  1.  

    मुख्यमंत्री रमन सिंह, सौदान सिंह, सरोज पांडे के साथ पवन साय की बैठक कर पैनल में आए नामों को एक बार फिर रिफाइन किया। उसके बाद शाम को रमन ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिले और प्रत्याशियों के नाम पर रायशुमारी की। इस दौरान राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री सौदान सिंह और पांडेय भी मौजूद थीं।

     

  2.  

    संकेत हैं कि भाजपा 20 से अधिक मौजूदा विधायकों का टिकट काट सकती है। अब शनिवार को चुनाव समिति बैठक में प्रत्याशियों के नामों को रख सिर्फ औपचारिकता पूरी होगी। बस्तर की सभी 12 सीटों पर पैनल में अब सिंगल नाम हैं। मंत्री महेश गागड़ा और केदार कश्यप को टिकट मिलना तय माना जा रहा है।

     

  3.  

    शुक्रवार की बैठक में 60 से ज्यादा नामों पर चर्चा हुई। विधायकों के नाम के साथ भी 2 से 3 नामों का पैनल है। इस बार 20-22 नए उम्मीदवारों में युवा-महिलाएं होंगी। शनिवार को आने वाली पहली सूची में करीब 50 नामों का ऐलान हो सकता है।

अमृतसर। दशहरा के एक समारोह के दौरान एक ट्रेन की चपेट में आने के कारण 61 लोगों की मौत वाले दुर्घटनास्थल के पास शनिवार को सैकड़ों लोगों ने धरना दिया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और ट्रेन के चालक के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। एक प्रदर्शनकारी ने आरोप लगाया कि ट्रेन तेज गति से निकली और भारी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बावजूद चालक ने ट्रेन की रफ्तार कम नहीं की।

अधिकारियों ने बताया कि अमृतसर में जोड़ा फाटक के निकट शुक्रवार शाम को रावण दहन देखने के लिए रेल की पटरियों पर खड़े लोग एक ट्रेन की चपेट में आ गए जिसमें कम से कम 61 लोगों की मौत हो गई और 72 अन्य घायल हो गए। दुर्घटनास्थल पर सुबह से हजारों लोग जुटे हुये हैं। पुलिस ने भीड़ प्रबंधन करने के लिए व्यापक व्यवस्था की है।

नयी दिल्ली। पंजाब के अमृतसर में हुये रेल हादसे के आलोक में रेलवे ने शनिवार को वहां से गुजरने वाली 37 रेलगाडि़यों को निरस्त कर दिया है जबकि 16 अन्य का मार्ग परिवर्तित कर दिया है। इसके साथ ही जालंधर अमृतसर रेलमार्ग पर आवाजाही रोक दी गई है। उत्तर रेलवे के प्रवक्ता दीपक कुमार ने बताया कि 10 मेल/एक्सप्रेस और 27 पैसेंजर रेलगाडि़यों को निरस्त कर दिया गया है। इसके अलावा 16 अन्य गाडियों को दूसरे मार्ग से उनके गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है जबकि 18 ट्रेनों को बीच में ही रोक कर उनकी यात्रा समाप्त कर दी गयी।

कराची। पाकिस्तान में सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी से कहा गया कि या तो वह कार्यस्थल पर हिजाब न पहने या इस्तीफा दे दे। मुस्लिम बहुल देश में इस तरह का यह पहला मामला है। इस घटना के बाद से सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई, जिसके चलते क्रिएटिव केओस कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जवाद कादिर को इस्तीफा देना पड़ा। महिला को उसके लाइन मैनेजर ने बताया कि वह अपनी नौकरी तभी सुरक्षित रख सकती हैं जब वह वह अपना हिजाब पहनना छोड़ेंगी।

उत्तर प्रदेश में शहरों के नाम बदलने की सियासत एक बार फिर परवान चढ़ी हुई है, जिसको लेकर योगी सरकार उन लोगों के निशाने पर है जो हमेशा से इस तरह के बदलावों की मुखालफत करते रहे हैं, इसके पीछे मुखलाफत करने वालों का यह तर्क रहता है कि एक शहर का नाम भर बदलने से सरकारी खजाने को सैकड़ों करोड़ रूपये की चपत लग जाती है। नाम बदले जाने से शहरों को पुनः अपनी पहचान बनानी पड़ती है। कई बार किसी प्रतिष्ठान का नाम बदले जाने से उस संस्थान की देश में ही नहीं विदेश तक में अपनी पुरानी साख ही चौपट हो जाती है। उदाहरण के लिये लखनऊ के विश्व प्रसिद्ध किंग जार्ज मेडिकल कालेज (केजीएमसी) (जो अब विश्वविद्यालय बन गया है) का नाम जब मायावती सरकार ने बदलकर छत्रपति साहू जी महाराज मेडिकल विश्वविद्यालय कर दिया गया तो इसको इसका काफी नुकसान उठाना पड़ा, इसकी पुरानी प्रतिष्ठा तो गई ही, इसके अलावा केजीएमसी को जो आर्थिक मदद मिलती थी, वह भी नाम बदलने से प्रभावित होने लगी।

 
जब मुलायम सिंह ने सत्ता संभाली तो मायावती के आदेश को रद्द कर दिया। मायावती फिर मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने दोबार केजीएमसी का नाम बदला दिया। इसके बाद 2012 में अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इसका नाम फिर किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय कर दिया।
 
खैर, सियासतदारों का इससे क्या लेना−देना है, लेकिन ताज्जुब तब होता है जब कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल भी ऐसे बदलावों का विरोध करने लगते हैं जो स्वयं सत्ता में रहते हुए नाम बदलने की खूब सियासत किया करते थे। वैसे पहली बार किसी शहर का नाम नहीं बदला गया है। शहरों और संस्थाओं के नाम बदलने की परम्परा काफी पुरानी है। अंग्रेजी हुकूमत और खासकर मुगलकाल में जनविरोध को दरकिनार कर जिस तरह से जर्बदस्ती शहरों के नाम बदलकर हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत की गईं थी, उसकी कसक आज भी कहीं न कहीं लोगों के दिलो−दिमाग पर छाई हुई है। इसको लेकर लोगों के बीच दुश्मनी का भाव भी देखा जा सकता है। अयोध्या में भगवान राम की जन्मस्थली पर बाबरी मस्जिद का बनना और काशी में बाबा विश्वनाथ मंदिर के परिसर को बलात कब्जा कर उस पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण होना इस बात की गवाही देता है। ऐसा ही खिलवाड़ मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली के साथ किया गया था। समय−समय पर तमाम समाचार पत्रों और कई पुस्तकों में लोगों की आहत भावनाओं का वर्णन भी मिल जाता है।

 
अपने देश में राज्यों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है। करीब दो वर्ष पूर्व हरियाणा के शहर गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्राम कर दिया गया। योगी सरकार मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पहले ही कर चुकी है। इलाहाबाद के बाद फैजाबाद का नाम भी बदलकर अयोध्या या साकेत नगर किये जाने की मांग उठने लगी है। नाम बदलाव का सरकारी तर्क यही रहता है कि ऐसे शहरों को उनके प्राचीन नाम वापस दिलाये जा रहे हैं। नाम बदलने का एजेंडा यूपी में नया नहीं है और इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किए जाने के बाद कुछ और जिलों के नाम बदले जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले दो दशक में जिलों के नाम खूब बदले गये। खास बात यह कि बसपा सरकार में रखे गये जिलों के नाम समाजवादी पार्टी ने सत्ता में आते ही बदल दिए। इसको लेकर सपा−बसपा में खूब तीखी तकरार भी हुई थी, बताते चलें वर्ष 1992 में भाजपा गठबंधन की कल्याण सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज, अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ व फैजाबाद का नाम साकेत करने की कोशिश की थी। माना जा रहा है कि फैजाबाद, कानपुर, लखनऊ, आजमगढ़ व अलीगढ़ के नाम भी आने वाले समय में बदले जा सकते हैं।
 
उत्तर प्रदेश की राजधानी और भगवान लक्ष्मण की नगरी जिसे आज लखनऊ के नाम से जाना जाता है, का भी नाम बदलने की भी मांग जोर पकड़ रही है। लखनऊ प्राचीन कौसल राज्य का हिस्सा था। यह भगवान राम की विरासत थी, जिसे उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण को समर्पित कर दिया था। इसे लक्ष्मणावती, लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जाना गया, जो बाद में बदल कर लखनऊ हो गया।

 
उत्तर प्रदेश भी पुराना नाम नहीं है। सन 1902 तक उत्तर प्रदेश को नॉर्थ वेस्ट प्रोविन्स के नाम से जाना जाता था। बाद में इसे नाम बदल कर यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे यूनाइटेड प्रोविन्स या यूपी कहा गया। सन् 1820 में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से बदल कर लखनऊ कर दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ स्थापित की गयी। स्वतन्त्रता के बाद 12 जनवरी सन् 1950 में इस क्षेत्र का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रख दिया गया और लखनऊ इसकी राजधानी बना। इस तरह यह अपने पूर्व लघुनाम यूपी से जुड़ा रहा।
 
इलाहाबाद का नाम बदले जाने पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता जुगल किशोर ने कहा कि संगम नगरी का नाम प्रयागराज करने से देश का हर नागरिक खुश है। करोड़ों जनता की आस्था का सम्मान करते हुए योगी सरकार ने यह फैसला किया। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस में भी संगम नगरी का नाम प्रयागराज उल्लेख किया गया है। मुगल शासकों द्वारा प्रयागराज का नाम बदलकर इलाहाबाद करना भारत की परम्परा और आस्था के साथ खिलवाड़ करना था।

 
बहरहाल, बात पिछली सरकारों की कि जाये तो उन्होंने जिले ही नहीं विश्वविद्यालय, पार्क तक के नाम बदले थे। लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क का नाम पहले अम्बेडकर उद्यान था। अखिलेश सरकार ने अम्बेडकर उद्यान का न केवल विस्तार किया बल्कि नाम भी बदल दिया। मायावती ने अपने अलग−अलग कार्यकाल में नए जिले बना कर उनका नाम दलित व पिछड़े वर्ग से जुड़े संतों−महापुरुषों के नाम पर रखे। मायावती ने मुख्यमंत्री रहते एटा से काट कर बनाए गए कासगंज जिले का नाम कांशीराम नगर कर दिया था। अमेठी को जिला बना कर उसे छत्रपति शाहू जी नगर किया गया। अमरोहा का नाम ज्योतिबा फुले नगर रखा गया। इसी तरह हाथरस का नाम महामाया नगर तो कई बार बदला। बसपा राज में ही कानपुर देहात का नाम रमाबाई नगर, संभल का नाम भीमनगर, शामली का नाम प्रबुद्धनगर व हापुड़ का नाम पंचशील नगर रखा गया। 2012 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मायावती द्वारा बनाये गये जिले के साथ तो कोई छेड़छाड़ नहीं की लेकिन इन जिलों के पुराने नाम जरूर बहाल कर दिए। इस पर मायावती ने सख्त एतराज जताते हुए इसे दलित महापुरुषों का अपमान बताया था।
 
संस्थान और शहर तो दूर कई राज्यों तक के नाम बदलने की सियासत परवान चढ़ चुकी है। उनमें से कुछ का उल्लेख करना समीचीन होगा। इसी के चलते असम अब (आसाम), ओडिशा (उड़ीसा), पश्चिम बंग (वैस्ट बंगाल), पुदुच्चेरी (पांडुचेरी) हो गया। इसी प्रकार शहरों में कन्याकुमारी (केप कोमारिन), कोजीकोड (कालीकट), कोलकाता (कैलकटा/कलकत्ता), गुवाहाटी (गौहाटी), चेन्नै (मद्रास), तिरुअनंतपुरम (त्रिवेन्द्रम), पणजी (पंजिम), पुणे (पूना), बंगलूरु (बैंगलोर), मुम्बई (बॉम्बे), विशाखापत्तनम (वालटेयर), विजयपुर (बीजापुर) हो गया।
 
कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर भी इलाहाबाद का नाम बदले जाने को लेकर योगी पर निशाना साध रहे हैं लेकिन कड़वी सच्चाई यह भी है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस सरकारों की नीति भी कुछ अलग नहीं रही थी। कांग्रेस ने हर नयी संस्था, मार्ग, पुल, आदि का नाम यथासंभव प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एवं उनके वंशजों के नाम पर ही रखा, सरकारी योजनाओं के साथ भी यही किया गया। कभी दिल्ली के कनॉट सर्किल एवं कनॉट प्लेस को इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के नाम पर नया नाम दिया गया था।
 
दरअसल, नाम बदलने का विचार राजनेताओं से शुरु होता है और जनभावनाओं के उभार के रूप में आगे बढ़ता है। अंग्रेजी विरासत के तौर पर जो नाम देश में प्रचलित हैं उनको देशज नामों से संबोधित किया जाए यह बात कहने−सुनने में अच्छी लगती है। परंतु इस कार्य में विसंगति भी बहुत हैं। जिस देश में कदम−कदम पर अंग्रेजियत पैर पसारे मिलती हो, जहां प्रायः सभी दस्तावेजी कार्य अंग्रेजी में किए जाते हों, जिस देश का संविधान अंग्रेजी में हो, उच्चतम न्यायालय का कार्य अंग्रेजी में होता हो, जहां अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही हो, देशज भाषाओं के विद्यालय बंद होने के कगार पर हों, वहां अंग्रेजी नामों को बदलने का औचित्य ही क्या है।  
     
यह देश है ही विचित्र। यदि नाम ही बदलना है तो सबसे पहले देश का नाम बदला जाना चाहिए। इस देश का नाम "भारत" होना चाहिए "इंडिया" नहीं। इंडिया नाम अंग्रेजों का दिया हुआ है न कि इस देश का मौलिक या प्राचीन नाम है। विष्णु पुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को भारतवर्ष या भारत कहा गया है। तब हम इसे भारत क्यों नहीं कहते ? सब जगह इंडिया ही क्यों सुनने को मिलता है ? यहां तक कि हिन्दूवादी नेता और पीएम मोदी भी "स्किल इंडिया", "डिजिटल इंडिया", "मेक इन इंडिया", आदि−आदि की बात करते हैं जबकि उसमें इंडिया की जगह भारत दिखना चाहिए।
 
-अजय कुमार

 

दशहरे के मौके पर अमृतसर के पास हुए हादसे को लेकर रेलवे का कहना है कि पुतला दहन देखने के लिए लोगों का वहां पटरियों पर एकत्र होना ‘‘स्पष्ट रूप से अतिक्रमण का मामला’’ था और इस कार्यक्रम के लिये रेलवे द्वारा कोई मंजूरी नहीं दी गई थी। अमृतसर प्रशासन पर इस हादसे की जिम्मेदारी डालते हुए आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि स्थानीय अधिकारियों को दशहरा कार्यक्रम की जानकारी थी और इसमें एक वरिष्ठ मंत्री की पत्नी ने भी शिरकत की।

 
रेलवे अधिकारियों ने कहा, ‘‘हमें इस बारे में जानकारी नहीं दी गई थी और हमारी तरफ से कार्यक्रम के लिये कोई मंजूरी नहीं दी गई थी। यह अतिक्रमण का स्पष्ट मामला है और स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदारी लेनी चाहिए।’’ इतनी भीड़ होने के बावजूद रेल चालक द्वारा गाड़ी नहीं रोके जाने को लेकर सवाल उठने पर अधिकारी ने कहा, ‘‘वहां काफी धुआं था जिसकी वजह से चालक कुछ भी देखने में असमर्थ था और गाड़ी घुमाव पर भी थी।’’ 

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