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रीहरिकोटा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने विश्वसनीय रॉकेट पीएसएलवी-सी 43 को गुरुवार को भारत के पृथ्वी अवलोकन उपग्रह हिसआईएस और आठ देशों के 30 अन्य उपग्रहों को लेकर रवाना किया और भारतीय उपग्रह सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित हो गया। इसरो ने कहा कि प्रक्षेपण के लिए 28 घंटे की उलटी गिनती बुधवार सुबह 5 बजकर 58 मिनट पर शुरू हुई थी और रॉकेट चेन्नई से करीब 110 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी) से गुरुवार सुबह 9 बजकर 58 मिनट पर रवाना हुआ।

इसरो द्वारा विकसित भू प्रेक्षण उपग्रह ‘हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट’ (हिसआईएस) पीएसएलवी-सी 43 मिशन का प्रमुख उपग्रह है। इसरो ने बताया कि अंतरिक्षयान का वजन करीब 380 किलोग्राम है और इसे 97.957 अंश झुकाव के साथ 636 किलोमीटर-पोलर सन सिंक्रोनस कक्षा में स्थापित किया गया। हिसआईएस की मिशन अवधि पांच साल की है और इसका प्रमुख उद्देश्य विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के अवरक्त (इन्फ्रारेड) और शॉर्टवेव अवरक्त क्षेत्रों के नजदीक दृश्य पृथ्वी की सतह का अध्ययन करना है।

हिसआईएस के साथ जिन उपग्रहों को रवाना किया गया है उनमें आठ देशों के 29 नैनो और एक माइक्रो उपग्रह शामिल हैं। इनमें 23 उपग्रह अमेरिका के और एक-एक उपग्रह ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलेशिया, नीदरलैंड और स्पेन के हैं। इन सभी उपग्रहों को इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड के माध्यम से वाणिज्यिक संविदा के तहत प्रक्षेपित किया गया है। इसरो ने कहा कि सभी उपग्रहों को पीएसएलवी-सी 43 द्वारा 504 किलोमीटर कक्षा में स्थापित किया जाना है। यह इस महीने में इसरो का दूसरा प्रक्षेपण है। अंतरिक्ष एजेंसी ने 14 नवंबर को अपने अत्याधुनिक संचार उपग्रह जीसैट-29 को जीएसएलवी एमके 3-डी 2 के साथ प्रक्षेपित किया था।

हैदराबाद। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बृहस्पतिवार को आरोप लगाया कि उन्होंने अपना हर एक वादा तोड़ दिया। किसानों के लिए कर्ज माफी की मांग करते हुए गांधी ने कहा, ‘‘अगर प्रधानमंत्री 15 लोगों के तीन लाख पचास हजार करोड़ रुपये माफ कर सकते हैं...वह भी देश के सबसे अमीर लोगों के, तो उन्हें भारत के किसानों के कर्ज माफ करने के लिए तैयार होना चाहिए।’’

 गांधी ने कहा, ‘‘हम किसानों के लिए मुफ्त उपहार की मांग नहीं कर रहे, हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि आप चाहे कुछ भी करें लेकिन सबके साथ निष्पक्ष रहें। अगर आप देश के सबसे अमीर लोगों को कर्ज माफी दे रहे हैं तो आपको देश के किसानों के साथ भी ऐसा ही करना चाहिए।’’ कांग्रेस मोदी सरकार पर साठगांठ वाले पूंजीवाद के आरोप लगाती रहती है। हालांकि, भगवा दल इसे सिरे से खारिज करता है।
 
 
यहां एक कार्यक्रम में गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी ने अपना हर एक वादा तोड़ दिया, यहां तक कि एक ईमानदार प्रधानमंत्री बनने का वादा भी उन्होंने तोड़ दिया। तेलंगाना में सात दिसंबर को विधानसभा चुनाव होने हैं।

सीट बंटवारे के मुद्दे पर PM मोदी से 30 नवंबर तक का मिलने का समय मांगने वाले केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने आज NDA से अगल होने के संकेत दे दिए हैं। इससे पहले उन्होंने कहा था कि वह  अंत तक चुप्पी बनाए रखेंगे और जवाब मिलने पर उस तारीख के बाद अपना जवाब देंगे। उपेंद्र कुशवाहा ने यह संकेत मोतीहारी में दिया जहां वो राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के एक नेता के घर गए थे जिसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। ऐसा कहा जा रहा है कि कुशवाहा 6 दिसंबर को NDA से अलग होने की घोषणा कर सकते है। बता दे कि कुशवाहा पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिलने का समय मांगा था जो उन्हें नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने PM मोदी से मिलने का समय मांगा जो वर्तमान में असंभव लग रहा है। इससे पहले कुशवाहा कह चुके है कि भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए उनकी पार्टी को सीटों की जो पेशकश की है, वह ‘‘सम्मानजनक नहीं’’ है।

इस मौके पर उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार पर भी जमकर निशाना साधा और कहा कि खिर रालोसपा के कितने साथियों की बलि चाहिए। आपको बता दे कि इससे पहले भी नीतीश पर उपेंद्र कुशवाहा हमला करते रहे हैं। रालोसपा विधायक सुधांशु शेखर के जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर से मुलाकात की खबर पर कुशवाहा ने ट्वीट करके जदयू अध्यक्ष पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘वैसे तो नीतीश कुमार जी, आपको तोड़-जोड़ में महारत हासिल है।

भोपाल। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बृहस्पतिवार को मध्यप्रदेश विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 132 से अधिक सीटें जीतने का दावा किया। बुधवार को राज्य विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान में रिकार्ड 75 प्रतिशत मतदान हुआ। वर्ष 2013 की तुलना में मतदान प्रतिशत में दो प्रतिशत का इजाफा हुआ। सिंह ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘हम 132 से ज्यादा सीटें जीतेंगे और 15 साल बाद राज्य में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर देंगे।’’ दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस का एजेंड़ा भी बताया।

उन्होंने कहा, ‘‘ 2013 के विधानसभा चुनाव में करीब तीन प्रतिशत जाली मतदाता थे। इस दफा विधानसभा चुनाव से पहले हमने मतदाता सूची से इनकी लगभग छटनी करवा दी। ’’ मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस बार चुनाव जीतने के लिए दिलो-जान लगा दिया।
 

जयपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में किसानों की दुर्दशा के लिए एक तरह से कांग्रेस व उसकी पूर्ववर्ती सरकारों को जिम्मेदार ठहराते हुए राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जिसे मूंग व मसूर में फर्क नहीं पता वह किसानों की बात कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर वल्लभ भाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो किसानों की यह हालत नहीं होती।किसान बहुल नागौर व भरतपुर में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए मोदी ने किसानों को केंद्र में रखकर कांग्रेस पर तीखे हमले किए और आरोप लगाया कि संप्रग सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की रपट पर ध्यान नहीं दिया।

प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए ‘नामदार’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं जबकि खुद को कामदार कहते हैं। कांग्रेस इन चुनावों में राज्य के किसानों की बदहाली को बड़ा मुद्दा बनाकर चल रही है और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में घोषणा की थी कि उनकी सरकार आते ही दस दिन के अंदार किसानों के कर्ज माफ कर दिये जायेंगे। मोदी ने भरतपुर में अपनी सभा में कहा,‘स्वामीनाथन आयोग ने किसानों की भलाई के लिए अपनी रपट दस साल पहले तत्कालीन संप्रग सरकार को सौंपी थी। अगर इनके दिल में किसानों के प्रति थोड़ी सी हमदर्दी होती तो वे उस रपट को लागू करते और किसानो को उसका हक देते। आज ये नामदार जिसे यह भी समझ नहीं कि चने का पौधा होता कि चने का पेड़ ... जिसे मूंग व मसूर में फर्क की समझ नहीं वह किसानों के नाम पर घड़ियाली आंसू बहा रहा है। किसानों के नाम पर भड़का रहा है।’ 

 
उन्होंने कहा,‘अगर दस साल पहले आपने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया होता तो आज देश के एक भी किसान पर एक भी रुपये का कर्ज नहीं होता। आप जिम्मेदार हैं और गुनाहगार हैं किसानों की इस दुर्दशा के लिए। आपकी चार पीढी के लोग जिन्होंने सरकारें चलाई हैं वे जिम्मेदार हैं किसानों की इस दुर्दशा के लिए। हम आए, और हमने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया।’ मोदी ने कहा,‘ देश के पहले प्रधानमंत्री अगर सरदार वल्लभाई पटेल होते तो किसान ऐसी ऊंचाइयों को पार करते होते जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता।’ इससे पहले नागौर में भी मोदी ने कहा,‘अगर हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री एक किसान का बेटा होता जिसने महात्मा गांधी के साथ रहकर हक की लड़ाई लड़ी... अगर वह सरदार पटेल, पहला प्रधानमंत्री होता तो देश का किसान बहुत सुखी होता।'
कांग्रेस पार्टी जिस प्रकार से नाम और खानदान का मुद्दा उछालने में लगी है, उससे ये बहस फिर छिड़ी है कि क्या भारत में राजवंशीय लोकतंत्र होना चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री की बुजुर्ग मां की उम्र को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया गया। उनके पिता को लेकर टिप्पणी की गई और यह साबित करने की कोशिश की गई कि प्रधानमंत्री बनने के लिए पिता की पहचान जरूरी है। ऐसी दलीलें भी आईं कि अगर आप किसी नामी परिवार की विरासत से आते हैं, तो राजनीतिक लिहाज से यह आपकी बड़ी योग्यता है। जाहिर है ऐसे में साधारण परिवारों से आने वाले लाखों प्रतिभाशाली राजनीतिक कार्यकर्ता कांग्रेस के नेतृत्व परीक्षण में फेल हो जाएंगे। कांग्रेस के लिए योग्यता, प्रतिभा, प्रेरणा और नेतृत्व करने की क्षमता कुछ नहीं है, उसके लिए खानदान का नाम और बड़ा सरनेम ही एक राजनीतिक ब्रांड है।
 
 
(1) गांधी जी के पिता का नाम क्या है?
(2) सरदार पटेल के पिता का नाम क्या है?
(3) सरदार पटेल की पत्नी का नाम क्या है?
 
मेरे किसी भी जानकार मित्र के पास इन सवालों का कोई निश्चित उत्तर नहीं था। यह कांग्रेस की राजनीति और देश पर उसके प्रभाव की त्रासदी है। गांधी जी ने भारत के सबसे असाधारण स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने राजनीतिक जागरूकता, सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से एक ऐसा वातावरण बनाया, जिससे अंग्रेजों को भारत पर शासन बनाए रखना असंभव लगने लगा। सरदार पटेल का योगदान किसी से कम नहीं था। स्वतंत्रता आंदोलन की अग्रिम पंक्ति के नेता होने के अलावा, उन्होंने भारत के उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में अंग्रेजों के साथ सत्ता हस्तांतरण की बातचीत की। उन्होंने 550 से अधिक रियासतों से बातचीत कर भारत को एक करने का काम किया। उन्होंने कुछ ही महीनों के अंतराल में भारत को मौजूदा स्वरूप प्रदान किया। संयोग से, गांधीजी के पिता करमचंद उत्तमचंद गांधी थे, सरदार पटेल के पिता झावरभाई पटेल थे और उनकी पत्नी का नाम दिवाली बा था। हालांकि इतिहासकारों द्वारा व्यापक शोध के बाद भी आज तक उनकी पत्नी की कोई तस्वीर या उनका अन्य कोई विवरण उपलब्ध नहीं हो पाया है।
 
 एक परिवार का आधिकारिक महिमामंडन
 
इसकी वजह को समझना आसान है। दशकों तक कांग्रेस के शासन में कॉलोनी, इलाके, शहर, ब्रिज, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, स्टेडियम, इन सबके नाम एक ही परिवार के नाम पर रखे जाते रहे। इसके पीछे की नीयत थी- ‘गांधियों’ को देश की रॉयल्टी के रूप में स्थापित करना। उन्हें ‘सरकारी स्तर पर’ भारत के संभ्रांत परिवार के रूप में महिमामंडित किया गया। बाकी किसी का कोई मतलब नहीं था। याद किया जा सकता है कि मुंबई में सरदार पटेल के निधन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कैबिनेट के अपने सहयोगियों से अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए मुंबई नहीं जाने का अनुरोध किया था। वे सीधे नहीं रोक सकते थे, इसलिए ये कहते हुए अनुरोध किया था कि सरदार पटेल के अंतिम संस्कार के दिन अपने कामकाज करते रहना ही उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी। लेकिन उनकी इस सलाह को सबने नकार दिया था। विजय चौक पर सरदार पटेल की प्रतिमा के निर्माण के प्रस्ताव को रिजेक्ट कर दिया गया था। तब संसद मार्ग के एक ट्रैफिक चौराहे पर उनका स्टैच्यू लगाकर देश को मनाया गया था।
 
बारदोली सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी को लेकर ज्यादातर लोग सरदार पटेल को किसान नेता मानते हैं। लेकिन सरदार पटेल अहमदाबाद के सबसे सफल पेशेवर वकीलों में से एक थे। पंडितजी की चर्चा एक बड़े वकील के रूप में की जाती है, लेकिन अपने पूरे कॅरियर में उन्होंने एक भी केस में जिरह नहीं की थी। वह सांकेतिक रूप से बस एक बार कोर्ट गए थे, जहां वो भूलाभाई देसाई के सहयोगी रहे सीनियर वकीलों के पीछे बैठे थे। लाल किले के अंदर विद्रोह से जुड़े एक मुकदमे की सुनवाई में भोलाभाई तब आजाद हिंद फौज के तीन सेनानियों की ओर से अपनी दलीलें दे रहे थे।
 
दूसरों की कीमत पर महिमामंडन के खतरे
 
देश के लिए बड़ा योगदान देने वाले नेताओं की तुलना में किसी एक खानदान का आधिकारिक रूप से महिमामंडन करना, उस पार्टी के साथ-साथ देश के लिए भी घातक है। पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं के योगदान को कम करके आंका गया। एक खानदान के लोगों को सबसे महान बताने का काम किया गया। उन्होंने भ्रम का एक ऐसा वातावरण बनाया, जिसमें देश आ गया। पार्टी ने इस खानदान के नेताओं को ही अपनी विचारधारा बना लिया। जब पंडितजी ने अपनी बेटी को अपना उत्तराधिकारी बनाया, तभी उन्होंने भारत में वंशवादी राजनीति की बुनियाद रख दी थी। जब यही बेटी 1975 में तानाशाह में बदल गई तो पार्टी की विचारधारा भी भारत को ‘’अनुशासित लोकतंत्र’’ में बदलने वाली हो गई। जब 1984 में सिखों का नरसंहार हुआ, तो उनके खिलाफ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बिल्कुल सटीक राजनीतिक रणनीति मान लिया गया। भाजपा विरोध आजकल कांग्रेस को ऐसी स्थिति में ले आया है कि वो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से भी गठजोड़ कर सकती है और माओवादियों, अलगाववादियों और गड़बड़ी फैलाने वालों से सहानुभूति रख सकती है।
 
हमने कई क्षेत्रों में देखा है कि वंशवादी नीतियों की कीमत देश को चुकानी पड़ी है। श्रीनगर के दो और नई दिल्ली के एक परिवार यानि कुल तीन परिवारों ने मिलकर 71 साल से जम्मू-कश्मीर की नियति से खेला है। इसके परिणाम स्पष्ट हैं। कांग्रेस के अंदर वंशवादी नेतृत्व के तरीके को देखते हुए कुछ और दूसरे दलों ने भी यही तरीका अपना लिया है। ऐसे संगठनों में ना तो कोई आंतरिक लोकतंत्र है और ना ही इनका कोई आदर्शवादी सिद्धांत है। अपने घोर राजनीतिक विरोधियों की तरफ झुकने या उनसे तालमेल की पूरी छूट है। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने कांग्रेस का विकल्प बनकर वहां की राजनीतिक शून्यता को भरा था। लेकिन धीरे-धीरे पार्टी का नियंत्रण मौजूदा मुख्यमंत्री के हाथों में चला गया, जो हर आम चुनाव में पाला बदलते रहते हैं। उनकी पार्टी में दूसरी पंक्ति का कोई नेतृत्व है ही नहीं और जो विकल्प दिया है वो सिर्फ “विरोधियों का गठजोड़” ही है।
  
वैसे वंशवाद को लेकर सवालों में रहने वाली पार्टियों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। केवल उसी नेता का राजनीतिक भविष्य होता है, जो वंशवादी पार्टियों के नेताओं को पसंद हो। परिवार के विरुद्ध जाते ही आपको पार्टी से बाहर फेंक दिया जाता है या हाशिए पर डाल दिया जाता है। यहां टैलेंट की कोई जगह नहीं होती है और मेरिट की भी कोई पूछ नहीं। संगठनात्मक ढांचे की तो कोई जरूरत ही नहीं होती है। सिर्फ परिवार का करिश्मा ही पार्टी का वोट बैंक होता है। परिवार के इर्द गिर्द की भीड़ ही कैडर बन जाती है।
 
वंशवादी पार्टियों की कमजोरी
 
इस मॉडल की एक खास कमजोरी है। पार्टी की ताकत वंश की वर्तमान पीढ़ी की क्षमता से जुड़ी होती है। अगर वर्तमान पीढ़ी गैर प्रेरणादायक या नेतृत्व करने में अक्षम होती है तो पार्टी को अपनी सारी ऊर्जा एक अयोग्य व्यक्ति पर खर्च करनी होती है। इसका परिणाम 44 लोक सभा सीट भी हो सकता है, कभी इससे थोड़ा कम, कभी थोड़ा ज्यादा। नेता की बचकानी प्रतिक्रिया और अज्ञानता नई विचारधारा बन जाती है। लेकिन यह उम्मीद की किरण है कि भारत बदल रहा है। इसके पास एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग है और एक बड़ा महत्वाकांक्षी तबका मध्यम वर्ग में शामिल होने का आकांक्षी है। यह महत्वाकांक्षी भारत पार्टियों और नेताओं को कड़ी कसौटी पर परखता है। किसी को भी थोप देना उन्हें स्वीकार्य नहीं। वे कठिन और धारदार सवाल पूछते हैं और उनका पैमाना बहुत सख्त है। वे ईमानदार नेताओं की तलाश में रहते हैं, वे उन्हें प्रेरित कर सकने वाले, दृढ़ व देश का नेतृत्व कर सकने वाले समर्थ लोगों की खोज में रहते हैं। उनके लिए उपनाम का कोई महत्त्व नहीं, योग्यता और क्षमता का महत्त्व होता है।
 
2019 की चुनौती
 
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती तभी और सामने आएगी जब कुछ परिवारों का करिश्मा पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया जाए और पार्टियों द्वारा एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से योग्य और क्षमतावान नेताओं को आगे बढ़ाया जाए। 2014 में ऐसा साबित भी हुआ है, जब ज्यादातर वंशवादी पार्टियां बुरी तरह से चुनाव हार गईं। 2019 का भारत 1971 के भारत से अलग है। अगर कांग्रेस पार्टी यह चाहती है कि 2019 की लड़ाई कम चर्चित माता-पिता के बेटे मोदी और अपनी क्षमता व योग्यता की बजाए अपने माता-पिता की वजह से चर्चा में रहने वाले के बीच हो, तो बीजेपी खुशी-खुशी यह चुनौती स्वीकार करेगी। इसे 2019 के लिए एजेंडा बनने दें।
 
-अरुण जेटली
(लेखक केंद्रीय वित्त मंत्री हैं।)

मध्य प्रदेश में 230 सदस्यीय विधानसभा के लिए आज जारी मतदान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बड़ा बयान आया है। प्रधानमंत्री ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा मुखिया मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति नरम रुख दिखाया है। तेलंगाना के निजामाबाद में मंगलवार को एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश को मायावती और अखिलेश से कोई दिक्कत नहीं है, पश्चिम बंगाल को वामदलों और ममता बनर्जी से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसे लोगों ने हर राज्य से बाहर कर दिया है।

मोदी के इस बयान से जो आशय निकाले जा सकते हैं वह यह है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भले भाजपा अपनी जीत के दावे कर रही हो लेकिन कहीं ना कहीं इन राज्यों में उसे अपना जनाधार खोने का खतरा है। बसपा जहां छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में मजबूती के साथ चुनाव लड़ रही है वहीं समाजवादी पार्टी भी मध्य प्रदेश में कुछ सीटों पर प्रभावी मानी जा रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री का सपा और बसपा के प्रति नरम रुख इसलिए भी हो सकता है कि यदि चुनाव परिणाम बाद भाजपा को सरकार बनाने के लिए आंकड़ों की कमी पड़े तो सपा या बसपा में से कोई सहयोग दे दे। 
 
इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने के जो प्रयास हो रहे हैं उसमें भी प्रधानमंत्री रुकावट डालना चाहते हैं। क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के खिलाफ अगर खड़ा कर दिया जाये तो महागठबंधन बनाने की जो कोशिशें हो रही हैं वह अपने आप ही बाधित हो जाएंगी। महागठबंधन में कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी है। अगर सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस या वामपंथी कांग्रेस से दूरी बना लें तो भाजपा की राह आसान हो जायेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में साफ संकेत दिया है कि भाजपा कांग्रेस को छोड़कर किसी भी पार्टी के साथ मिल कर काम कर सकती है।
 
गौरतलब है कि मायावती तो पहले तीन बार भाजपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बना चुकी हैं। इसके अलावा स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में जब मुलायम सिंह यादव की उत्तर प्रदेश में सरकार बनी थी तो वह भाजपा की वजह से ही बन पाई थी। ममता बनर्जी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रह चुकी हैं और वाजपेयी सरकार में वह विभिन्न मंत्रालय संभाल चुकी हैं। वामपंथी भी वीपी सिंह सरकार के दौरान भाजपा के साथ रह चुके हैं।
 

 

विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज ने पाकिस्तान को एक बार फिर फटकारते हुए कहा कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं जा सकती है। सुषमा ने कहा कि भारत कई वर्षों से करतारपुर गलियारे के लिए पूछ रहा था, जिस पर पाकिस्तान ने अभी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि द्विपक्षीय वार्ता शुरू हो जाएगी क्योंकि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं जा सकती है।

 
सुषमा स्वराज ने आगे कहा कि सार्क शिखर सम्मेलन के लिए पाकिस्तान द्वारा PM मोदी को निमंत्रण पर इस वक्त हम कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। विदेश मंत्री ने कहा कि जब तक पाकिस्तान भारत में आतंकवादी गतिविधियों को नहीं रोकता है, तब तक कोई वार्ता नहीं होगी, इसलिए हम सार्क में भाग नहीं लेंगे। 

इंदौर। मध्य प्रदेश चुनावों के बीच लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने राममंदिर मुद्दे में टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक मंदिर नहीं बन जाता यह मुद्दा समाप्त नहीं होने वाला है। चुनावों के वक्त राममंदिर निर्माण की बातें तूल पकड़ने वाले सवाल पर महाजन ने कहा कि मुद्दा चल रहा है या नहीं, ये तो चुनाव के वक्त कोई कुछ भी बोल देता है, मगर भारतीयों के दिलों में राममंदिर का मुद्दा है और जब तक मंदिर नहीं बन जाता यह मुद्दा समाप्त नहीं होने वाला है।

इसी के साथ महाजन ने कहा कि जब तक मंदिर नहीं बन जाता यह मुद्दा समाप्त नहीं होगा और मंदिर बनने के बाद भी लोगों के दिलों में राम बने रहेंगे। बता दें कि आज मध्य प्रदेश के सभी 52 जिलों की 230 विधानसभा सीटों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव हो रहे है। 

भरतपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर तीखा हमला करते हुए बुधवार को कहा कि ‘नामदार’ के ‘राजदरबारी’ लोग निर्दोषों की हत्या करने वाले नक्सलियों-माओवादियों को क्रांतिकारी कहते हैं। छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रक्रिया के दौरान भरतपुर के एक जवान के शहीद होने का जिक्र करते हुए मोदी ने यहां एक चुनावी सभा में कहा, ‘‘उस (जवान) को मौत के घाट उतारने वाले माओवादी, नक्सलवादी, हिंसावादी लोगों को नामदार के राजदरबारी, उनके खासम खास, उनके राज्यसभा सदस्य बेशर्मी के साथ क्रांतिकारी कहते हैं।' 

 

प्रधानमंत्री मोदी अपने चुनावी भाषण में प्राय: राहुल गांधी को ‘नामदार’ व खुद को ‘कामदार’ बताते हैं। मोदी ने कहा कि ‘नामदार’ की पार्टी के लोग हमारे सेनाध्यक्ष के लिए ‘रास्ता चलते गुंडे’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। मोदी ने सवाल उठाया, ‘‘क्या ऐसे लोग सेना का भला करेंगे? और सेना का भला नहीं होगा तो आपकी रक्षा होगी क्या?’’ उल्लेखनीय है कि कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने पिछले साल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत पर कथित अभ्रद टिप्पणी करते हुए कहा था कि वह ‘सड़क के गुंडे’ की तरह बयान देते हैं। भाजपा ने इस पर आपत्ति जताते हुए दीक्षित को पार्टी से निकालने की मांग की थी। हालांकि कांग्रेस ने खुद को दीक्षित के इस बयान से अलग कर लिया और दीक्षित ने भी बाद में अपनी टिप्पणी के लिए माफी मांगी।
 
मोदी ने कांग्रेस पर देश के शहीदों का अपमान करने का आरोप लगाया और कहा, ‘‘हमने सेना में वन रैंक, वन पेंशन लागू की। कांग्रेस ने इस पर कभी काम ही नहीं किया।’’ पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के दस साल के कार्यकाल में 12 लाख करोड़ रुपये के घोटाले होने का आरोप लगाते हुए मोदी ने कहा कि उनकी सरकार के सत्ता में आने के बाद चार साल में घोटालों का यह खेल बंद हुआ है। उन्होंने कहा कि वोट की राजनीति देश का भला नहीं कर सकती और मतदाताओं को अपने एक वोट की कीमत पहचाननी चाहिए।
 
 
मोदी ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व गुजरात का हवाला देते हुए कहा कि जहां जहां से कांग्रेस पार्टी गयी वहां विकास का आना तय है। उन्होंने कांग्रेस पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर भी काम नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर इस आयोग की सिफारिशें दस साल पहले लागू हो जातीं तो आज किसान कर्ज के बोझ से नहीं दबा होता।

 

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