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वर्तमान में जब मनुष्य अपने शरीर से पसीना नहीं निकालना चाहता हैं। इसके लिए वे पैसे खरच करके और अलग से समय निकालकर जिम जाते हैं। यह बहुत ख़ुशी की बात हैं की आप दस मंजिला भवन में रहते हैं और उसमे लिफ्ट सुविधा हैं तो आप अपने आप को भाग्यशाली और खुशनसीब समझते हैं। इस कारण आपका आना जाना सुगम और सरल हो जाता हैं ,और वह भी बिना थकावट के। पर कभी कभी विद्युत् ऊर्जा का प्रवाह न होने पर आने जाने में परेशानी का सामना करना पड़ता हैं। इसके लिए हमें सीढ़ी सेचढ़ने की आदत डालना चाहिए। इससे न केवल आप परेशान होंगे बल्कि स्वास्थ्य भी रहेंगे।
हम सभी जानते हैं कि सीढ़ियां चढ़ना-उतरना हमारी फिटनेस के लिए अच्छा होता है। लेकिन कोरोना महामारी के दौरान यह कई तरह की बीमारियों से बचाव का एक तरीका बनी हुई है...
अक्सर लोग एक-दूसरे को लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का उपयोग करने की सलाह देते हुए दिख जाते हैं...क्योंकि फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता और कम मेहनत के साथ खुद को ऐक्टिव रखने की चाह हर व्यक्ति के अंदर है। लेकिन ऐसा शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कोरोना महामारी के दौर में सीढ़ियां चढ़ने के अपने खास फायदे होंगे..
कोरोना महामारी के चलते पब्लिक प्लेस पर जाना और शारीरिक रूप से बहुत अधिक ऐक्टिव रहना फिलहाल सभी के लिए बेहद कम हो गया है। ऐसे में फैट बढ़ना, बीपी हाई रहना, तनाव बढ़ना और शरीर में जगह-जगह दर्द रहने जैसी समस्याएं बहुत आम हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि इन सभी समस्याएं के समाधान के रूप में आप सीढ़ियां चढ़ने और उतरने की प्रक्रिया को अपना सकते हैं
यानी अगर आप दिन में जितनी बार संभव हो उतना अधिक सीढ़ियां चढ़ें और उतरेंगे तो आप कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों से बचे रहेंगे। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि एक ताजा रिसर्च में यह बात सामने आई है। यदि आप उन लोगों में शामिल हैं जिन्हें पहले भी एंग्जाइटी, स्ट्रेस या डिप्रेशन जैसी समस्याएं रह चुकी हैं तो हर दिन सीढ़ियां चढ़ना और उतरना आपके लिए बहुत जरूरी है।
स्टडी में यह भी सामने आया है कि पड़ोस में रहनेवाले लोगों के यहां जाना, उनसे कुछ देर बात करना भी आपको महामारी के दौरान कई तरह की समस्याओं से बचाने में काफी कारगर प्रक्रिया है। लेकिन इस दौरान आप कोरोना की गाइडलाइन्स का पालन जरूर करें। कोरोना महामारी में तन और मन से जुड़ी सबसे अधिक संख्या में लोगों को प्रभावित करनेवाली बीमारियों को कंट्रोल करने के तरीकों पर आधारित यह स्टडी जर्नल साइंस अडवांस में पब्लिश हुई है।
यह रिसर्च जर्मनी के दो अलग-अलग हेल्थ इंस्टिट्यूट्स ने मिलकर की है। इनके नाम कार्ल्सरुहे प्रौद्योगिकी संस्थान और केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान हैं। शोध में इस बात का भी पता लगाया गया है कि सीढ़ियां चढ़ते और उतरते समय दिमाग का कौन-सा हिस्सा केंद्रीय भूमिका अदा करता है।
शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिमाग में सबजेनिकल सिंगुलेट कॉर्टेक्स का एक भाग सेरेब्रल कॉर्टेक्स मनुष्य की रोजमर्रा की जिंदगी और गतिविधियों के बीच तालमेल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह दिमाग का वह हिस्सा होता है, जहां इंसान की भावनाओं और मनोविकारों को रेग्युलेट किया जाता है। जिन लोगों के दिमाग के इस हिस्से में ग्रे ब्रेन मैटर कम होता है, उनमें सायकाइट्रिक डिसऑर्डर होने की आशंका अधिक होती हैं ।
इस आदत को डालने का सामान्य तरीका यह हो सकता हैं की आप कुछ दिन पहले माला सीढ़ी चलकर जाएँ फिर लिफ्ट का उपयोग करे। इस प्रकार क्रमशः यह आदत डालेंगे तो इससे दो फायदे होंगे पहला सीढ़ी चलने की आदत के साथ व्यायाम।
उनको जीने# में मरना आता हैं,
कोई जी जी कर मर रहा हैं ,
कोई मर मर कर जी रहा हैं
उनको मरने में जीना आता हैं। #मतलब सीढ़ी

क्या आपको पता है कि बड़ी से बड़ी बीमारी के ठीक होने में भोजन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फिर चाहें वे डायबिटीज, स्ट्रोक या हृदय जैसी कोई गंभीर बीमारी हो। अपनी अच्छी डायट से इनके हानिकारक प्रभावों को कम किया जा सकता है। ताजे फल और सब्जियाें में कई ऐसे गुण पाए जाते हैं जो हर तरह के स्वास्थ्य जोखिमों को नियंत्रित कर सकते हैं। अगर आप को भी ब्रेन स्ट्रोक का डर है तो उसे रोकने के लिए अपने खानपान में इस तरह के फ्रूट्स और सब्जियां शामिल कर सकते हैं। लेकिन ब्रेन स्ट्रोक कम करने के फूड्स के बारे में बताने से पहले आपको बता दें कि आप हाई ब्लड प्रेशर के खतरे को कम करने के लिए डिटेलुआ डायटिशियन डीएएसएच डॉयट यानी डायटरी एप्रोचेस टू स्टॉप हाइपरटेंशन को भी फॉलो कर सकते हैं।
एक डीएएसएच डायट में कोलेस्ट्रॉल, सोडियम और फैट की कम से कम मात्रा होती है। इसके लिए अपने आहार में साबुत अनाज, फल, सब्जियां, लीन प्रोटीन और कम वसा वाले डेयरी उत्पादों के सेवन पर जोर दिया जाता है। डीएएसएच डॉयट में फाइबर, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम की मात्रा से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। जिनमें शामिल हैं:सब्जियांः प्रतिदिन 3 से 5 तरह की सब्जियां खाएं , फलः प्रतिदिन 4 से 5 तरह के फल खाएं अनाजः प्रतिदिन 6 प्रकार के अनाज खाएं,लो-फैट और फ्री डेयरी उत्पादः प्रतिदिन 2 से 3 मात्रा में इनका सेवन करें नट्स, सीड्स और फलियां: प्रति सप्ताह 3 से ५,फैट और तेल: प्रतिदिन 2 से 3 सर्विंग शुगर की मात्राः प्रति सप्ताह 0 से 5 सर्विंग्स , सोडियम: प्रति दिन 1,500 मिग्रा से अधिक नहीं
ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं जिनमें कैलोरी और फैट की कम मात्रा होती है। लेकिन, ये पदार्थ फाइबर का एक अच्छा स्त्रोत भी होते हैं। जो शरीर को तरोजाता रखने के साथ इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाने में मददगार होते हैं।
ब्रेन स्ट्रोक का मुख्य कारण हाई ब्लड प्रेशर होता है। वहीं, केले में पोटैशियम की उच्च मात्रा होती है जो ब्लड प्रेशर कम करने में मददगार होता है। अगर नियमित तौर पर अपने आहार में आप केले का सेवन करते हैं, तो 24 फीसदी तक ब्रेन स्ट्रोक के जोखिम को कम कर सकते हैं।
कम वासा वाले दूध और उससे बने उत्पादों में मैग्नेशियम और कैल्‍शिम के साथ-साथ पोटैशियम की भी उच्च मात्रा पाई जाती है। ये प्राकृतिक रूप से कोलेस्‍ट्रॉल के लेवल को कम करने में मदद करते हैं। इसके अलावा जौ और भुट्टा जैसे आहार में भी मैग्नेशियम का अच्छा स्त्रोत माना जाता है। इनके सेवन से आप 30 फीसदी तक स्ट्रोक के जोखिम को कम कर सकते हैं।
आप हेल्दी नाश्ते के तौर पर ओटमील को भी अपने आहार में शामिल कर सकते हैं। ओटमील खाने से शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम होता है। साथ ही, यह पेट को भी स्वस्थ्य रखता है। इसमें आप बादाम और सोया भी मिला सकते हैं। इन तीनों में ही फैट की मात्रा बहुत कम होती है। यह बैड कोलेस्‍ट्रॉल के लेवल को 28 फीसदी तक कम कर सकते हैं।
शकरकंद में फाइबर का अच्छा स्त्रोत पाया जाता है।
ब्लूबेरी और इसकी प्रजातियां एंटी-ऑक्सीडेंट्स का एक अच्छा स्त्रोत होते हैं। ये खून की नसों को चौड़ा करने में मदद कर सकते हैं।
पालक में पर्याप्त मात्रा में मैग्नीशियम, विटामिन बी और फोलेट की मात्रा पाई जाती है। यह ब्लड प्रेशर को कम करता है और स्ट्रोक के जोखिम से भी बचाता है। इसके साथ ही, बीन्‍स में भी फोलेट और विटामिन बी की अच्छी मात्रा होती है। इनसे सेवन से 20 फीसदी तक स्ट्रोक के जोखिम को कम किया जा सकता है।
स्ट्रोक कम करने के फूड्स की जानकारी के लिए यह सबसे जरूरी है की आप जो भी खा रहें हैं या जिस भी खाद्य पदार्थ को खरीद रहें हैं, उसके पैक पर लगे लेबल की जांच करें। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के निर्देशों के अनुसार मार्केट में मिलने वाले हर तरह के खाद्य उत्पादक कंपनियों को अपने उत्पादित पदार्थों में मिले सभी पदार्थों की मात्रा सही मात्रा पैक के लेबल पर अंकित करना अनिवार्य है। इस जानकारी से आप आसानी से अपने लिए स्ट्रोक कम करने के फूड्स का चुनाव कर सकते हैं। जब भी आप मार्केट से किसी भी तरह के खाद्य पदार्थ खरीदें, तो उसके पैक पर इनकी मात्रा चेक करेंःकैलोरीकुल वसा संतृप्त वसा ट्रांस वसा कोलेस्ट्रॉल सोडियम फाइबर आहार
एक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक हर साल विश्वभर में लगभग 5 लाख लोगों की मृत्यु ब्रेन स्ट्रोक के कारण होती है। वहीं, अमेरिका में होने वाली मौतों में मस्तिष्काघात तीसरा सबसे बड़ा कारण भी है। हालांकि, आप अपने लाइफस्टाइल और दैनिक आहार में ही बदलाव करके स्ट्रोक के 80 फीसदी जोखिम को कम कर सकते हैं।
साथ ही, स्ट्रोक कम करने के आहार के नियमों के पालन के साथ-साथ आपको अपनी कुछ आदतों जैसे, स्मोकिंग या बहुत ज्यादा फास्ट फूड और फैटी खाद्य पदार्थों को खाने की आदतों में बदलाव लाना होगा और नियमित तौर पर एक्सरसाइज भी करना होगा।
अचानक से शरीर के किसी हिस्से का काम करना बंद कर देना, बेहोश होना, बोलने में परेशानी होना, देखने में परेशानी महसूस करना, किसी की कही बात समझने में परेशानी होना, चक्कर आना या अचानक से बहुत तेज सिर दर्द होना जैसे लक्षण ब्रेन स्ट्रोक के कारण हो सकते हैं।
ब्रेन स्ट्रोक को हिंदी में ‘मस्तिष्क का दौरा’ या मस्तिष्काघात कहा जाता है। कुछ स्वास्थ्य स्थितियां भी ब्रेन स्ट्रोक के कारण बन सकते हैं। जैसे, हाई ब्लड प्रेशर, बहुत ज्यादा स्मोकिंग या अल्कोहल पीने की आदत, दिल से जुड़े रोग, हाई ब्लड कोलेस्ट्राल लेवल या डायबिटीज की समस्या। साथ ही, कुछ मामलों में आनुवांशिक या जन्मजात स्थितियां भी मस्तिष्काघात का कारण हो सकती हैं।
तंत्रिका तंत्र शरीर से मस्तिष्क तक आगे और पीछे सिग्नल भेजने का कार्य करती है। यह मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और पूरे शरीर में तंत्रिकाओं से मिलकर बना होता है। अगर ब्रेन स्ट्रोक के कारण यह ख़राब होता है तो यह ब्रेन को सिंग्नल देना बंद कर सकता है। जिससे शरीर के अंग सही रूप से कार्य करना बंद कर सकते हैं।
अगर ब्रेन स्ट्रोक के कारण नर्वस सिस्टम डैमेज होती है, तो इसके बाद किसी भी तरह की शारीरिक गतिविधियों या खेलों को खेलते समय आपको सामान्य से अधिक दर्द का एहसास हो सकता है। क्योंकि, ब्रेन स्ट्रोक के कारण तंत्रिका तंत्र डैमेज होने के बाद मस्तिष्क ठंडी या गर्मी जैसे संवेदनाओं को पहले की तरह नहीं समझ पाता है।
अन्य स्थितियां भी देखी जा सकती हैं जैसेः
मस्तिष्क के सामने का हिस्सा प्रभावित होने के कारण सोचने-समझने की क्षमता कम हो सकती है
मस्तिष्क के दाईं ओर डैमेज होने के कारण भूलने की समस्या हो सकती है
आंखों से धुंधला दिखाई दे सकता है या अंधापन भी हो सकता है
फुट ड्रॉप की समस्या हो सकती है। इसके कारण पैर के सामने के हिस्से को उठाना मुश्किल हो जाता है। इसकी स्थिति में चलते समय जब पैर की अंगुलियों को जमीन पर रखने पर खिंचाव महसूस होगा।
ब्रेन में ब्लीडिंग होने के कारण संचार प्रणाली नष्ट हो सकती है। हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या स्मोकिंग इसका मुख्य कारण हो सकता है। इसे रक्तस्रावी स्ट्रोक या इस्कीमिक स्ट्रोक भी कहा जाता है। अगर मस्तिष्क के दौरे के कारण सर्क्युलेटरी सिस्टम डैमेज होता है, तो दूसरा स्ट्रोक आने या दिल का दौरा पड़ने का खतरा भी अधिक बढ़ जाता है।
दिमाग के दौरे के कारण अगर मस्तिष्क का आंतों को नियंत्रित करने वाला हिस्सा प्रभावित होता है, तो पाचन तंत्र खराब हो सकता है। डायजेस्टिव सिस्टम डैमेज होने के कारण कब्ज की समस्या, पर्याप्त तरल पदार्थ नहीं पी पाने की समस्या या शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं होने की समस्या हो सकती है।
दिमाग के दौरे की पहचान कैसे करें?
अचानक शरीर का सुन्न होना
अचानक कमजोरी महसूस करना
अचानक हाथ-पैर का काम करना बंद कर देना
अचानक एक या दोनों आंखों से धुंधला दिखाई देना या दिखाई देना बंद होना
चलने में असमर्थ होना
बिना किसी कारण के अचानक सिरदर्द होना
हमारा मस्तिष्क एक अत्यंत जटिल अंग है जो शरीर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करता है। अगर ब्रेन स्ट्रोक के कारण मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त प्रवाह प्रभावित होता है, तो हमारा मस्तिष्क उस हिस्से के कार्य को सुचारू रूप से करने में असमर्थ हो जाता है। जिसके कारण शरीर का कोई अंग भी पैरालाइज हो सकता है। आमतौर पर ब्रेन स्ट्रोक मस्तिष्क के किसी एक हिस्से को प्रभावित करता है। हालांकि, वह दोनों हिस्सों में से जिस भी हिस्से को प्रभावित करेगा वो विकलांगता का कारण बन सकता है। हालांकि, शरीर पर इसका कितना दुष्प्रभाव होगा यह ब्रेन स्ट्रोक कारणों और अन्य स्थितियों पर भी निर्भर कर सकता है।
अगर ब्रेन स्ट्रोक मस्तिष्क के बाईं ओर होता है, तो शरीर का दाहिना हिस्सा प्रभावित होगा, जो निम्न में से कुछ या सभी दुष्प्रभावों का कारण बन सकता हैः
शरीर के दाहिनी हिस्से में लकवा होना
बोलने और बात समझने में असमर्थ होना
शरीर के अंगों का धीरे-धीरे कार्य करना
मानसिक स्थिति में परविर्तन होना, जैसे-सोचने-समझने की स्थिति कम होना
याददाश्त खोना।
मस्तिष्क के दाएं तरफ ब्रेन स्ट्रोक के कारण क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
अगर ब्रेन स्ट्रोक मस्तिष्क के दाईं ओर होता है, तो शरीर का बायां हिस्सा प्रभावित होगा, जो निम्न में से कुछ या सभी दुष्प्रभावों का कारण बन सकता हैः
शरीर के बाईं ओर का पक्षाघात यानी लकवा होना
देखने में परेशानी होना
अंधापन का कारण होना
व्यवहार में परिवर्तन होना
याददाश्त खोना।
ब्रेन स्टेम तंत्रिका तंत्र यानी नर्वस सिस्टम में एक ब्रिज की तरह काम करता है। सभी फाइबर जो शरीर से ब्रेन में जाते हैं वो ब्रेन स्टेम से होते हुए ब्रेन की नसों से गुजरते हैं। यह मस्तिष्क के केंद्र में रीढ़ की हड्डी के ठीक ऊपर होता है। जब मस्तिष्क स्टेम में ब्रेन स्ट्रोक होता है, तो ब्रेन स्ट्रोक का अटैक कितना गंभीर है इसके आधार पर, ब्रेन स्टेम शरीर के दोनों किनारों को प्रभावित कर सकता है। इसके प्रभावित होने के कारण बोलने में परेशानी, सांस लेने में तकलीफ और दिल की धड़कन अनियंत्रित हो सकती है। आमतौर पर ब्रेन स्ट्रोक के कारण ब्रेन स्ट्रेम को होने वाले जोखिम नहीं होते हैं, हालांकि, ब्रेन स्ट्रोर के कारण ब्रेन का कितना हिस्सा और कैसे प्रभावित हुआ है, ऐसी स्थिति ब्रेन स्टेम का कारण बन सकती है।
दिमाग का दौरा किसी भी उम्र के व्यक्ति को किसी भी समय आ सकता है। हर साल लगभग 6 लाख लोग स्ट्रोक के खतरे से गुजरते हैं। आधुनिक दौर में ब्रेन स्ट्रोक के उपचार के लिए जरूरी है कि अपने दैनिक आहार और शारीरिक क्रियाओं पर ध्यान दें। इसके अलावा ऐसे कई ट्रीटमेंट हैं जो मस्तिष्काघात के उपचार के लिए कारगर हैं। कृपया अपने डॉक्टर से बात करें।यह बहुत गंभीर रोग होता हैं इसमें अविलम्ब इलाज़ की जरुरत होती हैं।

सर्दियों के मौसम में महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान होठों के फटने से होती हैं। इसके साथ ही हाथ-पैरों की त्वचा भी ड्राइनेस का शिकार होने लगती है और इसका सीधा असर आपकी खूबसूरती पर पड़ता है। कुछ टिप्स अपनाकर आप सर्दी के मौसम में भी अपने होठों को कोमल और मुलायम बनाए रख सकती हैं। फटे होंठों के लिए शहद वरदान समान होता है।
ताजे दूध की क्रीम खाना बहुत लोगों को पसंद है, पर क्या आपको मालूम है कि यह आपके होंठों को नरम बनाती है। इसके लिए आपको रोजाना क्रीम को 10 मिनट तक होठों पर लगाना होगा और फिर गुनगुने पानी में भीगी रूई के फाहे से इसे हल्के हाथों से साफ कर लें। कुछ ही दिनों में आपको इसका फर्क साफ दिखने लगेगा।
अपने चेहरे की तरह ही होठों की सफाई का भी ख्याल रखें। इसके लिए रोजाना सोने से पहले अपने होठों को गुनगुने पानी से साफ करें और फिर मुलायम कपड़े से पोंछे लें। इसके बाद कोई अच्छा लिप बाम लगाकर सोएं। आप चाहें तो लिप बाम की जगह देसी घी का इस्तेमाल भी कर सकती हैं।दिनभर जितना हो सके पानी पीते रहें। यह आपके होठों की नमी को बरकरार रखता है, जिससे आपके होंठ कोमल बने रहते हैं।

नई दिल्ली । कोरोना वैक्सीन आने की खबर के बाद से ही मोदी सरकार इसकी तैयारियों में जुट गई है। इसके तहत एक केंद्र पर एक दिन में लगभग 100 लोगों को ही वैक्सीन लगेगी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसीजर के ड्राफ्ट के तौर पर राज्यों को भेजा है। इसके अनुसार, शुरुआत में एक केंद्र पर वैक्सीन एक दिन में 100 लोगों को लगेगी। हालांकि कुछ समय बाद इसमें तेजी लाई जाएगी। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा दिए ड्राफ्ट में कहा गया है, हर एक वैक्सीनेशन केंद्र पर एक गार्ड होगा और उसके साथ 4 अन्य लोग होंगे। वहीं पर 3 कमरे भी बनाए जाएंगे। इन तीन कमरों में से एक वेटिंग रूम होगा और दूसरे कमरें वैक्सीनेशन और ऑब्जरवेशन के लिए उपयोग किए जाएंगे। कुछ समय बाद सरकार कम्युनिटी हॉल और टेंट की व्यवस्था भी करेगी, ताकि टीकाकरण में तेजी आ सके। ड्राफ्ट के अनुसार, जिस व्यक्ति को वैक्सीन लगेगी, उस कम-से-कम 30 मिनट की निगरानी में रखा जाएगा। कोरोना वैक्सीन लगने के बाद अगर कोई गम्भीर प्रभाव पड़ते हैं,तब तत्काल अस्पताल में भर्ती करवाया जाएगा। ये वह कोरोना अस्पताल होगा जिनका चुनाव राज्य खुद करने वाले है।

भारतीय किसान मोर्चा के एक पदाधिकारी ने बताया कि किसानों का यह आंदोलन दिल्ली और पंजाब के आस-पास का है और जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं वह बड़े किसानों और अढ़तियों से जुड़े हुए हैं।

नयी दिल्ली। केंद्र सरकार के नए किसान आंदोलन के खिलाफ उठ रही आवाज को अब अलग-थलग करने का प्रयास किया जा रहा है। हालिया दृश्यों से यह महसूस होता है कि किसान आंदोलन को देश का आंदोलन न बताकर महज पंजाब के किसानों तक सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। रणनीति है कि महीनों पुराने इस आंदोलन को पंजाब का बताकर अलग-थलग कर दिया जाए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े कई किसान संगठन एक अलग छवि बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इन्ही में से जुड़े एक संगठन भारतीय किसान मोर्चा के एक पदाधिकारी ने बताया कि किसानों का यह आंदोलन दिल्ली और पंजाब के आस-पास का है और जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं वह बड़े किसानों और अढ़तियों से जुड़े हुए हैं। इनका आम लोगों से कोई जुड़ाव नहीं है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने आगे कहा कि हम इन तथ्यों को दूसरे राज्यों में लेकर जा रहे हैं और वहां के किसान संगठनों और छोटे किसानों की मदद यह बात सभी तक पहुंचाई जाएगी। बता दें कि इस तरह का संदेश भाजपा और आरएसएस की तमाम इकाइयों के लोग पंजाब और दिल्ली को छोड़कर सभी राज्यों में पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, किसानों के विरोध को पंजाब का साबित करने की रणनीति बनाने वाले लोगों का मानना है कि अगर हम बाकी के राज्यों में यह संदेश देने में सफल होते हैं तो इसका मतलब यह होगा कि दूसरे राज्यों ने केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कृषि कानूनों को स्वीकार कर लिया है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की कोशिश यही है कि सभी किसान संगठन नए कृषि कानूनों को स्वीकार्य कर लें और अपना आंदोलन समाप्त कर दें लेकिन पंजाब के किसान सरकार के लिए चुनौती साबित हो रहे हैं।

भारत-उज्बेकिस्तान आभासी शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मीरजियोयेव से चर्चा की शुरुआत करते हुए अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में ये बातें कहीं।

नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि भारत और उज्बेकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ता से एक साथ खड़े हैं और उग्रवाद, कट्टरवाद तथा अलगाववाद के बारे में दोनों देशों की चिंताएं भी एक जैसी हैं। भारत-उज्बेकिस्तान आभासी शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मीरजियोयेव से चर्चा की शुरुआत करते हुए अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा, ‘‘उग्रवाद, कट्टरवाद तथा अलगाववाद के बारे में हमारी एक जैसी चिंताएं हैं। हम दोनों ही आतंकवाद के ख़िलाफ़ दृढ़ता से एक साथ खड़े हैं। क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर भी हमारा एक जैसा नजरिया है।’’ प्रधानमंत्री ने इसके साथ ही अफगानिस्तान में शांति की बहाली के लिए एक ऐसी प्रक्रिया की आवश्यकता जताई जो स्वयं अफगानिस्तान की अगुआई, स्वामित्व और नियंत्रण में हो। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले दो दशकों की उपलब्धियों को सुरक्षित रखना भी आवश्यक है।’’
मोदी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी भी मजबूत हुई है और भारत, उज्बेकिस्तान के साथ विकास की भागीदारी को भी और घनिष्ट बनाना चाहता है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि भारतीय ‘‘लाइन ऑफ क्रेडिट’’ के अंतर्गत कई परियोजनाओं पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘उज्बेकिस्तान की विकास प्राथमिकताओं के अनुसार हम भारत की विशेषज्ञता और अनुभव साझा करने के लिए तैयार हैं। अवसंरचना, सूचना और प्रौद्योगिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत में काफी काबिलियत है, जो उज्बेकिस्तान के काम आ सकती है।’’ भारत और उज्बेकिस्तान के बीच कृषि संबंधी संयुक्त कार्यकारी समूह की स्थापना को प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम बताया और कहा कि इससे दोनों देश अपने कृषि व्यापार बढ़ाने के अवसर खोज सकते हैं जिससे दोनों देशों के किसानों को मदद मिलेगी। मोदी ने कहा कि मीरजियोयेव के नेतृत्व में उज्बेकिस्तान में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं और भारत भी सुधार के मार्ग पर अडिग हैं।

उन्होंने उम्मीद जताई कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं और बढ़ेंगी। उन्होंने दोनों देशों के बीच सुरक्षा साझेदारी को द्विपक्षीय संबंधों का एक मजबूत स्तम्भ बताया और पिछले वर्ष हुए सशस्त्र बलों के पहले संयुक्त सैन्य अभ्यास का जिक्र किया। उन्होंने कह, ‘‘अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्रों में भी हमारे सयुंक्त प्रयास बढ़ रहे हैं।’’ प्रधानमंत्री ने कोविड-19 महामारी के इस समय में दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे को किए गए भरपूर सहयोग पर संतोष जताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत और उज्बेकिस्तान दो समृद्ध सभ्यताएं हैं और प्राचीन समय से ही निरंतर आपसी संपर्क में रहे हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के प्रदेशों के बीच भी सहयोग बढ़ रहा है। उन्होंने इसके लिए गुजरात और अन्दिजों की सफल भागीदारी के मॉडल को इसका उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इसी तर्ज पर अब हरियाणा और फरगाना के बीच सहयोग की रूपरेखा बन रही है।

नये संसद भवन का भूमि पूजन कर शिलान्यास करने के बाद प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि नये संसद भवन का निर्माण समय और जरूरतों के अनुरूप परिवर्तन लाने का प्रयास है और आने वाली पीढ़ियां इसे देखकर गर्व करेंगी कि यह स्वतंत्र भारत में बना है।

नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नये संसद भवन के शिलान्यास को ‘‘ऐतिहासिक’’ और भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ‘‘मील का पत्थर’’ बताते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि नया भवन आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का गवाह बनेगा और 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएं पूरी करेगा। नये संसद भवन का भूमि पूजन कर शिलान्यास करने के बाद प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि नये संसद भवन का निर्माण समय और जरूरतों के अनुरूप परिवर्तन लाने का प्रयास है और आने वाली पीढ़ियां इसे देखकर गर्व करेंगी कि यह स्वतंत्र भारत में बना है। मोदी ने कहा, ‘‘पुराने संसद भवन ने स्वतंत्रता के बाद के भारत को दिशा दी तो नया भवन आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का गवाह बनेगा। पुराने संसद भवन में देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काम हुआ तो नये भवन में 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएं पूरी की जाएंगी।’’ उन्होंने कहा कि आज जैसे इंडिया गेट से आगे नेशनल वॉर मेमोरियल ने नई पहचान बनाई है, वैसे ही संसद का नया भवन अपनी पहचान स्थापित करेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘आने वाली पीढ़ियां नए संसद भवन को देखकर गर्व करेंगी कि यह स्वतंत्र भारत में बना है और आजादी के 75 वर्ष का स्मरण करके इसका निर्माण हुआ है।’’ नये संसद भवन के शिलान्यास को ‘‘ऐतिहासिक’’ बताते हुए उन्होंने कहा कि आज का दिन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में मील के पत्थर की तरह है। उन्होंने कहा, ‘‘भारतीयों द्वारा, भारतीयता के विचार से ओतप्रोत भारत के संसद भवन के निर्माण का प्रारंभ हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं के सबसे अहम पड़ाव में से एक है। हम भारत के लोग मिलकर अपनी संसद के इस नए भवन को बनाएंगे। ...और इससे सुंदर क्या होगा, इससे पवित्र क्या होगा जब भारत अपनी आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर पर्व मनाएगा, उस पर्व के साथ-साथ प्रेरणा हमारे संसद की नई इमारत बने।’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि आज 130 करोड़ से ज्यादा भारतीयों के लिए बड़े सौभाग्य और गर्व का दिन है जब सभी इस ऐतिहासिक पल के गवाह बन रहे हैं।

उन्होंने कहा कि नये संसद भवन का निर्माण नूतन और पुरातन के सहअस्तित्व का उदाहरण है और यह समय तथा जरूरतों के अनुरूप खुद में परिवर्तन लाने का प्रयास है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर उस दिन को भी याद किया जब 2014 में पहली बार एक सांसद के तौर पर वह संसद भवन पहुंचे थे और उस वक्त उन्होंने लोकतंत्र के इस मंदिर में कदम रखने से पहले माथा टेक कर नमन किया था। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे वर्तमान संसद भवन ने आजादी के आंदोलन और फिर स्वतंत्र भारत को गढ़ने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। आजाद भारत की पहली संसद भी यहीं बैठी। इसी संसद भवन में हमारे संविधान की रचना हुई है। बाबा साहेब आंबेडकर और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने सेंट्रल हॉल में गहन मंथन के बाद हमें अपना संविधान दिया। संसद की मौजूदा इमारत स्वतंत्र भारत के हर उतार-चढ़ाव, हमारी हर चुनौतियों और समाधान, हमारी आशा और आकांक्षाओं और हमारी सफलता का प्रतीक रही है।

बदलती जीवनशैली ने न सिर्फ लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है, बल्कि मानसिक रोगियों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। मानसिक रोगियों को शारीरिक रोगियों के मुकाबले ज्यादा देखभाल और सहानुभूति की जरूरत होती है, लेकिन होता इसके उलट है। कई बार तो लोगों का व्यवहार मानसिक रोगियों के लिए ज्यादा असहनीय हो जाता है। इसीलिए मानसिक रोगों के लक्षण नजर आने पर भी कई लोग उस बारे में खुलकर बात नहीं करते और डॉक्टर के पास जाने से भी कतराते हैं। इससे रोग और बढ़ जाता है। पूरे विश्व में तेजी से बढ़ती मानसिक रोगियों की संख्या को देखते हुए इनके प्रति जागरूकता बहुत जरूरी है।
क्या हैं इनके कारण
आनुवांशिक कारणों के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय कारक भी मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जो माता-पिता महत्वाकांक्षा के कारण अपने बच्चों को वक्त नहीं दे पाते या जो बच्चे गरीबी में पले-बढ़े होते हैं या जिनकी मां बचपन में मर जाती हैं या पिता शराब पीकर बच्चों की पिटाई करते हैं, ऐसे बच्चों के बड़े होकर मानसिक रोगी होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। सिर में लगी चोट, संक्रमण, तनाव और अनिद्रा भी व्यक्ति को मानसिक रोगी बना सकती है। लंबे समय तक तनाव में रहने से भी मास्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।
डिप्रेशन
महानगरों में डिप्रेशन यानी अवसाद से पीड़ित लोगों की संख्या 15-17 प्रतिशत है। आमतौर पर यह बीमारी 13 से 35 वर्ष की उम्र में देखने को अधिक मिल रही है। लोग पूरी नींद नहीं ले पाते। तेज रफ्तार जिंदगी में मस्तिष्क को पूरा आराम नहीं मिल पाता। तनाव के कारण शरीर में कई हारमोनों का स्तर बढ़ता जाता है जिन्हें एड्रिनलीन और काट्रिसोल प्रमुख हैं। इनकी वजह से दिल का तेजी से धड़कना, पाचन-क्रिया का मंद पड़ जाता, रक्त का प्रवाह प्रभावित होना, नर्वस सिस्टम की क्रिया प्रणाली में गड़बड़ी और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने जैसी समस्याएं हो जाती हैं। यह स्थिति कुछ समय तक लगातार बने रहने से अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती है।
डिमेंशिया
यह भूलने की बीमारी है जो लगातार गंभीर होती जाती है। व्यक्ति नाम और जगहों को भी भूलने लगता है। ऐसे व्यक्ति में भाषा और ध्यान केंन्द्रित न कर पाने की समस्याएं भी देख जाती हैं। इसमें मस्तिष्क का वह भाग नष्ट हो जाता है, जो भावनाओं पर नियंत्रण रखता है। इसलिए व्यक्ति मूडी हो जाता है। तनाव, पोषक भोजन की कमी आदि इसके प्रमुख कारण हैं।
पार्किसन
डोपामिन रसायन हमारे मस्तिष्क की विभिन्न तंत्रिकाओं के बीच संदेशवाहक का काम करता है। जब डोपामिन का निर्माण करने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं तो पार्किसन के लक्षण प्रकट होते हैं। डोपामिन हमारे शरीर की गति को नियंत्रित रखता है। इस लिए इसकी कमी से हाथ-पैरों में कंपकपी, शरीर का संतुलन बिगड़ना, मांसपेशियों का कड़क हो जाना तथा अत्यधिक थकान रहना आम बात हो जाती है। बाद में मरीज डिप्रेशन में चला जाता है।
सिजोफ्रेनिया
यह एक जटिल मानसिक रोग है। इसमें रोगी कल्पनाओं में जीने लगता है। इसमें रोगी के लिए वास्तविक और अवास्तविक चीजों में भेद करना मुश्किल हो जाता है। कई मरीजों को अजीब तरह की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। वह कई तरह के भ्रम में जीने लगता है। इसका मुख्य कारण एकाकीपन, बेरोजगारी, गरीबी, नशीली दवाओं का सेवन है। बच्चे की अधिक पिटाई भी आगे चलकर इसका कारण बन सकती है।
अल्जाइमर
यह एक घातक मानसिक रोग है। इसमें मस्तिष्क की कोशिकाओं का आपस में संपर्क खत्म हो जाता है। परिणामस्वरूप मास्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है। यह 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में पाया जाने वाला सामान्य मस्तिष्क रोग है।
मेनिया
मेनिया अर्थात उन्माद रोग एक गंभीर मनोरोग है। इसमें रोगी अत्यंत उत्तेजक और हिंसक हो जाता है। यह एक खतरनाक मानसिक अवस्था है। व्यक्ति उत्तेजित हो जाता है तो वास्तविकता से संपर्क टूट जाता है।
एंजाइटी
अत्यधिक चिंता, बेचैनी, भविष्य का डर आदि इसका प्रमुख कारण हो सकता है। इससे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसमें थकान, सिरदर्द और अनिद्रा रहती है।
क्या है उपचार
हमारे देश में मानसिक रोग के प्रति जागरूकता का अभाव है। 90 प्रतिशत रोगी तो उपचार के लिए कभी हॉस्पिटल भी नहीं जाते। कई मामलों में यदि रोग का पता चल भी जाता है तो मरीज और उसके परिवार वाले खामोशी से सहते रहते हैं। कहां से सहायता प्राप्त की जाए, वे यह भी नहीं जानते। अगर मरीज को सही समय पर उचित इलाज उपलब्ध कराया जाए तो कई मानसिक रोगों का पूरी तरह इलाज संभव है।
फार्मेकोथेरेपी
दवाओं से किसी मानसिक रोग के उपचार को फार्मेकोथेरेपी कहते हैं। कई आधुनिक दवाएं बहुत अच्छी हैं, जिनसे मस्तिष्क को स्वस्थ कर रोगी का इलाज किया जाता है।
साइकोथेरेपी
सामान्यत: साइकोथेरेपी का उपयोग मानसिक रोगों या भावनात्मक आघातों के लिए किया जाता है। इसमें मरीज से विस्तार से बातचीत कर उसकी मानसिक अवस्था का अध्ययन किया जाता है और रोग के कारणों का पता लगाया जाता है। इस थेरेपी के द्वारा रोगी को परिस्थितियों से तालमेल बिठाने और खुद को स्वीकार करने में मदद की जाती है।
बिहैवियर थेरेपी
यह बिहैवियर डिसऑर्डर को ठीक करने की पद्धति है। यह अवसाद, उत्तेजना, भय आदि में सहायक हो सकती है।
संतुलित भोजन खाएं
जिस तरह शरीर को पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मस्तिष्क को भी पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, वसा मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी हैं। दिन में तीन बार भरपूर भोजन की बजाए 5 या छह बार थोड़ा-थोड़ा खाएं। इससे रक्त में शर्करा का स्तर कम नहीं होता। शराब का सेवन न करें या कम से कम करें।
भरपूर सोएं
नींद की कमी से मस्तिष्क अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाता। इससे सोचने की क्षमता, सृजनशीलता और समस्याओं को हल करने की क्षमता कम होती है। अनिद्रा के कारण अवसाद, एंजाइटी जैसे मानसिक रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
शारीरिक रूप से फिट रहें
शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। नियमित रूप से व्यायाम करें। व्यायाम करने से मस्तिष्क में रक्त का संचरण बढ़ता है, जिससे मस्तिष्क की कार्यक्षमता भी बढ़ती है।
मस्तिष्क का उपयोग करें
नए शोधों ने यह साबित किया है कि मस्तिष्क भी मांसपेशियों के समान ही कार्य करता है। जितना ज्यादा आप इसका इस्तेमाल करेंगे, उतना ही यह शक्तिशाली होगा। मानसिक व्यायाम नई मस्तिष्क कोशिकाओं के निर्माण में मदद कर याददाश्त बढ़ाता है। नई जटिल चीजें सीखें। जैसे कोई नई भाषा, चुनौतीपूर्ण खेल जैसे शतरंज आदि खेलें। सुडोकू, क्रॉस वर्ड आदि बेहतरीन मानसिक व्यायाम हैं।
तनाव न लें
तनाव मस्तिष्क का सबसे बड़ा शत्रु है। अगर समय रहते इसको नियंत्रित न किया गया तो लगातार तनाव की स्थिति मस्तिष्क की कोशिकाओं और हिप्पोकैंपस को नष्ट कर देगी। हिप्पोकैंपस मस्तिष्क का वह क्षेत्र है जो नई यादों को बनाने और पुरानी यादों को संजोकर रखने का काम करता है। इसके नष्ट होने से डिमेंशिया होने की आशंका बढ़ जाती है।
भरपूर पानी पिएं
हमारे शरीर में करीब 80 प्रतिशत पानी होता है। डिहाइड्रेशन हमारी मानसिक ऊर्जा और क्षमता को कम करता है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी रोजाना कम-से-कम 4 लीटर पानी का सेवन बहुत जरूरी है।
योग और ध्यान करें
योग मेटाबॉलिक रेट को बढ़ाता है, रक्त को शुद्ध करता है और रक्त संचरण को तेज करता है। ये सारी चीजें मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में काफी सहायक होती हैं। मानसिक शांति के लिए ध्यान करें। वैज्ञानिकों ने भी साबित किया है कि अवसाद, उत्तेजना, अनिद्रा में बहुत उपयोगी है ध्यान। ध्यान सेरेब्रल कोरटेक्स की मोटाई बढ़ाता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच संपर्को को बढ़ता है, जिससे स्मृति तेज
मानसिक रोग के आम लक्षण
-मन उदास रहना, कुछ भी अच्छा नहीं लगना, बात-बात में गुस्सा होना।
-अंदर ही अंदर घुटन महसूस करना, आत्मविश्वास का समाप्त हो जाना, याददास्त की कमी, तेज दिमाग का मद्धिम होना, भूख एवं नींद में कमी।
-बहुत ज्यादा उत्तेजित होना, बहुत ज्यादा खुश होना, लगातार बोलते रहना, ज्यादा खर्च करना।
-असामान्य व्यवहार करना, ज्यादा शक करना, सशंकित रहना, कान में काल्पनिक आवाज सुनाई देना।
-भीड़-भाड़ वाले स्थान जैसे बस, बाजार में अकेले जाना।
-बार-बार हाथ धोना, बार-बार बंद ताले की जांच करना।
- शराब, तंबाकू चाह कर भी नहीं छोड़ पाना।
-बच्चों का जरुरत से ज्यादा चंचल होना, स्थिर रहकर पढ़ाई या अन्य काम नहीं कर पाना एवं आवेश में आकर कार्यो को करना।
इसके लिए आयुर्वेद चिकित्सा भी लाभकारी हैं। चिकित्स्कीय परामर्श लेना जरुरी हैं।

एक रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिसर्च के मुताबिक भारत में करीब 70 प्रतिशत लोग विटमिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। विटमिन डी की कमी होने पर हड्डियों का कमजोर होना और हड्डियों से संबंधित बीमारियां, इम्यून सिस्टम कमजोर होना और डिप्रेशन की स्थिति शामिल है। ऐसे में अगर आप जिम में जाकर पसीना भी बहा रहे हैं, तो कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए आपको अपनी डायट में कुछ ऐसी चीजों को शामिल करना चाहिए जिन्हें पीने से आपके शरीर को भरपूर विटमिन डी मिलेगा।
ऑरेंज जूस
ऑरेंज जूस में विटमिन सी बहुलता से होता ही है साथ ही में यह विटमिन डी की कमी को दूर करने में भी मदद करता है। पैक्ड जूस की जगह घर पर ही इस फ्रूट का जूस निकालें और रोज पिएं, इससे आपको फायदा होगा।पैक्ड जूस में रसायन मिश्रित होने से हानिकारक होता हैं।
गाय का दूध
गाय का दूध विटमिन डी का बहुत अच्छा स्त्रोत हैं है। हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो लो फैट मिल्क की जगह लोगों को फुल क्रीम मिल्क पीना चाहिए जिसमें ज्यादा विटमिन डी और कैल्शियम होता है।आजकल शुद्ध दूध मिलना बहुत कठिन हैं। जहाँ तक हो शुद्ध दूध प्राप्त कर उपयोग करना चाहिए।
दही का करें सेवन
दूध से बनने वाला दही भी विटमिन डी अधिकता में होता है। रोज-रोज अगर दही न खाया जा सके तो इसकी लस्सी या छाछ बनाई जा सकती है जो टेस्टी तो होगी ही साथ ही में दही के पूरे फायदे भी आपको मिलेंगे।
सोया मिल्क में भी गाय के दूध की तरह विटमिन डी की भरपूर मात्रा होती है। इस दूध को चाहे तो आप यूं ही पी सकते हैं या फिर डॉक्टर की सलाह से इसमें ऐसा फ्लेवर पाउडर मिला सकते हैं जिसमें विटमिन डी हो।
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन

स्टैटिन दवाओं के दुष्प्रभाव
--वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन
एलॉपथी दवा खाने से एक बीमारी समाप्त होती हैं तो कई उसके साइड इफेक्ट्स देखने मिलते हैं। इससे अब सामान्य जन मानसिक रूप से बचते हैं ,पर अन्य कोई विकल्प न होने से लेने को मजबूर होना पड़ता हैं।
यदि आप कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने के लिए स्टैटिन दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो ये बातें आपको जरूर पता होनी चाहिए...
कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए आप जिन स्टैटिन दवाओं का उपयोग करते हैं, ये दवाएं आपके शरीर में उस पदार्थ की उपस्थिति को नियंत्रित करती हैं, जिसका उपयोग करके आपका शरीर कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करता है। लेकिन कोलेस्ट्रॉल को कम करने के फायदे के साथ ही स्टैनिन दवाएं आपके शरीर पर और भी कई असर डालती हैं। यदि आप भी अपने बढ़ते कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो आपको खुछ खास बातें जरूर पता होनी चाहिए...
स्टैनिन के लगातार उपयोग से आपके हार्ट की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इस कारण हार्ट डिजीज और हार्ट स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। हालांकि ये दवाएं काफी हद तक ब्लड क्लॉट्स को बनने से रोकटी हैं और इन थक्कों के जमाव का रिस्क भी कम करती हैं। लेकिन लगातार इन दवाओं का सेवन बिना किसी डॉक्टर की सलाह के करना आपकी जान के लिए जोखिम खड़ा कर सकता है।
आपको बता दें कि कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करनेवाली दवाओं के साथ डॉक्टर्स अक्सर हार्ट को हेल्दी रखने की दवाएं भी प्रिस्क्राइव करते हैं। इसलिए पहली बात तो आपको यह समझ लेनी चाहिए कि इन दवाओं की सिर्फ उतनी ही मात्रा का सेवन आपको करना है, जितनी मात्रा आपके डॉक्टर ने आपको सजेस्ट की हो।
आपको स्टैटिन दवाओं का सेवन करना चाहिए या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल कितना है और आपके हार्ट की सेहत कैसी है। साथ ही आपकी ब्लड वेसल्स की स्थिति कैसी है। इसलिए आपको स्टैटिन दवाएं लिखने से पहले आपके डॉक्टर आपकी सेहत के कई दूसरे पहलुओं की जांच करते हैं और तभी इन दवाओं को लेने का सुझाव देते हैं।
ऐसे समझें कोलेस्ट्रॉल की स्थिति
आमतौर पर लोगों को अपना टोटोल कोलेस्ट्रॉल लेवल 200 मिलीग्राम प्रतिडेसिलीटर (mg/dL)से नीचे रखना चाहिए। या फिर आप इसे 5.2 मिलीमोल्स प्रतिलीटर (mmol/L) में भी नाप सकते हैं।
-अगर बात एलडीएल यानी कि बैड कॉलेस्ट्रॉल की करें तो इसका स्तर 100 मिलीग्राम प्रतिडेसिलीटर से कम होना चाहिए। आप इसे 2.6 मिलीमोल्स प्रतिलीटर में नाप सकते हैं। लेकिन अगर आपके परिवार में हार्ट डिजीज की हिस्ट्री है तो आपके बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर 70 मिलीग्राम प्रतिडेसिलीटर (1.8 mmol/L) से ऊपर नहीं होना चाहिए।
आपको स्टैटिन लेने की सलाह देते समय आपके डॉक्टर कई बातों को ध्यान में रखते हैं। खासतौर पर जब वह आपको लंबे समय तक स्टैटिन लेने की सलाह दे रहे हों। क्योंकि यदि आपका हार्ट डिजीज का जोखिम बहुत कम है तो आपको संभवतः स्टैटिन की आवश्यकता नहीं होगी, जब तक कि आपका एलडीएल 190 मिलीग्राम प्रति डीएल (4.92 मिलीमोल प्रतिलीटर) से ऊपर न हो।
स्टैटिन्स के साइड इफेक्ट्स
-आमतौर पर स्टैटिन दवाएं ज्यादातर लोगों का शरीर स्वीकार कर लेता है। जिन लोगों में इसके हल्के-फुल्के साइड इफेक्ट्स होते हैं, उनका शरीर इन बदलावों को शुरुआती स्तर पर दिखाता है लेकिन फिर स्वीकार कर लेता है। यह स्थिति बहुत गंभीर नहीं है। लेकिन आपको अपने डॉक्टर से कोई भी बात छिपानी नहीं चाहिए। शाकाहारी लोग ऐसे बचें कोरोना वायरस से, इन फूड्स से मिलेगा Vitamin-D
-इन दवाओं को शुरू करने के बाद यदि आपके शरीर में किसी भी तरह का बदलाव होता है जैसे आपको मितली आना, सिर में दर्द रहना, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना इत्यादि तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए।
-ऐसा संभव है कि स्टैटिन शुरू करने के बाद आपका ब्लड शुगर लेवल बढ़ा हुआ रहने लगे, यह आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज की वजह भी बन सकता है।
उच्च कोलेस्ट्रॉल के लिए 6 आयुर्वेदिक उपचार
कोलेस्ट्रॉल एक प्रकार का फैटी एसिड होता है जो लीवर द्वारा उत्पादित होता है. शरीर कोलेस्ट्रॉल का उपयोग विभिन्न गतिविधियों को करने के लिए करता है जैसे कि हार्मोन, पित्त एसिड और विटामिन डी को संश्लेषित करना है. आयुर्वेद इसे स्नेहन के मामले में शरीर का एक महत्वपूर्ण घटक मानता है. कोलेस्ट्रॉल को संतुलित करने का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण न केवल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को रोकने के लिए है बल्कि आहार को कड़ाई से नियंत्रित करने के लिए भी है ताकि कोलेस्ट्रॉल का स्राव कम किया जा सके. यहां कुछ आयुर्वेदिक टोपी-युक्तियां दी गई हैं जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने और शरीर के सामान्य शरीर के कार्य को बहाल करने में मदद कर सकती हैं:
मेडिकागो सतीना: वह अल्फल्फा के रूप में जाने जाते हैं और धमनी से संबंधित बीमारियों से निपटने की उनकी क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं. वह कोलेस्ट्रॉल से घिरे धमनियों को साफ़ करने में सक्षम हैं. उन्हें पूरी तरह से या रस में मिलाकर रोजाना खाया जा सकता है.
अर्जुन: अर्जुन अभी तक एक और शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है जो दिल की बाधाओं, दिल के दौरे इत्यादि जैसे हृदय संबंधी स्थितियों से निपटने में शक्तिशाली शक्तिशाली है. अर्जुन पेड़ की छाल पाउडर के रूप में ली जा सकती है और खाया जा सकता है. उनके पास कोलेस्ट्रॉल को भंग करने और दिल की रोकथाम को रोकने की क्षमता है. यह गर्म पानी के साथ नाश्ते से पहले, सुबह में पहले उपभोग किया जाना चाहिए.
धनिया: धनिया को सबसे अच्छा हर्बल मूत्रवर्धक एजेंट माना जाता है. यह किडनी को पुनर्जीवित कर सकता है और अपशिष्ट के विसर्जन के मामले में उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करता है. इसलिए किडनी शरीर से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को फ्लश कर सकता है. धनिया को दैनिक आधार पर भोजन के साथ उपभोग किया जा सकता है.
लहसुन: फिर से लहसुन मानव जाति के लिए सदियों से ज्ञात है और उच्च कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है. दैनिक आधार पर लहसुन के दो लौंग रक्त में उच्च कोलेस्ट्रॉल के प्रभाव को पूरी तरह से बेअसर कर सकते हैं. धमनियों को मुक्त करने के अलावा लहसुन के कई अन्य स्वास्थ्य लाभ हैं.
गुगुलु: यह जड़ी बूटी रक्त में उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल के इलाज के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सकों के बीच लोकप्रिय जड़ी बूटियों में से एक है. उनमें गुगुलस्टेरोन होते हैं, जिन्हें रक्त में खराब कोलेस्ट्रॉल का सक्रिय अवरोधक माना जाता है. इस पदार्थ के 25 मिलीग्राम की खपत एक व्यक्ति को उच्च कोलेस्ट्रॉल से पूरी तरह से मुक्त कर सकती है. उन्हें किसी भी भोजन के बाद लिया जा सकता है.
पवित्र तुलसी या तुलसी: पवित्र तुलसी एक और लोकप्रिय और पारंपरिक भारतीय केंद्र है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा रक्त प्रवाह में उच्च कोलेस्ट्रॉल का इलाज करने के लिए किया जाता है. वह किडनी के माध्यम से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को खत्म कर सकते हैं. इसका उपयोग कई दवाओं की तैयारी के लिए किया जाता है. यह एक सिद्ध औषधीय जड़ी बूटी है जो रक्त में अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल से निपटने में बहुत ही कुशल है. उनके शरीर से कोलेस्ट्रॉल को विघटित करने की क्षमता है. तुलसी की 2-3 पत्तियों को दैनिक आधार पर उपभोग किया जा सकता है. यदि आप किसी विशिष्ट समस्या के बारे में चर्चा करना चाहते हैं, तो आप आयुर्वेद से परामर्श ले सकते हैं.
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन

शाकाहारी ऐसे बचें कोरोना वायरस से
--वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल /पुणे
कोरोना वायरस के कारण उन लोगों की स्थिति अधिक गंभीर बन रही है, जिनके शरीर में विटमिन-डी की कमी पाई गई। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विटमिन-डी हमारी इम्यून सेल्स को ऐक्टिव करने और उनके उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। शाकाहारी लोग किस तरह अपने खाने में विटमिन-डी की मात्रा बढ़ा सकते हैं...
आमतौर पर विटमिन-डी (Vitamin-D) की प्राप्ति एनिमल प्रॉडक्ट्स से ही होती है। यही कारण है कि ज्यादातर शाकाहारी लोगों में इस जरूरी विटमिन की कमी पाई जाती है। हमारे देश में महिलाओं में इसकी कमी का एक और बड़ा कारण है, उनका हर समय शरीर को ढके रहना। ऐसे में शाकाहारी लोग और महिलाएं इन फूड्स को अपनी डायट में शामिल कर शरीर में विटमिन-डी की कमी को पूरा कर सकते हैं...
गर्मी के मौसम के अनुसार आपको हेल्दी रहने और विटमिन-डी प्राप्त करने के लिए क्या खाना चाहिए,
-धूप, मशरूम, फोर्टिफाइड मिल्क, इंसटेंट ओटमील, विटमिन-डी टैबलेट्स, संतरे का जूस
सबसे पहले धूप की बात
-ज्यादातर लोगों को पता है कि सूरज की किरणें विटमिन-डी की प्राप्ति का प्राकृतिक माध्यम हैं। लेकिन आमतौर पर लोग धूप में पूरे शरीर को ढंककर बैठते हैं। इस कारण सूरज की किरणें त्वचा के अंदर पैनिट्रेट नहीं कर पातीं और सही मात्रा में विटमिन-डी नहीं मिल पाता।
-सुबह की गुनगुनी धूप हमारे ब्रेन, हमारी आंखों और हमारी स्किन के लिए बहुत अधिक फायदेमंद होती है। लेकिन जरूरी नहीं कि हर मौसम में और हर दिन सुबह के समय ही विटमिन-डी मिले।
-लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि सूरज की रोशनी हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि यह अच्छी नींद लाने में हमारी मदद करती है। इससे शरीर में विटमिन-डी का अवशोषण भी सही तरीके से होता है।
मशरूम से मिलता है विटमिन-डी
-गर्मी और बरसात के समय में मशरूम की सब्जी खाने से हमारे शरीर को जरूरी मात्रा में विटमिन-डी की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं इसमें पोटैशियम, प्रोटीन और सेलेनियम भी होते हैं। यही वजह है कि मशरूम खाने से हमारी हड्डियां सेहतमंद रहती हैं।
फोर्टिफाइड मिल्क
गाय का दूध पीने से शरीर में विटमिन-डी की कमी भी पूरी हो जाती है। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। इसलिए जरूरी है कि आप विटमिन-डी फॉर्टिफाइड दूध पिएं। गाय का दूध में विटमिन-डी फोर्टिफाइड हो तो इसका लाभ कई गुना बढ़ जाता है।
-गाय के दूध के अलावा मार्केट में विटमिन-डी फोर्टिफाइड सोया मिल्क भी आता है। सोया मिल्क खासतौर पर उन लोगों के लिए विटमिन-डी की प्राप्ति का अच्छा जरिया हो सकता है, जिन्हें लैक्टोस से एलर्जी है। यानी जिन्हें दूध पीने के बाद किसी भी तरह की दिक्कत होती है।
विटमिन-डी टैबलेट्स
मार्केट में विटमिन-डी की टैबलेट्स उपलब्ध हैं। अगर आप चाहकर भी अपने शरीर को विटमिन-डी उसकी जरूरत के अनुसार नहीं दे पा रहे हैं तो आप इन टैबलेट्स का सेवन कर सकते हैं।
-विटमिन-डी की टैबलेट सप्ताह में एक बार और लगातार दो महीने तक लेनी होती है। ऐसा उन लोगों के लिए है, जिनके शरीर में इसकी बहुत अधिक कमी हो गई हो। बाकी आप अपनी जांच कराने के बाद या अपने डॉक्टर के परामर्श के हिसाब से इनका सेवन कर सकते हैं।
इंस्टेंट ओटमील
हर चीज की तरह मार्केट में आपको ओटमील की भी कई वैरायटीज मिल जाएंगी। लेकिन अगर आप धूप और दूध के जरिए विटमिन-डी प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो इंस्टेंट ओटमील का सेवन करें। यह आपके शरीर को विटमिन-डी प्राप्त करने में मदद करेगा।
हालांकि इस बात का ध्यान रखें कि ओटमील से आपके शरीर को उतना विटमिन-डी नहीं मिल पाएगा, जितने की आपके शरीर को जरूरत होती है। लेकिन फिर भी इसके सेवन से आपके शरीर में विटमिन-डी की मात्रा बढ़ाने में मदद मिलेगी।
संतरे का जूस
संतरा भी मशरूम की तरह ही विटमिन-डी की प्राप्ति का एक प्राकृतिक सोर्स है। लेकिन यह सर्दियों का फल है और हमें इस साल गर्मियों में इसकी जरूरत है। तो मार्केट में मिलनेवाले स्टोर्ड ऑरेंज का जूस आप पाइनऐपल और दूसरे मौसमी फलों के साथ मिलाकर तैयार कर सकते हैं।
इससे आपको बेमौसम फल खाने का नुकसान भी नहीं होगा और सीमित मात्रा में ही सही आप विटमिन-डी का कुछ अंश प्राप्त कर पाएंगे। इन फूट्स के साथ बेहतर होगा कि आप अपने डॉक्टर की सलाह से विटमिन-डी टैबलेट्स का भी सेवन करें। साथ ही जितना संभव हो सके स्किन को खुला रखकर 45 मिनट के लिए धूप में हर दिन बैठें।
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन

जैन तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव जी-कृषि कर्म के जनक
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन
भारत को एक कृषि प्रधान देश माना जाता है। यहां पर प्राचीनकाल से ही खेती की जा रही है। सवाल यह उठता है कि भारत में कृषि करना कब से प्रारंभ हुआ और क्या रामायण एवं महाभारत काल में भी होते थे किसान या होती थी खेती-किसानी? क्या है इसके सबूत?
भारत में वैसे तो कृषि कार्य रामायण और महाभारत से भी पूर्व से किया जा रहा है। लोग खेत जोतते थे और उसमें अनाज, सब्जी आदि उगाते थे। कुछ लोग खेती के साथ ही गोपालन भी कहते थे और कुछ लोग सिर्फ गोपालन का ही कार्य करते थे। आज भी भारत के बहुत से त्योहार खेती और किसानी से ही जुड़े हुए हैं।
संसार की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में उल्लेख मिलता है कि अश्विन देवताओं ने राजा मनु को हल चलाना सिखाया। ऋग्वेद में एक स्थान पर अपाला ने अपने पिता अत्रि से खेतों की समृद्धि के लिए प्रार्थना की है।
अथर्ववेद के एक प्रसंग अनुसार सर्वप्रथम राजा पृथुवेन्य ने ही कृषि कार्य किया था। अथर्ववेद में 6,8 और 12 बैलों को हल में जोते जाने का वर्णन मिलता है।
यजुर्वेद में 5 प्रकार के चावल का मिलता है। यथाक्रम- महाब्राहि, कृष्णव्रीहि, शुक्लव्रीही, आशुधान्य और हायन। इससे यह सिद्ध होता है कि वैदिक काल में चावल की खेती भी होती थे।
राम की कई पीढ़ियों से पूर्व जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने कृषि, शिल्प, असि (सैन्य शक्ति), मसि (परिश्रम), वाणिज्य और विद्या- इन 6 आजीविका के साधनों की विशेष रूप से व्यवस्था की तथा देश व नगरों एवं वर्ण आदि का सुविभाजन किया था। इनके 2 पुत्र भरत और बाहुबली तथा 2 पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं जिन्हें उन्होंने समस्त कलाएं व विद्याएं सिखाईं। इसी कुल में आगे चलकर इक्ष्वाकु हुए और इक्ष्वाकु के कुल में भगवान राम हुए। ऋषभदेव की मानव मनोविज्ञान में गहरी रुचि थी। उन्होंने शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के साथ लोगों को श्रम करना सिखाया। इससे पूर्व लोग प्रकृति पर ही निर्भर थे। वृक्ष को ही अपने भोजन और अन्य सुविधाओं का साधन मानते थे और समूह में रहते थे। ऋषभदेव ने पहली दफा कृषि उपज को सिखाया। उन्होंने भाषा का सुव्यवस्थीकरण कर लिखने के उपकरण के साथ संख्याओं का आविष्कार किया। नगरों का निर्माण किया। ऋग्वेद में ऋषभदेव की चर्चा वृषभनाथ और कहीं-कहीं वातरशना मुनि के नाम से की गई है। शिव महापुराण में उन्हें शिव के 28 योगावतारों में गिना गया है।
रामायण काल में राजा जनक को एक खेत से हल चलाते वक्त ही भूमि से माता सीता मिली थी। इसी प्रकार महाभारत में बलरामजी को हलधर कहा जाता है। उनके कंधे पर हमेशा एक हल शस्त्र के रूप में विराजमान रहता था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस काल में भी खेती होती थी।
सिंधु घाटी के लोग बहुत सभ्य थे। वे नगरों के निर्माण से लेकर जहाज आदि सभी कुछ बनाना जानते थे। सिंधु सभ्यता एक स्थापित सभ्यता थी। उक्त स्थलों से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि यहां के लोग दूर तक व्यापार करने जाते थे और यहां पर दूर-दूर के व्यापारी भी आते थे। आठ हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के लोग धर्म, ज्योतिष और विज्ञान की अच्छी समझ रखते थे। इस काल के लोग जहाज, रथ, बेलगाड़ी आदि यातायात के साधनों का अच्छे से उपयोग करना सीख गए थे। सिंधु सभ्यता के लोगों को ही आर्य द्रविड़ कहा जाता है। आर्य और द्रविड़ में किसी भी प्रकार का फर्क नहीं है यह डीएनए और पुरातात्विक शोध से सिद्ध हो चुका है। इस सभ्यता के लोग कृषि कार्य करने के साथ ही गोपालन और अन्य कई तरह के व्यापार करते थे। सिंधु घाटी की मूर्तियों में बैल की आकृतियों वाली मूर्ति को भगवान ऋषभनाथ जोड़कर इसलिए देखा जाता।
इससे सिद्ध होता हैं की भगवान ऋषभदेव के द्वारा कृषि कार्य की शुरुआत की थी। इसका आधार उनकी प्राचीनता हैं भी हैं और उनके पुत्र का नाम चक्रवर्ती भरत था ,जिनके नाम से हमारे देश का नाम भारतवर्ष रखा गया हैं।
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन

जंगल बचाने महाभारत में विदुर की बात सत्य निकली
महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया। इस युद्ध में कौरवों ने 11 अक्षौहिणी तथा पांडवों ने 7 अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर लड़ाई लड़ी थी। कुल अनुमानित 45 लाख की सेना के बीच महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला। महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे।
इस युद्ध से पूर्व महात्मा विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को एक उदाहरण देकर समझाया था कि यह युद्ध रोक लो अन्यथा दोनों पक्ष का विनाश हो जाएगा। परंतु धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह में विदुर की बात नहीं मानी। यदि वह बात मान लेते तो पांडवों सहित कौरव भी बच जाते। अर्थात जंगल भी बच जाते।
महात्मा विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं:-
न स्याद् वनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रा न स्युर्ऋते वनम् ।
वनं हि रक्षते व्याघ्रैर्व्याघ्रान् रक्षति काननम् ।।46।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागपर्व)
अर्थात श्लोक में यह कहा गया कि बाघों के बिना वन का अस्तित्व संभव नहीं और न ही बिना वन के बाघ रह सकते हैं। वन की रक्षा तो बाघ करते हैं और बदले में वन उनकी रक्षा करते हैं। यह उदाहरण देकर महात्मा विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि अपने पुत्रों और पांडवों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहिए अन्यथा दोनों ही नष्ट हो जाएंगे।
धार्तराष्ट्रा वनं राजन् व्याघ्रा पाण्डुसुता मताः ।
मा छिन्दि सव्याघ्रं मा व्याघ्रान् नीनशन् बनात् ।।45।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागपर्व)
अर्थात् आपके पुत्र (धृतराष्ट्र ) वन के समान हैं और पाण्डुपुत्र उनके सह-अस्तित्व में रह रहे बाघ हैं। बाघों समेत इन वनों को समाप्त मत करिए अथवा उन बाघों का अलग से विनाश मत करिए। वनों तथा बाघों की भांति दोनों पक्ष एक-दूसरे की रक्षा करें इसी में सभी का हित है।
युद्ध का परिणाम : सभी जानते हैं कि सारे कौरव अपने पुत्रों सहित मारे हो गए थे। इसके अलावा मात्र पांच गांव के खातिर लड़े गए इस युद्ध से आखिर में पांडवों को क्या हासिल हुआ? पांडव वंश में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी के उत्तरा के गर्भ में पल रहा उनका एक मात्र पुत्र बचा था जिसे श्रीकृष्ण ने बचाया था। इसका नाम परीक्षित था। पांडव युद्ध जीतने के बाद भी हार ही गए थे क्योंकि फिर उनके पास कुछ भी नहीं बचा था। प्रत्येक पांडव के 10-10 पुत्र थे लेकिन सभी मारे गए। द्रौपदी के भी पांचों पुत्र मारे गए थे।
गांधारी, कुंती, धृतराष्‍ट्र, विदुर, संजय आदि सभी जंगल चले गए थे। जंगल में धृतराष्‍ट्र और गांधारी एक आग में जलने से मर गए। ऐसी लाखों महिलाएं विधवा हो गई थी जिनके पतियों ने युद्ध में भाग लिया था। उनमें कर्ण, दुर्योधन सहित सभी कौरवों की पत्नियां भी थीं।
अंत: में युद्ध के बाद युधिष्ठिर संपूर्ण भारत वर्ष के राजा तो बन गए लेकिन सब कुछ खोकर। किसी भी पांडव में राजपाट करने की इच्छा नहीं रही थी। सभी को वैराग्य प्राप्त हो गया था। यह देखते हुए युधिष्ठिर ने राजा का सिंहासन अर्जुन के पौत्र परीक्षित को सौंपा और खुद चल पड़े हिमालय की ओर, जीवन की अंतिम यात्रा पर। उनके साथ चले उनके चारों भाई और द्रौपदी आदि। वहीं सभी का अंत हो गया था।
श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और कुछ यादव महाभारत के युद्ध में और बाद में गांधारी के शाप के चलते आपसी मौसुल युद्ध में श्रीकृष्ण के कुल का नाश हो गया था। मौसुल युद्ध में श्रीकृष्‍ण के सभी पुत्र और पौत्र मारे गए थे। कुल में जो महिलाएं और बच्चे बचे थे, उन्हें अर्जुन अपने साथ लेकर मथुरा जा रहे थे तो रास्ते में वे बचे हुए लोग भी लुटेरों के द्वारा मारे गए। श्रीकृष्ण के कुल का एकमात्र व्यक्ति जिंदा बचा था जिसका नाम था वज्रनाभ।
आज हम बाघों को बचाने की बात करते हैं ताकि हमारे वन सुरक्षित रह सकें परंतु हमारे देश के वन क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं और इसके साथ ही वन के पशु पक्षी आदि सभी भी लुप्त होते जा रहे हैं। एक दिन धरती पर मानव ही बचेगा इसकी कोई गारंटी नहीं।

आजकल आधुनिक जीवनशैली में काम के बढ़ते दवाब के बीच ही पिछले कुछ सालों में ग्रीन टी पीने का चलन तेजी से बढ़ा है। एक नियत मात्रा में प्रतिदिन ग्रीन टी का सेवन आपकी सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद रहता है। कई शोध में भी ग्रीन टी सेहत के लिए फायदेमंद बताई गई है पर जरूरत से ज्यादा ग्रीन टी भी आपके शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकती है, इसलिए जरूरी है कि आप संतुलित मात्रा में ही ग्रीन टी का सेवन कों।
त्वचा में चमक
ग्रीन टी में एंटी एजिंग तत्व पाया जाता है, इसका सेवन करने से चेहरे की झुर्रियां कम होती है। इसके साथ ही आपके चेहरे पर हमेशा चमक और ताजगी बनी रहती है। इसके अलावा इसे पीने से आप तरोताजा रहते हैं।
मानसिक शांति
यदि आप कुछ काम करने के बाद मानसिक रूप से थकान महसूस करने लगते हैं तो ग्रीन टी आपके लिए अच्छी रहेगी। ग्रीन टी में थेनाइन तत्व होता है, जिसमें एमिनो एसिड बनता है। एमिनो एसिड शरीर में ताजगी बनाए रखता है और आपको थकावट महसूस नहीं होती जिससे आपको हमेशा मानसिक शांति मिलती है।
दांतों के लिए लाभकारी
आजकल युवा और बुजुर्गों में दांतों में पायरिया और केविटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है। ग्रीन टी में पाया जाने वाले कैफीन दांतों में लगे कीटाणुओं को मारने में सक्षम होता है। बैक्टीरिया कम होने से आपके दांत लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
ब्लडप्रेशर रहता है सामान्य
भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण उच्च रक्तचाप शरीर में अन्य कई बीमारियों का कारण हो सकता है। इसलिए यदि आपको ब्लड प्रेशर की समस्या है तो ग्रीन टी पिए। इसे पीने से रक्तचाप सामान्य रहने से आपको गुस्सा भी नहीं आएगा।
कोलेस्ट्रॉल घटाएं
दिल के रोगियों के लिए ग्रीनटी का सेवन बहुत फायदेमंद साबित होता है। ग्रीन टी शरीर में बेड कोलेस्ट्रॉल को कम करके गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मददगार होती है। यदि आप भारी भोजन करते हैं तो आपको नियमित रूप से ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए।
मधुमेह में फायदेमंद
यदि आपके शरीर में शुगर लेवल बढ़ रहा है तो ग्रीन टी का सेवन आपको बहुत फायदा पहुंचाएगा। इसके अलावा जिन रोगियों को डायबिटीज (मधुमेह) की बिमारी हैं तो उन्हें प्रतिदिन सुबह उठकर एक कप ग्रीन टी पीनी चाहिए। इससे आपके शरीर में मौजूद शुगर का लेवल कंट्रोल में रहेगा। मधुमेह रोगियों को भोजन के बाद ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए।
मोटापा कम करे
वजन कम करने में ग्रीन टी काफी हद तक सहायक है। ग्रीन टी पीने से आपके शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ता है, जिससे पाचन क्रिया संतुलित रहती है। ऐसा होने से व्यक्ति का अतिरिक्त वजन कम होता है।

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