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लोकसभा ने एक बहुत ही विवादास्पद मुद्दे पर विधेयक पारित कर दिया। इस नागरिकता विधेयक का मूल उद्देश्य पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम लोगों को भारतीय नागरिकता देना है। अर्थात् इन देशों का यदि कोई भी नागरिक हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, यहूदी हो और वह आकर भारत में बसना चाहे तो वैसी छूट मिलेगी। उनसे कानूनी दस्तावेज वगैरह नहीं मांगे जाएंगे। दूसरे शब्दों में भारत सरकार हर तरह से उनकी मदद करेगी। वैसे तो इस कानून का भारत में सभी को स्वागत करना चाहिए। उसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि ये तीनों देश- अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश किसी जमाने में भारत ही थे। इन क्षेत्रों में मुसलमान और गैर-मुसलमान सदियों से साथ-साथ रहते रहे हैं लेकिन भारत-विभाजन और काबुल में तालिबान राज के बाद इन देशों में गैर-मुसलमानों का जीना आसान नहीं रहा।
 
पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू विशेष तौर से भारत आकर रहना चाहते हैं। यदि भारत उनके लिए अपनी बांहें पसारता है तो इसमें कुछ बुराई नहीं है। यह स्वाभाविक ही है लेकिन असम गण परिषद और प. बंगाल की तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों ने इस विधेयक के विरुद्ध संग्राम छेड़ दिया है। अगप ने तो असम में भाजपा से अपना गठबंधन ही तोड़ दिया है। इसका कारण यह नहीं है कि ये दोनों संगठन हिंदू विरोधी हैं या ये बांग्लादेशी हिंदुओं के दुश्मन हैं। ऐसा नहीं है। सच्चाई यह है कि इन दोनों प्रदेशों में इन राजनीतिक दलों को डर है कि इस कदम से उनका हिंदू वोट बैंक अब खिसककर भाजपा के पाले में जा बैठेगा।
 
उनका यह डर सही है लेकिन हम यह न भूलें कि ये ही संगठन मुस्लिम वोट बैंक पटाने के चक्कर में असम और प. बंगाल के नागरिकता रजिस्टर में बांग्ला मुसलमानों को धंसाने के लिए तत्पर रहे हैं। याने यह मामला हिंदू-मुसलमान का उतना नहीं है, जितना कुर्सी का है। पड़ोसी देशों के सभी नागरिक भी भारत मां की ही संतान हैं। अभी 72 साल पहले तक पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत के ही अंग थे। पिछले चार-पांच सौ साल पहले तक नेपाल, भूटान, बर्मा, अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि सभी पड़ौसी देश भारत ही कहलाते थे। इसीलिए पड़ौसी देशों के दुखी नागरिकों के बारे में भारत का रवैया हमेशा जिम्मेदाराना ही होना चाहिए। जब 1971 में लाखों बांग्ला मुसलमान भारत में आ गए तो भारत ने उनका स्वागत किया या नहीं ? बेहतर यही है कि पड़ौसी राष्ट्रों के संकटग्रस्त लोगों को, चाहे वे किसी भी मजहब, जाति या वर्ग के हों, हम उन्हें अपने बड़े परिवार का हिस्सा ही समझें।
 

 

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

सिडनी। कप्तान विराट कोहली ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय टीम हार्दिक पंड्या और लोकेश राहुल की टीवी शो के दौरान महिलाओं पर ‘अनुचित’ टिप्पणी का समर्थन नहीं करती लेकिन उन्होंने साथ ही जोर दिया कि इस विवाद से ड्रेसिंग रूम का मनोबल प्रभावित नहीं होगा। कोहली ने कहा कि आस्ट्रेलिया के खिलाफ एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला के लिए पंड्या और राहुल की उपलब्धता इस पर निर्भर करेगी कि बीसीसीआई शुक्रवार को उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करता है या नहीं। कोहली ने एकदिवसीय श्रृंखला के शनिवार को यहां होने वाले पहले मैच की पूर्व संध्या पर कहा, ‘‘भारतीय क्रिकेट टीम के नजरिये से उस समय जो भी अनुचित टिप्पणी की गई उसका निश्चित तौर पर हम समर्थन नहीं करते। निश्चित तौर पर भारतीय क्रिकेट टीम के रूप में हम इस तरह के नजरिये का समर्थन नहीं करते और यह बता दिया गया है (दोनों खिलाड़ियों को)।’’

 

 
उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित तौर पर हम इस नजरिये के समर्थन में नहीं हैं और ये पूरी तरह से व्यक्तिगत नजरिया है। दोनों संबंधित खिलाड़ियों ने महसूस किया है कि क्या गलत हुआ और वे इसके स्तर को समझते हैं।’’ कोहली ने स्वीकार किया कि दोनों खिलाड़ियों पर इस विवाद का गहरा असर पड़ा है। उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित तौर पर वे समझते हैं कि क्या चीजें सही नहीं हुईं। हम फैसले का इंतजार कर रहे हैं।’’ यह पूछने पर कि क्या आस्ट्रेलिया में पहली बार श्रृंखला जीतने के बाद इस विवाद का ड्रेसिंग रूम पर असर पड़ेगा और क्या इससे 2019 विश्व कप की तैयारी से टीम का ध्यान भंग हुआ है, कोहली ने कहा, ‘‘जो भी हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन कुछ चीजें आपके नियंत्रण में नहीं होती।’’

 

उन्होंने कहा, ‘‘आपको बैठकर इंतजार करना होता है कि क्या होने वाला है। संयोजन और टीम संतुलन के नजरिये से, हां जब इस तरह की कुछ चीज होती है तो आपको सोचना होता है कि अब आपको किस संयोजन के साथ उतरने की जरूरत है।’’ प्रशासकों की समिति के प्रमुख विनोद दाय ने गुरुवार को पंड्या और राहुल पर दो एकदिवसीय मैचों का प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की। लेकिन सीओए की उनकी साथी सदस्य डायना एडुल्जी ने इस मामले को बीसीसीआई के विधि विभाग के पास भेज दिया।।कोहली ने कहा कि हाल में संपन्न टेस्ट श्रृंखला में अभूतपूर्व सफलता के बाद टीम का मनोबल काफी बढ़ा हुआ है।
 
उन्होंने कहा, ‘‘इस तरह की चीजों पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होता इसलिए आपको हालात से सामंजस्य बैठाना होता है और इसका हल निकालना होता है। हम इसे इसी नजरिये से देख रहे हैं। बीसीसीआई का फैसला आने के बाद संयोजन पर विचार करने की जरूरत है और इसके बाद हम देखेंगे कि पूरी स्थिति पर क्या करने की जरूरत है। प्रत्येक व्यक्ति की तरह हम भी यह इंतजार कर रहे हैं कि फैसला क्या होगा।’’ कोहली ने कहा, ‘‘लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम के नजरिये से इसका ड्रेसिंग रूम में हमारे आत्मविश्वास पर कोई असर नहीं पड़ेगा।’’

नयी दिल्ली। आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटाए जाने की पृष्ठभूमि में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा और दावा किया कि पिजड़े में बंद तोते को उड़ने नहीं दिया गया क्योंकि वह सत्ता के गलियारे के सारे राज खोल देता। सिब्बल ने ट्वीट कर कहा, ‘आलोक वर्मा को हटाया गया। समिति ने सुनिश्चित किया कि पिजड़े में बंद तोता उड़ न सके क्योंकि इसका डर था कि कहीं ये तोता सत्ता के गलियारे के राज नहीं खोल दे।’

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पिजड़े में बंद तोता अभी बंद ही रहेगा। गौरतलब है कि कुछ साल पहले उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को ‘पिजड़े में बंद तोता’ कहा था। दरअसल, उच्चतम न्यायालय द्वारा बहाल किये जाने के मात्र दो दिन बाद आलोक वर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली एक उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति ने गुरुवार को एक मैराथन बैठक के बाद एक अभूतपूर्व कदम के तहत भ्रष्टाचार और कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोपों में सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया।

सीबीआई के 55 वर्षों के इतिहास में इस तरह की कार्रवाई का सामना करने वाले जांच एजेंसी के वह पहले प्रमुख हैं।1979 बैच के आईपीएस अधिकारी वर्मा बुधवार को ड्यूटी पर लौटे थे। इससे एक दिन पहले ही उच्चतम न्यायालय ने कुछ शर्तो के साथ उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त किया था और सीबीआई प्रमुख का चयन करने वाली तीन सदस्यीय समिति से एक सप्ताह में उनके पद पर बने रहने के बारे में फैसला करने के लिए कहा था।

दुबई। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दौरे पर दुबई पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह यहां अपने ‘मन की बात’ करने नहीं आए हैं, बल्कि लोगों की सुनने आए हैं। राहुल ने यहां भारतीय कामगारों को संबोधित किया और भारत के विकास में उनके योगदान की सराहना की। आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले कामगारों से मुखातिब राहुल ने कहा कि जैसे ही हमारी सरकार आएगी, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देंगे।

 

उन्होंने कहा, ‘‘हम आपसे बातचीत करना चाहते हैं। मैं यहां अपनी मन की बात करने नहीं आया, मैं आपकी मन की बात सुनने आया हूं। किसी ने यहां कहा कि वह बड़ा आदमी हमसे मिलने आया है। कोई बड़ा आदमी नहीं होता। मैं बिलकुल आप जैसा हूं।’’ कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ‘‘मैं आपको कहना चाहता हूं कि हम आपके साथ खड़े हैं। जो भी आपको चाहिए, जो भी आपकी मुश्किलें हैं, जहां भी हम आपकी मदद कर सकते हैं...हम आपकी मदद करने को तैयार हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आपने अपना खून, पसीना और समय इस शहर को, इस देश को बनाने के लिए दिया और आपने हिंदुस्तान की जनता का नाम रौशन किया है। हर धर्म, हर प्रदेश, हर जाति का नाम आपने रौशन किया है।’’ 
 
भारतीय कामगारों से राहुल ने कहा, ‘‘आपने हिंदुस्तान, हिंदुस्तान के प्रदेशों और गरीब जनता की मदद की और आपने इस शहर, जो पूरी दुनिया में महान है, दुबई को बनाने का काम किया। मैं आपको दिल से धन्यवाद कहना चाहता हूं।’’ राहुल दुबई और अबूधाबी के दौरे पर आए हैं। वह यहां शुक्रवार और शनिवार को कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे तथा यूएई के मंत्रियों से भी मुलाकात करेंगे। वह गुरुवार को दुबई पहुंचे थे। हवाई अड्डे पर पहुंचने पर भारतीय मूल के लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया।
नरेन्द्र मोदी सरकार ने आर्थिक निर्बलता के आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण देने का जो फैसला किया है वह निश्चित रूप से साहसिक कदम है, एक बड़ी राजनीतिक पहल है। इस फैसले से आर्थिक असमानता के साथ ही जातीय वैमनस्य को दूर करने की दिशा में नयी फिजाएं उद्घाटित होंगी। निश्चित ही मोदी सरकार ने आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों के लिए यह आरक्षण की व्यवस्था करके केवल एक सामाजिक जरूरत को पूरा करने का ही काम नहीं किया है, बल्कि आरक्षण की राजनीति को भी एक नया मोड़ दिया है। इस फैसले से आजादी के बाद से आरक्षण को लेकर हो रहे हिंसक एवं अराजक माहौल पर भी विराम लगेगा। देशभर की सवर्ण जातियां आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करती आ रही हैं।
 
 
भारतीय संविधान में आरक्षण का आधार आर्थिक निर्बलता न होकर सामाजिक भेदभाव व शैक्षणिक पिछड़ापन है। आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को नौकरियों में आरक्षण देने का फैसला एक सकारात्मक परिवेश का द्योतक है, इससे आरक्षण विषयक राजनीति करने वालों की कुचेष्टाओं पर लगाम लग सकेगी। आरक्षण की नीति सामाजिक उत्पीड़ित व आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों की सहायता करने के तरीकों में एक है, ताकि वे लोग बाकी जनसंख्या के बराबर आ सकें। पर जाति के आधार पर आरक्षण का निर्णय सभी के गले कभी नहीं उतरा। संविधान एवं राजनीति की एक बड़ी विसंगति एवं विडम्बना को दूर करने में यह फैसला निर्णायक भूमिका का निर्वाह करेगा। इससे उन सवर्णों को बड़ा सहारा मिलेगा जो आर्थिक रूप से विपन्न होने के बावजूद आरक्षित वर्ग से जुड़ी सुविधा पाने से वंचित रहे हैं। इसके चलते वे स्वयं को असहाय-उपेक्षित तो महसूस कर ही रहे थे, उनमें आरक्षण व्यवस्था को लेकर गहरा असंतोष एवं आक्रोश भी व्याप्त था, जो समय-समय पर हिंसक रूप में व्यक्त भी होता रहा है। हम जात-पात का विरोध करते रहे हैं, जातिवाद समाप्त करने का नारा भी देते रहे हैं और आरक्षण भी दे रहे हैं। सही विकल्प वह होता है, जो बिना वर्ग संघर्ष को उकसाये, बिना असंतोष पैदा किए, सहयोग एवं सौहार्द की भावना पैदा करता है। संभवतः मोदी की पहल से यह सकारात्मक वातावरण बन सकेगा, जिसका स्वागत होना ही चाहिए।


 
 
जातिवाद सैंकड़ों वर्षों से है, पर इसे संवैधानिक अधिकार का रूप देना उचित नहीं माना गया है। हालांकि राजनैतिक दल अपने ''वोट स्वार्थ'' के कारण इसे नकारते नहीं, पर स्वीकार भी नहीं कर पा रहे हैं। और कुछ नारे, जो अर्थ नहीं रखते सभी पार्टियां लगाती रही हैं। इसका विरोध आज नेता नहीं, जनता कर रही है। वह नेतृत्व की नींद और जनता का जागरण है। यह कहा जा रहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान विधान में नहीं है। पर संविधान का जो प्रावधान राष्ट्रीय जीवन में विष घोल दे, जातिवाद के वर्ग संघर्ष की स्थिति पैदा कर दे, वह सर्व हितकारी कैसे हो सकता है? पं. नेहरू व बाबा साहेब अम्बेडकर ने भी सीमित वर्षों के लिए आरक्षण की वकालत की थी तथा इसे राष्ट्रीय जीवन का स्थायी पहलू न बनने का कहा था। डॉ. लोहिया का नाम लेने वाले शायद यह नहीं जानते कि उन्होंने भी कहा था कि अगर देश को ठाकुर, बनिया, ब्राह्मण, शेख, सैयद में बांटा गया तो सब चैपट हो जाएगा। जाति विशेष में पिछड़ा और शेष वर्ग में पिछड़ा भिन्न कैसे हो सकता है? गरीब की बस एक ही जाति होती है और वह है ''गरीब''।
 
गरीब सवर्णों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग कोई नई नहीं है। यह हमेशा ही जहां-तहां उठती रही है, यहां तक कि दलितों की नेता मानी जाने वाली मायावती भी इसके पक्ष में खड़ी दिखाई दी हैं। लेकिन पहली बार इसे बड़े पैमाने पर लागू करने का फैसला संविधान संशोधन के वादे के साथ हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में इसके सामने जो बाधाएं आएंगी, उसे सरकार भी अच्छी तरह समझती ही होगी। लेकिन उन चुनौतियों से पार पाकर इसे अमल में लाना हमारे राष्ट्र के लिये एक नई सुबह होगी।
 
जो वोट की राजनीति से जुड़े हुए हैं, वे आरक्षण की नीति में बंटे हुए हैं। लेकिन यह पहली बार है, जब किसी तबके की कमजोर आर्थिक स्थिति को आरक्षण से जोड़ा गया है। अभी तक देश में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों को जो आरक्षण मिलता रहा है, उसमें यह पैमाना नहीं था। आरक्षण के बारे में यह धारणा रही है कि यह आर्थिक पिछड़ापन दूर करने का औजार नहीं है। यह दलित, आदिवासी या पिछड़ी जातियों का सशक्तीकरण करके उन्हें सामाजिक रूप से प्रतिष्ठा दिलाने का मार्ग है। आरक्षण को सामाजिक नीति की तरह देखा जाता रहा है, साथ ही यह भी माना जाता रहा है कि आर्थिक पिछड़ापन दूर करने का काम आर्थिक नीतियों से होगा। अब जब आरक्षण में आर्थिक आधार जुड़ रहा है, तो जाहिर है कि आरक्षण को लेकर मूलभूत सोच भी कहीं न कहीं बदलेगी और यह बदलाव राष्ट्रीय चेतना को एक नया परिवेश देगा। क्योंकि जाति-पाति में विश्वास ने देश को जोड़ने का नहीं, तोड़ने का ही काम किया है। हमें जातिविहीन स्वस्थ समाज की रचना के लिए संकल्पित होने की जरूरत है। क्योंकि भारतीयता में एवं भारतीय संस्कृति में ''मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से छोटा-बड़ा होता है।''
 
 
एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि दस प्रतिशत आर्थिक आरक्षण के फैसले को अमली जामा पहनाया जा सकेगा या नहीं, लेकिन इतना अवश्य है कि मोदी सरकार के इस फैसले ने देश की राजनीतिक सोच एवं मानसिकता को एक झटके में बदलने का काम किया है। मोदी सरकार को ही नहीं, समूचे राष्ट्र को इसकी सख्त जरूरत थी। आर्थिक आधार पर आरक्षण के फैसले ने यकायक भारतीय राजनीति की सोच के तेवर और स्वर बदल दिए हैं। निश्चित ही सभी राजनीतिक दल इस विषयक फैसले को लेकर अपना स्वतंत्र नजरिया रखते हैं, और इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते रहे हैं, इसलिये वे इस फैसले का विरोध करके राजनीतिक नुकसान नहीं करना चाहेंगे। वे शायद ही यह जोखिम उठायें, इसलिये इसके मार्ग की एक बड़ी बाधा राजनीतिक विरोध तो दिखाई नहीं दे रही है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की संवैधानिक स्थितियां क्या बनेंगी, यह भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना तय है कि न्यायिक स्थितियां भी इसकी अनदेखी नहीं कर पाएंगी, क्योंकि संविधान का मूल उद्देश्य लोगों की भलाई है और वह इस देश के लोगों के लिये बना है, न कि लोग उसके लिये बने हैं।
 
 
आरक्षण पर नये शब्दों को रचने वालों! इन शब्दजालों से स्वयं निकल कर देश में नये शब्द की रचना करो और उसी अनुरूप मानसिकता बनाओ। वह शब्द है....मंगल। सबका मंगल हो। राष्ट्रीय चरित्र का, गरीबों का, जीवन में नैतिकता व नीतियों में प्रामाणिकता का मंगलोदय हो। इसके लिये पहल मोदी ने की है तो उसका लाभ भी उनको ही मिलेगा। 
 
-ललित गर्ग

पंचकुला। सीबीआई की एक अदालत ने 2002 में पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हुई हत्या के मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह और तीन अन्य को शुक्रवार को दोषी करार दिया। उन्हें 17 जनवरी को सजा सुनाई जाएगी। विशेष सीबीआई न्यायाधीश जगदीप सिंह ने यहां डेरा प्रमुख और तीन अन्य को इस मामले में दोषी ठहराया। सीबीआई के वकील एचपीएस वर्मा ने पीटीआई  बताया, ‘सभी चार आरोपियों को दोषी ठहराया गया है।’

इस मामले में 17 जनवरी को सजा सुनाई जाएगी। तीन अन्य आरोपियों में कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल शामिल हैं। गुरमीत (51) रोहतक की सुरनिया जेल से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश हुआ। वह अपनी दो अनुयायियों से बलात्कार करने के मामले में फिलहाल 20 साल की कैद की सजा काट रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2002 में छत्रपति की उनके आवास के बाहर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। 

 

दरअसल उनके अखबार ‘पूरा सच’ ने एक पत्र प्रकाशित किया था, जिसमें इस बात का जिक्र किया गया था कि सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में गुरमीत किस तरह से महिलाओं का यौन उत्पीड़न करता था। यह मामला 2003 में दर्ज किया गया था और इसे 2006 में सीबीआई को सौंपा गया था। मामले में गुरमीत को मुख्य षडयंत्रकर्ता नामजद किया गया था।

पने विवादित बयानों से कांग्रेस का सिरदर्द पैदा कराने वाले मणिशंकर अय्यर एक बार फिर से विवादों में घिर गए हैं। अय्यर ने विवादास्पद बयान देते हुए कहा कि अयोध्या के राजा दशरथ के महल में 10 हजार कमरे थे और यह किसी को पता नहीं है कि भगवान राम कौनसे कमरे में पैदा हुए थे? उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा कि आप बेशक मंदिर बनाइए मगर आप यह कैसे कह सकते हैं कि मंदिर वहीं बनाएंगे।

दिल्ली में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के तरफ से आयोजित एक समारोह एक शाम बाबरी मस्जिद के नाम में मणिशंकर अय्यर बोल रहे थे। 6 दिसंबर को पतन वाला दिन बताते हुए उन्होंने नरसिंहा राव की नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार को भी कठघरे में खड़ा किया।
 
इससे पहले अय्यर ने गुजरात चुनाव के समय पीएम मोदी के बारे में 'नीच' शब्द का इस्तेमाल किया था जिसके बाद उन्हें कांग्रेस से निलंबित कर दिया गया था। 2018 में अय्यर का निलंबन वापस ले लिया गया था। 

नयी दिल्ली। सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित करने वाला संविधान 124वां संशोधन विधेयक मंगलवार को लोकसभा में पेश कर दिया गया। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने संविधान (124 वां संशोधन) विधेयक, 2019 पेश किया। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सोमवार को ही इसे मंजूरी प्रदान की है।

 

 विधेयक पेश किये जाने के दौरान समाजवादी पार्टी के कुछ सदस्य अपनी बात रखना चाह रहे थे लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इसकी अनुमति नहीं दी।  उल्लेखनीय है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण को सोमवार को मंजूरी दी। सूत्रों के अनुसार, यह कोटा मौजूदा 50 प्रतिशत आरक्षण से अलग होगा।
 
सामान्य वर्ग को अभी आरक्षण हासिल नहीं है। समझा जाता है कि यह आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा, जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है। आरक्षण का लाभ उन्हें मिलने की उम्मीद है जिनकी वार्षिक आय आठ लाख रूपये से कम होगी और 5 एकड़ तक जमीन होगी।
 

नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फोन पर बातचीत कर रक्षा, आतंकवाद विरोधी कदमों और ऊर्जा के क्षेत्रों में बढ़ते द्विपक्षीय सहयोग को सराहा। अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने बातचीत के दौरान एक दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएं दीं और वर्ष 2018 में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझीदारी लगातार बढ़ने पर संतोष व्यक्त किया।

 

 उन्होंने नई 2+2 वार्ता व्यवस्था और भारत, अमेरिका एवं जापान के बीच पहले त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन की भी प्रशंसा की। दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय एवं वैश्विक मामलों पर समन्वय के अलावा रक्षा, आतंकवाद रोधी कदमों और ऊर्जा के क्षेत्र में बढ़ते द्विपक्षीय सहयोग को भी सराहा।
 
मोदी और ट्रम्प ने सोमवार शाम हुई वार्ता में 2019 में भारत-अमेरिकी संबंधों को और मजबूत बनाने तथा मिलकर काम करने पर सहमति जताई।

नयी दिल्ली। नागरिकता संशोधन विधेयक पर कुछ वर्गों की आशंकाओं को निर्मूल बताते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि असम की सीमा देश की सीमा है और जो भी जरूरी होगा, केंद्र सरकार वह सब करेगी। सिंह ने संसद की संयुक्त समिति द्वारा यथाप्रतिवेदित नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को लोकसभा में चर्चा एवं पारित करने के लिये रखते हुए यह बात कही। कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने सदन से वाकआउट किया।

यह विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। इस विधेयक के कानून बनने के बाद, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर और बिना उचित दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता मिल सकेगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सोमवार को नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी दी। इस पर संसद की संयुक्त समिति ने विचार किया है और समिति में तृणमूल कांग्रेस समेत कुछ दलों के सदस्यों ने असहमति का नोट दिया था। 

सदन में सिंह ने बताया कि असम के छह समुदायों को आदिवासी समुदाय का दर्जा देने की मांग लम्बे समय से की जा रही थी। गृह मंत्रालय ने इस संबंध में एक समिति का गठन किया था और समिति ने सिफारिश दे दी है। इस बारे में विचार विमर्श भी किया गया है। इसके अनुरूप कोच राजभोगशी, ताइ आहोम, चोटिया, मतक, मोरान एवं चाय बागान से जुड़े समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में शामिल किया जाने का प्रस्ताव है। गृह मंत्री ने कहा कि सरकार इस संबंध में विधेयक लायेगी।

 

उन्होंने कहा कि असम समझौता एक महत्पूर्ण स्तम्भ है। इसमें असम के लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने की बात कही गई। इसके लिये कानूनी एवं प्रशासनिक आधार तैयार करने की बात भी कही गई। लेकिन पिछले वर्षो में ऐसा नहीं हुआ। राजनाथ सिंह ने कहा कि हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस विषय पर एक समिति का गठन किया है। यह समिति सभी पक्षकारों से परामर्श करेगी और सांस्कृतिक, सामाजिक एवं भाषायी पहचान के बारे में छह मार्च तक अपनी सिफारिशें देगी। उन्होंने कहा कि सरकार बोडो समुदाय की मांगों के बारे में न केवल चिंता करती है बल्कि इसके लिये प्रतिबद्ध भी है।

गृह मंत्री ने कहा कि नागरिकता विधेयक के संबंध में गलतफहमी पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है और असम के कुछ भागों में आशंकाएं पैदा करने की कोशिक हो रही है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक सिर्फ असम के लिये नहीं है बल्कि ऐसे हजारों लोगों के लिये है जो पश्चिमी सीमा से आकर दिल्ली, गुजरात एवं अन्य स्थानों पर रह रहे हैं। यह सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा। इसके पीछे सोच यह है कि उत्पीड़न के शिकार प्रवासी देश के किसी हिस्से में रह सकें। सिंह ने जोर दिया कि पाकिस्तान में राष्ट्र एवं समुदाय के स्तर पर अल्पसंख्यकों के साथ सुनियोजित तरीके से भेदभाव किया जाता है। उन्हें बुनियादी अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है।

उन्होंने कहा कि बांग्लादेश और अफगानिस्तान में वर्तमान सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध है। लेकिन इन देशों में भी घटनाएं सामने आई हैं। गृह मंत्री ने कहा कि ऐसे में इन लोगों के पास भारत में रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का जिक्र करते हुए कहा कि इसे उचित ढंग से लागू किया जा रहा है। इसके तहत शिकायत करने का प्रावधान किया गया है। हम प्रक्रिया पूरी करने को प्रतिबद्ध है। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।

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