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काठमांडू। कृत्रिम अंग शिविर के उद्घाटन के दौरान नेपाल के कई द्विव्यांगों को मुफ्त में भारत में बने 'जयपुर फुट' दिए गए। ‘भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति’ (बीएमवीएसएस) ने कृत्रिम अंग शिविर की शुरूआत ‘चौधरी फाउंडेशन’ के सहयोग से काठमांडू के ‘नॉर्विक इंटरनेशनल अस्पताल’ से की गई है। ‘चौधरी फाउंडेशन’ नेपाल के पहले अरबपति बिनोद चौधरी का धर्मार्थ संगठन है।
 
काठमांडू के 50 लोगों को तीन दिवसीय शिविर के दौरान मुफ्त में कृत्रिम अंग दिए जाएंगे। एक अन्य शिविर पश्चिमी नेपाल के नवलपरासी जिले में आयोजित किया जाएगा जहां 400 से अधिक दिव्यांगों को कृत्रिम अंग दिए जाने की उम्मीद है। नेपाल के उप प्रधानमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री उप्रेन्द्र यादव, नेपाल में भारतीय राजदूत मंजीव सिंह पूरी, ‘चौधरी फाउंडेशन’ के अध्यक्ष बिनोद चौधरी और ‘जयपुर फुट’ के अध्यक्ष डी आर मेहता ने रविवार को एकसाथ शिविर का उद्घाटन किया।

 

‘भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति’ (बीएमवीएसएस) ने 1975 से अभी 30 देशों में करीब 17 लाख लोगों को कृत्रिम अंग मुहैया कराए हैं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उप प्रधानमंत्री यादव ने कहा कि सरकार निजी क्षेत्र के सहयोग से जरूरतमंद लोगों को कृत्रिम अंग प्रदान करने के लिए एक स्थायी संगठन स्थापित करने की योजना बना रही है।

इस्लामाबाद। अफगानिस्तान में दीर्घकालिक सैन्य अड्डे के निर्माण की अमेरिकी मांग देश में 17 साल लंबे युद्ध को खत्म करने के लिए तालिबान के साथ बातचीत में बाधक बन रही है। यहां मीडिया में आयी खबर में यह बात सामने आयी है। इस तरह की मीडिया रिपोर्ट ऐसे समय सामने आयी है जब अफगानिस्तान में सुलह के लिये अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद ने बातचीत की मेज पर तालिबान को लाने के लिए प्रयासों को तेज किया।

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, रूस और ईरान पिछले कुछ महीने से तालिबान के साथ बातचीत में शामिल हैं। ‘एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की एक खबर में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि अमेरिका अपनी मांग के बदले में शांति समझौते के बाद अफगानिस्तान को पुननिर्माण एवं पुनर्वास के लिये पर्याप्त वित्तीय सहायता देगा। तालिबान बार-बार अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की पूर्ण वापसी की मांग करता रहा है। हालांकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में हुई हालिया वार्ता में कुछ सैन्य अड्डों को चालू रखने के अमेरिका के सुझाव पर उन्होंने अपना झुकाव दिखाया था।

 अमेरिका तालिबान से यह गारंटी चाहता है कि अन्य देशों पर हमले की साजिश रचने के लिये अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को पत्र लिखने के बाद अबु धाबी में हुई वार्ता में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की थी। ट्रंप ने तालिबान को लेकर पाकिस्तान से मदद मांगी थी। बहरहाल अफगानिस्तान में 17 साल से चल रहे युद्ध के मद्देनजर राजनीतिक समाधान की मांग को लेकर हालिया दबाव ने अफगान शांति प्रक्रिया में सऊदी अरब और यूएई को एक ही मंच पर ला खड़ा किया है।

मॉस्को। दक्षिणी रूस में सोमवार तड़के एक बहुमंजिला आवासीय इमारत में हुए गैस विस्फोट में एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार लोग लापता हो गए। आपातकालीन मंत्रालय ने बताया कि दक्षिणी रोस्तोव क्षेत्र के शख्ती शहर में नौ मंजिला इमारत में हुए विस्फोट में शीर्ष दो मंजिलों के कई अपार्टमेंट क्षतिग्रस्त हो गए।

आपातकानील मंत्रालय की प्रवक्ता मरीना चेरन्यावस्काया ने एएफपी को बताया कि चार लोगों का अब भी कुछ पता नहीं है और बचाव अभियान में 200 से ज्यादा कर्मियों को लगाया गया है।

 

रूस के माग्नीतोगोरस्क में नए साल की पूर्व संध्या पर एक अपार्टमेंट में हुए विस्फोट में 39 लोगों की मौत हो गई थी। रोस्तोव के गवर्नर ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को गैस से हुए इस विस्फोट और बचाव कार्य की जानकारी दी। क्रेमलिन ने एक बयान में कहा, ‘‘ राष्ट्रपति ने क्षेत्र के प्रमुख को पीड़ितों को सहायता पहुंचाने का कार्य सौंपा है।' 

जयपुर। राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने सोमवार को कहा कि देश में केवल कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को चुनौती दे सकती है और उसे हरा सकती है। साथ ही पायलट ने विश्वास जताया कि कांग्रेस की अगुवाई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) केंद्र में अगली सरकार बनाएगा। पायलट ने कहा कि संवैधानिक संस्थानों को नष्ट करने में अपनी सारी ताकत लगा देने वालों को हराने के लिए राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों को साथ आना होगा।

अपने निवास पर संवाददाताओं से बातचीत में पायलट ने कहा, ‘प्रमुख घटक दलों के टूटने से जहां राजग कमजोर हुआ है वहीं संप्रग के सहयोगी दलों ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विश्वास जताया है।’ उन्होंने कहा कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग सरकार बनाएगा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बसपा तथा अन्य दलों के साथ सीटों को लेकर गठजोड़ नहीं होने पर पायलट ने कहा कि कांग्रेस को कभी कमजोर नहीं आंकना चाहिए।

पायलट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में हम सभी 80 सीटों पर लड़ेंगे। 2009 में कांग्रेस ने 22-23 सीटें जीतीं थीं तो कांग्रेस को कभी भी कमजोर नहीं आंकना चाहिए। जैसा राहुल गांधी ने कहा है कि वे उस गठबंधन का सम्मान करते हैं लेकिन कांग्रेस अपने दम पर लड़ेगी और अच्छी सीटें जीतेगी। पायलट ने कहा, ‘भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर अगर कोई पार्टी चुनौती देकर हरा सकती है तो वह कांग्रेस पार्टी है। सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों को देशहित में, हिंदुस्तान की भलाई के लिए, (संवैधानिक) संस्थानों को खत्म करने में लगी ताकतों को परास्त करने के लिए मिलकर काम करना होगा।’

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष पायलट ने कहा कि बीते पांच साल में संप्रग का कुनबा लगातार बढ़ता रहा है वहीं राजग के घटक दल उससे छिटकते जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘(लोकसभा) चुनाव दूर नहीं है और जिस प्रकार से भाजपा के खेमे में खलबली मची है उससे साफ दिखता है कि भाजपा ये चुनाव हारने जा रही है। राजग का गठबंधन लगातार कमजोर हुआ है और बीते पांच साल में आठ से दस पार्टियां उसका साथ छोड़ चुकी हैं। चाहे वह देवेगौड़ा हों, शरद पवार हों, चंद्रबाबू नायडू हों या एम के स्टालिन... ये सभी राहुल गांधी के नेतृत्व में अपना भरोसा जता चुके हैं और 2019 में संप्रग की सरकार केंद्र में बनने जा रही है।’

लोकसभा चुनाव की तैयारियों के संबंध में उन्होंने कहा कि तीन राज्यों में जिस प्रकार से कांग्रेस की सरकारें बनी हैं... यह आने वाले लोकसभा चुनाव का भी संकेत है। 15 तारीख से हम लोग हर लोकसभा क्षेत्र के प्रमुख नेताओं तथा कार्यकर्ताओं से जयपुर में मुलाकात करेंगे और लोकसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों का पैनल तैयार कर बहुत जल्द दिल्ली भेजेंगे।

 

भारत की राजनीति का वो दुर्लभ दिन जब विपक्ष अपनी विपक्ष की भूमिका चाहते हुए भी नहीं नहीं निभा पाया और न चाहते हुए भी वह सरकार का समर्थन करने के लिए मजबूर हो गया, इसे क्या कहा जाए? कांग्रेस यह कह कर क्रेडिट लेने की असफल कोशिश कर रही है कि बिना उसके समर्थन के भाजपा इस बिल को पास नहीं करा सकती थी लेकिन सच्चाई यह है कि बाज़ी तो मोदी ही जीतकर ले गए हैं। “आरक्षण",  देश के राजनैतिक पटल पर वो शब्द, जो पहले एक सोच बना फिर उसकी सिफारिश की गई जिसे, एक संविधान संशोधन बिल के रूप में प्रस्तुत किया गया, और अन्ततः एक कानून बनाकर देश भर में लागू कर दिया गया।
  
आजाद भारत के राजनैतिक इतिहास में 1990 और 2019 ये दोनों ही साल बेहद अहम माने जाएंगे। क्योंकि जब 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने देश भर में भारी विरोध के बावजूद मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर "जातिगत आरक्षण" को लागू किया था तो उनका यह कदम देश में एक नई राजनैतिक परंपरा की नींव बन कर उभरा था। समाज के बंटवारे पर आधारित जातिगत विभाजित वोट बैंक की राजनीति की नींव।
 
इस लिहाज से 8 जनवरी 2019 की तारीख़ उस ऐतिहासिक दिन के रूप में याद की जाएगी जिसने उस राजनीति की नींव ही हिला दी। क्योंकि मोदी सरकार ने ना केवल संविधान में संशोधन करके, आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है बल्कि भारत की राजनीति की दिशा बदलने की एक नई नींव भी रख दी है। यह जातिगत वोटबैंक आधारित राजनीति पर केवल राजनैतिक ही नहीं कूटनीतिक विजय भी है। इसे मोदी की कूटनीतिक जीत ही कहा जाएगा कि जिस वोटबैंक की राजनीति सभी विपक्षी दल अब तक कर रहे थे, आज खुद उसी का शिकार हो गए। यह वोटबैंक का गणित ही था कि देश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण लागू करने हेतु 124वाँ संविधान संशोधन विधेयक राजयसभा में भाजपा अल्पमत में होते हुए भी पारित करा ले जाती है। मोदी सरकार की हर नीति का विरोध करने वाला विपक्ष, मोदी को रोकने के लिए अपने अपने विरोधों को भुलाकर महागठबंधन तक बना कर एक होने वाला विपक्ष आज समझ ही नहीं पा रहा कि वो मोदी के इस दांव का सामना कैसे करे। अब खास बात यह है कि आरक्षण का लाभ किसी जाति या धर्म विशेष तक सीमित न होकर हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई पारसी और अन्य अनारक्षित समुदायों को मिलेगा। यह देश के समाज की दिशा और सोच बदलने वाला वाकई में एक महत्वपूर्ण कदम है।
 
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में हर विषय पर राजनीति होती है। शायद इसलिए कुछ लोगों का कहना है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का यह फैसला एक राजनैतिक फैसला है जिसे केवल आगामी लोकसभा चुनावों में राजनैतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से लिया गया है। तो इन लोगों से एक प्रश्न कि देश के वर्तमान परिदृश्य में कौन-सा ऐसा राजनैतिक दल है जो राजनैतिक नफा नुकसान देखे बिना कोई कदम उठाना तो दूर की बात है, एक बयान भी देता है ? कम से कम वर्तमान सरकार का यह कदम विपक्षी दलों के उन गैर जिम्मेदाराना कदमों से तो बेहतर ही है जो देश को धर्म जाति सम्प्रदाय के नाम पर बांट कर समाज में वैमनस्य बढ़ाने का काम करते हैं और नफरत की राजनीति करते हैं। याद कीजिए 1990 का वो साल जब ना सिर्फ हमारे कितने जवान बच्चे आरक्षण की आग में झुलसे थे बल्कि आरक्षण के इस कदम ने हमारे समाज को भी दो भागों में बांट कर एक दूसरे के प्रति कटुता उत्पन्न कर दी थी। इसका स्पष्ट उदाहरण हमें तब देखने को मिला था जब अभी कुछ माह पहले ही सरकार ने एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव किया था और देश के कई हिस्से हिंसा की आग में जल उठे थे।
 
कहा जा सकता है कि जातिगत भेदभाव की सामाजिक खाई कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही थी। लेकिन अब जाति या सम्प्रदाय सरीखे सभी भेदों को किनारे करते हुए केवल आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ने सामाजिक न्याय की दिशा में एक नई पहल का आगाज़ किया है। समय के साथ चलने के लिए समय के साथ बदलना आवश्यक होता है। आज जब आरक्षण की बात हो रही हो तो यह जानना भी जरूरी है कि आखिर इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी।
दरअसल जब देश में आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई थी तो उसके मूल में समाज में पिछड़े वर्गों के साथ होने वाले अत्याचार और भेदभाव को देखते हुए उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए मंडल आयोग द्वारा कुछ सिफारिशें की गई थीं जिनमें से कुछ एक को संशोधन के साथ अपनाया गया था। लेकिन आज इस प्रकार का सामाजिक भेदभाव और शोषण भारतीय समाज में लगभग नहीं के बराबर है। और आज आरक्षण जैसी सुविधा के अतिरिक्त देश के इन शोषित दलित वंचित वर्गों के साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव अथवा अन्याय को रोकने के लिए अनेक सशक्त एवं कठोर कानून मौजूदा न्याय व्यवस्था में लागू हैं जिनके बल पर सामाजिक पिछड़ेपन की लड़ाई हम लोग काफी हद तक जीत चुके हैं। अब लड़ाई है शैक्षणिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन की। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं करते हुए इसकी अलग व्यवस्था की है जो अब समाज में आरक्षण के भेदभाव को ही खत्म कर के एक सकारात्मक माहौल बनाने में निश्चित रूप से मददगार होगा। चूंकि अब समाज का हर वर्ग ही आरक्षित हो गया है तो आए दिन समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा आरक्षण की मांग और राजनीति पर भी लगाम लगेगी।
 
और अब आखिरी बात जो लोग इसका विरोध यह कहकर कर रहे हैं कि सरकार के इस कदम का कोई मतलब नहीं है क्योंकि नौकरियाँ ही नहीं हैं उनसे एक सवाल। जब मराठा, जाट, पाटीदार, मुस्लिम, आदि आरक्षण की मांग यही लोग करते हैं तब इनका यह तर्क कहाँ चला जाता है ?
 
- डॉ. नीलम महेंद्र
समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की प्रेस कांफ्रेस हो चुकी है। दोनों 38−38 सीटों पर चुनाव लड़ेगें। मायावती ने भाजपा और कांग्रेस को तौला तो एक ही तराजू पर लेकिन अमेठी में राहुल गांधी ओर और रायबरेली सोनिया गांधी के खिलाफ गठबंधन का कोई प्रत्याशी नहीं उतारे जाने की बात कहकर कई संकेत भी दे दिए। कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने की बड़ी वजह मायावती ने यही बताई कि कांग्रेस का वोट उनके पक्ष में ट्रांसफर नहीं होता है, संकेत की भाषा को समझा जाये तो उन्हें लगता है कांग्रेस को गठबंधन में शामिल करने से उसका वोट भाजपा के खाते में चला जाता है। मायावती अखिलेश की संयुक्त प्रेस कांफ्रेस के साथ ही यह भी साफ हो गया कि राष्ट्रीय लोकदल को लेकर मायावती में कोई उत्साह नहीं है, जबकि अखिलेश भी कुछ बोलने से कतराते दिखे। गठबंधन को लेकर आज काफी कौतुहल तो दिखाई दिया, लेकिन यह नहीं भुलना चाहिए कि हर चुनाव का अलग मिजाज होता है। सपा−बसपा की जोड़ी भाजपा को टक्कर तो जरूर देगी, लेकिन चुनाव एक तरफा हो जायेगा, इसकी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। हॉ, यह बात भी साफ हो गई है कि उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमों मायावती निर्विवाद रूप से मोदी के खिलाफ सबसे बड़ी नेत्री बनकर उभरी हैं तो राहुल गांधी की हैसियत चौथे नंबर पर है।
 
बहरहाल, बसपा प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने एक साथ चुनाव लड़ने की घोषणा करके उत्तर प्रदेश की सियासत में 25 वर्षो के बाद एक बार फिर इतिहास दोहरा दिया । 1993 में जब बीजेपी राम नाम की आंधी में आगे बढ़ रही थी तब दलित चिंतक और बसपा नेता कांशीराम एवं समाजवादी पार्टी के तत्कालीन प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने ठीक इसी प्रकार से उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव फतह के लिये हाथ मिलाकर भाजपा को चारो खाने चित कर दिया था। उस समय नारा भी लगा था,' मिले मुलायम और कांशीराम, हवा में उड़ गये जय श्री राम। 'खास बात यह है कि तब भी अयोध्या मंदिर−मस्जिद विवाद में सुलग रही थी और आज भी कमोवेश ऐसे ही हालात हैं। बस फर्क इतना भर है कि 1993 में कमंडल (अयोध्या विवाद) के सहारे आगे बढ़ रही बीजेपी को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी के उस समय के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और बीएसपी सुप्रीमो कांशीराम ने हाथ मिलाया था तो 25 वर्षो बाद 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये उत्तर प्रदेश में कांशीराम और मुलायम की जगह उनके उत्ताराधिकारी मायावती और अखिलेश यादव गठबंधन की रहा पर आगे बढ़ रहे हैं। दोनों नेताओं को लगता है कि साथ चलने से वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनाव की जैसी दुर्गित को रोका जा सकता है।
 
सपा−बसपा इस बात का अहसास राज्य में तीन लोकसभा सीटों पर हुए उप−चुनाव जीत जीत कर करा भी चुके हैं। इस साल के मध्य से कुछ पूर्व होने वाले लोकसभा चुनाव में अगर वोटिंग पैटर्न उप−चुनावों जैसा ही रहा तो सपा−बसपा गठबंधन उत्तर प्रदेश में भाजपा को 35−40 सीटों  पर समेट सकता है। सपा−बसपा की राह इस लिये भी आसान लग रही है क्योंकि यहां कांग्रेस फैक्टर बेहद कमजोर है, इसी के चलते सपा−बसपा ने गठबंधन से कांग्रेस को दूर भी रखा।
 
गौरतलब हो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से बीजेपी गठबंधन को 73 सीटों पर जीत हासिल हुई थी,जिसमें उसकी सहयोगी अपना दल की भी दो सीटें शामिल थीं। वहीं समाजवादी पार्टी 5 सीट और कांग्रेस महज 2 सीटों पर सिमट गई थी। बसपा का तो खाता भी नहीं खुल पाया था। करीब पांच वर्षो के बाद आज भी लोकसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व नहीं है। राजनीति के जानकार सपा−बसपा गठबंधन की बढ़त की जो संभावना व्यक्त कर रहे हैं। उसमें वह वर्ष 2014 में अपना दल और बीजेपी तथा सपा−बसपा के वोट शेयर का तुलनात्मक अध्ययन को आधार बना रहे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हर सीट पर जीत का आकलन किया जाये तो पता चलता है कि अगर एसपी−बीएसपी साथ आए तो वह आधी यानी करीब 41 लोकसभा सीटों पर भाजपा को हरा सकते हैं। 
 
 
यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरे पहलू पर नजर दौड़ाई जाए तो लोकसभा की तीन सीटों पर हुए उप−चुनाव के समय वोटिंग का प्रतिशत कम रहा था। माना यह गया कि भाजपा का कोर वोटर वोटिंग के लिये निकला ही नहीं था। मगर आम चुनाव के समय हालात दूसरे होंगे। फिर हमेशा चुनावी हालात एक जैसे नहीं होते हैं। मोदी सरकार सभी वर्ग के लोगों को लुभाने के लिए गरीब अगड़ों को दस प्रतिशत आरक्षण का एतिहासिक फैसला कर चुकी है। यूपी में आरक्षण कोटे में कोटा का खेल करके बीजेपी सपा−बसपा के दलित−पिछड़ा वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश कर रही है। व्यापारियों को जीएसटी में राहत, तीन तलाक पर एक बार फिर अध्यादेश लाना भी मोदी सरकार की सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा है। आने वाले दिनों में  आयकर की सीमा बढ़ाकर मध्य वर्ग को खुश किया जा सकता है। किसानों के लिये भी कई महत्वपूर्ण घोषणा हो सकती हैं। मोदी ने अपर कास्ट को आरक्षण का जो मास्टर स्ट्रोक चला है, वह आम चुनाव में अपना असर दिखा सकता है। इसके अलावा भी यह ध्यान रखना होगा कि लोग किन−किल मुद्दों पर वोट करेंगे।यह सच है कि साल 2014 में दस वर्ष पुरानी कांग्रेस गठबंधन वाली यूपीए सरकार को लेकर मतदाताओं में जबर्दस्त रोष था और विकल्प के रूप में उनके सामने प्रधानमंत्री पद के लिये मोदी जैसा दावेदार मौजूद था।
 
2019 में मोदी सरकार का कामकाज मतदाताओं के सामने मुख्य मुद्दा होगा, लेकिन सवाल यह भी रहेगा कि मोदी नहीं तो कौन? फिलहाल तो विपक्ष के पास मोदी के समकक्ष तो दूर आस−पास भी कोई नेता नजर नहीं आता है। खासकर कांग्रेस के संभावित प्रधानमंत्री पद के दावेदार राहुल गांधी एक बड़ा ड्रा बैक नजर आ रहे हैं, जिसकी सोच का दायरा काफी छोटा और संक्रीण है।
 
यहां यह भी ध्यान देना होगा कि बीएसपी हो या फिर समाजवादी पार्टी गठबंधन के बाद सपा−बसपा के जिन नेताओं के चुनाव लड़ने की उम्मीदों पर पानी फिरेगा, वह चुप होकर नहीं बैठेंगें। यह बगावत कर सकते हैं। चुनाव नहीं भी लड़े तो पार्टी को नुकसान पहुंचाने से इन्हें गुरेज नहीं होगा। इसके अलावा यह भी देखा गया है कि हर पार्टी में ऐसे वोटरों की भी संख्या अच्छी−खासी होती है जो किसी और दल के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने से कतराता है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। इसके अलावा एक हकीकत यह भी है कि योगी के सत्ता में आने से पहले समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच ही सत्ता का खेल चलता था। ऐसे में दोनों पार्टियों के तमाम नेता सत्ता बदलने पर एक−दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल देते थे, जिसमें अपने हित साधने के लिये आपस में मारकाट से लेकर जमीनों पर कब्जा, खनन−पटटों के लिये खूनी खेल तक खेला जाता था। ऐसे में सपा के कुछे नेता बसपा के पक्ष में अपने समर्थको से मतदान नहीं कराएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसे ही हालात बसपा में भी हैं। इसी प्रकार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद मतदाता बसपा के पक्ष में वोट नहीं करना चाहते। यहां जाट और जाटव (दलित) हमेशा विरोधी खेमें में खड़े रहते हैं। सपा−बसपा के जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा, वह बागी रूख अख्तियार करने के अलावा भाजपा नेताओं से भी हाल मिला सकते हैं।
 
कुछ राजनीतिक विश्लेषक साल 1993 के विधानसभा चुनावों का हवाला देते हैं जब सपा−बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में भाजपा और सपा−बसपा ने लगभग बराबर सीटें हासिल की थीं। तब उत्तराखंड यूपी का हिस्सा था और बीजेपी ने वहां 19 सीटें जीती थीं और कांग्रेस भी यहां इतनी दयनीय स्थिति में नहीं थी। तब कुर्मी और राजभर जैसी ओबीसी जातियों का प्रतिनिधि करने वाले कई नेता जो तब बसपा में थे, अब भाजपा के साथ खड़े हैं। मोदी जैसा गणितिज्ञ चेहरा भी भाजपा के पास है, जो आने वाले दिनों में वोटरों को लुभाने के लिये कई सौगातों की बरसात कर सकते हैं। फिर भी 1993 के सहारे सपा−बसपा नेता हौसलाफजाई तो कर ही सकते हैं।
 
- अजय कुमार

जम्मू। जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने आतंकवादियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की सोमवार को अपील करते हुए उन्हें आश्वस्त किया कि उनका प्रशासन उनके पुनर्वास के लिए जो भी हो सकेगा करेगा। मलिक ने एक कार्यक्रम के इतर संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘आपरेशन आल आउट जैसा यहां कुछ भी नहीं है। कुछ लोग इस गलत शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि ये बच्चे (आतंकवादी) वापस लौटें और हम जो कुछ भी उनके लिए कर सकते हैं, करने के लिए तैयार हैं।’ वह कुछ राजनेताओं द्वारा ‘आपरेशन ऑल आउट’ रोकने और कश्मीर घाटी में हत्या की जांच की मांग करने के आलोक में पूछे गए सवाल का जवाब दे रहे थे।

मलिक ने कहा कि जब कोई आतंकवादी कहीं भी गोली चलाता है और विस्फोटक फेंकता है- तो ऐसा नहीं हो सकता है कि आप गोली चलायें और हम आपको फूल और गुलदस्ता भेजें। हमारी तरफ से ‘आपरेशन आल आउट’ नहीं चलाया जा रहा है। उन्हें (आतंकवादियों को) यह रास्ता छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। आपरेशन आल आउट की तरह कुछ भी नहीं है।’ नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के उस बयान के बारे में पूछे जाने पर, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रदेश में अगर उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो वह राज्य में हुई हत्याओं के लिए वह अलग से एक आयोग का गठन करेंगे, राज्यपाल ने कहा कि वह रोज कुछ न कुछ बयानबाजी करते रहते हैं।


राज्यपाल ने कहा कि वह एक वरिष्ठ राजनेता हैं इसलिए उनके बारे में टिप्पणी करना अच्छा नहीं है। मलिक ने कहा कि मुख्यधारा के राजनेताओं की राजनीतिक जरूरतें हैं और हमारे देश में वोट के लिए लोग किसी हद तक जा सकते हैं। कुछ राजनेताओं के हालिया बयान के बारे में पूछे जाने पर मलिक ने कहा, ‘वे सब राजनेता हैं और उनकी राजनीतिक जरूरतें हैं। लोग वोट के लिए इस देश में बहुत दूर जा सकते हैं। मैं सबकी जरूरतों का समझता हूं और उनका सम्मान करता हूं।’ राज्य में विधानसभा चुनावों के बारे में पूछे जाने पर राज्यपाल ने कहा कि उनका प्रशासन इसके लिए तैयार है। राज्यपाल ने कहा कि हम चुनावों के लिए तैयार हैं और जब निर्वाचन आयोग इसका निर्णय करेगा हम चुनाव करायेंगे। इस बीच मलिक ने स्थानीय राजिंदर पार्क में बने संगीतमय फव्वारा और जिम का उद्घाटन किया। इसका निर्माण जम्मू कश्मीर बैंक ने करवाया है।

बेंगलुरू। कप्तान और स्टार खिलाड़ी किदाम्बी श्रीकांत की अगुवाई में बेंगलुरू रैप्टर्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रविवार को कांतिरावा स्टेडियम में मुम्बई रॉकेट्स को 4-3 से हराते हुए वोडाफोन प्रीमियर लीग (पीबीएल) के चौथे सीजन का खिताब जीत लिया। बेंगलुरू ने पहली बार यह खिताब जीता है। इस मैच में श्रीकांत के अलावा थी थ्रांग वू ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए  मैच जीत अपनी टीम को खिताब तक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। श्रीकांत ने बेंगलुरू को ऐसे समय में जीत दिलाई, जब वह 0-2 से पीछे थे। इसके बाद वू ने अपना ट्रम्प मैच जीतते हुए अपनी टीम को 3-2 से आगे कर दिया, लेकिन मुंबई के समीर वर्मा ने बेंगलुरू के बी. साई. प्रणीत को मात दे स्कोर 3-3 से बराबर कर मुकाबले को आखिरी  मैच में पहुंचा दिया। 

मैच का फैसला पुरुष युगल के आखिरी मैच से निकला जहां बेंगलुरू ने मुंबई को मात देते हुए खिताबी जीत हासिल की। दिन की शुरुआत में मिश्रित युगल मुकाबले में रॉकेट्स के किम जी जुंग और पिया जेबादिया बेर्नादेथ ने अपने ट्रम्प मैच में मार्कस एलिस और लॉरेन स्मिथ को 15-8, 15-14 हराया और अपनी टीम को 2-0 की बढ़त दिला दी। जुंग और जेबादिया ने पहले गेम में शुरुआत से ही अपना दबदबा बनाए रखा और इसे 15-8 से जीत लिया। दूसरे गेम में एक समय बेंगलुरू की टीम 6-3 से आगे थी लेकिन रॉकेट्स ने जल्द ही 8-8 की बराबरी कर ली। इसके बाद बेंगलुरू ने 11-9 की बढ़त बना ली लेकिन रॉकेट्स ने 13-13 की बराबरी के साथ गेम को रोमांचक मोड़ पर ला दिया। दोनों के बीच 14-14 की बराबरी के साथ मैच अंतिम शॉट तक गया, जिसमें रॉकेट्स ने बाजी मारते हुए दो अंक हासिल कर लिए।

इसके बाद श्रीकांत का सामना एंटोनसेन से हुआ, जिसमें श्रीकांत 15-7, 15-10 से विजयी रहे और अपनी टीम की वापसी कराई। स्कोर अब भी हालांकि मुम्बई के पक्ष में 2-1 था। श्रीकांत ने पहला गेम 15-7 से जीता। श्रीकांत ने 4-0 के साथ शुरुआत की और अंत तक अपनी बढ़त को बनाए रखा। दूसरे गेम में एंटोनसेन ने श्रीकांत को कड़ी टक्कर दी। श्रीकांत ने 5-3 की बढ़त के साथ शुरुआत की थी लेकिन एक समय मुकाबला 6-6 की बराबरी पर आ गया था।  इसके बाद हालांकि श्रीकांत ने 7-6 की बढ़त हासिल की और उसे अंत तक बनाए रखते हुए अपनी टीम को बेहद जरूरी एक अंक दिलाया। इसके बाद महिला एकल मुकाबले में रैप्टर्स की थी थ्रांग वू ने ट्रम्प मैच में मुम्बई की श्रेयांसी परदेसी को चुनौती दी। वू ने यह मैच 15-8, 15-9 से जीतते हुए स्कोर को 3-2 से आगे कर दिया। पीबीएल में ट्रम्प मैच जीतने वाली टीम को दो अंक मिलते हैं।

वू ने पहला गेम आसानी से 15-8 से अपने नाम किया। शुरुआत हालांकि अच्छी रही थी। एक समय स्कोर 8-6 था लेकिन जल्द ही वू ने अपनी बढ़त को मजबूत किया और लगातार अंक हासिल करते हुए बड़े अंतर से यह गेम अपने नाम किया। दूसरे गेम में परदेसी ने अच्छा आगाज किया और एक समय 8-8 की बराबरी पर थीं लेकिन वू ने इसके बाद बढ़त हासिल की और उसे मजबूत करते गईं। अंतत: वू ने यह गेम 15-9 से जीतते हुए अपनी टीम को दो बेहद महत्वपूर्ण अंक दिलाए और उसे 3-2 से आगे कर दिया।  इसके बाद साई प्रणीत का सामना समीर से हुआ। समीर ने यह मैच 7-15, 15-12, 15-3 से जीतते हुए मुंबई को 3-3 की बराबरी दिला दी। 


एडीलेड। ऑस्ट्रेलिया के उपकप्तान एलेक्स कैरी ने सोमवार को कहा कि टीम ने पिछले 12 महीने में जिस तरह से संघर्ष किया है उसे देखते हुए भारत जैसे शीर्ष देश के खिलाफ श्रृंखला में जीत दर्ज करना ‘काफी बड़ी बात होगी’। मेजबान टीम ने सिडनी में खेले गये पहले एकदिवसीय को 34 रन से जीत कर तीन मैचों की श्रृंखला में 1-0 से बढ़त कायम की। श्रृंखला का दूसरा मैच मंगलवार को एडीलेड में खेला जाएगा। ऑस्ट्रेलिया ने आखिरी बार जनवरी 2017 में पाकिस्तान के खिलाफ 4-1 से श्रृंखला में जीत दर्ज की थी। गेंद से छेड़छाड़ के विवाद के बाद तत्कालीन कप्तान स्टीव स्मिथ, उपकप्तान डेविड वार्नर और कैमरून बैनक्रोफ्ट पर प्रतिबंध लगने के बाद 2018 में टीम 18 एकदिवसीय में से सिर्फ दो में जीत दर्ज कर सकी थी।

टीम ने हालांकि 2019 की शुरूआत जीत के साथ की है। कैरी ने कहा, ‘यह (श्रृंखला को जीतना) काफी बड़ी बात होगी, ऐसा हुए काफी समय से नहीं हुआ है। मैं ऑस्ट्रेलिया को जीतते देखना चाहता हूं और इस टीम का हिस्सा होना हम सब के लिए काफी मायने रखता है। हम लगातार अच्छा प्रदर्शन कर विश्व कप में जाना चाहते है।’ इस विकेटकीपर बल्लेबाज ने कहा, ‘भारत की टीम काफी अच्छी है इसलिए वे जल्द
उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि पिछले मैच में हमने अच्छा प्रदर्शन किया और हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे। अगर आप हमारी बल्लेबाजी को देखेंगे तो हमने काफी अच्छा किया। भारत को शुरूआत में तीन झटके देना शानदार रहा। महेन्द्र सिंह धोनी और रोहित शर्मा ने बड़ी साझेदारी की लेकिन हमने सही समय पर साझेदारी को तोड़ वापसी की।

अहमदाबाद। भाजपा नीत गुजरात सरकार ने सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण सोमवार को लागू किया। इसके साथ ही गुजरात इस नए प्रावधान को लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। संसद ने 10 प्रतिशत आरक्षण मुहैया कराने के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक को पिछले सप्ताह मंजूरी दे दी थी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शनिवार को इसे मंजूरी दे दी थी।

 

 
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने रविवार को घोषणा की थी कि उनकी सरकार 14 जनवरी से आरक्षण प्रावधान लागू करेगी। उन्होंने एक ट्वीट में कहा, ‘‘मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि गुजरात सरकार ने 14 जनवरी 2019 से 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण लाभ लागू करने का फैसला किया है। इसे उन सभी जारी भर्ती प्रक्रियाओं में लागू किया जाएगा जिनमें फिलहाल केवल विज्ञापन प्रकाशित किए गए हैं और परीक्षा का पहला चरण अभी होना शेष है।’’
 
राज्य सरकार ने एक विज्ञप्ति में कहा था, “14 जनवरी को उत्तरायण शुरू होने के साथ सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण मिलेगा।”इसमें कहा गया था कि आरक्षण की नयी व्यवस्था उन दाखिलों और नौकरियों के लिये भी प्रभावी होगी जिनके लिये विज्ञापन 14 जनवरी से पहले जारी हुआ हो लेकिन वास्तविक प्रक्रिया शुरू न हुई हो। ऐसे मामलों में दाखिला प्रक्रिया और नौकरियों के लिये नए सिरे से घोषणाएं की जाएंगी। विज्ञप्ति में कहा गया था कि जो भर्ती या दाखिला प्रक्रिया - परीक्षा या साक्षात्कार- 14 जनवरी से पहले शुरू हो चुकी हैं, उनमें 10 फीसदी आरक्षण लागू नहीं होगा। 

 

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