ईश्वर दुबे
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Bhilai
शरीर के लिए त्रिस्तम्भ आवश्यक हैं --- आहार ,निद्रा ब्रह्मचर्य .आपको आश्चर्य होगा हमारे शरीर की शक्ति नेत्रों के द्वारा नष्ट होती हैं और उस शक्ति को प्राप्त करने के लिए निद्रा आवश्यक होती हैं ,इसलिए निद्रा लेने के बाद हम स्वस्थ्य और ताजगी महसूस करते हैं .निद्रा के आभाव में हम अनेक रोगों के साथ मानसिक बीमारियों से घिर जाते हैं .अनिद्रा की स्थिति में अपराधियों से अपराध कबूल करवाते हैं .जितना आहार आवश्यक हैं उससे अधिक निद्रा भी जरुरी हैं .
निद्रा सुखपूर्वक और चिंतारहित होना चाहिए ,इसके लिए बहुत जरुरी हैं नियमितता .जब तक नियमित दिन चर्या नहीं होगी तब तक हम नियमित नींद नहीं ले पायेगे .निश्चित समय होना जरुरी हैं .कहा भी गया हैं जल्दी सोना ,जल्दी उठना स्वस्थ्य ,धनी होना और होशियार होने की निशानी हैं .
अच्छी नींद आपके शरीर को ताज़ा और टूट फुट की पूर्ति कर अगले दिन के लिए तैयार करती है।
नींद के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो हम नहीं जानते। हम क्यों सोते हैं, हम क्यों सपने देखते हैं और मनुष्यों को व्यवस्थित जगह सोने की आवश्यकता क्यों होती है, वैज्ञानिक अभी तक इसके सटीक उत्तर की तलाश कर रहे हैं। लेकिन एक बात सुनिश्चित है: जब हम सोते हैं और एक अच्छी नींद लेते हैं, तो हम शारीरिक और मानसिक रूप से बेहतर महसूस करते हैं और दिन के दौरान बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
नींद हमारे शरीर और दिमाग के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जब आप सोते हैं तो क्या होता है?
आपका दिमाग पूरे दिन की सूचनाओं को संसाधित करता हैयह सोचकर मूर्ख न बनें कि जब आप सो रहे होते हैं, तो आपका दिमाग भी बंद हो जाता है। वास्तव में, सोते समय आपका दिमाग बहुत व्यस्त रहता है और दिन भर के लिए सूचनाओं को संग्रहित करता है।
यह प्रक्रिया विशेष रूप से दीर्घकालिक यादें बनाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपका मस्तिष्क दिन भर में एकत्रित की गई सभी सूचनाओं को समेकित करता है और बाद में उपयोग के लिए संग्रहीत करता है।
सोते समय भी आपका दिमाग काम करता है। आपका सहानुभूति तंत्रिका तंत्र आराम करता है
नींद के दौरान, आपका सहानुभूति तंत्रिका तंत्र (सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम), जो आपकी लड़ने या कल्पना की प्रतिक्रिया को नियंत्रित करती है, को आराम करने का मौका मिलता है।
जब हम नींद से वंचित होते हैं, तो सहानुभूति तंत्रिका तंत्र की गतिविधि बढ़ जाती है, जो रक्तचाप में वृद्धि में भी प्रतिबिंबित होती है।
कोरोनरी हृदय रोग का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं कि क्या नींद की कमी और हृदय रोग के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध है।
आपके शरीर में बढ़ता है हार्मोन्स का स्तर --- नींद के दौरान आपका शरीर सभी अलग-अलग उद्देश्यों के लिए कई अलग-अलग हार्मोन जारी करता है। मेनाटोनिन, जो कि पीनियल ग्रंथि द्वारा जारी किया जाता है, आपकी नींद के पैटर्न को नियंत्रित करता है।
आपके हार्मोन्स का स्तर में वृद्धि होती है। रात में हार्मोन्स स्तर बढ़ जाता है, जिससे आप उनींदापन महसूस करते हैं। जब आप सोते हैं, तो आपकी पिट्यूटरी ग्रंथि ग्रोथ हार्मोन जारी करती है, जो आपके शरीर की बढ़ने और मरम्मत करने में मदद करती है।
कम होता है कोर्टिसोल का स्तर ----कोर्टिसोल, जिसे अक्सर तनाव हार्मोन कहा जाता है, का स्तर जागने के ठीक बाद चरम स्तर पर पहुंचने से पहले सोने के पहले कुछ घंटों के दौरान गिरता है। जब आप उठते हैं और आपकी भूख बढ़ती है तो यह आपको उत्साहित महसूस करने में मदद करता है।
आपकी मांसपेशियां पैरालाइज हो सकती हैं नींद के दौरान, आप नॉन-रैपिड आई मूवमेंट स्लीप और रैपिड आई मूवमेंट स्लीप के बीच स्विच करते हैं। आरईएम नींद के दौरान, हम ज्वलंत सपने देखते हैं।
इस चरण के दौरान, आपकी मांसपेशियों को अस्थायी रूप से लकवा मार जाता है, जिसका अर्थ है कि आप हिल नहीं सकते। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि आप शारीरिक रूप से अपने सपनों को पूरा नहीं करते हैं।
आजकल ज्यादातर लोग बालों के झड़ने की समस्या से परेशान हैं। ऐसे में तिल का तेल लाभप्रद है। पोषक गुणों से भरपूर तिल के तेल में ना केवल त्वचा और बालों को पोषित करने की खूबी होती है बल्कि उपचार की क्वालिटी भी बेहतर होती है। ये बात वैज्ञानिक तौर पर भी साबित हो चुकी है कि तिल के तेल से बालों को संपूर्ण पोषण मिलता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन ई, बी कॉम्प्लेक्स, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और प्रोटीन पाया जाता है।
तिल का तेल बालों से जुड़ी हर समस्या का समाधान है। बालों को भीतर से पोषित करने और जड़ों को मजबूती देने के लिए तिल के तेल को रातभर बालों में लगाकर छोड़ दें और अगली सुबह बाल धो लें।
बालों की हर समस्या का इलाज है तिल का तेल
अगर आपके बाल बेजान और रूखे हो चुके हैं तो भी तिल के तेल का इस्तेमाल करना फायदेमंद रहेगा। ये स्कैल्प से लेकर बालों के अंतिम छोर तक उन्हें पोषित करता है। तिल के तेल के इस्तेमाल से बालों का रुखापन दूर हो जाता है और उनकी खोई हुई चमक वापस आ जाती है।
अगर आपके बाल बहुत अधिक गिर रहे हैं तो तिल के तेल से बालों में मालिश करना फायदेमंद होगा। इसमें बालों को मजबूती देने के गुण होते हैं। इसके साथ ही तिल के तेल से मसाज करने पर तनाव दूर होता है और नींद भी अच्छी आती है।
तिल के तेल से मसाज करने पर ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है जिससे बाल तेजी से बढ़ते हैं। अगर आपको लगता है कि आपके बाल पूरी तरह बढ़ने से पहले से ही टूट जाते हैं तो भी तिल के तेल का इस्तेमाल करें। तिल के तेल के इस्तेमाल से डेंड्रफ की समस्या भी दूर हो जाती है। अगर कम उम्र में ही बाल सफेद पड़ने लगे हैं तो रोजाना तिल के तेल को बालों में लगाए। जल्द ही सफेद बालों से छुटकारा मिल जाएगा।
हाल ही में हुए एक अध्ययन में यह कहा गया है कि अखरोट खाने से अस्थमा होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। यह अध्ययन 'एलर्जी एंड क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी' जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं के अनुसार अखरोट में भरपूर मात्रा में विटामिन ई पाया जाता है, जो अस्थमा के अटैक से बचाने में काफी कारगार साबित होता है।
उन्होंने यह भी बताया है कि अखरोट, मूंगफली, सोयाबीन, कोर्न, तिल आदि में गामा-टोकोफ़ेरॉल नाम का विटामिन ई पाया जाता है। जो शरीर को अस्थमा से बचाने में मदद करता है. यह अध्ययन 'यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना स्कूल ऑफ मेडिसिन' के शोधक्ताओं ने किया है.
अध्ययन के सीनियर लेखक प्रोफेसर मिशेल हर्नानडेज ने बताया है कि जो लोग अपनी डाइट में विटामिन ई का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं उनमें अस्थमा और एलर्जी से होने वाली बीमारियों का खतरा बहुत हद तक कम हो जाता है।
साथ ही शोधकर्ताओं ने यह भी बताया है कि विटामिन ई उन्ही कोशिकाओं पर सबसे ज्यादा असरदार होता है, जो अस्थमा के इलाज के लिए महत्वपूर्ण होती हैं.
अध्ययन के दौरान लोगों को 2 टीम में बांटा गया। जिसमें 2 हफ्तों तक एक टीम को गामा-टोकोफ़ेरॉल नाम का विटामिन ई दिया गया, जबकि दूसरी टीम को प्लेसबो दिया गया। नतीजों में विटामिन ई लेने वाले लोगों में इओसिनोफिलिक बीमारी के लक्षण बहुत कम देखे गए हैं। साथ ही विटामिन ई के सेवन से शरीर में म्यूसिन नाम के प्रोटीन का स्तर भी काफी कम पाया गया है। बता दें कि म्यूसिन शरीर में बलगम बनाने का काम करता है, जो अस्थमा के मरीजों के लिए काफी नुकसानदायक होता है।
धनिया के बीजों को अधिकतर खाने में स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, अगर इसका पानी रोज पिया जाए तो यह शरीर को कई तरह के स्वास्थ्य लाभ भी देता है। इसमें मौजूद पोटैशियम, विटमिन सी, कैल्शियम और मैग्नीशियम सेहत से जुड़ी कई समस्याओं को दूर करता है।
लिवर की बीमारी से बचाए
धनिया के पानी में मौजूद फाइबर और इसेंशल ऑइल लिवर से जुड़ी बीमारियों से बचाता है।
टाइफ़ॉइड से बचाए
धनिया के पानी में एक विशेष तत्व डोडेनल पाया जाता है। यह टाइफ़ॉइड के बैक्टीरिया को खत्म करता है।
दिल की समस्या रखे दूर
धनिया का पानी गुड कलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है और बैड कलेस्ट्रॉल को कम करता है। इसे रोज पीने से दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाए
धनिया के पानी में मौजूद एस्कॉर्बिक ऐसिड ऐंटिऑक्सिडेंट होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इससे सर्दी, खांसी की आशंका कम हो जाती है।
मुंह की बदबू करे दूर
रोज धनिया का पानी पीने से मुंह और सांस की बदबू की समस्या भी दूर हो जाती है।
अल्सर की समस्या
धनिया का पानी कोलेजन टिश्यू के प्रॉडक्शन को बढ़ाता है। इससे अल्सर की समस्या दूर हो जाती है।
मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) की स्थिति से हर महिला को एक न एक दिन गुजरना पड़ता है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं को अपनी सेहत का खास ख्याल रखना पड़ता है क्योंकि इसके बाद उन्हें कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इस दौरान सबसे ज्यादा खतरा दिल की बीमारियों का होता है हालांकि कुछ सावधानियां और आदतों में बदलाव करके दिल की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मेनोपॉज के कारण नर्वस सिस्टम और दिल पर असर पड़ता है। इसके बाद महिलाओं में धमनी रोगों यानी कोरोनरी आर्टरी डिजीज का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि इस दौरान धमनियों में ब्लॉकेज की समस्या बढ़ जाती है। ऐसा दिल की संकेत में इलेक्ट्रीकल उपद्रव यानि अर्थाथिमिआस के कारण होता है। इसे रोकने और दिल का अच्छा ख्याल रखने के लिए, महिलाओं को नियमित जांच करानी चाहिए।
करायें ये जांच
इसलिए हर महिला को नियमित रूप से ये टेस्ट करवाने चाहिए-
ब्लड प्रैशर, ब्लड शुगरथायराइड, हीमोग्लोबिन,ट्राइग्लिसराइड, बी.एम.आई और लिपिड प्रोफाइल।
विटामिन्स और मिनरल्स लें
मेनोपॉज के बाद दिल की बीमारियों से बचने के लिए अपने आहार में विटामिन्स और मिनरल्स युक्त पर्दाथों को शामिल करें। मेनोपॉज में होने वाली हॉट फ्लेशज की समस्या से बचने के लिए विटामिन ए, सी, मैग्नीशियाम आदि का सेवन करना चाहिए। मेनोपॉज के बाद अपनी डाइट का ख्याल रखने से आप हार्ट के साथ ओस्टियोपोरोसिस से भी बची रहेंगी। इसके अलावा अपनी खुराक में कैल्शियम की भरपूर मात्रा लें। इससे आपको मेनोपॉज के दौरान होने वाली समस्याओं से निजात मिलेगी।
हड्डियों पर पड़ता है असर
दिल के साथ-साथ मेनोपॉज का असर हड्डियों पर भी पड़ता है। एस्ट्रोजन हार्मोन के कम होने के कारण बोन मास कम हो जाता है, जिसके के कारण घुटने में दर्द और जोड़ों में दर्द की समस्या रहने लगती है। कैल्शियम की ज्यादा कमी की वजह से रीढ़ की हड्डी कमजोर होने लगती है और मरीज आगे की तरफ झुकना शुरू कर देते हैं।
खान-पान में रहें सचेत
दिन में पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं। इससे पेट में होने वाली समस्याएं दूर होगी और दिल के रोगों का खतरा भी काफी हद तक कम होगा। इसके अलावा अपने खान-पान में ताजे फल, जूस और मौसमी हरी पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करें। सीमित मात्रा में वसा का सेवन करें। इसके अलावा बाहर का खाना और तले हुआ भोजन से दूरी बनाकर रखें।
मोटापा न होने दें
कई बार ऐसा होता है कि हार्मोनल चेंज की वजह से कुछ महिलाओं का वजन बढ़ जाता है। ऐसे में आपको अपना वजन कंट्रोल में रखना चाहिए क्योंकि वजन जितना बढ़ता है उतना ही वह दिल के लिए खराब होता है। मगर इसके लिए अपनी डाइट में कटौती करनी सही नहीं है। हमेशा उचित डाइट लें और उसमें फलों, सब्जियों और स्प्राउट्स को भी शामिल करें।
व्यायाम है जरूरी
दिल को स्वस्थ रखने के लिए मेनोपॉज के बाद नियमित रूप से व्यायाम, एक्सरसाइज या योग करें। दिन में कम से कम 30 मिनट तक तेजी से चलें। वहीं, अगर आप हफ्ते में कम से कम 5 दिन खेल-कूद के गतिविधियों में हिस्सा लेंगी तो दिल के रोगों का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा।
ओवरी के बारे में आम तौर पर महिलाओं को ज्यादा जानकारी नहीं होती जो होनी चाहिये। यही वो अंग है जहां अंडे बनते हैं। यह अंडे जब शुक्राणुओं से मिलते हैं तो महिला गर्भवती होती है।
ओवरी का आकार बदलता रहता है
शरीर के बाकी अंग भले ही एक साइज़ पर आकर रुक जाएं, ओवरीज़ हमेशा बदलती रहती हैं। ये उम्र के साथ और पीरियड्स के दौरान साइज़ में बदलती रहती हैं। जब ये अंडा बना रही होती है तो ये आकार में बढ़ जाती हैं. लगभग पांच सेंटीमीटर। वहीं कई बार सिस्ट यानी गठान हो जाने की वजह से भी साइज़ में फ़र्क पड़ता है पर ये कोई घबराने वाली बात नहीं है। मेनोपॉज़ के साथ ये बदलना बंद कर देती हैं। उल्टा सिकुड़ जाती हैं।
ओवरी को भी स्ट्रेस होता है।
जिस समय ओवरीज़ अंडे बना रही होती हैं उसे ओव्यूलेशन कहते हैं। वहीं तनाव का इस पर विपरीत असर पड़ता है। मतलब अगर आप वाकई बहुत ज़्यादा तनाव में हैं, तो आपकी ओवरीज़ अंडे बनाना बंद कर देगी।
बर्थ कंट्रोल पिल से ओवरीज़ का स्पेशल रिश्ता है
डॉक्टरों की माने तो बर्थ कंट्रोल पिल्स ओवरीज़ का बड़ा फ़ायदा करती हैं। सुनने में अजीब लगा क्या? पर ये सच है। गर्भनिरोधक गोलियों को लेने से ओवेरियन कैंसर होने का खतरा काफ़ी कम हो जाता है।
ओवेरियन सिस्ट अकसर अपने आप ठीक हो जाते हैं
ओवरी में बहुत सी औरतों को सिस्ट हो जाता है। सिस्ट कैविटी-नुमा होती है जिसमें पस भर जाता है। इसे ठीक करने के लिए सर्जरी है और दवाइयां भी दी जाती हैं पर हर सिस्ट ख़तरनाक नहीं होता। कई सिस्ट बिना किसी दवा के तीन से चार महीनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। वहीं अगर ये ठीक नहीं हुए तो डॉक्टर को जरुर दिखाएं।
कुछ चीजें एक साथ मिलाकर खाने से या एक ही समय पर खाने से हमारे शरीर के लिए जहर का काम कर सकती हैं। इसलिए कुछ खाने की चीजों को एक समय पर एक साथ खाना कितना घातक हो सकता है, यह जान लेना बेहद जरूरी है । आयुर्वेद में -----
प्रकृति समसमवेत सिद्धांत ----तत्र खलवानेकारसेशु द्रव्यपनानेकदोषतमाकेषु च विकारेषु रसदोषप्रभावमेकैकश्येनाभिसमीक्ष्य ततो द्रव्याणविकारयोः प्रभात्तत्वं व्यवस्येत (चरक विमानस्थं १/९
अनेक रस वाले द्रव्यों में,और अनेक दोषों से उतपन्न होने वाले रोगों में .रस के और दोष के प्रभाव को अलग अलग विचार कर द्रव्य और रोग के प्रभाव के तत्व का निश्चय करे .
तात्पर्य यह हैं की यदि मधुर अम्ल और लवण रसों के प्रभाव (गुणों )का ज्ञान अलग अलग हैं तो उससे बनने वाला समुदाय का ज्ञान स्वतः हो जायेगा .जब ज्वर को दूर करने वाली अलग अलग चार औषधियां का परिज्ञान हैं तो उन चरों को मिलाकर यदि ज्वर में प्रयुक्त करें तो वह समुदाय भी ज्वरनाशक होगा .इस सिद्धांत को "प्रकृतिसमसमवेत" कहते हैं
न त्वेवं खलु सर्वत्र .हि विकृति विषमसमसमवेतानाम नानात्मकानाम परस्परेण चोपहतानाम्न्यैश्च विकल्पनैविलपित्तनाम व्यावपरभानुमनेनैव समुदायप्रभावतत्वमध्यवासातुरशक्यं ( चरक विमानस्थान१/१०)
किन्तु सब जगह ऐसा नहीं होता हैं क्योकि विकृति रूप मिले हुए एवं विषम रूप से मिले हुए अनेक प्रकार के आपस में उपघात को प्राप्त हुए और दूसरे भेद करने वाले उपायों से भिन्न हुए ,रसों के अवयव के प्रभाव के अनुमान से ही समुदाय के प्रभाव के तत्व का निश्चय शक्य नहीं हैं .
नानात्मकनाम -इसका तात्पर्य यह हैं की रस या दोषादि के नानारूप हेतु से उतपन्न होते हैं और उनमे भिन्न -भिन्न रूप और कारण के भेद होने से रस और दोष विकृतविषसमवेत होता हैं .परस्परेण चोपहतनाम --परस्पर एक के गुण को नष्ट करने वाले कारण से ,वह कारण कहीं पर अदृष्टवश होते हैं वा एक प्रबल होता हैं वह दुर्बल रस के प्रभाव को मिटा देता हैं .अन्यैश्च विकलनेविकल्पितानाम -- भिन्न भिन्न कल्पना के भेद से गुणी में विषमता आ जाती हैं .
उपरोक्त सिद्धांतों के आधार पर निम्मानुसार विषम संयोगो के कारण विषजन्य प्रभाव देखने मिलते हैं .
आयुर्वेद के अनुसार खाना और खाने के समय का सही से पालन करना बेहद लाभदायक साबित हुआ है। हमें पता भी नहीं चलता और ये खाना शरीर के अंदर जाकर हमें कई मायनों में बहुत नुकसान पहुंचाता है,नुकसानदायक बन सकते हैं ।
यह उस खराब हो गए या सड़े हुए खाने से कम नहीं है जो हम बचने के बाद या खराब होने के बाद बाहर फेंक देते हैं। जिस तरह से कभी-कभी यह खाना जानवरों को नुकसान पहुंचाता है, हमारे लिए भी उतना ही खतरनाक है।
आयुर्वेद सिखाता है स्वाद भी, सेहत भी
हमें खाने में अलग-अलग तरह की चीजें खाना बेहद पसंद होता है। चाहे वह एक साथ ही क्यों ना मिल जाए, लेकिन यह थोड़ा अटपटा लग सकता है क्योंकि कई ऐसी चीजें होती हैं, जो हम एक साथ नहीं खा सकते। अक्सर आपने लोगों को या स्पेशलिस्ट को यह कहते हुए सुना होगा कि एक साथ यह ना खाएं, एक साथ वह ना खाएं। इसका मतलब खाने में ऐसी कई चीजें होती हैं जो एक साथ या एक ही समय पर नहीं खाना चाहिए। कई चीजें तो ऐसी होती हैं जो एक साथ खाने से काफी नुकसानदेह साबित हो सकती हैं।
घी और शहद:
घी और शहद कभी साथ में नहीं खाना चाहिए। यहां तक कि पानी में मिलाकर भी शहद और घी का सेवन नुकसानदेह हो सकता है। घी या तेल या मक्खन में शहद जहर बन जाता है। एक तो शहद की तासीर गर्म होती है। इसे किसी गर्म चीज के साथ नहीं खाना चाहिए नहीं, तो ये हमारे लिए पेट की समस्या पैदा कर देता है।
मीट व मछली के साथ भी शहद :
मीट व मछली के साथ भी शहद का सेवन नहीं करना चाहिए। शहद का इनके साथ सेवन करने से हमारे शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ जाते है। इससे दृष्टिहीनता व कानो पर भी असर हो सकता है और हमें सुनना भी बंद हो सकता है।
शहद और मूली:
शहद के साथ मूली का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे भी हमारे शरीर के टॉक्सिन्स बढ़ जाते हैं। इससे बॉडी पार्ट्स खराब होने के चान्सेस ज्यादा बढ़ जाते हैं। इसलिए मूली के साथ शहद का सेवन कभी भी नहीं करना चाहिए।
शहद और दही:
शहद को कभी भी दही में मिलकर नहीं खाना चाहिए। इससे गैस, एलर्जी और किसी भी तरह की स्किन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा आप चीनी के साथ कभी भी शहद न खाये। चीनी के साथ शहद को खाना ऐसा होगा जैसे अमृत के साथ ज़हर को खाना।
इसके अलावा इन्हें भी एक साथ मिलाकर न खाएं:
मछली के साथ काली मिर्च कभी नहीं खानी चाहिए। मछली खाने के बाद काली मिर्च खाने से नुकसान होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
तिल के साथ कभी भी पालक का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से डायरिया होने का खतरा बढ़ जाता है।
10 दिन तक यदि कांसे के बर्तन में घी रख दी गई है, तो उसके बाद उस घी को नहीं खाना चाहिए।
पीले छतरी वाले मशरूम को सरसों के तेल में नहीं पकाना चाहिए और ना ही खाना चाहिए।
ठंडे पानी के साथ घी, तेल, खरबूज, अमरूद, खीरा, जामुन और मूंगफली कभी नहीं खानी चाहिए।
ये चीजें भी एक साथ हैं जहर समान
खीर के साथ सत्तू, शराब, खटाई और कठहल का सेवन कभी नहीं करना चाहिए।
पके हुए चावल के साथ सिरका नहीं खाना चाहिए। इसके परिणाम घातक हो सकते हैं।
दही और खट्टे फल एक साथ कभी नहीं खाने चाहिए। इसमें अलग-अलग एंजाइम मौजूद होते हैं, जिससे ये दोनों एक साथ पचाने में मुश्किल होता है।
अगर हम देखें तो दही और मछली की तासीर एकदम अलग अलग है, मतलब कि दही ठंडा है और मछली गरम होती है।
अक्सर लोगों को पूरी या पराठे के साथ दही खाना बेहद पसंद होता है, लेकिन तली और भुनी चीजों को दही के साथ नहीं खाना चाहिए। दही में मौजूद एंजाइम फैट को पचाने में दिक्कत पैदा करता है।
उपरोक्त आधार पर इस बात का विशेष ध्यान रखना अति आवश्यक हैं .अनजाने में कभी कभी हम असाध्य बीमारियों को निमंत्रित कर लेते हैं।
कब्ज पाचन तंत्र की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कोई व्यक्ति (या जानवर) का मल बहुत कड़ा हो जाता है तथा मलत्याग में कठिनाई होती है। कब्ज अमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था है, जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती है, मल कड़ा हो जाता है, उसकी आवृति घट जाती है या मल निष्कासन के समय अत्यधिक बल का प्रयोग करना पड़ता है।
सामान्य आवृति और अमाशय की गति व्यक्ति विशेष पर निर्भर करती है। (एक सप्ताह में 7 से 12 बार मल निष्कासन की प्रक्रिया सामान्य मानी जाती है। कब्ज होने से शौच करने में बाधा उत्पन्न होती है, पाचनतंत्र प्रभावित होता है,जिसके कारण शौच करने में बहुत पीड़ा होती होती है ,किसी को केवल गैस की समस्या होती है. किसी को खाने का पाचन ठीक से नहीं हो पाता है। और आजकल कब्ज की समस्याओ से बच्चे और युवा पीढ़ी दोनों परेशान हो चुके है। व्यक्ति दो या तीन दिन तक शौच नहीं हो पाता है।तो कब्ज की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
पेट में शुष्क मल का जमा होना ही कब्ज है। यदि कब्ज का शीघ्र ही उपचार नहीं किया जाये तो शरीर में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। कब्जियत का मतलब ही प्रतिदिन पेट साफ न होने से है। एक स्वस्थ व्यक्ति को दिन में दो बार यानी सुबह और शाम को तो मल त्याग के लिये जाना ही चाहिये। दो बार नहीं तो कम से कम एक बार तो जाना आवश्यक है। नित्य कम से कम सुबह मल त्याग न कर पाना अस्वस्थता की निशानी है।[1]
हम जो खाना खाते हैं वह जब मलाशय से नहीं निकल पाता, तो कोलोन में ही जमा हो जाता है। यदि आपका पेट ठीक प्रकार से साफ नहीं होता तो, आपको कोलोन इंफेक्शन होने का भी खतरा हो सकता है। यह वेस्ट मटीरियल यदि लंबे समय तक पेट में पड़ा रहे तो टॉक्सिक हो सकता है और आपकी हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए इन टॉक्सिक पदार्थों को बाहर निकालना बहुत जरूरी है।
यदि आप इन्हें बाहर निकालेंगे तो आपका मेटाबॉलिज्म बढ़ेगा और आप अंदर से स्वस्थ और सुंदर बनेंगे। कई लोगों को पेट साफ न होने की वजह से मुंहासे आदि हो जाते हैं, जो कि इससे बिल्कुल ठीक हो सकते हैं।
वजन कम करने में मदद मिलती है। आपके समग्र मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। प्रतिरक्षा प्रणाली के कामकाज में सुधार। पेट के कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।इसका प्रमुख कारण लिवर का समुचित क्रिया न करना प्रमुख कारण
कम रेशायुक्त भोजन का सेवन करना ; भोजन में फायबर का अभाव,,अल्पभोजन ग्रहण करना
शरीर में पानी का कम होनाकम चलना या काम करना ; किसी तरह की शारीरिक मेहनत न करना; आलस्य करना; शारीरिक काम के बजाय दिमागी काम ज्यादा करना ,कुछ खास दवाओं का सेवन करना,बड़ी आंत में घाव या चोट के कारण (यानि बड़ी आंत में कैंसर)थायरॉयड हार्मोन का कम बनना
कैल्सियम और पोटैशियम की कम मात्रा,मधुमेह के रोगियों में पाचन संबंधी समस्या,कंपवाद (पार्किंसन बीमारी)चाय, कॉफी बहुत ज्यादा पीन। धूम्रपान करना व शराब पीना,गरिष्ठ पदार्थों का अर्थात् देर से पचने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन ज्यादा करना,आँत, लिवर और तिल्ली की बीमारी
दु:ख, चिन्ता, डर आदि का होना,सही समय पर भोजन न करना।बदहजमी और मंदाग्नि (पाचक अग्नि का धीमा पड़ना),भोजन खूब चबा-चबाकर न करना अर्थात् जबरदस्ती भोजन ठूँसना। जल्दबाजी में भोजन करना।,बगैर भूख के भोजन करना,ज्यादा उपवास करना,भोजन करते वक्त ध्यान भोजन को चबाने पर न होकर कहीं और होना।
लक्षण ----सासों की बदबू,लेपित जीब,बहती नाक,भूख में कमी,सरदर्द,चक्कर आना,जी मिचलाना
चहरे पर दाने.मुँह में अल्सर,
पेट में लगातार परिपूर्णता
उपाय ---
रेशायुक्त भोजन का अत्यधित सेवन करना, जैसे साबूत अनाज
ताजा फल और सब्जियों का अत्यधिक सेवन करना
पर्याप्त मात्रा में पानी पीना
ज्यादा व्यायाम करना चाहिए जिससे शरीर में गतिविधिया बढ़ती है। कब्ज के समस्या नहीं होती है।
वसा युक्त भोजन का सेवन कम करे
अन्य उपाय
गार्सीनिया कंबोगिया
गार्सीनिया कंबोगिया आपकी भूख को दबाता है और आपके चयापचय को बढ़ाता है। यह न केवल आपके शरीर से सभी विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है, बल्कि शरीर के वजन को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। आप गार्सिनिया कंबोगिया को अपने दैनिक आहार में भी शामिल कर सकते हैं। इसे 1 से 2 बार रोजाना लेने से पेट साफ हो जाएगा।यह इंडोनेशिया में मिलता हैं .
सेब का जूस
सेब में पेक्टिन (फाइबर) अघुलनशील और घुलनशील गुण होते हैं। यह आपके मल को भारी बनाने में मदद करता है और इसे पास करना आसान बनाता है। यह आपके वजन घटाने के प्रयासों में सहायता कर सकता है। इसके अतिरिक्त, सेब पेट के कैंसर की कोशिकाओं के विकास को भी रोक सकता है। इसका उपयोग करने के लिए 1 सेब लें और 1 कप पानी के साथ ब्लेंड कर लें। फिर इसको छान लें या फिर ऐसे ही पी जाएं। ऐसा आपको रोजाना करना होगा।
लेमन डिटॉक्स ड्रिंक
नींबू विटामिन सी से भरपूर होता है, जो चयापचय को बढ़ाता है और शरीर से गंदगी को बाहर निकालने में मदद करता है। नींबू एक प्राकृतिक एंटीऑक्सिडेंट है, जो आपके शरीर को फ्री रैडिकल्स से बचाता है। एक अध्ययन के अनुसार, लेमन डिटॉक्स डाइट भी शरीर में वसा को कम कर सकता है। इसे लेने के लिए 1 गिलास गुनगुने पानी में, 1/2 नींबू और 1-2 चम्मच शहद मिलाएं। इसे रोज सुबह खाली पेट पिएं।
नोट: चूंकि नींबू अम्लीय होता है और दांतों पर असर डाल सकता है, इसलिए इसे रोकने के लिए नींबू के सेवन के बाद अपने मुंह को सादे पानी से कुल्ला करना न भूलें।
दही
दही एक प्राकृतिक प्रोबायोटिक है, जो आंत के हेल्दी बैक्टीरिया का ख्याल रखता है। इससे पाचन की समस्या दुरुस्त होती है। दही का दैनिक सेवन आपके शरीर में प्रोबायोटिक्स के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है, जो बदले में, आंत को शुद्ध करने में मदद कर सकता है। प्रतिदिन 1 से 2 बार बिना चीनी या फल के सादा दही लें।
कच्ची सब्जी का जूस
कच्ची सब्जियों से निकाला गया जूस पीना आपके कोलन को साफ करने और आपके शरीर को डिटॉक्स करने में काफी मददगार है। इसकी के साथ यह वेट को भी बैलेंस करने में मदद करता है। दिन में कई बार आपको अपनी डाइट में पालक, चुकंदर, गाजर, टमाटर और ककड़ी का रस पीना चाहिए। नोट: डिब्बाबंद या तैयार किए गए रस से बचें, क्योंकि उनमें पोषक तत्वों और खनिजों की कमी होती है।
सेब का सिरका
एप्पल साइडर विनेगर में एंटीऑक्सिडेंट और एंटीबायोटिक गुण होते हैं, जो आंत और मलाशय के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। एप्पल साइडर विनेगर में एसिटोबैक्टर नामक बैक्टीरिया की उपस्थिति होती है, जो पाचन में सहायता करता है और आपके पेट के लिए उचित कार्य करता है। यह पेट में एसिड नहीं बनने देता और वजन कम करने में मदद करता है।
इन जरूरी बातों का भी रखें ख्याल
जितना हो तरल पदार्थों का सेवन बढ़ाएं। तंबाकू के सेवन से बचें। शराब का सेवन कम करें। 50 वर्ष की आयु के बाद, नियमित हेल्थ चेकअप करवाएं खासतौर पर कोलोन कैंसर के लिए। फाइबर, अनाज, साबुत अनाज, चोकर, दलिया, फल, और सब्जियों से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें। यह आपके मल त्याग को बढ़ाने और पेट के स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद कर सकता है। कोलन इंफेक्शन से बचाने में मदद करेंगी यह ड्रिंक्स
इसबगोल की की भूसी कब्ज में परम हितकारी है। दूध या पानी के साथ २-३ चम्मच इसबगोल की भूसी रात को सोते वक्त लेना फ़ायदे मंद है। दस्त खुलासा होने लगता है।यह एक कुदरती रेशा है और आंतों की सक्रियता बढाता है
अमरूद और पपीता ये दोनो फ़ल कब्ज रोगी के लिये अमॄत समान है। ये फ़ल दिन में किसी भी समय खाये जा सकते हैं। इन फ़लों में पर्याप्त रेशा होता है और आंतों को शक्ति देते हैं। मल आसानी से विसर्जीत होता है।
अंगूर में कब्ज निवारण के गुण हैं। सूखे अंगूर याने किश्मिश पानी में ३ घन्टे गलाकर खाने से आंतों को ताकत मिलती है और दस्त आसानी से आती है। जब तक बाजार में अंगूर मिलें नियमित रूप से उपयोग करते रहें।
बड़ी मुनक्का पेट के लिए बहुत लाभप्रद होती है। मुनका में कब्ज नष्ट करने के तत्व हैं। ७ नग मुनक्का रोजाना रात को सोते वक्त लेने से कब्ज रोग का स्थाई समाधान हो जाता है। एक तरीका ये हैं कि मुनक्का को दूध में उबालें कि दूध आधा रह जाए | गुन गुना दूध सोने के आधे घंटे पाहिले सेवन करें। मुनक्का में पर्याप्त लोह तत्व होता है और दूध में आयरन नहीं होता है इसलिए दूध में मुनक्का डालकर पीया जाय तो आयरन की भी पूर्ती हो जाती है।
कुमारीआसव और अभयारिष्ट --दोनों चार चार चमच्च भोजन के बाद पानी से सुबह शाम
ज्यादा जानकारी के लिए हमेशा अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
सोरायसिस एक त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसे त्वचा का अस्थमा भी कहा जाता है। इसमें त्वचा की कोशिकाएं काफी तेजी से बढ़ते हैं। इसमें त्वचा की ऊपरी परत पर पपड़ी बन जाती है और वह छिल जाती है। इससे त्वचा में शुष्कता आ जाती है और सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। खुजलाहट के कारण त्वचा लाल हो जाती है और उसमें घाव बन जाते हैं।
अक्सर सोरायसिस किसी भावनात्मक आघात या तनाव से होता है, हालांकि इसके और कारण भी हैं। प्राचीन विज्ञान आयुर्वेद के अनुसार, वात और कफ के असंतुलन के कारण सोरायसिस होता है।
सोरायसिस त्वचा से जुड़ी एक ऑटोइम्यून डिसीज है, जो किसी भी उम्र में हो सकती है। इस बीमारी में त्वचा पर एक लाल रंग की मोटी परत बन जाती है, जो चकत्ते की तरह दिखती है। इन चकत्तों में खुजली के साथ दर्द और सूजन भी महसूस हो सकती है। आमतौर पर इसका असर कोहनी के बाहरी हिस्से और घुटने पर ज्यादा देखा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर यह रोग होता है।
जब भी शरीर पर लाल चकत्ते दिखें और खुजली भी हो रही है, तो इसे अनदेखा न करें। हो सकता है यह सोरायसिस का संकेत हो। कई लोग इसे इंफेक्शन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी कम होने के बजाय और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति के लिए एलोपैथिक इलाज बहुत ज्यादा असरदार नहीं होते। लेकिन हल्के लक्षणों के लिए घरेलू उपचार बहुत फायदेमंद हैं। कारण एलॉपथी में कॉर्टिकोस्टेरॉइड देने से तत्काल आराम लग जाता हैं बाद में फिर से उभार होने लगता हैं .
बचाव के लिए ,पूरक आहार लें
पूरक आहार सोरायसिस के लक्षणों को कम पूरक आहार सोरायसिस के लक्षणों को कम करने में आपकी मदद कर सकते हैं। विटामिन डी, दूध, एलोवेरा, अंगूर जैसे पूरक आहार लेने से सोरायसिस को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
त्वचा को सूखने से रोकें
सोरायसिस से बचने के लिए जरूरी है कि अपनी त्वचा को शुष्क न होने दें। कोशिश करें, कि घर या ऑफिस में ह्यमिडिफायर का उपयोग करें। संवेदनशील त्वचा वालों के लिए मॉइस्चराइजर त्वचा को कोमल रखने का बढिय़ा उपाय है।
तेज सुगंध से बचें
बेशक सुगंधित साबुन और परफ्यूम आपको अच्छा फील कराते हों, लेकिन इनमें मौजूद केमिकल और डाई आपकी त्वचा में जलन पैदा कर सकते हैं। इनकी तेज सुगंध सोरायसिस के लक्षणों को भड़काने का काम करती है। संवेदनशील त्वचा वाले लोग ऐसे साबुन और परफ्यूम इस्तेमाल करने से बचें।
शरीर को पानी में भिगोएं
वैसे तो गर्म पानी आपकी त्वचा में खुजली पैदा कर सकता है, लेकिन गुनुगने पानी में सेंधा नमक, दूध या जैतून का तेल डालकर नहाने से सोरायसिस में होने वाली खुजली को कम करना काफी आसान हो जाता है।
शराब के सेवन से बचें
सोरायसिस से बचाव के लिए शराब का सेवन न करना बेहतर इलाज है। जो लोग हर सप्ताह पांच नॉनलाइट बीयर पीते हैं, उनमें सोरायसिस बढने की संभावना दोगुना हो जाती है। इसलिए इस समस्या से ग्रसित लोगों को शराब का सेवन न करे
हल्दी का उपयोग करें
त्वचा से जुड़े किसी भी रोग के लिए हल्दी असरदार है। यह बीमारी से होने वाली सूजन को कम करती है। इसे भोजन में डालकर या फिर टैबलेट या सप्लीमेंट रूप में लिया जा सकता है। सोरायसिस होने की स्थिति में एफडीए ने इसकी खुराक प्रतिदिन 1.5 से 3.0 ग्राम तक लेने का सुझाव दिया है।
स्वास्थवर्धक भोजन करें
सोरायसिस से बचने के लिए अच्छी डाइट बेहद जरूरी है। कोल्ड वॉटर नट्स और ओमेगा-3 फैटी एसिड में सूजन को कम करने की क्षमता होती है। इस स्थिति में त्वचा पर ऑलिव ऑयल लगाना यानि जैतून का तेल लाभकारी है।
तनाव कम करें
सोरायसिस जैसी कोई भी समस्या तनाव पैदा कर इनके लक्षणों की स्थिति बदतर और भी बदतर कर सकती है। इसलिए जितना संभव हो तनाव कम लें। इसके लिए योगा, ध्यान जैसे अभ्यास बहुत कारगार साबित होंगे।
लाइट थैरेपी
सिरोयासिस से राहत के लिए लाइट थैरेपी बेस्ट है। इस थैरेपी का इस्तेमाल मरीज को रोग से जल्दी छुटकारा दिलाने के लिए किया जाता है। इसमें डॉक्टर मरीज की त्वचा पर पैराबैंगनी किरणें डालते हैं। यह लाइट स्किन सेल्स की वृद्धि को धीमा करती है। ध्यान रखें, लाइट थैरेपी हमेशा एक डॉक्टर की देखरेख में ही करानी चाहिए।
धुम्रपान से बचें
अगर आप धुम्रपान के आदी हैं, तो यह समय है जब आपको अपनी इस आदत को छोड़ देना चाहिए। । स्मोकिंग और तंबाकू के सेवन से सोरायसिस का खतरा बढ़ सकता है। यदि आप पहले से ही इस बीमारी से ग्रसित हैं, तो यह आपके लक्षणों को और भी गंभीर बना सकता है।
प्राकृतिक इलाज
छाछ
आयुर्वेद तक्रधारा के इलाज के अनुसार, सोरायसिस की बीमारी में शुद्ध किए हुए औषधीय छाछ का प्रयोग किया जाता है। इससे स्किन और बाल हेल्दी रहते हैं।
नीम
नीम के पत्ते सोरायसिस के इलाज में काफी कारगर होते हैं। नीम का तेल पोषक तत्वों से भरपूर है और उसका उपयोग कई प्रकार के लोशन, क्रीम, साबुन व प्रसाधन सामग्रियों में होता है। यह उन लोगों के लिए बहुत अच्छा है जिन्हें खुजली की बीमारी यानी एक्जिमा है। साथ ही इससे सोरायसिस और कील-मुंहासों के इलाज में भी मदद मिलती है। इसे खरोचों व छोटे घावों पर भी लगाया जा सकता है। शायद यही कारण है कि हर प्रकार की दवाई वाले लोशन में नीम का तेल रहता ही है। नीम का तेल त्वचा की शुष्कता और खुजलाहट दूर करता है।
विरेचन
आयुर्वेद के विशेषज्ञ विरेचन देते हैं जिससे शरीर से सारे विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।
विषैले तत्व पैदा करने वाले खाने से बचाव
आयुर्वेद के अनुसार, कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिनका खाने के दौरान गलत कॉम्बिनेशन शरीर में विषैले तत्व पैदा कर सकता है। जैसे कि मिल्कशेक और दही कभी एक साथ न खाएं।
सन के बीज
सन के बीज में ऐसे पदार्थ होते हैं जो शरीर में सूजन कम करते हैं जैसे ओमेगा 3 फैटी ऐसिड्स। साथ ही इनमें ऐंटीऑक्सिडेंट्स भी होते हैं, जो हॉर्मोन के सिक्रीशन ( स्राव) में बैलेंस बनाए रखते हैं। सन के कच्चे या भुने हुए बीज खाने से स्किन साफ रहती है।
6- योग
चूंकि सोरायसिस भावनात्मक आघात के कारण होता है इसलिए प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया, जोकि एक लयबद्ध सांस लेने की प्रक्रिया है, बहुत लाभदायक होती है। सुदर्शन क्रिया शरीर से भावनाओं के स्तर पर मौजूद विषैले तत्वों और नकारात्मक भावनाओं को निकाल देती है।
1. 3 बार ॐ का उच्चारण करें
2. कपालभाति - 20 बार, चक्र ( यदि आपका ब्लड प्रैशर बढ़ा रहता है, हृदय संबंधित रोग हैं या फिर चक्कर आते हैं तो धीमी गति से ही करें)
3. भस्त्रिका - 20 बार, 3 चक्र ( यदि आपका ब्लड प्रैशर बढ़ा रहता है, हृदय संबंधित रोग हैं या फिर चक्कर आते हैं तो धीमी गति से ही करें)
4. नाड़ी शोधन - 9 से 12 चक्र, धीमी और गहरी सांसें लें
5. भ्रामरी - 5 बार
6. इसके साथ साथ, अधिक मात्रा में पानी पिएं, योग निद्रा करें, चुस्त रहें और संतुलित आहार लें।
7. अपनी पसंद का कम से कम एक ध्यान प्रतिदिन करें।
यह रोग असाध्य वर्ग में आता हैं ,इसमें लम्बे समय तक इलाज़ की जरुरत पड़ती हैं जिससे मानसिक प्रभाव मरीज़ के ऊपर पड़ता हैं .इसमें बचाव के साथ इलाज़ भी जरुरी हैं .
आरोग्यवर्धिनी + किशोर गुग्गलु == दो दो गोली दोनों सुबह शाम पानी से
सारिवाद्यारिस्ट +कुमारी आसव == चार चार चम्मच सुबह शाम पानी से
(वयस्कों के लिए )
वाकुचि तेल स्थानीय प्रयोगार्थ
नमक तेल खटाइ मिर्च मसाले कम ,साबुन निरमा का उपयोग बंद ,बेसन का उबटन लाभदायक
जो स्थान संपर्क में रहता हैं वह किसी सिंथेटिक कपडे से दूर रहे या तलवे को आरामदायक हो और नुकसानदेह का उपयोग न करे .क्योकि एलर्जिक सम्पर्क भी परेशान करता हैं .
जरुरत पड़ने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श जरूर ले .
फिजियोथेरेपी का चलन आजकल बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की बीमारियों का उपचार इससे हो रहा है। घुटनों, पीठ या कमर में दर्द जैसे कई रोगों से बचने या निपटने के लिए बिना दवा खाए फिजियोथेरेपी के जरिये असरदार इलाज कराया जा सकता है।मौजूदा समय में अधिकांश लोग दवाइयों से बचने के लिए फिजियोथेरेपी की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि यह न केवल कम खर्चीला होता है, बल्कि इसके दुष्प्रभाव की आशंका न के बराबर होती है।
मांसपेशियों को सक्रिय करने का तरीका है फिजियोथेरेपी
प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा व्यायाम के जरिए शरीर की मांसपेशियों को सही अनुपात में सक्रिय करने की विधा फिजियोथेरेपी कहलाती है। इसे हिंदी में भौतिक चिकित्सा पद्धति कहा जाता है। घंटों लगातार कुर्सी पर वक्त बिताने, गलत मुद्रा में बैठने और व्यायाम या खेल के दौरान अंदरूनी खिंचाव या जख्मों की हीलिंग के लिए फिजियोथेरेपिस्ट की सेवा लेने की सलाह खुद चिकित्सक भी देते हैं!
विशेजषज्ञों का कहना है कि सबसे पहले यह बताना जरूरी है कि केवल रोगी ही नहीं, बल्कि स्वस्थ्य लोग भी ठीक रहने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह ले सकते हैं। मौजूदा समय में फिजियोथेरेपी काफी लोकप्रिय हुई है। इसकी लोकप्रियता और भरोसे का कारण यह भी है कि बाकी इलाज पद्धतियों से अलग फिजियोथेरेपी उच्च पेशेवर लोग ही करते हैं।
अस्थमा और फ्रैक्चर पीड़ितों के अतिरिक्त गर्भवतियों को भी फिजियोथेरेपी की सलाह दी जाती है। लगभग देश के हर बड़े अस्पताल में फिजियोथेरेपी की जाती है। वहीं, बुजुर्गों, मरीजों और कामकाजी लोगों के लिए घर तक फिजियोथैरेपी की सेवा पहुंचाने का भी चलन बढ़ा है। इसकी खास बात है कि फिजियोथेरेपिस्ट मरीज पर व्यक्तिगत तौर पर ध्यान देता है जो किसी हॉस्पिटल या क्लीनिक में संभव नहीं है। पेशवरों की निगरानी में व्यायाम कार्यक्रमों के चलन ने भी घर पर उपलब्ध होने वाली फिजियोथेरेपी सेवा की लोकप्रियता बढ़ा दी है।
सत्र पूरे करें
आपको फिजियोथेरेपी का लंबे समय तक फायदा मिले तो इसके सभी सत्र पूरे किए जाने जरूरी हैं। फिजियोथेरेपी शुरू करने से पहले उसकी अवधि की जानकारी ले लेनी चाहिए।
खान-पान में बदलाव के कारण आजकल (हाइपरटेंशन) हाई ब्लड प्रेशर की बिमारी आम हो गयी है और डॉक्टर इसमें दवाइयों के जरिये नियंत्रण का प्रयास करते हैं। इन दवाओं से मरीजों को कई बार कब्ज की समस्या होत है। हाल में हुए एक अध्ययन के अनुसार ब्लड प्रेशर) की कुछ दवाइयों से कब्ज की समस्या बेहद गंभीर रुप ले लेती है। यहां तक की मरीज को अस्पताल में भर्ती तक होना पड़ता है। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार कैल्शियम चैनल ब्लॉकर नाम के एक ड्रेग की वजह से डायवर्टीक्युलॉसिस हो सकता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पाचन नली की दीवारों पर छोटे-छोटे पाउच बन जाते हैं, जिन्हें डायवर्टीकुला कहा जाता है। अगर ये पाउच फट जाएं या फिर इनमें संक्रमण हो जाए तो स्थिति वाकई खतरनाक हो सकती है। यह कैल्शियम ब्लॉकर कैल्शियम की आपू्र्ति को बाधित कर ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करता है।
ऐसे में जरूरी है कि लोगों को इसके प्रति जागरूक किया जाए। हाइपरटेंशन कई कारणों से होता है, जिनमें से कुछ कारण शारीरिक और कुछ मानसिक होते हैं। हाइपरटेंशन होने पर हार्ट, किडनी व शरीर के अन्य अंग काम करना बंद कर सकते हैं। इसके अलावा हाई बीपी के कारण आंखों पर भी असर पड़ता है। हाइपरटेंशन में रक्तचाप 140 के पार पहुंच जाता है। इसलिए इस बीमारी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए नहीं तो यह जानलेवा साबित हो सकती है।
हाइपरटेंशन से बचने के लिए स्वस्थ जीवनशैली का पालन करने की जरूरत है। साथ ही हेल्दी डायट लें। शोधकर्ताओं के अनुसार, हाइपरटेंशन की समस्या को इन दो चीजों के अलावा कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, एसीई-इन्हीबिटर्स या फिर बीटा ब्लॉकर्स की मदद से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
तीन प्रकार की दवाएं नुकसानदेह
शोधकर्ताओं ने हाइपरटेंशन के तीन प्रकार के ड्रग्स का मूल्यांकन किया और देखा कि हाइपरटेंशन के इलाज में ये कितने प्रभावी हैं और किस ड्रग के क्या नुकसान हैं। इस स्टडी के लिए शोधकर्ताओं मे अनुवांशिक विश्लेषण किया। यानी उन्होंने उन जीन्स पर अपना ध्यान केंद्रित किया जो हाई ब्लड प्रेशर की विभिन्न दवाओं की नकल करते हैं। इस मूल्यांकन से शोधकर्ताओं को गैर डिहाइड्रोपीरीडीन कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स के बारे में पता चला जो डायवर्टीक्युलॉसिस नाम की कब्ज संबंधी समस्या को जन्म दे सकती है।
त्वचा में जब वायु की दृष्टि हो जाती हैं तो त्वचा रूखी ,फटी हुई ,शून्य ,पतली और काले वर्ण की हो जाती हैं ।उसमे सुई चुभोने सी पीड़ा ,तनाव ,और लालिमा हो जाती हैं ,शरीर के भिन्न भिन्न पर्वों में वेदना होती हैं .। यह बहुत सामान्य बीमारी हैं और बढाती उम्र के साथ यह रोग होता हैं। वैसे यह समुचित आहार के न होने से होता हैं।
हाथ और पैर सुन्न पड़ना आमतौर पर गंभीर बात नहीं होती है, लेकिन अगर शरीर के किसी अंग में बार बार झुनझुनाहट आ रही है या सुन्न पड़ रहा है, जिसका असर काफी देर तक रहता है., ।
यदि आप एक ही आसन में लंबे समय तक बैठे रहते हैं तो आपके हाथों और पैरों में झुनझुनी की समस्या होती है। एक ही जगह पर लंबे समय तक बैठे रहने के दौरान हाथ और पैर में झनझनाहट उत्पन्न होने लगती है, यह किसी बीमारी का अंदेशा नहीं होता है। हाथों और पैरों में झुनझुनी (झनझनाहट) की वजह से आपके हाथ और पैर कुछ देर के लिए सुन्न हो जाते हैं, इस दौरान आपको चुभन जैसी तकलीफ का एहसास होता है।
ऐसे समय में हाथ-पैर हिलाने में आप असमर्थ महसूस करते हैं। साथ ही शरीर के किसी हिस्से में अंदरुनी चोट की वजह से भी झनझनाहट पैदा हो सकती है, हमारे शरीर में ज्यादा झुनझुनी आना हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
हाथ−पैरों में झनझनाहट और सुन्न होने की समस्या के विभिन्न कारण हो सकते हैं। कुछ बीमारियां जैसे थायराइड, मधुमेह, स्ट्रोक व अन्य कई बीमारियों के कारण भी हाथ−पैरों में झनझनाहट और सुन्न होने की समस्या होती है।
गंभीरता से लें हाथों और पैरों की झनझनाहट
हम रात में एक ही अवस्था में देर तक सोए रहते हैं, जिससे हमारे पैर या हाथ सुन्न हो जाते हैं या उसमें झुनझुनी चढ़ जाती है, इस दौरान हाथ या पैर के जिस हिस्से में झुनझुनी हुई है, स्पर्श करने से किसी तरह का एहसास नहीं होता है। साथ ही हम अपने हाथ और पैर का हलन चलन करने में असमर्थ हो जाते हैं। थोड़ा सा दर्द भी महसूस होने लगता है। उस जगह पर थोड़ी देर मालिश करने से हाथों और पैरों की झुनझुनाहट को दूर किया जा सकता है। यदि मालिश के बाद भी झुनझुनाहट दूर नहीं होती तो किसी बीमारी का अंदेशा हो सकता है।
रक्त संचार की कमी की वजह से भी हाथ और पैर में झनझनाहट होने लगती है। हमारे शरीर में यदि रक्त संचार ठीक से नहीं होता है तो हमारी नसों में इसका असर होता है, जिससे हमारे शरीर के विभिन्न हिस्सों में ऑक्सीजन ठीक से पहुंच नहीं पाती और हमें शरीर में झनझनाहट और सुन्न जैसी अवस्था का सामना करना पड़ सकता है।
यदि हम नसों से संबंधित बीमारी से पीड़ित हैं तो हमारे हाथ-पैर की अंगुली व जोड़ सुन्न पड़ जाते हैं, हमारे हाथों और पैरों में ऐसा एहसास होता है कि जैसे किसी ने सुई चुभा देती है, यह दर्द कभी कभी असहनीय होती है।
अगर आपकी हाथों की अंगुलियों और कलाई में लंबे समय तक झनझनाहट रहती है या वह सुन्न पड़ जाते हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करें। यह लक्षण कार्पल टनल सिंड्रोम बीमारी के हो सकते हैं, जिसमें कलाई की बीच की नस जो हाथ और बाजू तक जाती है, बीच की नस दब जाने से अंगुलियों में झनझनाहट की शिकायत हो सकती है।
लगातार टाइपिंग करने की वजह
हाथों में झनझनाहट की वजह लगातार टाइपिंग करने की वजह से भी होती है, लैपटॉप, मोबाइल और कम्प्यूटर में बहुत देर टाइपिंग करने की वजह से भी कलाई की नसों पर बुरा असर पड़ता है। आजकल लोग घंटों एक ही पोजीशन में बैठकर मोबाइल में खेलते रहते हैं, काफी देर हाथों को एक ही पोीजशन में रखे रहने से भी हाथ में झनझनाहट होने लगती है।
नस दब जाने की वजह से
कमर या गर्दन की नस दब जाने की वजह से भी पैरों में झनझनाहट होती है, हमारे पैरों और हाथों में झनझनाहट की वजह चोट लगने, गलत तरीके से बैठने के कारण भी हो सकता है। रीढ़ की हड्डी के खराब होने से आसपास की नसों पर दबाव बनता है। ऐसे में सर्वाइकल की समस्या शुरू हो जाती है। इससे भी हाथ-पैर सुन्न होने लगते हैं।
गर्भवती होना
किसी किसीगर्भवती महिलाओं को भी पैर में झनझनाहट की समस्या कभी कभी हो जाती है। जिन महिलाओं के पैर के तलवे सपाट होते हैं, जिससे उनकी नस पर दवाब पड़ता है, ऐसे में पैर में झनझनाहट होती है।
शराब का अधिक सेवन
हाथों और पैरों में झनझनाहट की समस्या उन लोगों को भी हो सकती है, जो लोग शराब का अधिक सेवन करते हैं। शराब के अधिक सेवन की वजह से कोशिकाओं में झनझनाहट होने लगती है, जिससे हाथ व पैर सुन्न हो जाते हैं।
बीड़ी सिगरेट तम्बाखू का सेवन भी हानिकारक होता हैं। इनके सेवन से यह रोग अधिक होता हैं। इनसे बचना चाहिए.
हाथों और पैरों में झनझनाहट या सुन्न होने के कारण
डायबिटीज
हाथों और पैरों में हमेशा झनझनाहट की वजह डायबिटीज भी होती है। इसीलिए अपना शुगर समय- समय पर चेक करवा लेना चाहिए और दवाओं व उचित खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
थाइरॉयड
हम बहुत बार बीमारियों की अनदेखी करते हैं, हाथ व पैरों में अकड़न व झनझनाहट का थाइरॉयड की वजह से भी हो सकती है। गले की थाइरॉयड ग्रंथि में गड़बड़ होने की वजह से भी हाथ और पैर सुन्न हो जाते हैं, या हाथों और पैरों में झनझनाहट बनी रहती है। ऐसे में डॉक्टर से इलाज करवाएं और ब्लड की जांच करवाएं।
विटामिन की कमी
विटामिन की कमी की वजह से भी हमारे हाथों और पैरों में झनझनाहट होती है। विटामिन बी 12 की कमी की वजह से हाथों में झनझनाहट और सुन्न होने की शिकायत हो सकती है। डॉक्टर की उचित सलाह के चलते आप विटामिन की दवाईयों ले सकते हैं।
इन बीमारियों और आहारों की कमी के कारण हो सकता है ये लक्षण
आपको बता दें कि ऐसे लक्षण ज्यादातर ठंड के मौसम में देखने को मिलता है. यह शरीर में विटामिन बी कम्पलैक्स, मैग्नीशियम, रिच प्रोटीन समेत अन्य पोषक तत्वों के कारण होता है.
- विटामिन बी और डी की कमी,- फ्लूइड रिटेंशन,- कार्पेल टनेल सिंड्रोम,टाइट कपड़े पहनने के वजह से
- एक स्थिति में ज्यादा देर बैठने से,- नसों के दबने से- फिजिकल एक्टिविटी की कमी की वजह से
- थकान या कमजोरी की वजह से- ड्रग या स्मोक एडिक्ट होने की वजह से,- इसके अलावा उच्च रक्तचाप रोगी,- रीढ़ की हड्डी या मस्तिस्क में ट्यूमर,- थायराइड- डायबिटीज समेत अन्य मरीजों में भी ऐसे लक्षण पाए जाते हैं.
घरेलू उपाय
सुन्न पड़ गए अंग को थोड़ी देर हल्के गुनगुने पानी में भिंगोये. इसे करीब 5-10 मिनट तक पानी में डालकर रखें. तुरंत राहत मिलेगी.
हल्दी वाले दूध से इलाज
हल्दी-दूध में एंटी-ऑक्सीडेंट की मात्रा होती है जो ब्लड को बॉडी में सर्कुलेट करने में मदद करती है. जिसके कारण नसों में हमेशा प्रवाह होते रहता है.
दालचीनी
दालचीनी में भारी मात्रा में न्यूट्रिएंट्स मौजूद होते हैं जो शरीर में बल्ड फ्लो को बढ़ाते हैं. जिससे अंगों के सुन्न होने की संभावना कम हो जाती है.
मसाज भी अच्छा उपाय है
शरीर का मसाज आज से नहीं सदियों से लोग करवाते आ रहे हैं. इससे सिर्फ थकान से ही नहीं बल्कि इन छोटी-मोटी कई रोगों से मुक्ति मिलती है. इस तरीके से भी शरीर में रक्त प्रवाह सुचारू ढ़ंग से होता है.
योग करना फायदेमंद
कई ऐसे योग हैं जो रक्त को शरीर में प्रवाह करवाने में मददगार है. इन योगों को नियमित रूप से प्रतिदिन करना लाभकारी हो सकता है।
डाइट सही होना जरूरी
पौष्टिक भोजन हमारे शरीर को कई रोगों से बचाते हैं। ज्यादातर अंग के सुन्न होने की समस्या विटामिन बी व डी कम्पलैक्स, मैग्नीशियम, रिच प्रोटीन, आयरन के कारण होता है। ऐसे में जिन फूड्स में ऐसे तत्व पाएं जाते हैं उसका सेवन करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर मूंगफली, , दालचीनी, लहसुन, डार्क चाकलेट, केला, सोयाबीन समेत अन्य आहारों का सेवन कर सकते है। और पानी की मात्रा भी शरीर में सही होना चाहिए।
इस रोग को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए ।इसके जीर्ण होने पर अन्य घातक बीमारियां होने के अवसर होते हैं ।
टमाटर का अधिक मात्रा में सेवन करने से लिवर कैंसर का खतरा कम होता है। एक नये अध्ययन के अनुसार टमाटर का अधिक सेवन करने से लिवर कैंसर होने का खतरा कम होता है। टमाटर में लाइकोपीन नाम का एंटीऑक्सीडेंट, एंटी इंफ्लामेट्री और कैंसर को नष्ट करने वाले गुण पाए जाते हैं। टमाटर में मौजूद इन सभी चीजों से लिवर की सूजन, कैंसर का खतरा और अन्य समस्याएं खत्म होती हैं।
कच्चे टमाटर के साथ टमाटर की सॉस, केचअप और टमाटर से बने प्रोडकट्स में लाइकोपीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
उन्होंने आगे बताया, लिवर कैंसर से सुरक्षित रखने में टमाटर का पाउडर बहुत अहम भूमिका निभाता है। कच्चे टमाटर में विटामिन-ई, विटामिन-सी, फोलेट, मिनरल्स, फिनोलिक कंपाउंड और डायट्री फाइबर पाए जाते हैं।
अध्यान में पाया गया कि टमाटर के शरीर में सूजन पैदा करने वाले बैक्टीरिया की ग्रोथ नियंत्रण में रही। इस अध्ययन में शामिल किये गये चूहों को लिवर कार्सिनोजेन से संक्रमित किया गया। इसके बाद उन्हें हाई फैट डाइट दी गई थी।
टमाटर के अलावा अमरूद, तरबूज, पपीते में भी लाइकोपीन पाया जाता है लेकिन टमाटर के मुकाबले इन चीजों में लाइकोपीन की मात्रा कम होती है। लाइकोपीन से भरपूर टमाटर और टमाटर से बनी चीजें जैसे टोमेटो सॉस को खाने से भी हृदय रोग, ऑस्टियोपोरोसिस, डायबिटीज, फेफड़े, स्तन और पेट आदि कैंसर का खतरा कम होता है।
रोज़ाना 80 मिनट तक पैदल सैर करने से बहुत से फायदे हैं इससे न सिर्फ शरीर में ऊर्जा बनी रहती है बल्कि यह काफी रोगों से छुटकारा पाने या रोगों को दूर रखने का तरीका भी है। जानें हर दिन पैदल चलने से आपको क्या-क्या फायदें होंगे।
पैदल चलना न केवल आपके पैसे बचाता है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद लाभदायक है। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ कदम पैदल चलने से कई तरह की बीमारियों से बचाव के अलावा मानसिक मजबूती भी मिलती है। बावजूद इसके, लोग थोड़ा-सा भी पैदल चलने से कतराते हैं। यहां तक कि ऑफिस, कॉलेज या शॉपिंग मॉल में सीढ़ियों की बजाय लिफ्ट का इस्तेमाल करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, रोजाना 20 मिनट भी पैदल चला जाए, तो इससे बिगड़े हुए ग्लूकोज के स्तर को ठीक किया जा सकता है, साथ ही दिल की बीमारियों से भी बचा जा सकता है। आइए जानते हैं, पैदल चलने के फायदे:
कदम बढ़ाएं, दर्द भगाएं
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि दिन में 80 मिनट भी पैदल चला जाए, तो घुटने, कूल्हे में दर्द से राहत के साथ ही टखनों या पैरों में आई जकड़न को दूर किया सकता है। इसके साथ ही हफ्ते में 80 मिनट तेज चलना चाहिए, क्योंकि इससे कई तरह की बीमारियां दूर की जा सकती हैं। एक अध्ययन के अनुसार, रोजाना दो हजार कदम चलने वाले लोगों में हार्ट अटैक से होने वाली मौतों में 10 प्रतिशत जोखिम कम पाया गया है। इस स्टडी को 6 साल तक किया गया और उसके बाद यह परिणाम निकला कि पैदल चलना सेहत के लिए बेहद लाभदायक है।
"पैदल चलने से ब्रेन में सेरोटोनिन नामक केमिकल रिलीज होता है। इससे लोग मानसिक रूप से बेहतर होते हैं।"
होगा ‘फील गुड’
जब रोजाना पैदल चलने की आदत बन जाती है, तो एंडोर्फिन नाम हार्मोन का रिसाव होता है, जिसे फील गुड हार्मोन कहा जाता है। इसके रिलीज होने से व्यक्ति के मूड में सुधार होता है और वह अच्छा महसूस करता है। साथ ही पेड़-पौधों के बीच चलने से ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रण में रखा जा सकता है।
उम्र में होता है इजाफा
डॉक्टर कहते हैं कि व्यक्ति जितना ज्यादा पैदल चलता है, उसकी उम्र में इजाफा होता है। पैदल चलने से उम्र के ढलान पर पहुंचने के बावजूद इंसान शारीरिक रूप से मजबूत रहता है। इससे उनमें उम्र के साथ दिखने वाली समस्याओं का असर बेहद कम दिखता है। रोजाना पैदल चलने से सेहत बेहतर रहता है और उम्र बढ़ती है।
"चलने से न केवल शरीर को मिलने वाले ऑक्सिजन की मात्रा में बढ़ोतरी होती है, बल्कि इसमें ढेर सारी कैलरी भी लगती है, जिससे मोटापा नियंत्रण में मदद मिलती है।"
पैदल चलेंगे, तो मोटापा भागेगा
वैसे तो मोटापा अपने आप में एक बीमारी है, लेकिन कई बीमारियों की वजह भी मोटापा है। बदलती जीवनशैली और फास्ट फूड पर बढ़ती निर्भरता के कारण तेजी से यह समस्या लोगों को अपनी जद में ले रही है। डॉक्टरों के अनुसार, मोटापा डायबीटीज, दिल के रोग, जोड़ों के दर्द की सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा, इसके कारण बढ़ती उम्र में अल्जाइमर तक की दिक्कत हो सकती है। डॉक्टर बताते हैं कि पैदल चलने से मोटापा दूर होता है।
कम कर देता है स्ट्रोक का खतरा
जो लोग रोजाना पैदल चलते हैं, उनमें ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बेहद कम हो जाता है, क्योंकि जो भी हम खाते हैं, पैदल चलने की वजह से वह पच जाता है और कैलरीज बर्न हो जाती है। स्ट्रोक उन लोगों को ज्यादा होता है, जो पैदल नहीं चलते या कोई एक्सरसाइज नहीं करते। ऐसे में वह जो भी खाते हैं, कोलेस्ट्रॉल धमनियों में जमा होने लगता है, जिसकी वजह से स्ट्रोक हो सकता है।
"पैदल चलने से इंसान सेहतमंद रहता है। सुबह के वक्त पैदल चला जाए, तो इससे शरीर को विटामिन डी भी मिलता है।