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इसरो प्रमुख ने कहा, ‘‘लेकिन कोविड-19 महामारी की वजह से सभी चीजें बाधित हो गईं। कोविड-19 संकटसे निपटने के बाद हमें एक आकलन करना होगा।’’ सिवन ने कहा, ‘‘ लॉकडाउन की वजह से गंगनयान प्रभावित होगा…सभी उद्योगों ने काम करना अभी शुरू नहीं किया है।’’

नयी दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख के सिवन ने बुधवार को कहा कि लॉकडाउन की वजह से अंतरिक्ष में मानव को भेजने और चंद्रयान-3 अभियान में देर होने के अलावा ऐसे 10 अंतरिक्ष अभियान ‘बाधित’ हुए हैं, जिनके इस साल होने की योजना थी। उन्होंने कहा कि इसरो अपने अंतरिक्ष अभियानों पर लॉकडाउन के प्रभाव का आकलन करेगा। इसरो प्रमुख ने बताया कि अंतरिक्ष एजेंसी ने इस साल 10 प्रक्षेपण की योजना बनाई थी। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन कोविड-19 महामारी की वजह से सभी चीजें बाधित हो गईं। कोविड-19 संकटसे निपटने के बाद हमें एक आकलन करना होगा।’’ सिवन ने कहा, ‘‘ लॉकडाउन की वजह से गंगनयान प्रभावित होगा…सभी उद्योगों ने काम करना अभी शुरू नहीं किया है।’’

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीने में अभियान का कार्य प्रभावित हो गया। इसरो प्रक्षेपण से जुड़े उपकरणों के उत्पादन के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर है। इसरो को उपकरण उपलब्ध कराने वालों में शामिल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमईएस) भी लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए है। उन्होंने बताया, ‘ ‘ चंद्रयान-तीन समेत सभी अभियान प्रभावित हुए हैं।’’ सिवन ने कहा, ‘‘ हमें गगनयान पर लॉकडाउन के प्रभावों का आकलन करना होगा।’’ पिछले साल चंद्रयान-2 के चंद्रमा की सतह पर हार्ड लैंडिंग होने के बाद इसरो ने चंद्रयान-3 प्रक्षेपित करने की योजना बनाई थी, जिसे इसी साल चांद पर भेजा जाना था। गगनयान मिशन के तहत 2022 तक तीन भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजा जाना है। इसके लिए चार अंतरिक्ष यात्रियों का चयन भी हो चुका है और वे रूस में प्रशिक्षण हासिल कर रहे हैं लेकिन यह भी लॉकडाउन की वजह से प्रभावित हुआ है।

मेरठ जम्मू-कश्मीर में सेना लगातार आतंकियों के खिलाफ अभियान चला रही है। इस साल अब तक 100 से ज्यादा आतंकी ढेर किए जा चुके हैं। जम्मू-कश्मीर के अलावा अब आतंकी अन्य राज्यों को अपना निशाना बनाने में जुटे हैं। खुफिया सूत्रों से पता चला है कि दिल्ली में आतंकी हमला हो सकता है। आंतकियों के वेस्ट यूपी में छिपे होने की सूचना मिली है। ऐसे में पुलिस ने देर रात वेस्ट यूपी के जिलों में चेकिंग अभियान चलाया। यूपी दिल्ली बॉर्डर पर सख्त चेकिंग चल रही है।
बताया जा रहा है कि खुफिया एजेंसियों ने कश्मीर के आंतकियों का दिल्ली में आने की आशंका जताई है। इस पर वेस्ट यूपी में अलर्ट जारी किया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली में अलर्ट जारी किया गया है। यूपी बॉर्डर समेत कई जिलों में पूरी रात चेकिंग अभियान चलाया गया।

वेस्ट यूपी के जरिए दिल्ली को बना सकते हैं निशाना
सूत्रों की मानें तो जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हिज्बुल मुजाहिद्दीन और इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठनों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में पैठ जमाई है। दिल्ली में हमले के लिए आंतकी संगठन इन जिलों में छिपे उनके स्लीपर सेलों का प्रयोग कर सकते हैं।

स्लीपर सेलों की ले सकते हैं मदद
कहा जा रहा है कि ट्रक में बैठकर कश्मीर से दिल्ली में जाने की फिराक में आतंकी वेस्ट यूपी में शरण ले सकते हैं। मेरठ में देश की दूसरी सबसे बड़ी छावनी है। इसके अलावा बागपत, सहारमपुर, हापुड़, गाजियाबाद दिल्ली से सटे होने के कारण वे यहां मौजूद उनके स्लीपर सेलों की मदद ले सकते हैं।

हो रही सख्त चेकिंग
आईजी प्रवीर कुमार ने कहा कि यूपी के दिल्ली बॉर्डर पर सख्त चेकिंग चल रही है। रात में गश्त भी बढ़ाई गई है। उन्होंने कहा कि जिले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। ट्रक ही नहीं किसी भी वाहन को बिना चेकिंग के आगे नहीं जाने दिया जा रहा है।

मुंबई. लद्दाख की गलवान घाटी (Galwan Valley) में 20 सैनिकों की शहादत के बाद चीन (China) के खिलाफ देशभर के लोगों में जबरदस्त गुस्सा दिख रहा है. जगह-जगह लोग चीन के सामान की बहिष्कार की बात कर रहे हैं. इस बीच महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra) ने चीन को बड़ा झटका दिया है. राज्य सरकार ने केंद्र से बातचीत के बाद चीन की तीन कंपनियों के प्रोजेक्ट पर फिलहाल रोक लगा दी है. इस प्रोजेक्ट की लागत करीब 5 हजार करोड़ रुपये की है. अब केंद्र सरकार की गाइडलाइन आने के बाद इस पर कोई फैसला लिया जाएगा.

बड़े प्रोजेक्ट पर खतरा
>>जिन प्रोजेक्ट पर रोक लगाई गई है, उसमें पुणे से सटे तालेगांव में इलेक्ट्रिक व्हीकल की बड़ी फैक्ट्री भी है. कहा जा रहा है कि ये करीब 3500 हजार करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है. ये कंपनी 1000 करोड़ का निवेश करने वाली थी जिसमे 1500 लोगों को रोजगार मिलना था.
>>हेंगली इंजीनियरिंग- इस कंपनी के साथ भी पुणे के तालेगांव में 250 करोड़ का निवेश करने का करार हुआ था जिससे 150 लोगों को रोजगार मिलने की संभावना थी.
>> ग्रेट वॉल मोटर्स ऑटोमोबाइल- इस कंपनी ने सबसे ज्यादा निवेश करने का करार किया था. करीब  3770 करोड़ रुपये का निवेश होना था जिससे 2042 लोगों के लिए रोजगार मिलने की संभावना थी.


12 कपंनियों से हुआ था करार
बता दें कि ये सभी करार 15 जून को हुए थे. महाराष्ट्र सरकार ने पिछले दिनों 12 एमओयू (Memorandum Of Understanding) पर साइन किए थे. सभी 3 चाइनीज कंपनियों के प्रोजेक्ट होल्ड पर डाल दिए गए हैं, जबकि 9 प्रोजेक्ट के काम फिलहाल जारी रहेंगे. इसमें दूसरे देशों की कंपनियां शामिल हैं. बता दें केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों से चीन के प्रोजेक्ट और आयात पर जानकारी मांगी थी.


BSNL ने पहले दिया था झटका
इससे पहले टेलीकॉम ​डिपार्टमेंट भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) से 4G अपग्रेडेशन सुविधा में चीनी इक्विमेंट्स का इस्तेमाल नहीं करने नहीं करने का फैसला किया था. टेलीकॉम डिपार्टमेंट ने BSNL से इस संबंध में अपने टेंडर पर फिर से काम करने को कहा है. टेलीकॉम डिपार्टमेंट (DoT) इस बात पर भी विचार कर रहा है कि देश की प्राइवेट मोबाइल सर्विस ऑपरेटर्स  भी चीनी कंपनियों के उत्पाद पर अपनी निर्भरता कम करें.

 

रेलवे ने भी चीन से समझौते रद्द किए
उधर भारतीय रेलवे ने भी चीन में बनी चीजें इस्‍तेमाल करने से इनकार कर दिया है. वहीं, चीन की कुछ कंपनियों के साथ कई समझौते भी रद्द कर दिए गए हैं. इस बीच, भारत सरकार घरेलू उत्‍पादों का निर्यात बढ़ाने की कोशिशों में जुट गई है. इसी के तहत वाणिज्य मंत्रालय ने अलग-अलग देशों में घरेलू कंपनियों के लिए निर्यात के मौके तलाशने के लिए भारतीय मिशनों के साथ 1,500 प्रोडक्‍ट्स की सूची साझा की है.

नेपाल के आर्मी चीफ पूर्ण चंद्र थापा ने विवादित कालापानी का दौरान किया। इस दौरान आर्मी चीफ के साथ भारत सीमा पर तैनात नेपाल सशस्त्र पुलिस बल के महानिरीक्षक शैलेंद्र खनाल भी थे। दोनों अधिकारियों ने भारत सीमा पर ताजा हालात का जायजा लिया।

 

हिन्दुस्तान की जमीन पर गलत नीयत बनाए हुए चीन और जिसे भारत ने अब तैयारियां तेज कर दी हैं। जहां ड्रैगन की हर साजिश का करारा जवाब दिया जाएगा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चीन को साफ शब्दों में कह दिया कि सीमा पर किसी भी तरह की गुस्ताखी माफ नहीं की जाएगी। सीमा पर चीन की साजिश अब उसे महंगी पड़ने वाली है। गलवान घाटी में तनाव को लेकर बैठकों का दौर जारी है। चीन से तनाव तो जारी है ही लेकिन भारत के दो पड़ोसी देशों में भी हलचलें तेज हो गई। एक तरफ जहां लगातार भारत को आंखे दिखा रहा नेपाल विवादित नक्शे को कानूनी जामा पहनाने के बाद कालापानी क्षेत्र के करीब का दौरा करते नजर आए तो दूसरी तरफ कश्मीर में अपनी नापाक आतंकी साजिशों को अंजाम देने वाला पाकिस्तान आईएसआईएस के साथ बैठकें कर रहा है।

नेपाल आर्मी चीफ का कालापानी के करीब का दौरा 

नेपाल के आर्मी चीफ पूर्ण चंद्र थापा ने विवादित कालापानी का दौरान किया। इस दौरान आर्मी चीफ के साथ भारत सीमा पर तैनात नेपाल सशस्त्र पुलिस बल के महानिरीक्षक शैलेंद्र खनाल भी थे। दोनों अधिकारियों ने भारत सीमा पर ताजा हालात का जायजा लिया। खबरों के अनुसार नेपाल आर्मी चीफ ने उस सड़क का भी इंस्पेक्शन किया जो हाल ही में बनाई गई है। यह सड़क नेपाल के दार्चूला जिले को ब्यास गांव से जोड़ती है जो तिंकर दर्रे के पास है। नेपाल आर्मी चीफ का दौरा उनकी संसद द्वारा विवादित नक्शा पास किए जाने के ठीक बाद हुआ है। कालापानी शुरू से ही भारत और नेपाल के बीच विवाद का केंद्र रहा है।

पाकिस्तान सेना प्रमुख की ISI संग सिक्रेट मीटिंग

भारत-चीन की झड़प के बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मुख्‍यालय में करीब दो सा‍ल बाद तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने एक ख़ुफ़िया मीटिंग की है। रेडियो पाकिस्तान के मुताबिक, आईएसआई हेडक्वॉर्टर में अहम मीटिंग हुई। इसमें बाजवा के अलावा ज्वॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ नदीम रजा, नेवी चीफ एडमिरल जफर महमूद अब्बासी और एयरफोर्स चीफ मुजाहिद अनवर खान भी मौजूद थे।  

एशिया के दो बड़े देशों के बीच साल 1962 में युद्ध हो चुका है। यह युद्ध 20 अक्टूबर 1962 को शुरू हुआ था जो एक महीने तक चला था। इस युद्ध में 10 से 20 भारतीय सैनिकों ने जबकि 80 हजार चीनी सैनिकों ने हिस्सा लिया था।

नयी दिल्ली। दुनिया में सबसे लंबी सीमा होने की वजह से चीन के विवादों की कहानी भी काफी लंबी है। सबसे लंबी जमीनी सीमा होने की वजह से कई देशों के साथ चीन के संबंध काफी अच्छे हैं तो कुछ देशों के साथ तल्ख भी। हाल ही में गलवान घाटी में सीमा विवाद को लेकर सीमा सेना के साथ हुई हिंसक झड़प में भारतीय सेना के एक अफसर समेत 20 जवान शहीद हो गए जिसके चलते लोगों के मन में चीन के प्रति काफी आक्रोश नजर आ रहा है। जगह-जगह चीन के सामानों का बहिष्कार किया जा रहा है जबकि भारत सरकार लगातार चीन से बातचीत कर सीमा विवाद को सुलझाने में जुटी हुई है और हिंसक भड़प को लेकर चीन से जवाब भी मांग रही है।
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14 देशों के साथ चीन का हुआ है विवाद

करीब सात दशक में चीन का 14 देशों के साथ विवाद हुआ है। चीन की करीब 22 हजार 117 किमी लंबी जमीन सीमा का हिस्सा है। जिसमें कई देशों ने अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ी हैं। हालांकि सभी देशों के साथ सिर्फ सीमा को लेकर ही विवाद नहीं है बल्कि कुछ देशों के साथ व्यापार युद्ध भी हुआ। लेकिन जब हम चीन के सबसे ज्यादा विवादित सीमाओं की बात करते हैं तो सामने भारत, रूस और वियतनाम ही नजर आता है।

1962 में हुआ था भारत और चीन के बीच युद्ध

एशिया के दो बड़े देशों के बीच साल 1962 में युद्ध हो चुका है। यह युद्ध 20 अक्टूबर 1962 को शुरू हुआ था जो एक महीने तक चला था। इस युद्ध में 10 से 20 भारतीय सैनिकों ने जबकि 80 हजार चीनी सैनिकों ने हिस्सा लिया था। जिसमें भारत को 1300 सैनिकों की क्षति हुई थी जबकि 1000 के आसपास सैनिक जख्मी हुए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक युद्ध के दौरान 1500 के करीब सैनिक लापता हो गए थे और 4 हजार सैनिकों को चीन ने बंदी बना लिया था। भारत के मुकाबले चीन को कम नुकसान हुआ था क्योंकि चीनी सेना के महज 700 सैनिक मारे गए थे और 1500 के करीब जख्मी हुए थे। हालांकि फिर 21 नवंबर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी गई थी।

इसके बाद साल 1993 में भारत और चीन के बीच एक शांति समाझौत भी हुआ था। लेकिन अक्साई चीन को लेकर अक्सर दोनों देशों के बीच में विवाद होते रहते हैं। इतना ही नहीं डोकलाम में भी दोनों देशों के बीच तनाव देखा जा चुका है और हाल ही में लद्दाख में टकराव देखनों को मिल रहा है।

मंगोलिया बॉर्डर को लेकर हुआ था युद्ध

1962 में जब भारत चीन से युद्ध हारा था उस वक्त रूस और अमेरिका क्यूबा-मिसाइल विवाद में फंसे हुए थे। जिसकी वजह से भारत का सबसे करीबी मित्र रूस चीन के खिलाफ युद्ध में मदद नहीं कर पाया था। अगर उस वक्त रूस भारत की मदद करता तो फिर रूस को चीन और अमेरिकी दोनों देशों का सामना करना पड़ता।

वैसे रूस और चीन के बीच तल्खियां कुछ कम नहीं हैं। 1969 में चीन और तब के सोवियत संघ में मंगोलिया बॉर्डर को लेकर विवाद छिड़ा था और फिर युद्ध भी हुआ था। हालांकि 1991 में चीन और सोवियत सीमा समझौते पर दस्तखत किया था। तब से मतभेद कुछ कम हुए।

वियतनाम सीमा विवाद

भारत और रूस के बाद चीन और वियतनाम के बीच सीमा को लेकर आपस में ठनी रहती है। यह विवाद सदियां पुराना है। 27 दिनों तक चले इस युद्ध में 10 हजार से अधिक सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध में चीन की बहुत बुरी हार हुई और फिर चीन ने अपने सैनिकों को पीछे कर लिया था।

 रायपुर, 17 जून 2020 प्रदेश सरकार की ‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना‘ राज्य के किसानों के लिए मददगार साबित हुई है। जशपुर जिले के फरसाबहार ब्लॉक के ग्राम दाईजबहार के 52 वर्षीय किसान श्री रामकिशुन मांझी के लिए कोरोना संकट काल में यह योजना बड़ी राहत लेकर आई है। रामकिशुन को इस योजना के तहत लगभग 66 हजार रूपए की प्रोत्साहन राशि मिलेगी। पहली किश्त के रूप में 16 हजार रूपए मिलने से उत्साहित रामकिशुन खरीफ की तैयारी में जुट गए हैं। रामकिशुन ने बताया कि उनके नाम पर करीब 7 एकड़ पैतृक कृषि भूमि है। परिवार के भरण-पोषण का जरिया खेती किसानी ही है। राजीव गांधी न्याय योजना से मिली प्रथम किश्त की राशि से अपनी दो एकड़ की बाड़ी में आलू, प्याज, लहसुन, मिर्च की खेती के सपने का साकार करने में जुट गए हैं।
    कृषक रामकिशुन ने बताया कि वे खरीफ के समय में धान के साथ ही मूंगफली, अरहर, उड़द जैसे दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती भी करते है एवं रबी फसल के समय इस बार मक्का एवं गन्ना जैसे नगदी फसलों की खेती करने की इच्छा है। श्री रामकिशुन ने बताया कि वर्तमान समय में जब पूरा देश संकट के दौर से गुजर रहा है ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ शासन ने किसानों की समस्याओं को समझा और लॉकडाउन की कठिन परिस्थिति में राजीव गांधी किसान न्याय योजना शुरू कर किसानांे को सीधे मदद पहुंचाई हैं। किसान न्याय योजना किसानों के लिए सहारा बन गई है। किसानों के हित की रक्षा के लिए राजीव गांधी किसान न्याय योजना लागू करने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल का आभार जताया है।

दिल्ली में 10 जून से शराब कम दाम में मिलेगी क्योंकि आप सरकार ने इसकी बिक्री पर लगाया 70 फीसदी ‘विशेष कोरोना शुल्क’ वापस लेने का रविवार को फैसला किया। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।

नयी दिल्ली। दिल्ली में 10 जून से शराब कम दाम में मिलेगी क्योंकि आप सरकार ने इसकी बिक्री पर लगाया 70 फीसदी ‘विशेष कोरोना शुल्क’ वापस लेने का रविवार को फैसला किया। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। हालांकि अधिकारी ने बताया कि सरकार ने सभी श्रेणियों की शराब पर मूल्य वर्द्धित कर (वैट) 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला किया गया। पिछले महीने सरकार ने शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर‘विशेष कोरोना शुल्क’ लगाया था।

जिनेवा । विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने आयुष्मान भारत योजना की तारीफ करते हुये कहा है कि इसके क्रियान्वयन में तेजी लाकर देश कोविड‑19 से बेहतर तरीके से निपट सकता है। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. तेद्रोस गेब्रियेसस ने कोविड‑19 पर नियमित प्रेस वार्ता में कहा, “निस्संदेह कोविड बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और कई राष्ट्रों के समक्ष गंभीर चुनौती है, लेकिन हमें इसमें अवसर भी तलाशने होंगे। भारत के लिए यह आयुष्मान भारत को गति देने का अवसर साबित हो सकता है, खासकर प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर फोकस करते हुये।”
मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत के तहत सरकार ने 10 करोड़ गरीब परिवारों को सालाना पाँच लाख रुपये की नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है। साथ ही इसमें जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी ढाँचों को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

तेद्रोस ने कहा कि प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं और जन भागीदारी के जरिये हम महामारी की लहर का रुख मोड़ सकते हैं। भारत ने जो योजना शुरू की है उसका भरपूर इस्तेमाल करने और उसके क्रियान्वयन को गति देने से उसे लाभ हो सकता है। सरकार आयुष्मान भारत को तेजी से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ आयुष्मान भारत की तारीफ करता रहा है और यह इस योजना को कसौटी पर कसने तथा गति देने के लिए अच्छा अवसर हो सकता है। इस महामारी से लड़ने में इसका पूरा इस्तेमाल किया जाना चाहिये।

इस समय की बात करें तो चीन के बौखलाने की कई और वजहें भी हैं। दुनियाभर में कोरोना फैलाने की चीन की साजिश बेनकाब हो गई है और उसकी अर्थव्यवस्था भी दांव पर लग गई है। चीन में स्थापित दुनिया के कई देशों की कंपनियां भारत आने की तैयारी भी कर रही हैं।

भारत सरकार ने यह पहली बार आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया है कि चीन की सेना भारतीय क्षेत्र में घुस आई है। चीनी सेना की घुसपैठ पर आधिकारिक बयान इस बार स्वयं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से आया है इसलिए यह साफ हो गया है कि इस बार चीन का मंसूबा जितना खतरनाक है, भारत सरकार भी उसी दृढ़ता के साथ जवाब देने की तैयारी कर रही है। कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से दुनिया भर में आलोचना का शिकार हो रही चीन को यह लग रहा है कि इस तनातनी के सहारे वो दुनिया के बड़े देशों का ध्यान भटका सकती है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े देशों को चीन विरोधी एजेंडे को त्यागने को मजबूर कर सकती है और यही सोच कर चीन अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने में लगा हुआ है।


चीनी सेना की घुसपैठ पर रक्षा मंत्री का बयान

सबसे पहले बात कर लेते हैं भारत सरकार के कद्दावर मंत्री और सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले मोदी सरकार के अहम मंत्रियों में शामिल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान की। रक्षा मंत्री ने यह माना कि पूर्वी लद्दाख में बड़ी तादाद में चीनी सेना प्रवेश कर गई है। रक्षा मंत्री के मुताबिक, “चीन वहां तक आ गया है जिसे वह अपना मानता है, जबकि भारतीय उसे अपना मानते हैं। दोनों देशों के बीच इस बात को लेकर मतभेद हुए हैं और अच्छी-खासी संख्या में चीन के लोग भी आ गए हैं।'' हालांकि इसके साथ ही इन्होने पुरजोर शब्दों में यह भी कहा कि भारत अपनी मौजूदा स्थिति से किसी भी कीमत पर कदम पीछे नहीं लेगा और सरकार किसी भी रूप में देश का सर झुकने नहीं देगी। उन्होंने यह विश्वास दिलाया कि सरकार को जो करना चाहिए, वो सरकार ने अपनी तरफ से किया है।


5 मई से शुरू हुआ विवाद, 6 जून की तारीख है महत्वपूर्ण

भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (जिसे एलएसी के नाम से जाना जाता है) पर कई स्थानों को लेकर दोनों देशों में विवाद है। चीन अपनी दादागिरी के बल पर भारतीय क्षेत्र में यदा-कदा घुसपैठ करता रहा है लेकिन अब भारतीय सेना भी मुंहतोड़ जवाब दे रही है। ताजा विवाद की शुरूआत पिछले महीने 5 मई को हुई थी, जब सैंकड़ों चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए थे। उसी दिन भारतीय सीमा में गश्त कर रहे हमारे सैनिकों के साथ उन्होंने हाथापाई भी की। इसके बाद हालात तेजी से बदलने लगे। सीमा पर भारतीय सेना और कूटनीतिक स्तर पर भारत सरकार के रवैये ने चीन को यह बखूबी समझा दिया कि इस बार उसे करारा जवाब मिलने वाला है। भारत के आत्मबल को देखिए कि उसने मध्यस्थता करने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऑफर को भी ठुकराते हुए यह साफ-साफ कहा कि चीन के साथ मतभेद सुलझाने के लिए वह अकेले ही काफी है। भारत के इस स्टैंड ने चीन को यह बता दिया कि सीमा पर चीनी हरकत से निपटने में भारत सक्षम है और वह किसी भी स्तर पर इसे अंतर्राष्ट्रीय विवाद का मुद्दा नहीं बनने देगा, जैसा कि चीन की मंशा है। ऐसे में तुंरत ही चीन ने शांति का राग अलापना शुरू कर दिया और अब बताया जा रहा है कि भारतीय और चीनी सेना के अधिकारियों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने को लेकर 6 जून को अहम बैठक होने जा रही है।

 
यह भारत 1962 का भारत नहीं है

एक तरफ जहां बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश की जा रही है तो वहीं साथ ही दूसरी तरफ भारत ने भी चीनी सेना की तैयारियों को देखते हुए अपनी रक्षा तैयारियों को तेज कर दिया है। चीन के नापाक मंसूबों को देखते हुए भारत ने चीन सीमा से सटे अपने सैन्य अड्डों पर तोपों, टैंकों, हथियारों और अन्य युद्धक उपकरणों को तैनात कर दिया है। भारतीय सेना वहां पर लगातार अपनी ताकत और संख्या को बढ़ा रही है। चीन की चालबाजी देखिए कि एक तरफ जहां वो शांति का राग अलाप रहा है, रोजाना सैन्य अधिकारी के स्तर पर बातचीत कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ सीमा पर सैन्य ताकत बढ़ा रहा है और तोप, टैंक सहित अन्य युद्धक साजो-सामान भी एकत्र कर रहा है। साफ-साफ लग रहा है कि चीन भारत को बातचीत में उलझा कर 1962 की तरह ही धोखा देने का षड्यंत्र रच रहा है। ऐसा मंसूबा बनाते समय शायद चीन यह भूल रहा है कि यह 2020 का भारत है। यह 1962 का भारत नहीं है जब चीन ने भारत को हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे में उलझा कर धोखे से आक्रमण कर दिया था। उस समय भी कुर्बानी के जोश और जज्बे से भरी हुई भारतीय सेना चीनी सेना पर भारी पड़ी थी लेकिन अचानक हुए हमले और सैन्य तैयारियां नहीं होने की वजह से हमें हार का सामना करना पड़ा था। उस समय एक तरफ चीन था, जिसके तानाशाह ने धोखे से भारत को सबक सिखाने की योजना कई साल में बनाई थी तो दूसरी तरफ भारत था, जिसकी सरकार को यह आभास भी नहीं था कि चीन हम पर हमला कर सकता है। कूटनीतिक तैयारियों का आलम देखिए कि हमारे सबसे करीबी माने जाने वाले सोवियत संघ रूस ने भी हमें ठेंगा दिखा दिया था। लेकिन अब माहौल बदल गया है। भारत की सेना हो या सरकार, सभी चीन के नापाक मंसूबों को समझ चुके हैं। सीमा पर इस बार भारतीय सेना पूरी तरह से तैयार है। राजधानी दिल्ली में बैठी सरकार कूटनीतिक स्तर पर भी चीन की घेरेबंदी करने की तैयारी कर रही है।


इस बार क्यों बौखलाया है चीन ?

दरअसल, चीन की फितरत बहुत अजीब-सी है। आत्मसम्मान से रहित यह देश अपने स्टैंड को बदलने में तनिक भी वक्त नहीं लगाता है। कुछ महीने पहले, यही चीन भारत से लगातार गुहार लगा रहा था कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों की सरकारों द्वारा कोरोना वायरस को चीनी वायरस कह कर संबोधित करने के मुद्दे पर भारत उसका साथ दे और उसके कुछ दिनों बाद ही चीन ने अपना असली चेहरा दिखा दिया।


हालांकि इस बार चीन के बौखलाने की कई और वजहें भी हैं। दुनियाभर में कोरोना फैलाने की चीन की साजिश बेनकाब हो गई है और उसकी अर्थव्यवस्था भी दांव पर लग गई है। चीन में स्थापित दुनिया के कई देशों की कंपनियां भारत आने की तैयारी कर रही हैं तो वहीं सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश भारत में चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम भी जोर पकड़ती जा रही है। आर्थिक नुकसान की इसी आशंका से ग्रस्त चीन इस तरह की हरकतें कर रहा है।

 
लड़ाइयों में पराजित होने का लंबा रिकॉर्ड रहा है चीन का

यह बात उन लोगों को बहुत अजीब लग सकती है जो चीन को एक महाशक्ति मानते हैं लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि चीन उतना ही प्राचीन देश है जितना कि भारत। युद्ध में हारने का चीन का एक लंबा इतिहास रहा है। यह भी एक सच्चाई है कि इतिहास में गिने-चुने मौकों पर ही चीन को विजय हासिल हुई है, ज्यादातर लड़ाइयों में चीन को हार का सामना ही करना पड़ा है। आधुनिक चीन के इतिहास की बात करें तो 1894-95 में उसके आकार की तुलना में काफी छोटे देश जापान ने चीन को बुरी तरह से हरा दिया था। इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब ब्रिटेन, रूस, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे देशों ने खरबूजे की तरह चीन को आपस में बांट लिया था। उस समय एक देश के तौर पर चीन का अस्तित्व स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में ही था लेकिन लगातार हो रही पराजय की वजह से इन देशों के साथ चीन को कई तरह की अपमानजनक संधि करनी पड़ी थी और इसकी दयनीय हालत को इतिहास में चीनी खरबूजे के काटे जाने के नाम से आज भी जाना जाता है। 1949 की चीनी क्रांति के बाद वहां पर कम्यूनिस्ट सरकार की स्थापना हुई जो आज तक चल रही है लेकिन इनके दौर में भी चीन को कई बार हार का सामना करना पड़ा। 1962 की लड़ाई भले ही चीन धोखे से जीत गया लेकिन इसके कुछ सालों के बाद ही चीन को सिक्किम के मोर्चे पर भारत से करारी हार का सामना करना पड़ा था। पिछले कई दशकों से चीन कभी पाकिस्तान, कभी श्रीलंका, कभी नेपाल या कभी अन्य किसी देश के सहारे भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है लेकिन इस नापाक कोशिश में भी चीन थोड़े समय के लिए ही भारी पड़ता नजर आता है। पाकिस्तान को छोड़कर अन्य सभी मोर्चों पर चीन को बार-बार भारत से हार का सामना ही करना पड़ा है और डोकलाम का घाव तो अभी ताजा ही है।


-संतोष पाठक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

पूर्वी लद्दाख के इन तीन क्षेत्रों में दोनों पक्षों के बीच पिछले एक महीने से गतिरोध जारी है। यह पता नहीं चला है कि भारतीय सेना वार्ता में क्या प्रस्ताव रखेगी लेकिन समझा जाता है कि वह इन क्षेत्रों में यथास्थिति बरकरार रखने पर जोर देगी।

नयी दिल्ली। भारत और चीन की सेना के बीच छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता होगी और उम्मीद है कि दोनों पक्ष पूर्वी लद्दाख में तनाव कम करने के लिए विशिष्ट प्रस्तावों पर चर्चा करेंगे। यह जानकारी बुधवार को आधिकारिक सूत्रों ने दी। उन्होंने कहा कि लेह स्थित 14वीं कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह वार्ता में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे जो सीमा पर स्थित एक बैठक बिंदु पर होगी। सूत्रों ने बताया कि पैंगोंग त्सो, गलवान घाटी और डेमचोक में तनाव को कम करने के लिए भारतीय पक्ष वार्ता में विशिष्ट प्रस्ताव रखेगा। पूर्वी लद्दाख के इन तीन क्षेत्रों में दोनों पक्षों के बीच पिछले एक महीने से गतिरोध जारी है। यह पता नहीं चला है कि भारतीय सेना वार्ता में क्या प्रस्ताव रखेगी लेकिन समझा जाता है कि वह इन क्षेत्रों में यथास्थिति बरकरार रखने पर जोर देगी। उन्होंने बताया कि दोनों सेनाओं के स्थानीय कमांडर के साथ ही मेजर जनरल स्तर पर कम से कम दस बार वार्ता हो चुकी है ताकि गतिरोध का समाधान किया जा सके।
2017 में डोकलाम के बाद दोनों सेनाओं के बीच यह सर्वाधिक गंभीर सैन्य गतिरोध है। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘‘हमें उम्मीद है कि चीनी पक्ष भी तनाव कम करने के लिए विशिष्ट सुझाव रखेगा।’’ पिछले महीने की शुरुआत में गतिरोध शुरू होने के बाद भारतीय सेना ने निर्णय किया कि पैंगोंग त्सो, गलवान घाटी, डेमचोक और दौलत बेग ओल्डी के विवादास्पद क्षेत्रों में चीनी सैनिकों की आक्रामकता से निपटने के लिए वह भी ठोस रवैया अपनाएगी। चीन की सेना ने समझा जाता है कि पैंगोंग त्सो और गलवान घाटी में करीब 2500 सैनिकों की तैनाती की है। इसके अलावा वह अस्थायी ढांचे एवं हथियारों को भी बढ़ा रही है।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि चीन ने पैंगोंग त्सो इलाके से करीब 180 किलोमीटर दूर अपने सैन्य हवाई अड्डे पर निर्माण गतिविधियों सहित अस्थायी सीमा से अंदर अपने क्षेत्र में रक्षा निर्माण में काफी तेजी लाई है।


उन्होंने बताया कि भारत ने भी अतिरिक्त सैनिकों और तोपों की तैनाती कर अपनी उपस्थिति मजबूत की है। सरकार के सूत्रों ने कहा कि चीन के सैनिकों ने पूर्वी लद्दाख के जिन इलाकों में आक्रामक रवैया अपनाया है वहां भारतीय सेना ने अपनी उपस्थिति मजबूत करने की खातिर सैनिकों, वाहनों और तोपों सहित सैन्य तैनाती बढ़ा दी है। पूर्वी लद्दाख में स्थिति तब खराब हुई जब पांच मई की शाम को चीन और भारत के 250 सैनिकों के बीच हिंसा हुई जो अगले दिन भी जारी रही। इसके बाद दोनों पक्ष ‘‘अलग’’ हुए। बहरहाल, गतिरोध जारी रहा। इससे पहले 2017 में भारत और चीन के सैनिकों के बीच डोकलाम में आमना-सामना हुआ था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका बढ़ गई थी। भारत और चीन के बीच 3488 किलोमीटर वास्तविक नियंत्रण रेखा है।

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