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बालेश्वर (ओडिशा) : भारत ने ओडिशा तट से रविवार को परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-4 का सफल परीक्षण किया. यह मिसाइल 4,000 किलोमीटर की दूरी तक का लक्ष्य भेदने में सक्षम है. यह परीक्षण सेना ने प्रायोगिक परीक्षण के रूप में किया.

रक्षा सूत्रों ने बताया कि सतह से सतह पर मार करने वाली इस सामरिक मिसाइल का परीक्षण डॉ अब्दुल कलाम द्वीप स्थित एकीकृत परीक्षण केंद्र (आईटीआर) के लॉन्च पैड संख्या-4 से सुबह करीब 8:35 बजे किया गया. परीक्षण को ‘‘पूर्ण सफल'' करार देते हुए उन्होंने कहा कि परीक्षण के दौरान मिशन के सभी उद्देश्य प्राप्त कर लिए गए. सभी रडार, ट्रैकिंग सिस्टम और रेंज स्टेशनों ने मिसाइल के उड़ान प्रदर्शन पर निगरानी रखी, जिसे एक मोबाइल लॉन्चर से दागा गया.

अग्नि-4 मिसाइल का यह सातवां परीक्षण था. इससे पहले भारतीय सेना की सामरिक बल कमान (एसएफसी) द्वारा इसी स्थान से दो जनवरी 2018 को इसका सफल परीक्षण किया गया था.

डॉ दर्शन पाल
कृषि विशेषज्ञ एवं एक्टिविस्ट
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इसमें कोई संदेह नहीं कि किसानों की कर्जमाफी में सरकारें अपना फायदा जरूर देखती हैं और चुनावी जीत-हार के नजरिये से ही ऐसा करती भी हैं. लेकिन, यह जरूरी है कि किसानों के कर्जे माफ किये जाएं और साथ ही ऐसी नीतियां बनायी जाएं, ताकि किसान कर्ज के दलदल में फंसे ही नहीं. 
 
बीते करीब ढाई दशक से ज्यादा समय से देश में किसानों की कर्जमाफी की राजनीति हमारी सरकारें कर रही हैं, लेकिन आज तक किसी सरकार ने एेसी नीति नहीं बनायी, जिससे किसान पर कर्ज का बोझ आने ही न पाये और वह आत्महत्या न करे. सरकारें चार-साढ़े चार साल तक किसानों के मुद्दों-मांगों पर ओछी राजनीति करती रहती हैं और जब चुनाव आते हैं, तो पार्टियां कर्जमाफी का वादा कर देती हैं. निश्चित रूप से यह राजनीति ठीक नहीं है और इससे कभी भी किसानों की आय बढ़नेवाली नहीं है. 
 
इस वक्त देश का किसान कर्ज के आइसीयू में पड़ा हुआ एक ऐसा मरीज है, जिसे बाहर निकालना बहुत जरूरी है और यह काम कर्जमाफी से ही संभव है. अब रहा सवाल कर्जमाफी से सरकारों के राजस्व घाटे का, तो मैं समझता हूं कि नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार को लेनी ही चाहिए. 
 
किसान पर कर्जे क्यों हैं, इसके कई अलग-अलग कारण हैं. लेकिन, यह बात पक्की है कि कर्ज देनेवाली संस्थाएं एक तो किसानों के साथ कठोर होती हैं, दूसरे यह कि किसान को लागत की कीमत भी नहीं मिल पाती, क्योंकि कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़ या फिर कीड़े-मकोड़े लगने के साथ कभी-कभी प्राकृतिक आपदाओं के आने से उसकी फसल बर्बाद हो जाती है. ऐसे में वह और भी कर्जदार हो जाता है.
 
कभी बारिश ज्यादा हाे गयी, या कभी बहुत कम हुई, तो भी किसान की फसल पर असर पड़ता है. कुल मिलाकर इस एतबार से देखें, तो एक बार कर्ज माफ कर देनेभर से ही किसान की समस्या का अंत नहीं हो जाता है. इसके लिए एक समुचित और व्यावहारिक नीति बनाने की जरूरत है, ताकि फसल बर्बादी की हालत में किसान की बर्बादी न होने पाये. 
 
मेरा मानना है कि किसानों को कर्ज देने की व्यवस्था में सिर्फ सरकारी संस्थाएं अग्रणी हों और उन्हें बेतहाशा सूद पर कर्ज देनेवाले साहूकारों से मुक्ति दिलायी जाये. पंजाब में 95 प्रतिशत किसान आत्महत्याएं स्थानीय स्तर पर साहूकारों द्वारा दिये कर्जे के कारण हुई हैं. इसे बंद करने की सख्त जरूरी है और यह तभी होगा, जब सरकारी व्यवस्था में कर्ज मिलना आसान हो. 
 
यह भी कि सरकारी व्यवस्था में कर्ज पर ब्याज चार प्रतिशत से अधिक तो कतई न हो और किसी भी कीमत पर न हो. साथ ही बैंक से लोन मिलने में भी आसान व्यवस्था बनायी जाये. अगर साहूकारों के चंगुल से किसानों को नहीं बचाया गया, तो बड़ी से बड़ी कर्जमाफी का भी कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि सरकारें तो माफ कर देंगी, मगर किसान साहूकार के कर्ज के हाथों मारा जाता रहेगा. 
 
इस समय जो बैंक से कर्ज मिल रहे हैं किसानों को, उस पर करीब सात प्रतिशत ब्याज है, जिसमें तीन प्रतिशत की सब्सिडी केंद्र सरकार देती है. ऐसे में बचा चार प्रतिशत, जो किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं कर रहा है, जितना कि साहूकारों का कर्ज करता है. यहां एक और बात समझनी होगी कि जो किसान छोटे-मझोले हैं, उनके लिए ब्याज दर 4 प्रतिशत से भी कम हो. 
 
उदारीकरण के बाद जब बाजार उन्मुक्त हुआ, तो हर चीज बाजार तय करने लगा. इसका नुकसान यह हुआ कि तब से किसानों (गरीबों भी कह सकते हैं) के स्वास्थ्य पर खर्च कर पाना महंगा होता गया है. एक तरफ जहां बीमारियों का इलाज महंगा होता गया, वहीं शिक्षा के बाजारीकरण से उनके बच्चे उच्च शिक्षा से भी वंचित होते चले गये. और बाकी चीजों की महंगाई का हाल तो हम सबको पता है कि यह रुकने का नाम नहीं ले रही है. 
 
ऐसे में किसानों पर दोगुनी-चौगुनी मार पड़ने लगी. इसलिए कर्ज में डूबे हुए किसान अपने फसलों की बर्बादी या लागत भी न मिल पाने के चलते या तो किसानी छोड़ने लगे या फिर आत्महत्याएं करने लगे. आज खेती में इस्तेमाल होनेवाली हर चीज तो महंगी हो गयी है. चाहे डीजल हो या बीज, रासायनिक खाद हो या पानी, सब कुछ तो उसकी पहुंच से बाहर है, तभी तो वह कर्ज लेता है. बैंक से कर्ज लेने में इतने लफड़े हैं कि वह मजबूरी में साहूकार से कर्ज ले लेता है. 
 
एक तरफ वह अपनी फसल की मार से परेशान होता है, तो दूसरी तरफ उसके बच्चे को न तो अच्छा स्वास्थ्य मिलता है, न अच्छी शिक्षा. नौकरी करनेवाले या मध्यवर्ग के लोग जब पैसा रहते हुए भी इन चीजों के महंगे होने से हमेशा परेशान रहते हैं, ऐसे में किसान के लिए यह जीवन नर्क की तरह है, जहां उसके पास पाने को कुछ नहीं है, खोने के लिए सब कुछ है, ऊपर से कर्ज अलग से है. 
 
हमारा तो इतना ही मानना है कि अगर सरकारें कर्जमाफी की राजनीति कर रही हैं, तो करें. लेकिन, जब तक फसलों में इस्तेमाल होनेवाली चीजों की कीमतें कम नहीं होंगी, और उत्पादन के बाद फसलों का समर्थन मूल्य उसकी पूरी लागत कीमत के साथ 50 प्रतिशत ज्यादा जोड़कर नहीं मिलेगा, तब तक किसान कर्ज लेते रहेंगे और आत्महत्या करते रहेंगे. 
 
कहने का अर्थ यह है कि किसान को कर्ज से माफी नहीं, बल्कि मुक्ति की जरूरत है. इसके लिए सरकारें योजनाएं और नीतियां बनाएं और ईमानदारी से बनाएं, तो मैं समझता हूं कि यह संभव है कि किसान कर्जमुक्त हो जायेंगे. 
 
लोग कह रहे हैं कि पूंजीपतियों के दिवालिया होने पर उनके लोन को सरकार राइट ऑफ कर देती है, लेकिन किसानों के थोड़े से कर्जे माफ करने में उसकी हिम्मत डोल जाती है. यह बात सही है. लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि दोनों अलग-अलग प्रकार के कर्जे हैं और दोनों की प्रक्रिया और ब्याज अलग-अलग हैं. इन दोनों की तुलना नहीं करनी चाहिए. 
 
लेकिन, यह बात तो जरूरी कही जानी चाहिए कि एक तरफ पूंजीपति हजारों करोड़ रुपये लेकर विदेश भाग जा रहे हैं, और दूसरी तरफ महज कुछ हजार के कर्ज के चलते किसान आत्महत्या कर ले रहे हैं, तो क्या सरकार इतनी असंवेदनशील है कि उसे यह फर्क नजर नहीं आता? 
देश के नागरिकों को आत्महत्या से बचाना सरकार की जिम्मेदारी है, क्योंकि वे इस देश के नागरिक ही नहीं, बल्कि अन्नदाता भी हैं. इसलिए सरकार को अपनी जिम्मेदारी तो निभानी ही चाहिए. 

 

एक तरफ इंसान क्रेडिट और डेबिट के जाल में उलझा हुआ है, तो दूसरी तरफ आये दिन बैंक फ्रॉड की खबरें छायी रहती हैं. एक रिपोर्ट बताती है कि भारत का हर चौथा नागरिक बैंकिंग संबंधी धोखाधड़ी का शिकार है. ऐसे समय में जब देश डिजिटल होने की ओर बढ़ रहा है और कैशलेस अर्थव्यवस्था की बात की जा रही है, तो जरूरी हो जाता है कि ऑनलाइन बैंकिंग प्रणाली से जुड़ी धोखाधड़ी पर रोक लगाने के उपाय ढूंढ़े जायें और उपभोक्ताओं को जागरूक भी किया जाये. इन्हीं बहसों के मद्देनजर आज का विशेष...

ऑनलाइन ठगे जाने में भारतीय शीर्ष पर
 
18 प्रतिशत भारतीय ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी का शिकार हुए 2017 में, वित्तीय सेवा तकनीक प्रदाता कंपनी एफआईएस के अनुसार. इस प्रकार, बीते वर्ष ऑनलाइन ठगी का शिकार होनेवालों में भारतीय अव्वल रहे. भारत के 18 प्रतिशत की तुलना में जर्मनी में आठ और यूनाईटेड किंगडम में 6 प्रतिशत लोग ठगी का शिकार हुए. ऑनलाइन ठगी का शिकार होनेवालों में ज्यादातर भारतीयों की उम्र 27 से 37 वर्ष के बीच थी. इस आयु वर्ग के लगभग 25 प्रतिशत लोगों ने अपने साथ हुई धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज की.
 
25,800 डिजिटल ठगी के मामले सामने आये 2017 में, परिणामस्वरूप तकरीबन 1.8 बिलियन रुपये (180 करोड़) का नुकसान उठाना पड़ा उपभोक्ताओं को, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद के अनुसार.
 
टेक्नोलॉजी के बढ़ते उपयोग के कारण लोग अब बढ़चढ़ कर बैंकिंग मोबाइल या कंप्यूटर पर इंटरनेट के माध्यम से कर रहे हैं. ऑनलाइन बैंकिंग में ऑनलाइन सामानों और सेवाओं की खरीद-फरोख्त, ऑनलाइन गेमिंग आदि जैसे लेनदेन के व्यवहार भी शामिल हैं. 
 
ऑनलाइन सेवाएं बैंक, विभिन्न ऑनलाइन बाजार, यात्रा सेवाएं आदि प्रदान करने वाली कंपनियां बैंकिंग लेनदेन और खरीद-फरोख्त के लिए अपने वेबसाइट या मोबाइल एप के माध्यम से ग्राहकों को व्यवहार करने की सुविधा प्रदान करती हैं. इन वेबसाइट और मोबाइल एप को इस्तेमाल करते समय ग्राहक इन कंपनियों को अपने व्यक्तिगत प्रोफाइल डाटा तक पहुंचने की अनुमति देते रहते हैं. ये प्रोफाइल डाटा कंपनियों के विश्वास पर उनको दिया जाता है कि उनके पास यह सीमित और सुरक्षित प्रयोग के लिए जमा रहेगा. बैंक ग्राहकों द्वारा इंटरनेट बैंकिंग का जो डाटा जंगल तैयार किया जा रहा है, उस पर सबकी नजर टिकी हुई है. लेकिन, उस जंगल में बैंकिंग ग्राहक कितना सुरक्षित है, इस पर विचार करना बहुत ही जरूरी है. 
 
इंटरनेट या इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग के प्रकार
 
इंटरनेट, ऑनलाइन बैंकिंग या इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग दो तरीके से संपन्न किये जा सकते हैं. एक मामले में कार्ड आदि की जरूरत नहीं होती. इस प्रकार की ऑनलाइन बैंकिंग में लेनदेन आईडी अथवा कार्ड और पासवर्ड, ओटीपी, सीवीवी आदि के माध्यम से किया जाता है. इसे बैंकिंग भाषा में ‘कार्ड नॉट प्रजेंट’ कहते हैं.
 
दूसरे प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन में कार्ड का प्रयोग आवश्यक है, जैसे कि एटीएम से धन निकासी या बाजार में पीओएस के माध्यम से भुगतान. इन दोनों प्रकार की ऑनलाइन बैंकिंग में अलग-अलग तरह के सुरक्षा उपाय अपनाये जाते हैं. बैंक और ऑनलाइन व्यवसाय करनेवाली कंपनियां लेनदेन और खरीद-फरोख्त को सुरक्षित बनाये रखने के लिए नये-नये सुरक्षा उपाय लागू करती रहती हैं.
 
ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड और सुरक्षा उपाय
 
जिन मामलों में कार्ड की जरूरत नहीं पड़ती और बैंकिंग के लिए आईडी, पासवर्ड आदि की जरूरत होती है उन मामलों में फ्रॉड करनेवाले कार्ड विवरण आदि लुभावने प्रस्ताव देकर फोन, ईमेल आदि से प्राप्त कर लेते हैं या उन्हें लिंक भेजकर अपने मनचाहे वेबसाइट पर लेनदेन के लिए ले जाते हैं. ग्राहकों को ऐसे संदेश को खोले बिना तत्काल डिलीट करना चाहिए. अपनी सुरक्षा के लिए ग्राहक किसी भी हालत में अपने आईडी पासवर्ड को किसी को भी न दें, बैंक के किसी अधिकारी या कर्मचारी को भी नहीं. 
 
पासवर्ड और उंगलियों की छाप
 
आजकल पेमेंट बैंक और पेमेंट को सुगम बनाने के लिए कई कंपनियां काम कर रही हैं. पेमेंट सेवा देनेवाली कई कंपनियां अपने एप में घुसने के लिए उंगली की छाप के माध्यम से ग्राहक को पहचानने की सुविधा देते हैं. 
 
यह एक सुरक्षित उपाय है. लेकिन यह पासवर्ड आप के ऑनलाइन खाते में डकैती डालने का एक आसान रास्ता है. बैंक और पेमेंट सुविधा प्रदान करने वाली कंपनियां ग्रहकों को मोबाइल नोटिफिकेशन, एसएमएस आदि से लगातार पासवर्ड बदलने को आगाह करती रहती हैं, लेकिन यह पाया गया है कि बहुसंख्यक ग्राहक महीनों अपने पासवर्ड नहीं बदलते. ठग उनपर, बाजार और इंटरनेट पर लगातार नजर रखते हैं और ग्राहक के कीपैड पर उंगलियों की हरकत को भांप लेते हैं. 
 
रिजर्व बैंक द्वारा जारी सुरक्षा उपाय
 
ऑनलाइन बैंकिंग में हो रहे फ्रॉड को लेकर रिजर्व बैंक ने बैंक ग्राहकों के हितों की सुरक्षा के लिए वर्ष 2017 में 6 जुलाई को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया है. इसे कोई भी रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर जाकर पढ़ सकता है. 
 
अपने ऑनलाइन बैंकिंग लेनदेन को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से ग्राहक को अपने खाते में हुए किसी भी लेनदेन या पासवर्ड प्राप्त करने के लिए एसएमएस या ईमेल संदेश पाने के लिए मोबाइल फोन और यदि हो तो ई-मेल पता खाते में अनिवार्य रूप से दर्ज करवाना चाहिए. ग्राहक के खाते से यदि कोई अनाधिकृत लेनदेन हुआ है और गलती या लापरवाही बैंक की है, तो बैंक इस नुकसान की पूरी भरपाई करेगा. 
 
यदि कोई फ्रॉड बैंक या ग्राहक की गलती की वजह से न होकर सिस्टम में कहीं और से हुई गलती के कारण होता है और ग्राहक यदि उसकी सूचना तीन कार्य दिवस के अंदर बैंक को दे देता है, तो ग्राहक को कोई नुकसान नहीं होगा, उसके खाते से हुए ऐसे किसी भी लेनदेन की पूरी भरपाई बैंक करेगा. लेकिन यदि यही सूचना चार से सात कार्य दिवस में बैंक को दी जाती है, तो बैंक अलग-अलग मामलों में अधिकतम पांच हजार से पचीस हजार तक के नुकसान की भरपाई कर सकेगा. यदि सूचना देने में देरी सात दिनों से ज्यादा होती है, तो संबंधित बैंक के बोर्ड से अनुमोदित पॉलिसी के अनुसार नुकसान की भरपाई बैंक कर सकेगा. यदि फ्रॉड ग्राहक की गलती जैसे पासवर्ड आदि दूसरों को बताने के कारण हुआ है, तो उसकी गलती के कारण हुए नुकसान को ग्राहक को स्वयं उठाना पड़ेगा. लेकिन, यदि ग्राहक ने बैंक को तुरंत अपनी गलती की सूचना दे दी है और इस सूचना के बाद यदि कोई फ्रॉड होता है, तो उसकी भरपाई बैंक को करनी पड़ेगी. 
 
 बैंक स्तर पर सुरक्षा उपाय
 
ऑनलाइन बैंकिंग लेनदेन को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से लगभग सभी बैंकों ने अपने मोबाइल एप में एक विशेष प्रकार की सुविधा ग्राहकों को दे रखी है. ग्राहक जब चाहे तब अपना इंटरनेट बैंकिंग और डेबिट कार्ड को बंद या ब्लॉक कर सकता है और जब लेनदेन की जरूरत हो, तब इंटरनेट बैंकिंग या डेबिट कार्ड को अनब्लॉक कर खोल सकता है. 

यूपीआई एक सुरक्षित उपाय
 
भारत सरकार ने लेनदेन को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से भीम एेप जारी किया है. यह ऐप नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा रिसर्च कर तैयार किये गये यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस- यूपीआई पर काम करता है. अब सभी बैंक और पेमेंट कंपनी यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं. इस पेमेंट एेप को ग्राहक अपने मनचाहा नाम, मोबाइल नंबर आदि नाम से संचालित कर सकते हैं. इस तरह का लेन देन करते समय कभी भी उपभोक्ता का खाता नंबर सामने नहीं आयेगा.
 
जरूरी है जागरूकता
 
ग्राहक के हितों की सुरक्षा रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों और बैंक द्वारा प्रदान किये गये सुरक्षा उपायों के उपयोग से ही संभव है. यह कोई कठिन काम नहीं है यदि ग्राहक स्वयं के हितों के प्रति जागरूक है. ग्राहक स्वयं से ऑनलाइन बैंकिंग सीखे, जिससे कि उसे लेनदेन के लिए अपना आईडी पासवर्ड किसी को न देना पड़े.
 
कार्ड ठगी से लूटी गयी 65 करोड़ से अधिक की राशि
 
911 मामलों में धोखे से डेबिट व क्रेडिट का इस्तेमाल किया गया था 2017-18 के दौरान. इस तरह 65.26 करोड़ रुपये की ठगी की गयी थी धोखबाजों द्वारा.
 
348 मामलों के साथ कार्ड ठगी के सबसे ज्यादा शिकार आईसीआईसीआई बैंक के ग्राहक हुए 2017-18 में. इस दौरान 7 करोड़ रुपये का गबन किया गया ठगों द्वारा. वहीं, इसी अवधि में भारतीय स्टेट बैंक में कार्ड ठगी के 144 मामले सामने आये, जिसमें 10 करोड़ की राशि धोखेबाजों ने हथिया ली.
 
32 करोड़ की राशि चुरा ली गयी कार्ड ठगी के द्वारा सिटी यूनियन बैंक से 2017-18 के दौरान. इस प्रकार यह बैंक सबसे बड़ी कार्ड ठगी का शिकार हुआ.
 
फोनकॉल द्वारा धोखाधड़ी
 
अपराधी उपभोक्ताओं को फोनकॉल द्वारा भी ठग रहे हैं. आये दिन यह खबर आती रहती है कि उपभोक्ताओं को बैंक अधिकारी बनकर फोन किया जाता है, बैंकिंग संबंधी किसी स्थिति का हवाला देकर, डेबिट कार्ड का नंबर पूछा जाता है, पासवर्ड (वन टाइम पासवर्ड-ओटीपी भी), सीवीवी हासिल करने की कोशिश होती है, और खाते से पैसे चुरा लिये जाते हैं. इन जानकारियों के आधार पर कार्ड क्लोनिंग (नकल), स्किमिंग, स्फूमिंग और कार्ड बदलने सहित आदि आपराधिक कारनामों को अंजाम दिया जाता है. इस तरह ठगे गये लोगों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है. 
 
आरबीआई के नियमानुसार बैंक से जुड़ा कोई भी अधिकारी उपभोक्ता का एटीएम कार्ड नंबर, पिनकोर्ड या ऑनलाइन बैंकिंग आईडी व पासवर्ड नहीं पूछ सकता है. इसलिए, इस तरह का कॉल आने की स्थिति में उपभोक्ताओं को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए और बैंक व पुलिस से संपर्क करना चाहिए. इसके अलावा, समय-समय पर अपना एटीएम का पिनकोड भी बदलना चाहिए. लॉटरी या किसी किस्म के इनाम से जुड़े फोनकॉल से भी सतर्क रहना चाहिए और किसी भी तरह की जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए.
 
ऐसे होती है ऑनलाइन व मोबाइल बैंक ठगी

फिशिंग व फ्रॉडुलेंट ई-मेल
 
फिशिंग एक प्रकार की ऑनलाइन धोखाधड़ी है, जिसमें उपयोगकर्ता को विशिष्ट तरीके से डिजाइन किया गया ईमेल भेजा जाता है और फिर उसके माध्यम से निजी जानकारियां जैसे क्रेडिट कार्ड नंबर, पासवर्ड या खाता से संबंधित अन्य जानकारी चुरा ली जाती है.
 
मालवेयर व वायरस
 
ऑनलाइन धोखाधड़ी के इस तरीके में उपयोगकर्ता के कंप्यूटर में बिना उसकी जानकारी के अनचाहा सॉफ्टवेयर, जिसे मालवेयर कहा जाता है, इंस्टॉल कर दिया जाता है. ऐसा तब होता है जब उपयोगकर्ता किसी विशेष वेबसाइट पर जाता है या वीडियो या फाइल डाउनलोड करता है. इस मालवेयर के माध्यम से यूजर्स की निजी जानकारियां चुरा ली जाती हैं.
 
मोबाइल फ्रॉड
 
इसमें ठगी करनेवाले टैबलेट, स्मार्टफोन सहित दूसरे मोबाइल डिवाइस के माध्यम से यूजर्स की निजी व खाता संबंधी जानकारियों को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं. चूंकि आजकल मोबाइल डिवाइस से ऑनलाइन बैंकिग का चलन बढ़ता जा रहा है, ऐसे में ठगी करनेवालों को यूजर्स की बैंकिंग डिटेल अासानी से प्राप्त हो जाती है.
 
टेक्स्ट मैसेज फ्रॉड (स्मिशिंग)
 
इसके जरिये यूजर्स को बहकाने वाले टेक्स्ट मैसेज भेजे जाते हैं, ताकि वे धोखेबाजों की बातों में आकर अपनी वित्तीय व निजी जानकारी साझा कर डालें. ऐसे ज्यादातर मैसेज में लिखा होता है कि किन्हीं कारणों से आपका खाता बंद कर दिया गया है और उसे खोलने के लिए आपको किसी लिंक या नंबर पर संपर्क करने के लिए कहा जाता है. 
 
उस विशेष लिंक या नंबर पर संपर्क करने के बाद यूजर्स से बैंक खाते की डिटेल मांगी जाती है. डिटेल व पिन नंबर साझा करने के बाद यूजर्स ठगी का शिकार हो जाते हैं.
 
कस्टमर की जवाबदेही
 
अगर कस्टमर की लापरवाही की वजह से कोई फ्रॉड का मामला आता है, तो निश्चित उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. अगर आपके जाने-अनजाने में किसी ने पिन नंबर या पासवर्ड का गलत इस्तेमाल कर लिया है, तो आपके पास बचाव का विकल्प है. आरबीआई के नियमानुसार, खाते से गलत निकासी की सूचना सात कार्यदिवस के भीतर (तीन दिनों के बाद भीतर देने की कोशिश करें) बैंक को देते हैं, तो कस्टमर को कुल निकासी राशि पर सहूलियत दी जाती है. 
 
आरबीआई के अनुसार, ऐसी स्थिति में बैंक बचत बैंक जमाखाते पर 5000 रुपये, अन्य बचत खातों पर 10000 रुपये, प्री-पेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट, गिफ्ट कार्ड पर 10000 रुपये, करेंट अकाउंट्स/ कैश क्रेडिट/ ओवर ड्रॉफ्ट (365 दिनों की अवधि में घटित फ्रॉड) पर 10000 रुपये, क्रेडिट (पांच लाख की लिमिट के साथ) पर 10000 रुपये, अन्य करेंट/ कैश क्रेडिट/ ओवर ड्रॉफ्ट अकाउंट्स पर 25000 रुपये और क्रेडिट कार्ड (5 लाख से ऊपर लिमिट पर) पर 25000 रुपये की अधिकतम लायबिलिटी होती है. अगर रिपोर्ट की अवधि सात दिन से अधिक की है, तो कस्टमर लायबिलिटी का निर्धारण बैंक के बोर्ड द्वारा निर्धारित नीतियों के मुताबिक होगा.

धन वापसी की क्या है प्रक्रिया
 
कस्टमर के खाते से अवांछित इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन की रिपोर्ट करने के दस दिनों के भीतर बैंक को रिवर्स या क्रेडिट करना होता है. डेबिट कार्ड या बैंक अकाउंट फ्रॉड होने की स्थिति में बैंक को यह सुनिश्चित करना होता है कि कस्टमर को ब्याज का नुकसान न हो. अगर क्रेडिट कार्ड की वजह से ट्रांजेक्शन हुआ है, तो कस्टमर पर ब्याज का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जा सकता है. अगर धोखाधड़ी का मामला बैंक के संज्ञान है, तो उसकी शिकायत के 90 दिनों के भीतर हल करना होगा.
 
त्वरित सिस्टम की व्यवस्था
 
आईबीआई के सर्कुलर के मुताबिक, ग्राहक फ्रॉड की शिकायत दर्ज करा सकें, इसके लिए बैंकों को एसएमएस, ई-मेल, आईवीआर आदि की 24/7 कस्टमर सर्विस उपलब्ध करानी होगी. एसएमएस या ई-मेल अलर्ट के माध्यम से त्वरित प्रतिक्रिया या रिप्लाई की नयी व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी बैंकों को सौंपी गयी है. शिकायत दर्ज कराने के लिए ग्राहकों को वेब पेज या ई-मेल एड्रेस खोजने की जरूरत नहीं होगी.
क्रेडिट कार्ड फ्रॉड से बचने के लिए बरतें सावधानी
 
डिजिटल इकोनॉमी के भले ही बेशुमार फायदे हों, लेकिन जिस तेजी से डिजिटल ट्रांजेक्शन से जुड़े फ्रॉड बढ़ रहे हैं, ऐसे में ज्यादा अलर्ट होने की जरूरत है. ज्यादातर भुगतान अब क्रेडिट कार्ड से होने लगे हैं, ऐसे में अगर हम सावधानी बरतें, तो फ्रॉड से बच सकते हैं.
 
सीवीवी न करें साझा : ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के लिए कार्ड वेरिफिकेशन वैल्यू (सीवीवी) नंबर की जरूरत होती है, जो कार्ड के पिछले हिस्से पर प्रिंट होती है. इसे किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए. बिना सीवीवी नंबर के पेमेंट की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है. अगर आप किसी अनजाने व्यक्ति के साथ इसे साझा कर रहे हैं, तो आप उसे कार्ड के गलत इस्तेमाल का आमंत्रण दे रहे हैं.
 
दोनों ओर की फोटोकॉपी न साझा करें : क्रेडिट कार्ड के दोनों तरफ की फोटोकॉपी कभी साझा न करें. कार्ड पर छपे सीवीवी की मदद से ऑनलाइन ट्रांजेक्शन पूरा होता है. अगर किसी के पास पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है, तो वह गलत इस्तेमाल कर सकता है.
 
सुरक्षित और विश्वसनीय वेबसाइट का ही करें इस्तेमाल : अपने क्रेडिट कार्ड की डिटेल किसी अनजान व संदिग्ध वेबसाइट पर साझा न करें. ऑनलाइन शॉपिंग करते समय विशेष सावधानी बरतें. आपके खाते की डिटेल मांग रहे किसी भी ई-मेल के लिंक पर क्लिक न करें. प्रतिष्ठित कंपनियां आपको सीधे वेबसाइट पर जाने की सलाह देती हैं.
 
कार्ड चोरी पर तुरंत दर्ज करायें शिकायत : अगर आप कार्ड चोरी या गुम हो गया है, तो इसकी तुरंत जानकारी अपने बैंक को दें. आप सीधे 24/7 कस्टमर केयर नंबर पर अपनी शिकायत कर कार्ड को डिएक्टिवेट करा सकते हैं.

नयी दिल्ली : सरकार के सिनेमा टिकट के दामों में कटौती के फैसले से अब फिल्म देखा सस्ता होगा और फिल्म उद्योग को बढ़ावा मिलने में मदद मिलेगी. मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एमएआई) ने शनिवार को यह बात कही. 

 वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता वाली जीएसटी परिषद ने शनिवार को 100 रुपये से ऊपर की सिनेमा की टिकट पर जीएसटी कर की दर को 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत और 100 रुपये से कम की टिकट पर कर को 18 से घटाकर 12 प्रतिशत करने का निर्णय किया है. मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष दीपक अशर ने बताया, इस कदम से सिनेमा देखना सस्ता होगा. उन्होंने कहा कि टिकटों के दाम कम होने से ज्यादा से ज्यादा लोग सिनेमा की ओर आकर्षित होंगे.इससे सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि हमें खुशी है कि सरकार ने 100 रुपये से ऊपर की टिकटों पर जीएसटी को घटाकर 18 प्रतिशत किया है.

बॉलीवुड के गंभीर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह इन दिनों खबरों में बने हुए हैं. वजह है हिंदू-मुस्लिम और मॉब लिंचिंग मामले पर पिछले दिनों दिया उनका बयान. धीरे-धीरे यह बयान तूल पकड़ता जा रहा है.

 शुक्रवार को राजस्थान में नसीरुद्दीन का विरोध हुआ और कार्यक्रम रद्द हो गया. देश में कहीं नसीर के बयान पर विरोध के सुर उभर रहे हैं, तो वहीं उनके समर्थन में भी कुछ आवाजें उठ रही हैं. यह बात दीगर है कि नसीर के बयान की आलोचना करनेवालों की संख्या ज्यादा है. इन्हीं में एक नाम बॉलीवुड एक्टर अनुपम खेर का है, जो नसीरुद्दीन शाह के बयान पर भड़क गये हैं. उन्होंने तंज भरे अंदाज में यह सवाल भी किया कि आखिर और कितनी आजादी चाहिए?

अनुपम खेर ने कहा, देश में इतनी आजादी है कि सेना को गालियां दी जा सकती हैं, एयर चीफ की बुराई की जा सकती है और सैनिकों पर पथराव किया जा सकता है. आपको इस देश में और कितनी आजादी चाहिए? उन्हें (नसीरुद्दीन शाह) जो कहना था वह कह दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जो कहा वह सच है.

यहां यह जानना गौरतलब है कि बॉलीवुड के सीनियर एक्टर्स में से एक नसीरुद्दीन शाह ने हाल में एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि देश में जैसा माहौल चल रहा है उसे देखकर उन्हें डर लगता है कि कल को उनके बच्चों को किसी गली में घेर कर न पूछ लिया जाये कि तुम हिंदू हो या मुस्लिम.

हिंदू-मुस्लिम मामले पर बोलते हुए नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि यह एक जहर की तरह है, जो तेजी से फैल रहा है और इसे काबू में कर पाना मुश्किल दिख रहा है.

चेन्नई : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 लोकसभा चुनाव के लिए बनाए गए महागठबंधन पर रविवार को करारा प्रहार किया है. उन्होंने महागठबंधन पर हमला करते हुए इसे विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का ‘‘निजी अस्तित्व'' बचाने के लिए किया गया ‘‘नापाक गठबंधन'' करार दिया. मोदी ने तमिलनाडु में चेन्नई मध्य, चेन्नई उत्तर, मदुरई, तिरुचिरापल्ली और तिरूवल्लुर निर्वाचन क्षेत्रों के भाजपा के बूथ कार्यकर्ताओं से वीडियो संबोधन के जरिए कहा कि लोग ‘‘धनाढ्य वंशों के एक बेतुके गठबंधन'' को देखेंगे.

प्रधानमंत्री ने कहा कि महागठबंधन के प्रमुख घटक तेलुगू देशम पार्टी का गठन कांग्रेस की ज्यादती के खिलाफ दिवंगत मुख्यमंत्री एनटी रामाराव ने किया था लेकिन अब पार्टी कांग्रेस से हाथ मिलाने का इच्छुक है। मोदी ने कहा कि महागठबंधन में कुछ पार्टियों ने समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया से प्रेरित होने का दावा किया है लेकिन वे (लोहिया ने) स्वयं कांग्रेस की विचाराधारा के खिलाफ थे.

उन्होंने कहा, ‘‘आज कई लोग महागठबंधन की बात कर रहे हैं. गठबंधन निजी अस्तित्व को बचाने के लिए है और विचारधारा-आधारित समर्थन नहीं है. गठबंधन सत्ता के लिए है, जनता के लिए नहीं. यह गठबंधन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए है, लोगों की आकांक्षाओं के लिए नहीं.''


मोदी ने कहा कि गठबंधन के कई दलों और नेताओं का कहना है कि वह लोहिया से प्रेरित हैं ‘‘जो स्वयं कांग्रेस विरोधी थे.'' मोदी ने किसी का प्रत्यक्ष तौर पर जिक्र किए बिना कहा कि गठबंधन के कई नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार तथा प्रताड़ित किया गया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के ‘‘पारिस्थितिकी तंत्र'' से किसी को नहीं बख्शा. उन्होंने दिवंगत मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन की अन्नाद्रमुक सरकार की 1980 में की गई बर्खास्तगी का भी हवाला दिया, जबकि रामचंद्रन को लोगों का समर्थन प्राप्त था.

महागठबंधन 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा बनाया गया गठबंधन हैं.

रांची : पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में तीन राज्य में शानदार प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस पार्टी का झंडा झारखंड में भी लहरा रहा है. राहुल के नेतृत्व में 2019 के आम चुनावों से पहले तीन राज्यों से शुरू हुआ ‘विजय रथ’ झारखंड में भी आगे बढ़ा. कोलेबिरा उपचुनाव में कांग्रेस के नमन विक्सल कोंगारी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार बसंत सोरेंग को 9658 मतों से हरा दिया. एनोस एक्का की पत्नी मेनोन एक्का, जिन्हें जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, चौथे स्थान पर खिसक गयीं. 20 राउंड की मतगणना में कभी भी वह रेस में नहीं रहीं. वहीं, कोंगारी ने पहले राउंड से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के बसंत सोरेंग पर बढ़त बनाये रखी, जो अंत तक कायम रही.

शिबू सोरेन से दगाबाजी

लोकसभा चुनाव 2019 में महागठबंधन की तैयारी कर रही कांग्रेस को उस वक्त तगड़ा झटका लगा था, जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सुप्रीमो शिबू सोरेन ने एनोस की पत्नी मेनोन को समर्थन का एलान कर दिया. कांग्रेस से विचार-विमर्श के बगैर मेनोन को झामुमो का समर्थन और गुरुजी का आशीर्वाद दोनों मिल गया. कोलेबिरा उपचुनाव में जब कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी, तो यह अटकलें लगने लगीं कि झारखंड में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनने से पहले ही बिगड़ गया. लेकिन, सच्चाई कुछ और ही थी.

 
 

तहखाने की रिपोर्ट बताती है कि झामुमो और शिबू सोरेन ने एनोस एक्का को सबक सिखाने के लिए उनकी पत्नी को समर्थन देने की चाल चली थी. दरअसल, वर्ष 2009 में गुरुजी के मंत्रिमंडल में रहते हुए एनोस एक्का ने उनकी पीठ में छुरा घोंपा था. अपने ही मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के खिलाफ तमाड़ में एनोस एक्का ने गोपाल दास पातर उर्फ राजा पीटर को उतार दिया था. शिबू सोरेन इस उपचुनाव में हार गये थे. उन्हें इस्तीफा तो देना ही पड़ा था, काफी किरकिरी भी झेलनी पड़ी थी.

इसका बदला झामुमो ने एनोस एक्का से ले लिया है. मेनोन को गुरुजी ने आशीर्वाद के साथ समर्थन तो दे दिया, लेकिन पार्टी का कोई बड़ा नेता वहां प्रचार करने नहीं गया. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अंतिम क्षण में प्रचार की औपचारिकता पूरी करने भर के लिए कोलेबिरा गये. दूसरी तरफ, पार्टी के नेता पौलुस सुरीन दूसरी पार्टी के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करते रहे, लेकिन हेमंत या गुरुजी ने उन्हें कभी रोका नहीं.

एक्का का जेल में होना

वर्ष 2005 से कोलेबिरा विधानसभा का प्रतिनिधित्व करने वाले एनोस एक्का का जेल में होना उनकी पार्टी की हार की एक वजह रही. पारा शिक्षक की हत्या के मामले में एनोस एक्का के जेल जाने के बाद उनकी सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई थी. एनोस की पत्नी मेनोन एक्का पहली बार चुनाव लड़ रही थीं. रणनीति बनाने में वह भाजपा और कांग्रेस से कमजोर साबित हुईं और चुनाव हार गयीं.

एनोस और मेनोन एक्का का भ्रष्टाचार

लगातार तीन बार कोलेबिरा से चुनाव जीत चुके एनोस एक्का पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. उनके साथ उनकी पत्नी मेनोन एक्का भी उन्हीं आरोपों में घिरी हुई हैं. कई जगहों पर उनकी संपत्ति को प्रवर्तन निदेशालय ने अटैच कर दिया है. लोगों में इसका भी गलत संदेश गया और झारखंड पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.

कांग्रेस की ठोस रणनीति

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के समर्थन के बावजूद मेनोन एक्का हार गयीं, तो इसकी सबसे बड़ी वजह कांग्रेस की ठोस रणनीति रही. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ अजय कुमार के नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए महागठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं की फौज कोलेबिरा में उतार दी.

दूसरी तरफ, भाजपा की सहयोगी पार्टी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) ने भाजपा से दूरी बनाये रखी. इस तरह कोलेबिरा में भाजपा पूरी तरह अलग-थलग पड़ गयी और उसके प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा.

रायपुर-अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पुनिया के छत्तीसगढ़ प्रवास के कार्यक्रम में आंशिक परिवर्तन किया गया है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पुनिया और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के छत्तीसगढ़ के प्रभारी सचिव डॉ चंदन यादव अब 24 दिसंबर सोमवार को शाम 7 बजे दिल्ली से रायपुर पहुंचेंगे. पीएल पुनिया 26 दिसंबर बुधवार को दोपहर 2.50 बजे रायपुर से दिल्ली के लिये रवाना होंगे.

रायपुर। दिल्ली से मंत्रियों के नाम तय होने के बाद प्रदेश में मंत्रिमंडल गठन की तैयारी तेज हो गई है. 25 दिसंबर को प्रातः 11 बजे नया मंत्री मंडल शपथ लेगा. इसे लेकर राजभवन द्वारा तैयारियां शुरु कर दी गई है. इसी दिन राज्यपाल मध्यप्रदेश में भी मंत्रियों को शपथ दिलाएंगी.इससे पहले 17 दिसंबर को सीएम भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. उनके साथ ही भूपेश के छोटे कैबिनेट ने भी शपथ ली थी. जिसमें टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू को मंत्रीपद की शपथ दिलाई गई थी.

आपको बता दें कि संभावित मंत्रियों की सूची लेकर सीएम भूपेश बघेल, मंत्री टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लंबी चर्चा हुई थी. इस चर्चा में वरिष्ठ और अनुभवी नामों पर सहमति बनी जिसके बाद कल देर रात सीएम भूपेश बघेल अपने साथियों के साथ दिल्ली से वापस रायपुर लौटे थे.

रायपुर. किसानों की ऋण माफी को लेकर भूपेश बघेल के मंत्रिमंडल के प्रस्ताव पारित करने के साथ ही प्रक्रिया शुरू हो गई है. शासन ने धान खरीदी के दौरान ऋण माफी योजना के पात्र किसानों से अल्पकालीन कृषि ऋण की लिकिंग के जरिए वसूली पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दिया है.

सहकारिता विभाग की सचिव रीता शांडिल्य की ओर से शनिवार को सहकारी संस्थाएं पंजीयक और छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी बैंक के प्रबंध संचालक को जारी किए गए पत्र में राज्य शासन की ओर से राज्य ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंक व प्राथमिक कृषि साख समितियों की ओर से वितरित और 30 नवंबर 2018 तक बकाया अल्पकालीन कृषि ऋण माफ करने के निर्णय की जानकारी देते हुए अल्पकालीन ऋण वसूली नहीं करने निर्देशित किया है.

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