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खास खबर (1096)

1984 के आम चुनाव में राज्य के 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव ही नहीं हो पाए। इसके बाद राजीव गांधी की पहल थी कि कैसे शांति प्रक्रिया की जाए। 1985 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार और केंद्र के नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है।

असम समेत भारत के पूर्वोत्तर के कुछ सीमावर्ती इलाके में बांग्लादेशियों और मूल स्थानीय निवासियों की पहचान एक मुश्किल काम है। इन इलाकों में सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों का रहन-सहन भाषा और खानपान एक जैसा ही है। यही वजह है कि यहां बाहरी बनाम स्थानीय नागरिकता का सवाल दशकों से सुलगता रहा है। यूं तो इसकी जड़ें आजादी के साथ ही जुड़ी हैं लेकिन सत्तर के दशक में मामले ने काफी हिंसक रूप अख्तियार कर लिया। इस आंदोलन के कई पक्ष थे। एक तरफ स्थानीय लोगों की भाषा, संस्कृति रोजगार, मानवाधिकार जैसे मसले थे तो दूसरी तरफ क्षेत्रीयता और देशी-विदेशी से बढ़कर सांप्रदायिक संघर्ष का खतरा था। सबसे बड़ा खतरा भारतीय नागरिकों के हितों की सुरक्षा का सवाल भी था। आखिरकार भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार और स्थानीय आंदोलनकारियों के बीच 1985 में एक मसले के हल के लिए समझौता हुआ और ये था असम समझौता। यही असम समझौता इन दिनों चर्चा में है जिसकी वजह है नेशनल रजिस्टर्स ऑफ सीटिजन्स यानी एनआरसी। आज बात करेंगे असम समझौते की, जानेंगे क्या था ये समझौता, किन परिस्थितियों में हुआ था ये समझौता।

असम ने दशकों तक अवैध घुसपैठियों के दंश को झेला है और अभी कई इलाकें इस दंश को झेल रहे हैं। शुरूआत में इसे क्षेत्रीय समस्य़ा के तौर पर देखा जा रहा था। जो पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के राज्य तक सिमटी थी। लेकिन अवैध बांग्लादेशियों का मसला देखते-देखते एक राष्ट्रीय विषय बन गया।
 
सबसे पहले जानते हैं असम में अवैध प्रवासियों का मसला क्या है। इसके लिए हमें सत्तर के दशक में हुए आंदोलन और उसके बाद उपजे राजनीतिक माहौल को समझना होगा।
 
महाभारत काल में भी असम का ज़िक्र मिलता है। तब इसका नाम ‘प्रागज्योतिषपुर’ हुआ करता था जो कामरूप की राजधानी थी। सन 1228 में बर्मा के एक राजा चाउ लुंग सिउ का फा, जो कि चीनी मूल का था, ने इस पर अपना अधिकार कर लिया। वह ‘अहोम’ वंश का था। इसी वजह से राज्य का नाम असम हो गया। असमिया भाषा में असम को असोम बोला जाता है जो अहोम का अपभ्रंश मतलब घिस-घिसकर बना शब्द है।
 
असम पर तब तक अहोम वंश का ही राज चलता रहा जब तक अंग्रेजों की नज़र इस पर नहीं पड़ी थी। 1826 में अंग्रेजों ने असम जीत लिया और यहीं से वो बीज डला जो अब NRC की वजह बना है। 1874 में संयुक्त असम, जिसमें आज के नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल भी शामिल थे, पर अंग्रेज़ चीफ कमिश्नर का राज शुरू हो गया।
 
असम के एक तरफ पूर्वी बंगाल (फिलहाल बांग्लादेश) था और दूसरी तरफ था पश्चिम बंगाल (1905 में हुए बंटवारे तक बंगाल एक ही था) और असम से थोड़ी दूर चलने पर था बिहार। पचास के दशक से ही गैरकानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था। औपनिवेशिक काल में बिहार और बंगाल में बड़ी तादाद में चाय बगान में काम करने के लिए लोग आने लगे। अंग्रेजों ने उन्हें यहां खाली पड़ी जमीन पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद विभाजन के बाद नए बने पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के साथ ही असम में भी बड़ी संख्या में बंगाली लोग आए। तब से ही वहां रह-रह कर बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे पर चिंगारी सुलगती रही। लेकिन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान और वर्तमान के बांग्लादेश में मुसलमान बंगालियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की हिंसक कार्रवाई शुरू हुई तो वहां के करीब 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली। बांग्लादेश बनने के बाद इनमें से ज्यादातर लोग लौट गए लेकिन तकरीबन एक लाख लोग वहीं रह गए। 1971 के बाद भी कई बांग्लादेशी असम आते रहे। जल्द ही स्थानीय लोगों को ये लगने लगा कि बाहर से आए लोग उनके संसाधनों पर कब्जा कर लेंगे और इस तरह जनसंख्या में हो रहे बदलावों ने असम के मूल वासियों में भाषाई, संस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी। इस भय ने 1978 के आसपास एक शक्तिशाली आंदोलन को जन्म दिया। जिसका नेतृ्तव वहां की युवाओं ने किया। इसी बीच आल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू और आल असम गण संग्राम परिषद ने मांग की कि विधानसभा चुनाव कराने से पहले विदेशी घुसपैठियों की समस्या का हल निकाला जाए। बांग्लादेशियों को वापस भेजने के अलावा आंदोलनकारियों ने मांग रखी कि 1961 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को वापस अपने राज्य भेजा जाए या कही और बसाया जाए। आंदोलन उग्र होता गया और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पैदा हो गया।

1979 के लोकसभा उपचुनाव में मंगलदोई सीट पर वोटरों की संख्या में अत्यधिक इजाफा हुआ। जब पता किया गया तो जानकारी मिली कि ऐसा बांग्लादेशी अवैध शरणार्थियों की वजह से हुआ है। 1977 के आम चुनाव के बाद दो साल में अतिरिक्त 77 हजार वोटर निकले। जिसके बाद इसके खिलाफ आब्जेक्शन फाइल हुआ। बाद में उनमें से 37 हजार विदेशी निकले। जिसके बाद ये आंदोलन चला। 1983 के विधानसभा चुनाव का राज्य की बड़ी आबादी ने बहिष्कार किया। इस बीच राज्य में आदिवासी, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। भारत में पहली बार असम में हिंसा देखने को मिला। जब 15 फ़रवरी, 1983 को असम के नौगांव जिले में स्थित एक पुलिस स्टेशन के अफ़सर ने एक संदेश भेजा। इसमें लिखा था, ‘ख़बर है कि पिछली रात नेली गांव के इर्द-गिर्द बसे गांवों से तकरीबन 1000 असमिया लोग ढोल बजाते हुए नेली गांव के नजदीक इकट्ठा हो गए हैं। उनके पास धारदार हथियार हैं। नेली गांव के अल्पसंख्यक भयभीत हैं, किसी भी क्षण उन पर हमला हो सकता है। शांति स्थापित करने के लिए तुरंत कार्रवाई का निवेदन किया जाता है।’ तीन दिन बाद यानी 18 फ़रवरी की अलसुबह दंगाइयों का घेरा और तंग हो गया। अब जब नेली और आसपास के 11 गांवों में फंसे हुए लोगों के बच निकलने की जगह न बची, तो पहले आग लगाई और फिर बड़े इत्मीनान से तकरीबन 1800 लोग- बूढ़े, जवान, औरतें और बच्चे- क़त्ल कर डाले गए। ग़ैर सरकारी आंकड़ा क़रीब 3000 मौतों का है। इस घटना को नेला कांड के नाम से जाना जाता है।
 
1984 के आम चुनाव में राज्य के 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव ही नहीं हो पाए। इसके बाद राजीव गांधी की पहल थी कि कैसे शांति प्रक्रिया की जाए। 1985 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार और केंद्र के नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है।
 
क्या है असम समझौता?
- असम में घुसपैठियों के ख़िलाफ़ वर्ष 1979 से चले लंबे आंदोलन और 1983 की भीषण हिंसा के बाद समझौते के लिये बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई।
- इसके परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते (Assam Accord) के नाम से जाना जाता है।
- आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और कुछ अन्य संगठनों तथा भारत सरकार के बीच हुआ यह समझौता ही असम समझौता कहलाता है।
- असम समझौते के मुताबिक 25 मार्च, 1971 के बाद असम में आए सभी बांग्लादेशी नागरिकों को यहाँ से जाना होगा, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान।
- इस समझौते के तहत 1951 से 1961 के बीच असम आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और मतदान का अधिकार देने का फैसला लिया गया।
- इस समझौते के तहत 1961 से 1971 के बीच असम आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिये गए, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया।
- इस समझौते का पैरा 5.8 कहता है कि 25 मार्च, 1971 या उसके बाद असम में आने वाले विदेशियों को कानून के अनुसार निष्कासित किया जाएगा। ऐसे विदेशियों को बाहर निकालने के लिये तात्कालिक एवं व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे।
- इस समझौते के तहत विधानसभा भंग करके 1985 में चुनाव कराए गए, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला और AASU के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत असम के मुख्यमंत्री बने।
- इस समझौते में असम के आर्थिक विकास के लिये पैकेज भी दिया गया तथा असमिया भाषी लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान सुरक्षित रखने के लिये विशेष कानूनी और प्रशासनिक उपाय किये गए।
 
इसके साथ ही असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में भी संशोधन किया गया।

असम समझौते की धारा-6
असम समझौते की धारा-6 में असमियों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान और धरोहर के संरक्षण और उसे बढावा देने के लिये उचित संवैधानिक, विधायी तथा प्रशासनिक उपाय करने का प्रावधान है। समिति इन प्रावधानों को लागू करने के लिये 1985 से अब तक उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगी।
 
असम अकॉर्ड के अलावा असम आंदोलन के लोगों की एक और मांग थी कि असम के मुख्यमंत्री इस्तीफा दें और नए सिरे से चुनाव हों क्योंकि असम के लोगों ने तो चुनाव में हिस्सा ही नहीं लिया था। राजीव सरकार ने सीएम के इस्तीफे वाली बात भी मान ली और सीएम हितेश्वर सैकिया का इस्तीफा हो गया। राज्य में नए सिरे से चुनाव हुए और कांग्रेस का सामना इस चुनाव में एक नई पार्टी से हुआ। 13-14 अक्टूबर, 1985 को गोलघाट में आसू और असम गण संग्राम परिषद ने मिलकर एक राजनीतिक पार्टी बनाई और नाम रखा- असम गण परिषद। चुनाव हुए तो 126 में से 92 निर्दलीय और कांग्रेस के 25 उम्मीदवार चुनाव जीते। ये निर्दलीय असम गण परिषद के समर्थन से जीते थे। असम के नए मुख्यमंत्री बने आसू के प्रेसीडेंट रहे प्रफुल्ल कुमार महंता। ये अपने आप में एक रिकॉर्ड था, क्योंकि महंता 32 साल की उम्र में देश के सबसे युवा सीएम बने। लेकिन महंतो भी प्रदेश की जनता की मांग पर खरे नहीं उतर पाए और सरकार ने जो वादा किया वो निभाया नहीं क्योंकि बांग्लादेशी लोगों को वापस भेजने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नतीजतन एक बार फिर कांग्रेस की सरकार आई और ये मामला वैसा का वैसा ही रहा। लेकिन फिर सर्बानंद ने असम में विदेशियों के मामले को पूरे जोर-शोर से उठाना शुरू किया। वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लेकर गए और IMDT एक्ट को चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 2005 में दिए अपने फैसले में इस एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया। असम में विदेशियों के मामले पर फिर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 1951 में शुरू हुआ काम पूरा हो– माने एक रजिस्टर बने जिसमें असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की पहचान दर्ज हो। जिसका नाम न हो, वो विदेशी माना जाए. यही NRC है। सर्बानंद सोनोवाल, वो 2011 में असम गण परिषद को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए और वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री हैं।
 
- अभिनय आकाश

नई दिल्ली ,विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बुधवार (15 जनवरी) को कहा कि भारत और चीन को एक दूसरे को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर ''संतुलन और आपसी ''समझ बनानी होगी। उन्होंने कहा कि इस तरह के दृष्टिकोण को अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

जयशंकर ने 'रायसीना डायलॉग' में अपने संबोधन में कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे के साथ मिलना होगा लेकिन चुनौती यह है कि यह कैसे काम करेगा। उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि यह आज बहुत महत्वपूर्ण है। मेरे मन में, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि दोनों देश संतुलन कायम करें और एक दूसरे को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर आपसी समझ बनायें। मेरे लिए यह बहुत जरूरी है, न कि विकल्प।"

उन्होंने कहा कि भारत-चीन संबंध की एक बहुत ही अनोखी विशेषता है कि इतिहास में बहुत कम ही ऐसी दो शक्तियां हैं, जो पड़ोसी हैं। उन्होंने कहा कि भारत और चीन दोनों को साथ-साथ रहना होगा क्योंकि कोई विकल्प नहीं है।

इस बीच, जयशंकर ने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और बांग्लादेश के सूचना मंत्री हसन महमूद समेत कई विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के साथ द्विपक्षीय बैठकें की। लावरोव के साथ अपनी बैठक में जयशंकर ने ईरान, सीरिया और लीबिया में स्थिति से संबंधित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की।

विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि जयशंकर ने रूस की मेजबानी में होने वाली आरआईसी की अगली बैठक में भाग लेने संबंधी लावरोव के आमंत्रण को स्वीकार किया। जयशंकर ने महमूद से भी मुलाकात की और भारत तथा बांग्लादेश के बीच संपर्क बढ़ाये जाने पर चर्चा की।

विदेश मंत्री ने एक ट्वीट में कहा, ''बांग्लादेश के सूचना मंत्री डॉ हसन महमूद से मिलकर प्रसन्नता हुई। यह जान कर अच्छा लगा कि मीडिया पर हमारी पहल को आगे बढ़ाया जा रहा है। कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाने पर सार्थक चर्चा हुई।"

जयशंकर ने एस्टोनिया के विदेश मंत्री उरमास रिंसलू से भी मुलाकात की और डिजिटल सहयोग तथा वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ''एस्टोनिया के विदेश मंत्री उरमास रिंसलू का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। डिजिटल सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर बहुत ही सार्थक वार्ता हुई। हम साथ काम करने के लिए तत्पर हैं।"

उन्होंने अमेरिका के एक प्रतिनिधिमंडल से भी मुलाकात की और सहयोग बढ़ाने के अवसरों के बारे में बात की। जयशंकर ने अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मोहिब से भी मुलाकात की और मौजूदा स्थिति तथा द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ''अफगानिस्तान के एनएसए मोहिब से मुलाकात हुई। मौजूदा स्थिति और हमारे द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा हुई।" जयशंकर ने मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद से भी मुलाकात की।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन अपराधों के लिये अपराधियों को दंडित नहीं करने और उन्हें पाक साफ बताने का मुख्य कारण पुलिस और प्रशासन द्वारा इन मामलों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेना और इनमे संलिपत व्यक्तियों को सजा दिलाने की मंशा से कार्यवाही नहीं करना था।

नयी दिल्ली। वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों की जांच करने वाले विशेष जांच दल की रिपोर्ट में पुलिस, प्रशासन और यहां तक न्यायपालिका की भूमिका की पर भी उंगली उठाते हुये कहा गया है कि अपराधियों को सजा देने की कोई मंशा नहीं थी और न्यायाधीशों ने ‘सामान्य तरीके से’ आरोपियों को बरी किया।सिख विरोधी दंगों से संबंधित 186 बंद किये गये मामलों की फिर से जांच की निगरानी के लिये शीर्ष अदालत ने इस विशेष जांच दल का गठन किया था।  दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस एन ढींगरा की अध्यक्षता वाले इस जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ऐसा लगता है कि पुलिस और प्रशासन का ‘सारा प्रयास’ दंगों से संबंधित आपराधिक मामलों को दबाने का था। रिपोर्ट के अनुसार चुनिन्दा व्यक्तियों को पाक साफ करार देने के लिये मामले दर्ज किये गये थे। शीर्ष अदालत ने 11 जनवरी, 2018 को विशेष जांच दल का गठन करके उसे 186 मामलों की जांच की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इन मामलों को पहले बंद करने के लिये रिपोर्ट दाखिल की गयी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन अपराधों के लिये अपराधियों को दंडित नहीं करने और उन्हें पाक साफ बताने का मुख्य कारण पुलिस और प्रशासन द्वारा इन मामलों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेना और इनमे संलिपत व्यक्तियों को सजा दिलाने की मंशा से कार्यवाही नहीं करना था।

रिपोर्ट में इन मामलों के प्रति निचली अदालतों के रवैये की भी आलोचना की गयी है और कहा गया है कि अदालतों द्वारा अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग स्थानों पर दंगा, हत्या, आगजनी और लूटपाट जैसे अनेक मामलों के मुकदमों की गयी कार्यवाही समझ से परे है।  विशेष जांच दल ने इनमें से कुछ मामलों में आरोपियों को बरी करने के निचली अदालतों के आदेशों के खिलाफ विलंब के लिये क्षमा याचना के आवेदन के साथ अपील दायर करने की संभावना तलाशने की सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार 1984 के दंगों के आरोपियों को न्यायाधीशों द्वारा सामान्य तरीके से बरी किया गया। रिकार्ड पर उपलब्ध किसी भी फैसले से यह पता नहीं चलता कि न्यायाधीश 1984 के दंगों की स्थिति और इन तथ्यों के प्रति सजग थे कि प्राथमिकी दर्ज करने और गवाहों के बयान दर्ज करने में विलंब के लिये पीड़ित जिम्मेदार नहीं थे।रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मुकदमों की लंबी सुनवाई की वजह से पीड़ित और गवाह बार बार अदालत के चक्कर लगाते हुये थक गये थे और ज्यादातर ने उम्मीद छोड़ दी थी लेकिन जिन लोगों ने हिम्मत नहीं हारी, अदालत ने प्राथमिकी दर्ज कराने और साक्ष्य दर्ज करने सहित उनकी गवाही को भरोसेमंद मानने से इंकार कर दिया। रिपोर्ट कहती है कि फाइलों की छानबीन से कल्याणपुरी थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी इंसपेक्टर सूरवीर सिंह त्यागी की दंगाइयों के साथ साजिश में संलिप्त होने के सबूत मिलते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘इस मामले में इंसपेक्टर सूरवीर सिंह त्यागी ने जानबूझ कर स्थानीय सिखों के लाइसेंस वाले हथियार ले लिये ताकि दंगाई उन्हें अपना निशाना बना सकें और जान माल को नुकसान पहुंचा सकें। उन्हें निलंबित किया गया था लेकिन बाद में बहाल करके सहायक पुलिस आयुक्त के पद पर पदोन्नति भी दी गयी। समिति का मत है कि उनका मामला कार्रवाई के लिये दिल्ली पुलिस के दंगा प्रकोष्ठ को सौंपा जाये।’’रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइलों के अवलोकन से पता चला कि पुलिस ने घटना वार या अपराध के क्रम के अनुसार प्राथमिकी दर्ज करने के बजाय अनेक शिकायतों को एक ही प्राथमिकी में शामिल कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेट ने भी पुलिस को घटना के अलग-अलग चालान दाखिल करने के निर्देश नहीं दिये।’’ रिपोर्ट में कहा गया है कि घटनाओं के अनुसार अलग-अलग मुकदमों की सुनवाई के बारे में भी निचली अदालत के न्यायाधीशों ने कोई आदेश नहीं दिया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगा पीड़ितों के सैकड़ों शव बरामद किये गये थे और इनमें से अधिकांश की पहचान नहीं हो सकी लेकिन पुलिस ने फारेंसिक साक्ष्य भी संरक्षित नहीं की ताकि बाद में उनकी पहचान की जा सके।

रिपोर्ट कहती है, ‘‘ऐसा लगता है कि पुलिस और प्रशासन का सारा प्रयास दंगों से संबंधित आपराधिक मामलों को दबाने का था। रिपोर्ट में कहा गया है कि विशेष जांच दल को 186 मामले सौंपे गये थे, जिन्हें फरवरी, 2015 में केन्द्र द्वारा गठित एक अन्य विशेष जांच दल देख चुका था और उसने इनमें से 199 मामलों के बारे में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। इन 199 मामलों में 426 व्यक्ति मारे गये थे और इनमें से 84 व्यक्तियों की पहचान नहीं हो सकी थी। दो सौ से अधिक व्यक्ति जख्मी हुये थे। इन दंगों में रिहाइशी मकानों, दुकानों, वाहनों, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, पूजा स्थलों सहित करीब सात सौ संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया था या उनमें लूटपाट और आगजनी की गयी थी।न्यायमूर्ति ढींगरा की अध्यक्षता वाले इस विशेष जांच दल में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी राजदीप सिंह और वर्तमान आईपीएस अधिकारी अभिषेक दुलार भी शामिल थे। लेकिन राजदीप सिंह ने व्यक्तिगत कारणों से इसका हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था।

नई दिल्ली,थल सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे ने मंगलवार को चीन, पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात तथा कश्मीर में 'छद्म युद्ध' से मुकाबला कर रहे सैनिकों को चौबीस घंटे सतर्क रहने को कहा। इसके साथ उन्होंने जवानों को भरोसा दिलाया कि उनकी अलग-अलग जरूरतों को किसी भी कीमत पर पूरा किया जाएगा। आर्मी चीफ ने कहा कि सेना सिर्फ एक लड़ाकू संगठन नहीं है बल्कि एक मूल्यवान संस्था है जिसका देश के मन में खास स्थान है।
 सेना दिवस की पूर्व संध्या पर 13 लाख कर्मियों वाले बल को दिए अपने संदेश में सेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय सेना ने राष्ट्र के मन में एक 'विशेष स्थान' बनाया है और यह केवल एक लड़ाकू संगठन या राष्ट्रीय शक्ति का औजार नहीं है। उन्होंने कहा, 'यह देश की एक मूल्यवान संस्था भी है। हमें अपने मूल्यों, आचार और अपने नागरिकों द्वारा जताए गए भरोसे को बनाए रखने के संकल्प में दृढ़ बने रहना है।'

'पाक, चीन से लगी सीमा पर डटे जवान हर समय सतर्क रहें'
सेना प्रमुख ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के तहत सैन्य मामलों का विभाग बनाने के सरकार के फैसले को एक फलदायक कदम बताया जिससे तीनों सेनाओं के बीच अधिक समन्वय होगा। थल सेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय सेना की प्राथमिक जिम्मेदारी शीर्ष स्तर की तैयारियां बरकरार रखना है। उन्होंने सभी कर्मियों, खासकर पाकिस्तान, चीन की सीमाओं और सियाचिन ग्लेशियर की रक्षा करने वाले जवानों से कहा कि वे 'हर समय सतर्क रहें।' उन्होंने 'छद्म युद्ध की जटिल चुनौती' का मुकाबला करने वाले जवानों को भी सतर्क करने को कहा।

 जनरल नरवणे ने कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि आपकी परिचालन साजोसामान संबंधी जरूरतों को हर कीमत पर पूरा किया जाए। उन्होंने कहा कि सेना ने उभरते खतरों से निपटने के लिए सैद्धांतिक अनुकूलन और क्षमता वृद्धि की दिशा में कई कदम उठाए हैं। सैन्य मामलों के विभाग के गठन पर उन्होंने कहा कि इससे नागरिक-सैन्य तालमेल में वृद्धि होगी, रणनीतिक परिणामों की उत्पादकता बढ़ेगी और तीनों सेनाओं के बीच अधिक से अधिक समन्वय हो सकेगा।

मुंबई। सूर्य का किसी राशी विशेष पर भ्रमण करना संक्रांति कहलाता है. सूर्य की गति इस दिन से बढ़ने लगती है. खरमास खत्म हो जाता है और शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं. ऐसा सब सूर्य के गोचर के कारण ही होता है. सूर्य हर माह में राशी का परिवर्तन करता है. वर्ष की बारह संक्रांतियों में से दो संक्रांतियां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती हैं. मकर संक्रांति और कर्क संक्रांति. सूर्य जब मकर राशी में जाता है तब मकर संक्रांति होती है. मकर संक्रांति से अग्नि तत्त्व  की शुरुआत होती है और कर्क संक्रांति से जल तत्त्व की. इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ रही है. मकर संक्रांति पर भगवान सूर्य की विशेष पूजा-आराधना से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस दिन कुछ विशेष प्रयोग करने से जीवन में खुशियां आती है. मकर संक्राति एक ऐसा त्योहार है जिस दिन किए गए काम अनंत गुणा फल देते हैं. संक्राति के दिन सूर्य वरदान बनकर चमकते हैं. मान्यता है कि संक्राति के दिन शुभ मूहूर्त में नदियों का पानी अमृत में बदल जाता है. संक्राति के दिन किया गया दान लक्ष्मी की कृपा बनकर बरसता है. मकर संक्रांति को दान, पुण्य और देवताओं का दिन कहा जाता है. ज्योतिष के अनुसार मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान से तमाम जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. ज्योतिषियों के मुताबिक, इस बार कई कारणों से मकर संक्रांति खास है. यह तिथि पुण्य स्नान और दान के लिए विशेष मानी गई है. मकर संक्रांति के दिन सिर्फ खिचड़ी ही नहीं तिल से जुड़े दान और प्रयोग भी लाभ देते हैं .दरअसल ये मौसम में परिवर्तन का समय होता है. ऐसे में तिल का प्रयोग विशेष हो जाता है. साथ ही मकर संक्रांति सूर्य और शनि से लाभ लेने का भी खास दिन होता है. मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं. शास्त्रों में उत्तरायण के समय को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है. ज्योतिष विज्ञान ये मानता है कि मकर संक्रांति के दिन किया गया दान सौ गुना फल देता है. मकर संक्रान्ति के दिन घी-तिल-कंबल-खिचड़ी दान का खास महत्व है. मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन तिल गुड़ और खिचड़ी के दान से किस्मत बदलती है. खुशी और समृद्धि के प्रतीक मकर संक्रांति के दिन पुण्य काल में दान देना, स्नान करना या श्राद्ध कार्य करना शुभ माना जाता है. शास्त्रों में मकर संक्रांति पर गंगा स्नान की विशेष महिमा बताई गई है. मकर संक्रांति महज एक खगोलीय राशि परिर्वतन नहीं है. इसके ज्योतिषीय महत्व भी हैं. इस दिन सूर्य मकर राशि में गोचर करते हैं. वहीं सूर्य अपने पुत्र यानि शनि से मिलने उनके घर आते हैं. व्यक्ति के जीवन में इस परिर्वतन का बहुत असर होता है. इसीलिए इस पर्व को इतना महत्व दिया जाता है.


सूर्य को मतबूत करने का दिन है मकर संक्रांति
मकर संक्रांति का पर्व सूर्य को मतबूत करने का दिन है. इस दिन सूर्य की उपासना करने से सूर्य खुश होते हैं और जीवन में अच्छे फल देने लगते हैं. इसलिए सूर्य का मजबूत होना बहुत जरूरी है. जिस व्यक्ति के जीवन में सूर्य कमजोर होते हैं उसे मेहनत करने के बाद भी सम्मान नहीं मिलता है और हर क्षेत्र में तरक्की की रफ्तार में वह पीछे रह जाता है. जिन लोगों को जीवन में इस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है उन लोगों के लिए मकर संक्रांति का दिन बेहद महत्वपूर्ण है. इस दिन सूर्य की पूजा करने से कई तरह के कष्ट और संकट मिट जाते हैं. सूर्य को प्रभावशाली ग्रह माना गया है. जिस व्यक्ति के जीवन में सूर्य मजबूत स्थिति में होते हैं सूर्य उस व्यक्ति को मान सम्मान, पद- प्रतिष्ठा, उच्च पद सभी कुछ प्रदान करते हैं. इस दिन स्नान करने के बाद सूर्य भगवान को याद करते हुए सूर्य मंत्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नम:' का जप करना चाहिए. पूजा करने के बाद जल में गंगा जल मिलाकर उसमें चंदन का पाउडर मिलकर सूर्य भगवान को अर्घ्य देना चाहिए. इस दिन गायत्री मंत्र का जाप करने से भी सूर्य की अशुभता दूर होती है.

यूपी कैबिनेट ने प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने के साथ ही कई अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी है। कैबिनेट ने घाघरा नदी का नाम बदलकर सरयू नदी कर दिया है।
यह नदी दक्षिणी तिब्बत के ऊंचे पर्वत शिखर में मापचाचुंगो हिमनद से निकलती है और उत्तर प्रदेश में बहराइच, सीतापुर, गोंडा, बाराबंकी, अयोध्या, अंबेडकरनगर, मऊ, बस्ती, गोरखपुर, लखीमपुर खीरी और बलिया से होकर गुजरती है।

यह गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। निचली घाघरा नदी को सरयू के नाम से भी जाना जाता है। अयोध्या इसके दायें किनारे पर स्थित है। कैबिनेट ने इसका नाम बदलकर सरयू करने के प्रस्ताव पर सहमति दे दी है। अब राजस्व अभिलेखों में इसका नाम सरयू दर्ज किया जाएगा।
कैबिनेट ने कई अन्य प्रस्तावों को भी मंजूरी दी
- उन्नाव जनपद के थाना कोतवाली सदर के अन्तर्गत दही पुलिस चौकी को उच्चीकृत कर नवीन मार्डन पुलिस थाना की स्थापना हेतु यूपीएसआईडीसी से निशुल्क भूमि उपलब्ध कराने को मंजूरी दी गई है।

- कैबिनेट ने पुलिस विभाग के जर्जर व बेकार पड़े भवनों को ध्वस्त किए जाने पर सहमति दी।

- जिला कारागार, प्रयागराज को पूरा कराए जाने के लिए प्रस्तावित लागत 200 करोड़ से अधिक होने के कारण वित्त विभाग की व्यवस्था के अनुरूप व्यय प्रस्ताव को दी मंजूरी।

- विधानसभा क्षेत्र बरेली नगर, जनपद बरेली में बस स्टेशन का निर्माण कराए जाने के लिए मिनी बाईपास पर केंद्रीय कारागार और नगर निगम, बरेली की रिक्त भूमि परिवहन विभाग को निशुल्क दिए जाने को दी मंजूरी।

- गोरखपुर के सोनौली-नौतनवां-गोरखपुर-देवरिया-बलिया मार्ग को गोरखपुर शहर से देवरिया बॉर्डर तक चौड़ीकरण व सुदृढीकरण कराए जाने पर मंजूरी।

नई दिल्ली । वरिष्ठ कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी  ने सेना प्रमुख को सलाह देते हुए कहा है कि वह पीओके पर कार्रवाई करने के लिए इतने ही इच्छुक हैं, तो सीडीएस  और पीएमओ से बातचीत करें।कांग्रेस नेता ने ट्वीट किया, 'नए सेना प्रमुख।।। संसद ने पहले ही वर्ष 1994 में पीओके को लेकर सर्वसम्मत से प्रस्ताव पारित कर दिया था। सरकार कार्रवाई करने और निर्देश देने के लिए स्वतंत्र है। अगर आप पीओके पर कार्रवाई करने के लिए इतने ही इच्छुक हैं, तो मेरी सलाह है कि आप सीडीएस  और पीएमओ से बातचीत करें। कम बोलें, काम ज्यादा करें।'
ज्ञात रहे कि शनिवार को पत्रकारों से बात करते हुए सेना प्रमुख ने कहा था, 'जहां तक पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की बात है तो पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा होने संबंधी संसद का कई साल पुराना प्रस्ताव है। अगर संसद चाहेगी कि वह हिस्सा भी हमारा होना चाहिए और अगर इसका आदेश हमें मिले तो निश्चित तौर पर हम कार्रवाई करेंगे।' 
उधर, केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने सेना प्रमुख जनरल नरवणे के पीओके पर दिए बयान का समर्थन किया है। अठावले ने कहा कि पीओके में भारत को निशाना बनाने वाले आतंकवादी संगठनों का ठिकाना है और उनको उखाड़ फेंकने के लिए सैन्य कार्रवाई की जरूरत है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ने रविवार को कहा, 'मैं सेना प्रमुख नरवणे के उस बयान का समर्थन करता हूं, जिसमें उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार से आदेश मिलने पर सेना पीओके में सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार है।' 

नयी दिल्ली। उच्च्तम न्यायालय ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन को केंद्र शासित प्रदेश में प्रतिबंध लगाने के सभी आदेशों की एक हफ्ते में समीक्षा करने का आदेश दिया और इंटरनेट के इस्तेमाल को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों का हिस्सा बताया। न्यायमूर्ति एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने के लिए कहा।
संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इंटरनेट के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार का हिस्सा बताते हुए शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से इंटरनेट के निलंबन के सभी आदेशों की समीक्षा करने के लिए कहा। अदालत ने कहा कि कश्मीर में लगे प्रतिबंधों को लेकर न्यायालय ने कहा कि किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल उपकरण के तौर पर नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि मजिस्ट्रेट को निषेधाज्ञा जारी करते समय इसपर विचार करना चाहिए और आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। पिछले साल पांच अगस्त को पूववर्ती जम्मू कश्मीर प्रदेश से संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष दर्जा वापस लिये जाने के बाद केंद्र सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शीर्ष न्यायालय ने यह फैसला दिया।

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली के पटपडग़ंज इलाके स्थित एक पेपर प्रिटिंग प्रेस में गुरुवार तड़के आग लगने से एक की मौत हो गई। औद्योगिक क्षेत्र पटपडग़ंज में लगी आग बुझाने के लिए घटनास्थल पर 35 दमकलकर्मी मौजूद हैं। बीते कुछ दिनों में दिल्ली में आग लगने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसमें कई लोग अपनी जान भी गंवा चुके हैं। पटपडग़ंज में लगी आग में अभी कई लोग फंसे बताए जा रहे हैं जिन्हें निकालने का प्रयास किया जा रहा है। फिलहाल अभी आग लगने की वजह स्पष्ट नहीं हो पाई है। दिसंबर महीने में दिल्ली के अनाज मंडी इलाके में आग लगने से 45 लोगों की जान चली गई थी। इसके बाद आग की कई घटनाएं सामने आईं।

जमशेदपुर     ,                                                                                 
झारखंड के जमशेदपुर में मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। यहां टाटानगर स्टेशन परिसर में में एक महिला ने मंगलवार को दो हजार रुपये में अपने दो महीने के मासूम बच्चे को बेच दिया। भीख मांगकर गुजारा करने वाली उस महिला ने बताया कि अगर मैं बच्चे को नहीं बेचती तो वह भूख और ठंड से मर जाता।

टाटानगर स्टेशन के बाहर चाईबासा स्टैंड के पास चाय-पान की दुकान लगाने वालों में यह घटना मंगलवार को दिन भर चर्चा का केंद्र रही। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार स्कूटी पर तीन लोग (युवक-युवती व वृद्ध महिला) आए थे। आरक्षण केंद्र के पीछे पहले से बैठी एक महिला (स्टेशन सफाईकर्मी की ड्रेस में) को वृद्ध महिला ने बैग से निकालकर स्वेटर दिया। जिसे उसने बच्चे को पहना दिया। बच्चे की मां के हाथ पर कुछ रखने के बाद तीनों बच्चे को लेकर चले गए। उस महिला के पास करीब तीन वर्ष की बच्ची भी है। दोनों मां-बेटी बस के इंतजार में खड़े यात्रियों से भीख मांगकर अपना गुजारा करते हैं।

नहीं बेचती तो मर जाता : बच्चा बेचने की सूचना पाकर रेलकर्मी उसके पास पहुंचे और उससे पूछताछ की। उसने बताया कि अगर वह अपने बच्चे को नहीं बेचती तो वह ठंड और भूख से मर जाता। उसने कहा कि उसका और कोई नहीं है। वह कहां की रहनेवाली है, यह बात उसने नहीं बतायी।

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