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नई दिल्ली । भविष्य में केंद्र सरकार को विदेशों से डबल इंजन वाले राफेल या अन्य लड़ाकू विमानों की खरीद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। रक्षा मंत्रालय इसी क्षमता के दोहरे इंजन वाले लड़ाकू विमानों का देश में ही निर्माण करेगा। इसके लिए स्वदेशी विमान तेजस को नया स्वरूप देने की तैयारी आरंभ हो गई है। नया स्वरूप मिग 29- के की जगह ले सकता है। रक्षा मंत्रालय की डिजाइन एजेंसी ने दोहरे इंजन वाले तेजस का डिजाइन तैयार कर लिया है। दावा किया गया है कि नया तेजस राफेल की टक्कर का होगा। रक्षा सूत्रों ने कहा कि दोहरे इंजन वाले तेजस को बनाने में करीब 12 साल लगेंगे। एरोनॉटिकल डिजाइन एजेंसी और हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा संयुक्त रूप से यह डिजाइन तैयार किया जा रहा है। डबल इंजन वाले आधुनिक तेजस का निर्माण आसानी से किया जा सकता है। प्रोजेक्ट एजेंसी की माने तो, 2030 से लेकर 2050 तक 750 से ज्यादा लड़ाकू विमानों को बदले जाने की जरूरत होगी। इसलिए इस प्रोजेक्ट को जल्दी शुरू कर देना चाहिए।

इस जनजातीय क्षेत्र में सदियों से अनोखी परंपरा का निर्वाहन किया जाता है. इसके तहत बहन दूल्हा बनकर सेहरा बांधती है और अपनी भाभी को ब्याह कर लाती है. जानिए..

अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए मशहरू हिमाचल प्रदेश यहां के अनोखे रिति रिवाज के कारण भी जाना जाता है. आज हम आपको प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र लाहौल स्पीति की एक अनोखी परंपरा के बारे में बताएंगे. इसमें बहन अपने भाई और भाई अपने भाई के लिए बारात लेकर जाते हैं और दुल्हन ब्याह कर लाते हैं.
बेशक यह पढ़कर आप चौंक जाएंगे. मगर यह पूरी तरह से सच है. यहां अपने भाई की शादी के लिए बहन दूल्हा बन बारात लेकर वधु पक्ष के घर जाती है. यहां वह दूल्‍हे की तरह ही वह सभी रस्में निभाती है जो कि दूल्हे को निभानी चाहिए.

इतना ही नहीं जिन भाईयों की बहन नहीं होती. उन परिवारों में छोटे व बड़े भाई अपने अन्य भाई के लिए दूल्हा बनकर और ब्याह रचाकर दुल्हन लेकर आते हैं. यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे यहां आज भी पूरी शिद्दत से निभाया जाता है.

लाहौल स्पीति की यह परंपरा अपने आप में अनूठी है. इसकी वजह यह है कि जब किसी कारणवश दूल्हा अपनी शादी में शामिल नहीं हो पाता है तो बहन के सिर पर सहरा सजाकर दुल्हन को ले आती है.
सदियों पुरानी यह परंपरा यहां आज भी कायम है. सामान्य विवाह की तरह यहां पर भी बहन सेहरा बांधकर बैंड बाजे के साथ बारात लेकर जाती है और अपनी भाभी को ब्याह कर घर ले आती है.

कई बार तो दूल्हे के छोटे भाई भी अपनी भाती को ब्याहकर घर ले आते हैं. इतिहासकारों की मानें तो यह परंपरा सदियों पुरानी है.

अहमदाबाद/लखनऊ/मुंबई,देश में एनआरसी और एनपीआर पर छिड़े घमासान के बीच आम लोगों को एक अलग तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार भले ही लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही हो कि एनआरसी और एनपीआर का आपस में कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन हकीकत यह है कि बुजुर्ग लोग इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं। देशभर में लोग म्युनिसिपल ऑफिसों में जन्म से जुड़े डॉक्युमेंट्स के लिए पहुंच रहे हैं। बढ़ती भीड़ ने म्युनिसिपल कर्मचारियों की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं।

अहमदाबाद, गोरखपुर, वाराणसी और मालेगांव जैसे शहरों में जन्म प्रमाण पत्र के आवेदनों में तेज वृद्धि देखी जा रही है। अहमदाबाद के बर्थ रिकॉर्ड ऑफिस के एक अधिकारी ने कहा, '30 दिसंबर तक जन्म प्रमाण पत्र के लिए लगभग 200 लोग हर दिन आ रहे हैं। हम इतने अधिक आवेदनों का जवाब देने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं।'

आवेदनों की बढ़ी तादाद
मेडिकल ऑफिसर चिराग शाह ने बताया कि पीछले कुछ दिनों में 1950 से पहले के जन्म प्रमाण पत्रों के लिए भी काफी आवेदन आ रहे हैं। अहमदाबाद म्युनिसिपल्टी के मुताबिक, पहले उनके यहां हर दिन औसतन 17 से 20 आवेदन आते थे, लेकिन 24 दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा एनपीआर अपडेट को मंजूरी देने के बाद अगले दिन आवेदनों की संख्या 92 तक पहुंच गई, इनमें से 60 मुस्लिमों के थे।

'चुनाव प्रचार के दौरान मिली थी चेतावनी'
महाराष्ट्र के मालेगांव म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (एमएमसी) के सभी पांच ऑफिसों और स्थानीय अदालतों में भी जन्म प्रमाण पत्रों के लिए सैलाब उमड़ पड़ा है। मालेगांव के स्थानीय निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता नसीम खान ने कहा, 'महाराष्ट्र में चुनाव के दौरान मालेगांव में चुनाव प्रचार कर रहे कई राजनेताओं ने जन्म प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेजों में गलतियों को लेकर लोगों को चेतावनी दी। जिसके बाद नए जन्म प्रमाण पत्रों, दस्तावेजों में नाम में बदलाव, स्पेलिंग में सुधार इत्यादि को लेकर भीड़ बढ़ गई।' दिसंबर में जब केन्द्र ने विवादित नागरिकता कानून पास किया तो इसमें और ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई।

बंगाल में भी उमड़ी भीड़
कोलकाता म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी सुब्रत बनर्जी ने कहा कि उन्होंने जन्म प्रमाणपत्र के लिए इतनी लंबी कतार कभी नहीं देखी थी। उन्होंने बताया कि तीन दिनों में हर दिन उन्हें करीब 250 आवेदन मिले, इनमें से अधिकतर लोग बुजुर्ग हैं। आपको बता दें कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत देश के अलग-अलग राज्यों के 10 मुख्यमंत्री यह कह चुके हैं कि वह अपने राज्य में जनगणना नहीं कराएंगे, जिसके बाद भीड़ में कुछ कमी देखी गई है।

यूपी में बढ़े आवेदन
दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहक्षेत्र गोरखपुर में जहां हर सप्ताह जन्म प्रमाण पत्र के लिए औसतन 90-100 आवेदन आते थे, वहीं अब यह संख्या 150 तक पहुंच गई है। वहीं पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जहां नोडल ऑफिस में हर दिन 100-125 तक आवेदन आते थे, वहीं अब 300 तक आवेदन आ रहे हैं।

लखनऊ. अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर सरकार, संतों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिप के पदाधिकारियों की सक्रियता तेज हो गयी है. इसी के साथ दो पूजित राम शिलाओं के 18 साल बाद ट्रेजरी से बाहर आने की उल्टी गिनती भी शुरू हो गयी है. इन राम शिलाओं को 15 मार्च, 2002 को श्रीराम जन्मभूमि न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष और अयोध्या आंदोलन के प्रमुख किरदार दिगंबर अखाड़ा के प्रमुख रामचंद्र परमहंस और विहिप के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल ने केंद्र की तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में गठित अयोध्या प्रकोष्ठ के प्रभारी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को सौंपी थी.

स्व. परमहंस व सिंघल की इच्छा इन पूजित शिलाओं को मंदिर के गर्भगृह में लगाने की थी, इसलिए मंदिर निर्माण शुरू होने से पहले ही संतों व विहिप की कोशिश इसे ट्रेजरी से बाहर लाने की है. प्रयागराज में इसी माह माघ मेले में संतों की केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक में किसी शुभ मुहूर्त पर इन शिलाओं को ट्रेजरी से बाहर लाने के बारे में भी निर्णय होगा.

वर्ष 2002 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए और प्रदेश में राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली सरकार थी. मंदिर निर्माण को लेकर तस्वीर साफ न होने से संतों में नाराजगी बढ़ रही थी. विहिप पर भी सवाल उठ रहे थे. तब अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने अधीन अयोध्या प्रकोष्ठ का गठन कर नाराजगी दूर करने की कोशिश की.

इसी बीच प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के घोषणापत्र में मंदिर निर्माण का उल्लेख न होने से नाराजगी फैल गयी. परमहंस ने अयोध्या में 100 दिनों के यज्ञ व 15 मार्च, 2002 को मंदिर निर्माण शुरू करने की घोषणा कर दी. 13 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति का निर्देश दे दिया. जब परमहंस ने प्राण दे देने का एलान कर दिया, तो अटल ने उनसे फोन पर बात कर विवादित स्थल पर न जाने और प्रतीकात्मक शिलादान के लिए राजी किया.

श्रीराम जन्मभूमि न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष और अयोध्या आंदोलन के प्रमुख किरदार दिगंबर अखाड़ा के प्रमुख रामचंद्र परमहंस और विहिप के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल द्वारा पूजित दो राम शिलाएं श्रीराम मंदिर निर्माण के दौरान मंदिर के गर्भगृह में लगनी हैं. अभी ये शिलाएं ट्रेजरी में हैं.

प्रयागराज में संतों की केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक में विचार-विमर्श कर यह तय होगा कि इन्हें गर्भगृह में किस स्थान पर लगाया जाये. वैसे तो ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार को करना है और उसी की देखरेख में मंदिर का निर्माण होना है लेकिन सभी जानते हैं कि सरकार के गठित ट्रस्ट के जरिये मंदिर का निर्माण होने के बावजूद इसमें विहिप व संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी.

शिलादान कार्यक्रम में शामिल रहे विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा कहते हैं कि ट्रेजरी में रखीं दोनों राम शिलाएं कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं. एक तो ये शिलाएं स्व. परमहंस और सिंघल जैसे उन लोगों ने पूजन करके सरकार को सौंपी थीं, जिनका इस पूरे आंदोलन में अतुलनीय योगदान है.

ऊपर से ये दोनों शिलाएं अयोध्या आंदोलन के इन दोनों सूत्रधारों के साथ गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ, महंत अवैद्यनाथ सहित तमाम संतों, विहिप के महेशनारायण सिंह, कोठारी बंधुओं सहित उन तमाम कारसेवकों को श्रद्धांजलि का भी माध्यम हैं, जो अपने जीते जी मंदिर निर्माण का सपना साकार होते नहीं देख पाये. इसलिए भी इन्हें गर्भगृह जैसे मुख्य पवित्र स्थल पर लगाना है.

पुडुचेरी. क्या आपने कभी आपने सोचा है कि कोई मंत्री अपनी गाड़ी में पेट्रोल भराने के लिए जाए और पेट्रोल पंप वाला उन्हें डीज़ल देने से मना कर दे. यकीन करना मुश्किल है लेकिन पुडुचेरी  में कुछ ऐसा ही देखने को मिला. यहां के कृषि मंत्री आर कमलाकन्न को पेट्रोल देने से इसलिए देने से मना कर दिया कि सरकार ने पिछले कई महीनों से पेट्रोल के बकाया पैसे नहीं चुकाए थे.

ये घटना शुक्रवार की है. आर कमलाकन्न को कबिनेट मीटिंग के लिए कराईकल से पुडुचेरी जाना था. मंत्री जी ने कार से मीटिंग में जाने की प्लानिंग की थी, लेकिन पेट्रोल पंप ने उन्हें डीज़ल देने से मना कर दिया. इसके बाद उन्हें मजबूरन बस में सवार होकर कैबिनट की मीटिंग में जाना पड़ा. कहा जा रहा है कि इस पेट्रोल पंप का सरकार पर करीब ढाई करोड़ रुपये बकाया हैं. इसमें से करीब 50 लाख का बकाया मंत्रियों पर है. पेट्रोल पंप ने पिछले छह महीनों से अपने कर्मचारियों को सैलरी भी नहीं दी है.

करीब 3 घंटे का सफर तय करने के बाद मंत्री जी पुडुचेरी पहुंचे. उन्हें बस में देखकर आमलोग बेहद हैरान थे. आर कमलाकन्न ने कहा कि वो हर हाल में कैबिनेट मीटिंग में जाना चाहते थे. लिहाजा वो पुडुचेरी जाने के लिए बस में सवार हो गए.

नई दिल्ली. नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देशभर में मचे बवाल के बीच केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह ने शुक्रवार को साफ किया कि जिस दिन संसद में CAA कानून पास हुआ था उसी दिन ये कानून जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो गया था. उन्होंने कहा कि अब सरकार का अगला कदम रोहिंग्या शरणार्थियों के निर्वासन के संबंध में होगा, ताकि वे नागरिकता कानून के तहत अपने आप को सुरक्षित न कर सकें.

केंद्रीय मंत्री ने इस बात की जांच कराने की मांग की कि कैसे रोहिंग्या शरणार्थी पश्चिम बंगाल के कई इलाकों से होते हुए जम्मू के उत्तरी इलाकों में आकर बस गए. उन्होंने कहा कि जिस दिन संसद में CAA को मंजूरी मिली थी, उसी दिन जम्मू-कश्मीर में भी ये कानून लागू हो गया था. इस कानून को लेकर कोई अगर-मगर जैसी बात नहीं है. उन्होंने कहा कि हमारी सरकार का अगला कदम रोहिंग्या शरणार्थियों के निर्वासन को लेकर रहेगा.

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों ने माना कि जम्मू के कई इलाकों में बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं. रोहिंग्या शरणार्थियों के निर्वासन की योजना पर बात करते हुए जीतेंद्र सिंह ने कहा, 'इस बारे में केंद्र में मामला विचाराधीन है. जम्मू में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों की सूची तैयार की जा रही है. अगर जरूरत हुई तो बॉयोमेट्रिक पहचान पत्र दिए जाएंगे, क्योंकि सीएए रोहिंग्या को किसी भी तरह का कोई भी लाभ प्रदान नहीं करता.'

नई दिल्ली. इस साल राज्यसभा की 73 सीटों के लिए चुनाव कराने होंगे, क्योंकि साल के अंत तक राज्यसभा के 69 सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो जाएगा. जिन लोगों का कार्यकाल इस साल खत्म हो रहा है, उसमें 18 भाजपा के और 17 कांग्रेस के सदस्य शामिल हैं. इसके अलावा चार सीटें पहले से ही रिक्त पड़ी हैं. ऐसे में इस साल उच्य सदन की 73 सीटों के लिए चुनाव कराए जाएंगे. इस साल अकेले उप्र से 10 सीटें खाली हो रही हैं. राज्य में भाजपा की सरकार है, इसलिए ज्यादातर सीटें भाजपा के खाते में जाएंगी. सबसे ज्यादा नुकसान यहां समाजवादी पार्टी को होगा.

अभी हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों का साफ-साफ असर राज्यसभा चुनाव पर पड़ेगा. राज्य विधानसभाओं का अंकगणित इस बार भाजपा के खिलाफ जा रहा है. आंकड़ों से साफ है कि भाजपा अपने सदस्यों की संख्या में इजाफा नहीं कर पाएगी, जिससे राज्यसभा में वह बहुमत से दूर ही रहेगी, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की सदस्य संख्या बढ़ेगी. गौरतलब है कि 2018 और 2019 में भाजपा को कुछ राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है, जिसका सीधा असर राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव परिणाम पर पड़ेगा.

दूसरी तरफ, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की स्थिति 245 सदस्यीय राज्यसभा में सुधरेगी. इस समय भाजपा के राज्यसभा में 83, और कांग्रेस के 46 सदस्य हैं. समीकरण के हिसाब से राज्यसभा में भाजपा की संख्या 83 के आसपास बनी रहेगी और सदन में बहुमत की उसकी आस फिलहाल पूरी नहीं हो पाएगी. इस साल राज्यसभा से कई दिग्गजों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी, रामदास आठवले, दिल्ली भाजपा नेता विजय गोयल शामिल हैं. कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार का भी कार्यकाल इसी साल खत्म हो रहा है.

नई दिल्ली. ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर चालान और मोटरसाइकल को जब्त किए जाने से गुस्साए युवक ने बाइक को ही आग के हवाले कर दिया. दक्षिणी दिल्ली में बुधवार को हुई इस घटना के बाद आरोपी ने पुलिस को अरेस्ट कर लिया है.

युवक के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. दक्षिणी दिल्ली के डेप्युटी पुलिस कमिश्नर ने यह जानकारी दी है. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आरोपी की पहचान दिल्ली के ही संगम विहार इलाके के रहने वाले विकास के तौर पर हुई है. अधिकारी के मुताबिक विकास बिना हेलमेट के ही बाइक चला रहा था, जिस पर उसका चालान किया गया था.

इस पर गुस्साए 20 वर्षीय युवक विकास ने अपनी बाइक को ही आग के हवाले कर दिया. इसके बाद पुलिस और मौके पर मौजूद लोगों ने किसी तरह से बाइक में लगी आग को बुझाया और विकास को गिरफ्तार कर लिया.

चेन्नै. झगड़े के बाद पत्नी के मायके लौटने से पति इतना अपसेट हुआ कि उसने अपना गुप्तांग ही काट दिया. यर घटना तमिलनाडु की राजधानी चेन्नै के वॉशरमेनपट में मंगलवार शाम की है. पुलिस ने कहा कि सुनामी क्वॉर्टर में रहने वाले बाबू (40) की शादी देवी (35) से हुई थी. दंपती का कोई बच्चा नहीं है और इसके लिए दोनों के बीच अक्सर विवाद होता रहता था. देवी को पति के शराब पीने की आदत पसंद नहीं थी.

पुलिस ने बताया कि देवी बाबू से तलाक चाहती थी और सोमवार को घर छोड़कर मायके चली गई. हालांकि नये साल को सेलिब्रेट करने के लिए वह मंगलवार को लौट आई थी. इसी दौरान बाबू के शराब पीने पर दोनों के बीच झगड़ा शुरू हो गया. देवी दोबारा से अपनी मां के घर चली गई.

इससे दुखी होकर बाबू किचन में गया और चाकू से अपना गुप्तांग काट दिया. उसकी चीख सुनकर पड़ोसी दौड़े आए और सरकारी अस्पताल में उसे भर्ती कराया. पुलिस का कहना है कि पीड़ित की हालत अभी नाजुक है.

मुंबई. टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने ब्रॉडकास्टिंग और केबल सर्विसेज सेक्टर के लिए अपने टैरिफ ऑर्डर में बदलाव किया है. इसके तहत केबल टीवी ग्राहक कम कीमत में अधिक चैनल देख सकेंगे. पहला टैरिफ ऑर्डर पिछले साल फरवरी में लागू किया गया था. नया बदलाव पहली मार्च से लागू होगा.

बदलावों के अनुसार, ट्राई ने किसी भी बकेट में शामिल इंडिविजुअल चैनलों के एमआरपी की हदबंदी कर दी है. 1 मार्च से इनका एमआरपी 12 रुपये तक होगा, जो अभी 19 रुपये तक है. रेगुलेटर ने बकेट बनाने के लिए दो शर्तें भी लगाई हैं, जिनसे चैनल बकेट्स पर डिस्काउंट करीब 33 प्रतिशत तक ही रहेगा. पहली शर्त यह है कि किसी बकेट में चैनलों के एमआरपी का योग उस पूरे बकेट के प्राइस के डेढ़ गुने से ज्यादा नहीं हो सकता है. इसका मतलब यह है कि अगर कोई ब्रॉडकास्टर 10 चैनलों का बकेट 100 रुपये महीने पर ऑफर कर रहा हो तो सभी 10 चैनलों का कंबाइंड MRP 150 रुपये से ज्यादा नहीं हो सकता है. इसस ब्रॉडकास्टर्स को चैनलों के दाम और बकेट प्राइस में बदलाव करना होगा.

दूसरी शर्त यह है कि किसी भी अ-ला-कार्ट चैनल का MRP उस बकेट के किसी भी चैनल के ऐवरेज प्राइस के तीन गुने से ज्यादा नहीं हो सकता है. मसलन, अगर किसी बकेट में चैनलों का ऐवरेज प्राइस 3 रुपये है (बकेट प्राइस के MRP में उस बकेट के सभी चैनलों की संख्या से भाग देने पर हासिल) तो उस बकेट के किसी भी एक चैनल का MRP 9 रुपये से ज्यादा नहीं हो सकता है.

इससे पहले ब्रॉडकास्टर्स कन्ज्यूमर्स को चैनल बकेट्स पर उन बकेट्स के सभी चैनलों के टोटल अ-ला-कार्ट प्राइस के मुकाबले 35-55% का ऐवरेज डिस्काउंट दे रहे थे. ट्राई ने कहा था कि ब्रॉडकास्टर्स ने बकेट डिस्काउंट्स में लचीलेपन का दुरुपयोग किया. ट्राई ने ब्रॉडकास्टर के डिस्ट्रिब्यूशन वाले चैनलों की कुल संख्या के हिसाब से प्रति ब्रॉडकास्टर बकेट्स की कुल संख्या की सीमा भी तय कर दी है. इस तरह अगर किसी ब्रॉडकास्टर के पास 12 चैनल हों तो वह 12 से ज्यादा बकेट्स ऑफर नहीं कर सकता है.

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