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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में माहौल अभी काफी गरमाया हुआ है। एक ओर छात्रों का संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर डॉ. फिरोज खान का विरोध खत्म नहीं हो रहा है, वहीं कैंपस में सोमवार को पॉलिटिकल साइंस विभाग में वीर सावरकर की तस्वीर को उतारकर फेंकने का मामला सामने आने से गरमा गया था। अब एक बार फिर से बीएचयू चर्चा में है।
बीएचयू के इतिहास विभाग ने बीए के कोर्स से रामायण और महाभारत के साथ वैदिक काल का अध्याय हटा दिया है। रामायण और महाभारत अध्याय को हटाए जाने से छात्रों में खासा आक्रोश है। छात्रों ने कोर्स से महाभारत और रामायण को हटाए जाने को लेकर विभागाध्यक्ष से आपत्ति जताई है।

इससे पहले बीएचयू कैंपस में सोमवार को पॉलिटिकल साइंस विभाग में वीर सावरकर की तस्वीर को उतारकर फेंकने की शिकायत छात्रों ने विभागाध्यक्ष से करते हुए मामले की जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। घटना सोमवार सुबह की है। एमए प्रथम वर्ष का एक छात्र पहुंचा तो देखा कि वहां तस्वीर फेंकी पड़ी है। बाद में इसे कमरे में लगा दिया गया। मामले में तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया गया है।
समाज विज्ञान के संकाय प्रोफेसर आरपी पाठक ने बताया कि जांच के लिए तीन सदस्यी टीम घोषित की गई है। इसमें बिंदा पराजंपे (इतिहास), प्रो जेबी कुमरईया (अर्थशास्त्र) और विधि संकाय से डा वीके सिंह है। वहीं छात्रों का आक्रोस कम नहीं हो रहा है, उनकी मांग है कि इसकी जांच जल्दी से जल्दी की जाए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।

इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने के बाद अब योगी आदित्यनाथ आगरा का नाम परिवर्तित करना चाह रहे हैं।

समय के साथ-साथ सरकार भी कुछ नया प्रयोग करने की फिराक में बैठी रहती हैं। ऐसे में अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक बार फिर से नाम बदलने का विचार कर रहे हैं। लेकिन ये नाम किसका है यह जानकर आपको थोड़ा हैरानी होगी। हालांकि आपने तस्वीर में उस स्थान को देख भी लिया और आपके मन में कई तरह के सवाल भी पनपे होंगे।

इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने के बाद अब योगी आदित्यनाथ आगरा का नाम परिवर्तित करना चाह रहे हैं। आपको बता दें कि ताज नगरी को अग्रवन बनाने के लिए साक्ष्य मांगे जा रहे हैं। इससे लिए प्रशासन ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय से पूछा है कि आगरा का नाम बदलकर क्या किया जाए ? साक्ष्यों को लेकर विश्वविद्यालय का इतिहास विभाग पूरे मामले पर मंथन कर रहा है और साक्ष्य जुटाने में लगा हुआ है।

प्रशासन द्वारा दिए गए निर्देश के बाद अब ताजनगरी आगरा का इतिहास खंगाला जा रहा है। साथ ही यह भी खंगाला जा रहा है कि आगरा का नाम कब, किसने और कैसे अग्रवन के रूप में प्रयोग किया था। इसके लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

विश्वविद्यालय को जैसे ही आगरा को अग्रवन कहने के साक्ष्य मिलेंगे वह इसकी रिपोर्ट तुरंत ही शासन को मुहैया कराएगा। विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रमुख सुगम आनंद के अनुसार प्रशासन के पत्र के आधार पर साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आगरा के नाम को लेकर अलग-अलग मत है, लेकिन हम लिखित प्रमाण या अभिलेख पर शोध कर रहे हैं।

यह कोई पहली दफा नहीं होगा जब किसी शहर का नाम परिवर्तित किए जाने की बात हो रही हो या फिर परिवर्तित कर दिया गया हो। आपको बता दें कि नाम बदलाव की फेहरिस्त बहुत लंबी है। ये बात अलग है कि नाम बदले जाने के बावजूद उन्हें पुराने नाम से ही जाना जाता है। जैसे आपके सामने हाल ही का उदाहरण है। जैसे इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया। लेकिन ज्यादातर लोग आज भी इलाहाबाद ही कहते हैं। ठीक इसी तरह गुड़गाव भी है जिसे गुरूग्राम कर दिया गया था। विद्धानों का मानना है कि आगरा गजेटियर में अग्रवन का उल्लेख मिलता है।

मुगलकाल में अग्रवन से आगरा हो गया

इतिहासकारों का मानना है कि आगरा को प्राचीन काल में अग्रवन कहा जाता था। लेकिन मुगलकाल में अग्रवन से यह आगरा हो गया था। इसके अतिरिक्त कुछ लोगों का मानना है कि करीब हजार साल पहले महर्षि अंगिरा हुए थे। ऐसे में उनसे संबंधित होने के कारण पहले इसे अंगिरा कहा जाता था। फिलहाल डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के विद्धान खंगाल रहे हैं कि आगरा का नाम बदलकर क्या किया जा सकता है।

ता पार्टी की सरकार के दौरान संजय गांधी को एक मामले में कोर्ट ने तिहाड़ जेल भेज दिया था. तब इंदिरा, संजय की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं. कहा जाता है कि तब कमलनाथ जानबूझकर एक जज से लड़ पड़े और जज ने उन्हें सात दिन के लिए तिहाड़ भेज दिया. वहां वो संजय गांधी के साथ ही रहे.

सीएम बनने में क्यों हुई देर
विज्ञापन में आगे ज़िक्र है कि कमलनाथ मध्य प्रदेश में कांग्रेस का एक लोकप्रिय चेहरा हैं. उन्होंने ज्योतिरादित्य और दिग्विजय के साथ मिलकर शिवराज सिंह के लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना तोड़ दिया.1993 में भी कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने की चर्चा थी. बताया जाता है कि तब अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे कर दिया था. इस तरह कमलनाथ उस समय सीएम बनने से चूक गए थे. अब 25 साल बाद दिग्विजय सिंह के समर्थन के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला.

ये विज्ञापन छपते ही कांग्रेस में हड़कंप मच गया है. जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने कहा एजेंसी के ज़रिए ये विज्ञापन छपवाया गया है. लिहाजा इसकी जांच की जाएगी कि किस स्तर पर ये चूक हुई. बीजेपी को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल गया है. पूर्व जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा की मानें तो ये कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाज़ का नतीजा है. अब ये पता करना होगा कि ये विज्ञापन किस कांग्रेस ने छपवाया है. प्रदेश मीडिया प्रभारी लोकेंद्र पारासर ने कहा है कि विज्ञापन में इंदिरा, संजय गांधी जैसे कांग्रेस नेताओं के नाम भी ऐसी भाषा में लिखे गए हैं मानो कि वो साधारण लोग हों.

भोपाल केंद्र सरकार द्वारा असमय मौत के मामले में लाइफ कवर देने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के क्रियान्वयन में अफसरों की रुचि नहीं है। प्रदेश के सिर्फ पौने आठ फीसदी लोगों को ही इस योजना से जोड़ा जा सका है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना 2015 में शुरू की गई थी। इसके लिए हर साल 330 रुपए का प्रीमियम बैंकों द्वारा खातेदारों से लिए जाने का प्रावधान है जिसमें दो लाख रुपए का लाइफ कवर है। यह योजना 18 से 50 साल तक के बैंक खाताधारकों के लिए लागू की गई है।

योजना के एमपी में क्रियान्वयन का परीक्षण करने के बाद यह बात सामने आई है कि प्रदेश में इसकी स्थिति संतोषजनक  नहीं है। यहां 18 से 50 साल तक की उम्र के 3.15 करोड़ लोग रहते हैं, इसके विपरीत सिर्फ 24.37 लाख लोगों का ही इस योजना में बीमा किया जा सका है जो तय आबादी का सिर्फ 7.76 प्रतिशत ही है। इसी तरह की स्थिति प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के मामले में भी है। इस योजना में 18 से 70 साल तक की उम्र के लोग शामिल हैं और इसके लिए साल भर में सिर्फ 12 रुपए प्रीमियम लिया जाता है पर  इसका कवरेज भी प्रदेश में अपेक्षित नहीं है। सितम्बर 2019 तक की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में इस उम्र सीमा के 4 करोड़ लोगों में से सिर्फ 94.33 लाख लोगों को ही योजना से जोड़ा गया है।

इन दोनों ही योजनाओं में क्लेम सेटलमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 10715 बीमा क्लेम सेटलमेंट किए गए हैं। इसमें प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना में सबसे अधिक 772 केस इंदौर में और सबसे कम 12 आगर मालवा के हैं। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में सबसे कम 9 केस आगर मालवा और सबसे अधिक 216 इंदौर से सेटल किए गए हैं।

केदारनाथ में 16 जून 2013 को एक भीषण बाढ़ आई थी। जून में बारी बारिश के दौरान वहां बादल फटे थे और कहते हैं कि केदारनाथ मंदिर से 5 किलोमीटर ऊपर चौराबाड़ी ग्लेशियर के पास एक झील बन गई थी जिसके टूटने से उसका सारा पानी तेजी से नीचे आ गया था। यह बिल्कुल जल प्रलय जैसा ही दृश्य था।
केदारनाथ मंदिर के मुख्य तीर्थ पुरोहित ने उस वक्त कहा था कि 16 जून को शाम करीब 8 बजे के बाद अचानक मंदिर के पीछे ऊपर वाले पहाड़ी भाग से पानी का तेज बहाव आता दिखा। इसके बाद तीर्थयात्रियों ने मंदिर में शरण ली। रातभर लोग एक-दूसरे को ढांढस बंधाते दिखे। मंदिर के चारों ओर जल प्रलय था।
पानी, रेत, चट्टान, पत्थर और मिट्टी के सैलाब ने पूरी केदार घाटी के पत्ते-पत्ते को उजाड़ दिया। पहाड़ों में धंसी बड़ी-बड़ी मजबूत चट्टाने भी टूटकर पत्थर बन गई थी। सैलाब के सामने कोई नहीं टिक पाया था मंदिर पर भी खतरा मंडरा रहा था।
केदारनाथ के दो साधुओं की मानें तो एक चमत्कार ने मंदिर और शिवलिंग को बचाया। 16 जून को जब सैलाब आया तो इन दोनों साधुओं ने मंदिर के पास के एक खंबे पर चढ़कर रातभर जागकर अपनी जान बचाई थी। खंबे पर चढ़े साधुओं ने देखा कि मंदिर के पीछे के पहाड़ से बाढ़ के साथ अनुमानित 100 की स्पीड से एक विशालकाय डमरूनुमा चट्टान भी मंदिर की ओर आ रही है, लेकिन अचानक वह चट्टान मंदिर के पीछे करीब 50 फुट की दूरी पर रुक गई। ऐसा लगा जैसे उसे किसे ने रोक दिया हो।
उस चट्टान के कारण बाढ़ का तेज पानी दो भागों में कट गया और मंदिर के दोनों ओर से बहकर निकल गया। उस वक्त मंदिर में 300 से 500 लोग शरण लिए हुए थे। साधुओं के अनुसार उस चट्टान को मंदिर की ओर आते देख उनकी रूह कांप गई थी। उन्होंने केदार बाबा का नाम जपना शुरू कर दिया और अपनी मौत का इंतजार करने लगे थे, लेकिन बाबा का चमत्कार की उस चट्टान ने मंदिर और उसके अंदर शरण लिए लोगों को बचा लिया।
कहते हैं कि उस प्रलयंकारी बाढ़ में लगभग 10 हजार लोग मारे गए थे। आज उस घटना को बीते 6 साल हो चुके हैं और वह शिला आज भी केदारनाथ के पीछे आदि गुरु शंकराचार्य की समाधी के पास स्थित है। आज इस शिला को भीम शिला कहते हैं। लोग इस शिला की पूजा करने लगे हैं।
तारणहार इसी शिला ने बाढ़ त्रासदी में बाबा केदारनाथ धाम ज्योतिर्लिंग मंदिर की रक्षा की थी। आज भी इस शिला का रहस्य बरकरार है कि मंदिर की चौड़ाई के बराबर यह शिला आई कहां से और कैसे यह अचानक मंदिर के कुछ दूरी पर ही रुक गई? आखिर यह चमत्कार कैसे हुआ। क्या यह चमत्कार आदि गुरु शंकराचार्य का था? जिनकी समाधी मंदिर के पीछे ही स्थित है, या कि यह महज एक संयोग था। शिला का प्रकट होना और अचानक रुक जाना निश्चित ही बाबा की कृपा ही कही जाएगी।
आज इस शिला के चमत्कार को सभी लोग नमस्कार कर रहे हैं, क्योंकि इस शिला ने सही समय पर और सही जगह रुककर मंदिर को सुरक्षित किया था। पूरी बाढ़ के पानी तथा उसके साथ आने वाले बड़े-बड़े पत्थरों को इसी शिला ने रोककर केदारनाथ मंदिर की रक्षा की थी। डमरूनुमा भीमशिला की चौड़ाई लगभग मंदिर की चौड़ाई के बराबर है जिसने प्रलय का अभिमान चकनाचूर कर मंदिर को लेशमात्र भी क्षतिग्रस्त नहीं होने दिया।
कुछ लोग कहते हैं कि सर्वप्रथम यह मंदिर पांडवों ने बनवाया था। यहीं भीम ने भगवान शंकर का पीछा किया था। प्रलय के समय ऐसा लगा जैसे भीम ने अपनी गदा गाड़कर महादेव के मंदिर को बचाया हो। संभवत: इसीलिए इस शिला को लोग भीम शिला कहने लगे हैं। भोलेनाथ की महिमा तो भोलेनाथ ही जानें।
 

रोहतक: हरियाणा (haryana) के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupendra singh Hooda) का कहा है कि प्रदूषण (Pollution) के लिए सिर्फ पराली जलाने (Stubble burning) को ही जिम्मेदार नहीं मान सकते हैं दूसरे बहुत से कारण भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं.  हुड्डा ने कहा कि प्रदूषण के लिए निर्माण कार्य और उद्योग भी उतने ही जिम्मेदार हैं. 

भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने मांग की कि सरकार पराली के मुद्दे का स्थाई समाधान करे. उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की पराली पर एमएसपी फिक्स करे और खरीदें.

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों के साथ भेदभाव कर रही है क्योंकि पंजाब में किसानों को ढाई हजार रुपए प्रति एकड़ दिया जा रहा है जबकि हरियाणा में सरकार ₹1000 प्रति एकड़ पराली के लिए किसानों को दे रही है.

हुड्डा ने कहा कि सरकार को सलाह देते हुए कहा कि पराली को अनेक तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है. उद्योग, खाद व अलग-अलग कामों में पराली काम आ सकती है इसलिए सरकार किसानों की पराली खरीदें.

रोहतक: हरियाणा (haryana) के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupendra singh Hooda) का कहा है कि प्रदूषण (Pollution) के लिए सिर्फ पराली जलाने (Stubble burning) को ही जिम्मेदार नहीं मान सकते हैं दूसरे बहुत से कारण भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं.  हुड्डा ने कहा कि प्रदूषण के लिए निर्माण कार्य और उद्योग भी उतने ही जिम्मेदार हैं. 

भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने मांग की कि सरकार पराली के मुद्दे का स्थाई समाधान करे. उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की पराली पर एमएसपी फिक्स करे और खरीदें.

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों के साथ भेदभाव कर रही है क्योंकि पंजाब में किसानों को ढाई हजार रुपए प्रति एकड़ दिया जा रहा है जबकि हरियाणा में सरकार ₹1000 प्रति एकड़ पराली के लिए किसानों को दे रही है.

हुड्डा ने कहा कि सरकार को सलाह देते हुए कहा कि पराली को अनेक तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है. उद्योग, खाद व अलग-अलग कामों में पराली काम आ सकती है इसलिए सरकार किसानों की पराली खरीदें.

नयी दिल्ली। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने इंटरनेट पर बच्चों से जुड़ी पॉर्न सामग्री के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए अपने मुख्यालय में एक ऑनलाइन बाल यौन उत्पीड़न और शोषण रोकथाम/जांच इकाई की स्थापना की है। अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।उन्होंने बताया कि एजेंसी की विशेष अपराध जांच शाखा के अंतर्गत आने वाली यह नई ‘‘विशेष इकाई’’ न केवल उन लोगों से संबंधित खुफिया जानकारी एकत्र करेगी, जो इंटरनेट पर ऐसी सामग्री बना रहे हैं और प्रसारित कर रहे हैं, बल्कि उन लोगों की भी जानकारियां एकत्र करेगी, जो ऐसी सामग्रियों को इंटरनेट पर ब्राउज और डाउनलोड कर रहे हैं।

अधिकारियों ने बताया कि यह बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री पर रोकथाम के लिए एजेंसी का सक्रिय कदम लगता है। उन्होंने बताया कि भारतीय दंड संहिता, बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के तहत अपराधियों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाएगा।

भुवनेश्वर। ओडिशा में एक सरकारी पुस्तिका में दावा किया गया है कि महात्मा गांधी की मृत्यु ‘‘दुर्घटना’’ के चलते हुयी जिसके बाद इसे लेकर राज्य में विवाद छिड़ गया है। राजनीतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से माफी मांगने और इस ‘‘बड़ी भूल’’ को तत्काल सुधारने को कहा है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर प्रकाशित दो पृष्ठों की पुस्तिका ‘आमा बापूजी: एका झलक’ में उनकी शिक्षाओं, उनके कार्यों और ओडिशा से उनके जुड़ाव की संक्षिप्त जानकारी दी गई है। इसमें दावा किया गया है कि गांधी का ‘‘दिल्ली के बिड़ला हाउस में 30 जनवरी 1948 को अचानक हुए घटनाक्रम में दुर्घटना के चलते निधन हो गया’’। पुस्तिका पर मचे बवाल के बीच पटनायक नीत सरकार ने यह पता लगाने के लिए जांच का आदेश दिया है कि स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग ने ऐसी जानकारी प्रकाशित क्यों की।
इस पुस्तिका को राज्य सरकार के स्कूलों और राज्य सरकार से सहायता प्राप्त स्कूलों में वितरित करने के लिए प्रकाशित किया गया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री नरसिंह मिश्रा ने कहा कि सरकार के प्रमुख होने के नाते मुख्यमंत्री को पुस्तिका में प्रकाशित गलत सूचना के लिए माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने इस गलती को ‘‘अक्षम्य कृत्य’’ बताया।  कांग्रेस विधायक दल के नेता ने कहा, ‘‘पटनायक को इस बड़ी भूल की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, माफी मांगनी चाहिए और पुस्तिका तत्काल वापस लेने के लिए निर्देश जारी करने चाहिए।’’ मिश्रा ने बीजद सरकार पर गांधी से नफरत करने वालों का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बच्चों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि महात्मा गांधी की हत्या किसने की और उनकी हत्या किन परिस्थितियों में की गई।
उन्होंने कहा, ‘‘राष्ट्रपिता से नफरत करने वालों को खुश करने के लिए उनके निधन की जानकारी इस प्रकार दी गई।’’ भाकपा ने राज्य सचिव आशीष कानूनगो ने भी आरोप लगाया कि यह कदम इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और सच को छुपाने के लिए राज्य के रचे षड्यंत्र का हिस्सा है। कानूनगो ने कहा, ‘‘हर कोई जानता है कि नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की, जिसके बाद उसे पकड़ा गया, उसके खिलाफ मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई। बच्चों को सच बताया जाना चाहिए और पुस्तिका को तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।’’ माकपा नेता जनार्दन पति ने भी कहा कि सरकार ने बच्चों को गुमराह करने की यह ‘‘कोशिश जानबूझकर’’ की है। उन्होंने कहा, ‘‘चालाकी से असत्य बताया गया है। मुख्यमंत्री को इस बड़ी भूल के लिए माफी मांगनी चाहिए।’’
सूत्रों ने बताया कि सरकार ने स्कूलों से पुस्तिका वापस लेने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी है।  जाने माने शिक्षाविद प्रोफेसर मनोरंजन मोहंती ने सरकारी प्रकाशन में गलत तथ्य पेश करने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की। सामाजिक कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंतारा ने दावा किया कि ‘‘गोडसे से सहानुभूति रखने वालों ने लेखक एवं प्रकाशक को प्रभावित किया होगा’’। उन्होंने सही जानकारी प्रकाशित कर संशोधित पुस्तिका छात्रों में पुन: वितरित करने पर जोर दिया।  इस बीच, राज्य स्कूल एवं जन शिक्षा मंत्री समीर रंजन दास ने कहा कि मामले की जांच की जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इस कृत्य के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

साल 2011 में तत्तकालीन कृषि मंत्री शरद पवार कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब बाहर निकल रहे थे तभी अरविंदर ने उनके गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया था। खुद पर अचानक हुए हमले से लड़खड़ाए पवार गिरते-गिरते बचे थे।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार को एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान थप्पड़ मारने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया गया है। दिल्ली पुलिस ने अरविंदर सिंह नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है। बता दें कि साल 2011 में तत्तकालीन कृषि मंत्री शरद पवार कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब बाहर निकल रहे थे तभी अरविंदर ने उनके गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया था। खुद पर अचानक हुए हमले से लड़खड़ाए पवार गिरते-गिरते बचे थे।

उसका कहना था कि आम आदमी परेशान है और नेता सही मुद्दों पर ध्यान नहीं देते। उस वक्त निजी सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़कर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया था। लेकिन पुलिस कस्टडी से अरविंदर भागने में सफल हो गया था। जिसके बाद पुलिस ने जगह-जगह थापेमारी भी की थी। लेकिन घटना के करीब आठ साल बाद जाकर दिल्ली पुलिस को कामयाबी मिली है।

उनके अनुयायी उन्हें नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। नानकदेव अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे।
नानक देव जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा,14अप्रैल 1469ईसवी
राय भोई की तलवंडी, (वर्तमान ननकाना साहिब, पंजाब,पाकिस्तान) मृत्यु 22 सितंबर 1539 करतारपुर में हुई थी ।स्मारक समाधि करतारपुर में ही है ।वे सिख धर्म के संस्थापक थे ।उनके उत्तराधिकारी गुरु अंगद थे । वैसे जन्म के समय वे सनातन हिन्दू थे।सिख धर्म की स्थापना का श्रेय उन्हें जाता हैउनकी जीवनसाथी बीबी सुलखनी थीं ।माता-पिता लाला कल्याण राय (मेहता कालू जी), माता तृप्ता देवी जी थीं ।
सिख सतगुरुओं के नाम--
सतगुरु नानक देव ,सतगुरु अंगद देव,सतगुरु अमर दास,सतगुरु राम दास,सतगुरु अर्जन देव,सतगुरु हरि गोबिंद,सतगुरु हरि राय,सतगुरु हरि कृष्ण,सतगुरु तेग बहादुर ,सतगुरु गोबिंद सिंह ।कुल दस गुरु हैं ।
बचपन से ही उनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा। ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्रापति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए। तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएं घटी जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानने लगे। बचपन के समय से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे।
नानक के सिर पर सर्प द्वारा छाया करने का दृश्य देखकर राय बुलार का नतमस्तक होना
इनका विवाह बालपन मे सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। ३२ वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ। चार वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ। दोनों लड़कों के जन्म के उपरांत १५०७ में नानक अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास इन चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पडे़।
गुरु नानक देव जी की यात्राएं-
वे चारों ओर घूमकर उपदेश देने लगे। 1521 तक उन्होंने चार यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में "उदासियाँ" कहा जाता है।
नानक सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा उन्होंने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग मानवता को दिया। उन्होंने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया । उनके दर्शन में सूफीयोंं जैसी थी । साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।
इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था ।
जीवन के अंतिम दिनों में उनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ। स्वयं ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और मानवता कि सेवा में समय व्यतीत करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर 22 सितंबर 1539 ईस्वी को उनका परलोकवास हुआ।
मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।नानकदेव अच्छे सूफी कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा "बहता नीर" थी जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी के शब्द समा गए थे।
उन्होंने लोगों को धर्म,आध्यात्म,मानवता,भाईचारे व मुहब्बत का पाठ पढ़ाया था ।
"मानवता के दीप थे,मानवता के नूर ।
पापकर्म को कर दिया,हर इक जन से दूर ।।"

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