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खास बातें

  • मात्र 20 रुपये खर्च करने पर पसीने की जांच से आनुवांशिक बीमारी का पता लगाया जा सकता है
  • अब दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक भी एम्स की इस नायाब मशीन के बारे में सुनकर हैरान हो चुके हैं
  • एम्स ने इस मशीन को अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हुए प्रदर्शनी में रखा है
 
मात्र 20 रुपये खर्च करने पर पसीने की जांच से आनुवांशिक बीमारी का पता लगाया जा सकता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) करीब 20 वर्षों से देशी मशीन के जरिये सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी दुर्लभ बीमारी की जांच कर रहा है। अब दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक भी एम्स की इस नायाब मशीन के बारे में सुनकर हैरान हो चुके हैं।  एम्स ने इस मशीन को अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हुए प्रदर्शनी में रखा है। 
 
एम्स के बालरोग विभाग के डॉ. एसके काबरा बताते हैं कि सिस्टिक फाइब्रोसिस एक अनुवांशिक बीमारी है जोकि शरीर के कई भागों को प्रभावित करता है। आमतौर पर विदेशों में इस रोग की जांच के लिए करीब 10 से 15 लाख रुपये की मशीन है। 

भारत में भी निजी क्लीनिक में इस जांच के 5 हजार रुपये लगते हैं। लेकिन एम्स में स्वदेशी मशीन पर जांच कराने का खर्च करीब 20 रुपये के आसपास है। फिलहाल करीब 700 बच्चे इस बीमारी के चलते एम्स में अपना उपचार करा रहे हैं। हर वर्ष करीब 600 मरीजों की जांच एम्स देशी मशीन से कर रहा है। 

ऐसी है पसीने की जांच करने वाली मशीन

डॉक्टरों के अनुसार मरीज के पसीने में क्लोराइड की मात्रा का पता करके रोग की पहचान की जा सकती है। करीब एक हजार रुपये की लागत से बनी एम्स की स्वीट क्लोराइट टेस्ट मशीन में एमीमीटर और रेगुलेटर लगा होता है। एमीमीटर के नेगेटिव और पॉजिटिव इलेक्ट्रो को हाथ पर चिपकाया जाता है। 

इस जांच में मिथाइल अल्कोहल, मिलीक्यू वॉटर, फिल्टर पेपर का इस्तेमाल भी किया जाता है। अभी तक करीब 10 हजार से ज्यादा जांच हो चुकी हैं। कई अंतरराष्ट्रीय  मेडिकल जर्नल में भी वैज्ञानिकों ने एम्स की इस मशीन को दुनिया का सबसे बेहतर मॉडल बताया है। 

नशा छोड़ने वालों की कला ने किया हैरान

एम्स का हरेक कर्मचारी उस वक्त हैरान हो जाता है जब उसके सामने नशा छोड़ने वालों की कला दिखाई देती है। शराब, अफीम, चरस, सिगरेट जैसे नशे की लत को छुड़ाने के लिए कई लोग एम्स में भर्ती हुए थे। तमाम काउंसलिंग और दवाओं के जरिये जब इन्होंने नशा छोड़ा तो इनके भीतर की कला उभर कर सामने आई। 

गाजियाबाद स्थित एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेस ट्रीटमेंट सेंटर में भर्ती इन मरीजों ने हस्तकला का प्रदर्शन दिखाते हुए कई उत्पाद तैयार किए हैं। इन सभी उत्पादों की प्रदर्शनी एम्स के 64वें स्थापना दिवस पर निदेशक कार्यालय में लगी है। बृहस्पतिवार को प्रदर्शनी देखने पहुंचे डॉक्टर व नर्सिंग कर्मचारियों ने जब नशा छोड़ने वालों की हस्तकला देखे तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। 

उन्होंने प्रदर्शनी के प्रतिनिधि से इसके बारे में पूछा तो पता चला कि वे अपने मरीजों को हमेशा ही ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ये मरीज अस्पताल से डिस्चॉर्ज हो चुके हैं लेकिन अपनी कला को एक पहचान के रूप में एम्स में ही छोड़ गए हैं। यह सुन हर कोई अपने फोन में मरीजों की कला को कैद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर इसे पोस्ट भी कर रहे हैं। एम्स के ही मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि नशा किसी भी इंसान की क्षमता और सोच दोनों को प्रभावित करता है। 

अगर आप वर्कआउट कर रहे हैं और उसका रिजल्ट अच्छा चाहते हैं तो इसके लिए डायट का विशेष ध्यान देना होगा। वर्कआउट के बाद होने वाली थकान को भगाने के लिए आपको एनर्जी की आवश्यकता होती है। इसके लिए आपको एनर्जी ड्रिंक का सहारा लेते हैं। अगर आप बाजार में मिलने वाले एनर्जी ड्रिंक्स की जगह प्राकृतिक ड्रिंक्स को प्राथमिकता देंगे तो यह आपकी सेहत के लिए यह फायदेमंद होगा। आइए जानते हैं वर्कआउट करने के बाद किन ड्रिंक्स को लेना चाहिए।
नारियल पानी- नारियल पानी में प्राकृतिक पोटैशियम होता है। इससे शरीर में पानी की कमी पूरी होती है। इसके साथ ही नारियल पानी वर्कआउट करने के बाद हमारे शरीर को एनर्जी देता है।
नींबू पानी- नींबू में विटमिन सी पाया जाता है। विटमिन सी हमारे शरीर को तुरंत एनर्जी पहुंचाता है। इसके अलावा नींबू पानी हमारे इम्यून सिस्टम को भी तेज करता है।
दूध- आपने अक्सर लोगों को यह कहते सुना होगा कि वर्कआउट के बाद दूध पीना चाहिए। वर्कआउट करने के बाद हड्डियों और मांसपेशियों के लिए दूध बहुत फायदेमंद होता है।
पानी- पानी हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसलिए लोग वर्कआउट के बाद पानी पीने की सलाह देते हैं। एक बात का ध्यान ध्यान रखना चाहिए कि पानी वर्कआउट के कुछ समय बाद पीना चाहिए।
ग्रीन टी- वर्कआउट के बाद आप ग्रीन टी पी सकते हैं। ग्रीन टी शरीर को सही तरह से एनर्जी देती है और मेटाबॉलिज्म भी बढ़ाती है।
चैरी जूस- वर्कआउट करने के बाद चैरी का जूस काफी फायदेमंद होता है। चैरी का जूस हमारी थकी हुई मसल्स और बॉडी का आराम पहुंचाता है।
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अगर गर्भावस्था के दौरान मांएं तनाव लेती हैं तो उनके बच्चों को 30 साल की उम्र तक आते-आते पर्सनैलिटी डिसऑर्डर होने की आशंका 10 गुना तक बढ़ जाती है। फिनलैंड में 3,600 महिलाओं पर हुए अध्ययन के मुताबिक, अगर लंबे समय तक हल्का तनाव है तब भी वह बच्चे के विकास पर असर डालता है और जन्म के बाद इसका असर बढ़ता जाता है।
तनाव रिश्तों की समस्याओं, सामाजिक तत्वों और मानसिक समस्याओं से जुड़ा हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने से महिलाओं को पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से बचाया जा सकता है।
इसे कहते हैं पर्सनैलिटी डिसऑर्डर
जब किसी के व्यक्तित्व के कुछ पहलू उनके और अन्य लोगों के लिए जीवन को कठिन बना देते हैं तो उसे पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहा जा सकता है। ऐसे लोग जरूरत से ज्यादा चिंतित, भावनात्मक रूप से अस्थिर, विरोधाभासी और असामाजिक हो सकते हैं। ऐसे लोगों को डिप्रेशन होने की आशंका भी अधिक रहती है।
प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा तनाव में रहने वाली महिलाओं में मिसकैरेज का खतरा बढ़ जाता है। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और चीन की झेजंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया है। अध्ययनकर्ताओं का दावा है कि प्रेग्नेंसी के दौरान तनाव लेने वाली महिलाओं में गर्भपात का खतरा 42 फीसदी बढ़ जाता है।
इससे पहले हुए अध्ययन की रिपोर्ट में यह पाया गया था कि 24 सप्ताह की प्रेग्नेंसी में होने वाले गर्भपात में 20 फीसदी मामले तनाव के कारण होते हैं, लेकिन दोबारा अध्ययन के बाद यह पाया गया कि आंकड़ें इससे कहीं ज्यादा हैं। यही नहीं फिनलैंड में हुए एक अध्ययन से इस बात का भी खुलासा किया गया कि गर्भावस्था के दौरान तनाव लेने से जन्म लेने वाले बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है।
ऐसे कम करें तनाव
-काम का बहुत ज्यादा तनाव न लें।
-योग करें या स्ट्रेचिंग करें।
-स्विमिंग करें या वॉक करें।
-संतुलित आहार लें।
-रात में जल्दी सो जाएं
-खुश रहें, मुस्कुराएं।
-किताबें पढ़ें।
प्रेग्नेंसी में स्ट्रेस से गर्भस्थ के मस्तिष्क और दिल पर असर पड़ता है। गर्भवती को बीपी समेत कई अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं। मां के गर्भावस्था के अंतिम समय में तनाव में होने से गर्भस्थ को कम एनर्जी पहुंच पाती है जो बच्चे को गर्भ में बढऩे से रोकता है।
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नवरात्र में दुर्गा पूजा, डांडिया, गरबा और सिंदूर खेली के लिए बंगाली परंपरा के अनुसार साड़ी पहनने की इच्छा हर लड़की की होती है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम कितने मॉडर्न हैं, हमें अपनी परंपराओं से प्यार है। आप भी इस नवरात्र दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली स्टाइल में साड़ी पहनना चाहती हैं तो यहां जानें इसे पहनने का सही और बेहद आसान तरीका...
बंगाली साड़ी
बंगाली साड़ी की खूबी यह है कि यह बॉर्डर वाली साड़ी होती है। बेसिक और रोजमर्रा की साडिय़ा प्योर कॉटन या खादी में होती हैं जबकि त्योहार के अवसर पर पहनी जानेवाली साडिय़ां सिल्क और जरी में होती हैं। ऐसा पारंपरिक तौर पर होता था बाकि तो अब हर पैटर्न और फैब्रिक में आपको साडिय़ां मिल जाएंगी। लेकिन दुर्गा पूजा के लिए रेड बॉर्डर वाली साड़ी ही खरीदें।
ऐसे पहनें
-पेटीकोट और ब्लाउज पहनने के बाद सबसे पहले साड़ी को अपनी कमर के चारों तरफ अच्छी तरह पेटीकोड में दबाते हुए ड्रेप कर लें। साड़ी आपको इस तरह दबानी है कि पहली प्लीट राइट से लेफ्ट की तरफ बने।
-इस साड़ी में आपको नॉर्मल साड़ी से अलग और करीब तीन गुना बड़ी या चौड़ी प्लीट्स में बांधा जाता है। ताकि चलने में आसानी रहे।
-इस हिसाब से इस साड़ी को बांधते समय दो से तीन चौड़ी प्लीट्स बनेंगी। आखिरी प्लीट ऐसे बनाएं कि साड़ी का बचा हुआ हिस्सा आपके लेफ्ट हैंड की तरफ मुड़े।
- अब इस साड़ी के बचे हुए अनड्रेप हिस्से से पल्लू की प्लीट्स बनाएं और पल्लू को लूज छोड़ते हुए इसे कंधे पर सेफ्टी पिन की मदद से टक करें।
- पल्लू का जो हिस्सा कंधे के पीछे की तरफ गया है, उसे पीछे से घुमाते हुए, सीधे हाथ के नीचे से निकालें और इसके एक कोने में चाबी का गुच्छा या कुछ लटकन बांध लें और सीधे हाथ के कंधे पर पीछे की तरफ डाल लें।
- आप चाहें तो अपनी सुविधा के लिए सीधे कंधे पर डाले गए पल्लू को शॉल्डर पर सेफ्टी पिन से टक भी कर सकती हैं। अब आप लाल बिंदी, लिपस्टिक और काजल से अपने लुक को कंप्लीट करें।
-साथ ही साड़ी के साथ बालियां या पारंपरिक झुमकियां पहनें। हाथों में चौड़े कड़े और लाल चूडिय़ां पहनें। अब आप तैयार हैं, अपने खूबसूरत बंगाली लुक के साथ दुर्गा पूजा के लिए।
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नवरात्रि सिर्फ पूजा पाठ और व्रत के लिए ही नहीं बल्कि पंडाल, गरबा नाइट्स और रंग बिरंगे कपड़ों के लिए भी जाना जाता है. नवरात्रि के दिनों में लड़कियों में फैशन ट्रेंड कुछ अलग ही होता है. बात चाहे कपड़ों की हो, हेयर स्टाइल की हो या फिर ज्वैलरी की, नवरात्रि के दौरान ट्रेडिशनल इंडियन आउटफिट्स काफी ट्रेंड में रहते हैं. लड़कियों का फैशन सेन्स भी सिर चढ़कर बोलता है. इन दिनों अनारकली सूट, लहंगा और सिल्क की साडिय़ां पहनना ज्यादातर लड़कियों की पसंद होता है. कपड़ों के साथ-साथ अगर मैचिंग ज्वैलरी और फुटवियर हों, तो आपके लुक पर चार चांद लग जाते हैं.
फुटवियर की बात करें तो अलग-अलग कपड़ो के साथ आप अलग-अलग तरह की चप्पलों को ट्राई कर सकते हैं. त्योहारों के इस सीजन में इन दिनों कोल्हापुरी चप्पलें काफी ट्रेंड में हैं. कोल्हापुरी चप्पलें और मोजडिय़ां ट्रेडिशनल ड्रेस के साथ काफी अच्छी लगती हैं. महिलाएं हो या पुरुष दोनों ही इसे पहनना बहुत पसंद करते हैं. अब इन कोल्हापुरी चप्पलों में काफी कुछ बदलाव भी आ रहा है. पहले इनमें सिर्फ फ्लैट सोल ही होता था लेकिन अब इनमें हील्स और हल्के फ्लिप-फ्लॉप्स स्टाइल भी आने लगे हैं.
इसके अलावा अब यह सिर्फ ब्राउन या चमड़े के वास्तविक रंगों में ही नहीं आते, अब इनकी सिलाई में भी प्रयोग किए जाने वाले धागों के रंगों में भी बदलाव आ गया है. चाहे लहंगा हो, साड़ी या सूट, कोल्हापुरी चप्पल आप किसी भी आउटफिट के साथ ट्राई कर सकते हैं. इसे आप रोज के कैजुअल्स के साथ भी पहन सकते हैं. ये चप्पलें स्टाइल के अलावा आपके पैरों की सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद हैं. आइए बताते हैं इससे जुड़ी कुछ खास बातें.
तलवों को मिलता है आराम
कोल्हापुरी चप्पलों का सोल काफी सपाट और पतला होता है. इसके बावजूद पहनने वाले को यह काफी आरामदेह लगता है क्योंकि सपाट सोल के कारण आपके पैर चप्पल पर बराबरी से फैलते हैं. इस तरह आपके पैरों का कोई भी कोना इसमें दबा नहीं रहता जिसके कारण चलते वक्त पैरों में रक्त का संचार अच्छे से होता है.
उंगलियों के लिए आरामदायक
कोल्हापुरी चप्पलें आगे से खुली होती हैं, इसलिए यह आपके नाखून व उंगलियों को काफी आराम पहुंचाती हैं. इसके अलावा जिन लोगों में पैर के अंगूठे के जोड़ पर कड़ा (बनियन) हो, उनके लिए भी कोल्हापुरी चप्पलें बहुत फायदेमंद होती हैं. इस चप्पल में पैरों का ज्यादातर हिस्सा खुला होता है, इसलिए इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए इसे पहनना आसान होता है. कुछ लोगों की उंगलियां आगे से या बीच से उठी सी या टेढ़ी सी लगती हैं उनके लिए यह काफी फायेदमंद है.
कुशन वाली चप्पलें ज्यादा फायदेमंद
इन दिनों जहां स्टाइल बदल रहा वैसे ही बदलते हुए डिजाइल के साथ कोल्हापुरी चप्पलें भी बदल रही हैं. आजकल इन चप्पलों के सोल में कुशन का प्रयोग भी होने लगा है. मोटे सोल वाली कोल्हापुरी चप्पलें ज्यादा फायदेमंद हो सकती हैं. हालांकि जिनके पैरों की पिंडलियों में ज्यादा दर्द हो, वो इसे पहनने से बचें.
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आंखें बहुत कुछ बयां करती हैं. वह बिन बोले ही बहुत कुछ समझा देती हैं. आंखें हमारे शरीर का सबसे खूबसूरत और नाजुक हिस्सा हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आंखों की सही देखभाल के साथ साथ आंखों को आकर्षक और सुंदर रखना भी बेहद जरूरी है. दरअसल चेहरे पर सबसे खूबसूरत और आकर्षक आंखें होती हैं. शरीर के अन्य अंगों की तरह आंखों की देखभाल भी जरूरी है. ऐसे में आंखों की देखभाल करने और उसे सुदंर बनाने का तरीका भी कुछ खास होना चाहिए. आइए आपको बताते हैं आंखों को सुदंर और सही रखने के कुछ खास उपाय-
गुलाब जल का करें इस्तेमाल
रात को सोने से पहले गुलाब जल की 2 बूंदे आंखों में डाल लें. इससे सुबह आंखें एकदम फ्रेश लगेंगी. साथ ही आंखों से सबकुछ साफ साफ नजर आएगा.
मेकअप रिमूव करना न भूलें
रात को सोने से पहले आंखों का मेकअप रिमूव करना न भूलें. क्लींजिंग मिल्क आंखों के आसपास की जगह पर लगाएं और उसे रुई से पोंछ लें.
बादाम तेल से करें मालिश
अगर आपकी आंखों के नीचे काले धब्बे (डार्क सर्क्लस) हैं तो आप रोज आंखों के आसपास बादाम के तेल से हल्की मालिश करें. मालिश के बाद तेल को 15 मिनट तक लगा रहने दें. फिर भीगी रुई से उसे पोंछ लें. इससे आपकी आंखें आकर्षक दिखने लगेंगी.
पका हुआ पपीता लगाएं
आंखों पर पका हुआ पपीता लगाने से भी वह सुदंर दिखती हैं. पके पपीते को मैश कर लें. फिर इसमें एक बूंद शहद मिलाएं. इसे आंखों के आसपास लगाकर 10 मिनट तक रखें, फिर आंखो को धो लें. इसके अलावा आंखों पर खीरे के टुकड़े रखने से भी आंखें फ्रेश होती हैं.
दूध का करें इस्तेमाल
इसके अलावा आंखों को सुंदर बनाने के लिए आप बादाम और दूध का पेस्ट तैयार करें और इसे 20 मिनट तक आंखों के नीचे लगाकर रखें. इसके बाद इसे ठंडे पानी से धो लें. ऐसा करने से आंखों के नीचे पडऩे वाले डार्क सर्कल्स गायब हो जाते हैं.
शहद और अंडे का करें इस्तेमाल
वहीं थोड़े से शहद में अंडे का सफेद हिस्सा मिला कर आंखों के चारों ओर लगाएं और 20 मिनट बाद इसे धो लें. इससे आंखों के आसपास की त्वचा का रंग साफ होने लगता है और आंखें सुंदर दिखने लगती हैं.
केसर का करें प्रयोग
आपको बता दें कि केसर का सेवन करने से भी आंखें सुंदर दिखने लगती हैं. इसके अलावा आप उसे आंखों पर लगा भी सकते हैं. केसर के कुछ रेशे गुलाब जल में एक घंटे के लिए भिगोएं. इसके बाद रुई भिगोकर बंद आंखों पर रख दें. 5 मिनट बाद इसे उठा लें. ऐसा करने से आंखों के नीचे काले घेरे कम हो जाते हैं.
आराम लें और नींद पूरी करें
वहीं आंखों की खूबसूरती के लिए आराम या नींद का पूरा होना भी बेहद जरूरी होता है. सोते समय आंखें बंद होती हैं, जिससे इन्हें नैचुरल मॉइश्चराइजर मिलता है इसलिए कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लें.
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फ्रूट जूस केवल हमें हेल्दी बनाने में ही मददगार नहीं हैं बल्कि ये हमारी खूबसूरती के लिए भी एक कंप्लीट टॉनिक हैं। जी हां, टॉनिक। फ्रूट जूस के पीने से हमारी स्किन सुंदर, साफ और चमकदार बनती है। इसलिए आपको जो भी फ्रूट्स पसंद हैं, उन्हें रोज खाएं और उनका जूस भी पिएं। आइए जानते हैं कि स्किन का ग्लो और वाइटनेस बढ़ाने के लिए कौन-से फ्रूट्स सबसे अधिक इफेक्टिव हैं...
सेब का जूस
आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन सेब का जूस हमारे शरीर पर उम्र के प्रभाव को आने से रोकता है। इस जूस में ऐंटिऑक्सिडेंट्स बहुत अधिक मात्रा में होते हैं, जो ऐड फैक्टर्स को स्किन पर झलकने से रोकते हैं। वहीं, मिरल्स त्वचा को पोषण देते हैं। अगर आपमें ब्लड की कमी और पोषण का अभाव है तो एपल जूस का सेवन रोज करें।
पपीते का जूस
पपाया जूस पीने से आपकी आंखों के चारों तरफ उभर आए काले घेरे बस चंद दिनों में गायब हो सकते हैं। जूस पीते वक्त इसके कॉटन की मदद से थोड़ा-सा उन डार्क सर्कल्स पर लगा भी लें। फिर देखें इसका असर। हर रोज पपाया जूस पीने से पिग्मेंटेशन, डार्क सर्कल और ब्लैकनेस की दिक्कत दूर होती है। आपकी स्किन नॉर्मल हो या ड्राई यह जूस बहुत प्रभावशाली है आपकी त्वचा की चमक बढ़ाने में।
ऑरेंज जूस
विटमिन सी से भरपूर होने के कारण ऑरेंज जूस स्किन का ग्लो बढ़ाने में सबसे अधिक कारगर है। क्योंकि विटमिन सी स्किन टोन को लाइट करने का काम करता है। ऑरेंज के अलावा भी जैसे आंवला या मौसमी का जूस भी आप पी सकते हैं क्योंकि ये भी विटमिन सी का अच्छा सॉर्स हैं।
अंगूर का जूस
अंगूर के जूस में विटमिन सी और विटमिन ए भरपूर मात्रा में पाया जाता है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी स्किन फ्लॉलेस रहे और सूदिंग भी तो आपको ग्रेप्स जूस का नियमित सेवन करना चाहिए। यह पिग्मेंटेशन और डार्क पैचेज को दूर करने में मददगार है।
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स्लीप एपनिया एक ऐसी दिक्कत है, जिसमें पीडि़त व्यक्ति की सांस उस समय कुछ देर के लिए रुक जाती है, जब वह सो रहा हो। इस दौरान उनके शरीर को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। सांस टूटने से उनकी आंख खुल जाती है और उठते ही वह तेजी से हांफने लगता है। इस समस्या से ग्रस्त कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें जागने पर इस बात का अहसास भी नहीं होता कि सोते समय उन्हें सांस नहीं आ रही थी इसलिए वे तेजी से सांस ले रहे हैं और अजीब घबराहट महसूस कर रहे हैं।
स्लीप एपनिया कुछ हद तक खर्राटे लेने की तरह होती है, जिसमें कई लोगों को यह पता ही नहीं चल पाता कि सोते समय वे खर्राटे ले रहे थे। अगर स्लीप एपनिया का समय रहते पता ना चले तो यह कई दूसरी परेशानियों का कारण बन सकता है। जैसे, पूरी रात सोने के बाद भी सुबह के समय थकान महसूस होना, दिनभर आलस बने रहना, मानसिक समस्याएं होना, डाइजेशन ठीक से ना होना, यादाश्त पर असर, कब्ज बने रहना साथ ही हर्ट फेलियर जैसी स्थिति के लिए कंडीशंस तैयार करने की वजह भी हो सकता है।
स्लीप एपनिया के पारंपरिक उपचार में रात में सीपीएपी मास्क पहनना शामिल है। लेकिन कुछ लोग इस मास्क को लगाकर सोने में सहज नहीं होते। इन लोगों को अपनी रोजमर्रा की आदतों में बदलाव करना चाहिए। इनमें सबसे पहला नंबर आता है अपने वजन पर नियंत्रण रखना। हर रोज योग करना और हो सकते तो आधा घंटे की वॉक भी रोज करें। सोने की जगह और पॉश्चर बदल सकते हैं। एल्कोहॉल और स्मोकिंग से दूर रहें। अगर तब भी आराम महसूस ना हो तो डॉक्टर से जरूर मिलें।
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ध्यान या मेडिटेशन हमारे तनाव को कम करने में किसी चमत्कार की तरह काम करता है। इस मुद्दे पर नए सिरे से बात करने की जरूरत नहीं है कि हम सभी के जीवन में बढ़ती व्यस्तता के चलते तनाव किस कदर हावी होता जा रहा है। इस तनाव या स्ट्रेस पर अगर वक्त रहते ध्यान नहीं दिया जाए तो यह दूसरी भावनात्मक और शारीरिक परेशानियों की वजह बन सकता है।
ध्यान भारतीय सभ्यता और परंपराओं का हिस्सा है। योग चिकित्सा पद्धति ध्यान के बिना अधूरी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस तरह योगासन करने से हम कई तरह की शारीरिक बीमारियों से बचे रहते हैं, ठीक वैसे ही ध्यान करने पर स्ट्रेस, एंग्जाइटी, डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियां हमें परेशान नहीं करती हैं। पिछले दिनों कॉर्पोरेट प्रफेशनल्स पर हुई कई स्टडीज में भी यह बात सामने आई है कि ध्यान वर्क प्रेशर और टारगेट स्ट्रेस को कम करने में भी मददगार है।
इस तरह मिलेगा पूरा लाभ
ध्यान और मेडिटेशन करने के लिए आपको हर दिन 30 मिनट की जरूरत होगी। लेकिन इसकी शुरुआत आप 10 मिनट या 15 मिनट से भी कर सकते हैं। आप चाहें तो 30 मिनट के ध्यान को 10 मिनट के 3 सेशन या 15 मिनट के दो 2 सेशन में बांटकर भी कर सकते हैं। अगर आपको शुरुआत में मन एकाग्र करने में दिक्कत हो तो परेशान ना हों। आप कोशिश करते रहें। ऐसा सभी के साथ होता है शुरुआत में। जब ध्यान लगाने की कोशिश के दौरान उनका मन कहीं ना कहीं भटकता रहता है।
आने दें विचार
कई बार हम इस बात से परेशान हो जाते हैं कि हमारा ध्यान तो एकाग्र हो ही नहीं पा रहा है, आखिर हम ध्यान कैसे लगाएंगे? हमसे यह नहीं हो पाएगा। ऐसा ना सोचें और अपने मन में आनेवाले विचारों को जबरदस्ती दबाने की कोशिश ना करें। जब आप रोज बैठकर किसी बिंदू या किसी दीपक की लो पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करेंगे तो आपके मन में आनेवाले विचार धीरे-धीरे खुद ही कम हो जाएंगे।
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उपराष्ट्रपति को पत्र लिखकर बताई ये वजह
नई दिल्ली। दिवगंत अरुण जेटली के परिवार ने उन्हें मिलने वाली पेंशन को लेने से मना कर दिया है। इसके लिए उनकी पत्नी ने राज्यसभा के उपसभापति एम वेंकैया नायडू को एक पत्र लिखा है। जिसमें उनका कहना है कि भाजपा नेता को मिलने वाली पेंशन उन कर्मचारियों को दान कर दी जाए जिनकी तनख्वाह कम है। परिवार को पेंशन के तौर पर लगभग तीन लाख रुपये मिलते।
संगीता जेटली ने वेंकैया नायडू को पत्र लिखकर कहा, जिस महान कार्य को अरुण किया करते थे उनके उसी मार्ग पर चलते हुए मैं संसद से अनुरोध करती हूं कि एक दिवंगत सांसद के परिवार को मिलने वाली पेंशन को उस संस्थान के जरुरतमंद लोगों को दान कर दिया जाए जिसकी जेटली ने दो दशकों तक सेवा की है। यानी राज्यसभा के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को दी जाए। मुझे पूरा विश्वास है कि अरुण की भी यही इच्छा होती।
पत्र की एक प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेजी गई है। भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार अरुण जेटली ने 66 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स अस्पताल में 24 अगस्त को अंतिम सांस ली थी। वह यहां कई दिनों तक आईसीयू में भर्ती थे। उनके पास वित्त मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी थी। इसके अलावा वह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। वह चार बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेटली को अपना अमूल्य मित्र बताया था। वह एक ऐसे नेता थे जिसके पक्ष और विपक्ष दोनों में मित्र थे। पत्र में संगीता जेटली ने आगे लिखा कि अरुण हमेशा से एक परोपकारी रहे हैं। अपने कानूनी पेशे या राजनीति में उन्होंने जो भी सफलता हासिल की उनका मानना था कि यह उन्हें गुरु, सहयोगियों के समर्थन और दोस्तों, रिश्तेदारों की शुभकामनाओं के कारण मिली है। वह हमेशा जरुरत के समय हर किसी की मदद के लिए खड़े रहे।
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